तुम क्यों नहीं बनते विषपायी

—विनय कुमार विनायक
तुम क्यों नहीं बनते विषपायी?
सबके हिस्से का अमृत पी लेते
और दूसरों को गरल पिलाते हो,
किन्तु बनते नहीं हो विषपायी!

सृष्टि के सारे अवदान को तुम,
निज गेह में छुपा लिया करते,
बन जाते भोला-भाला तमाशाई,
किन्तु बनते नहीं हो विषपायी!

जब भी तुमको अवसर मिला,
सबकुछ झपट लिया करते हो,
दीन हीन की नही करते भलाई,
किन्तु बनते नहीं हो विषपायी!

नेकी करते नहीं हो पूछ-पूछकर
पिला देते हो सुकरात को जहर
देकर उस भोले शंकर की दुहाई,
किन्तु बनते नहीं हो विषपायी!

बड़ी दलीलें देते उनके विरुद्ध
गालियां देकर प्रतिभाहीन कहके,
किसी भी अवसर पर नहीं चूके
किन्तु बनते नहीं हो विषपायी!

आरक्षण जहर था, है, रहेगा भी,
रहने देते, तुमने क्यों पी लिया,
रे बाबा! वर्णसंकर को पीने देते,
तुम कब से हो गए विषपायी?

कमंडल तो कमंडल है, रहेगा भी,
कमंडल को मंडल क्यों बना दिए,
रे बाबा! उसे तो शुद्ध रहने देते,
क्या तुम भी वर्णसंकर विषपायी?
—विनय कुमार विनायक

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