‘ईश्वर का अवतार क्यों नहीं होता?’

मनमोहन कुमार आर्य
ईश्वर क्या है? ईश्वर एक सच्चिदानन्दस्वरुप, सर्वशक्तिमान, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि, अजर, अमर, अनन्त, नित्य एवं सृष्टिकर्ता आदि असंख्य गुण, कर्म व स्वभाव से युक्त दयालु व धर्म में स्थित सत्ता है। हमारे देश में पाषाण व धातुओं की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करने की परम्परा विगत दो या ढ़ाई हजार वर्षों से चल रही है। यह मूर्तियां किसी न किसी ईश्वर के अवतार की ही बनाई जाती हैं और कहा जाता है कि ईश्वर ने अमुक अमुक समय पर अमुक अवतार लिये हैं। अब वह जीवित नहीं हैं इस लिये उनकी मूर्ति बनाकर पूजा करने से वही लाभ होता है जो ईश्वर प्रायः अपनों भक्तों का किया करता है। इस मिथ्या मान्यता को मानने वालों से इसका प्रमाण पूछा जाये तो वह उनमें से किसी के पास नहीं है। हां, कुछ लोग पुराणों की ओर संकेत कर कह सकते हैं उनमें मूर्तिपूजा का विधान है। अब किसी पुस्तक में कोई विधान है तो विवेकशील मनुष्यों का कर्तव्य होता है कि वह तर्क, युक्ति व प्रमाणों से उसकी पुष्टि करें। ऐसा कोई तर्क, युक्ति व प्रमाण अवतार मानने व मूर्तिपूजा करने वाले बन्धुओं के पास नहीं है। यदि होता तो वह उसे प्रकाशित करते व उसका जोर शोर से प्रचार करते जैसा कि वैदिक धर्म का प्रचारक आर्यसमाज निराकार व सर्वव्यापक ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना का जप, स्वाध्याय, ध्यान आदि के द्वारा द्वारा प्रचार करता है और जप, ध्यान व स्वाध्याय के पक्ष में वेद व वेदानुकूल दर्शन व उपनिषदों के प्रमाणों देता है।

अवतार कहते हैं कि ऊंचे स्थान से नीचे उतरने को। अवतार का अर्थ होता है कि ईश्वर कहीं ऊंचे स्थान पर रहता है और वह यदा कदा पृथिवी पर मनुष्य शरीर में आता व लीला करता है। वह साधुओं की रक्षा व दुष्टों का विनाश करता हे। उनसे यदि पूछा जाये कि इसका प्रमाण क्या है तो वह गीता आदि ग्रन्थ के श्लोकों को बताते हैं। यदि उनसे पूछा जाये कि आज की परिस्थितियां तो महाभारत व रामायण काल से भी अधिक खराब हैं, भारत का विभाजन हो गया, लाखें सज्जन व बेकसूर लोग दुष्टों के द्वारा मारे गये। हिन्दुओं में संगठन नहीं है, समाज अनेक जन्मना जातियों में बंटा है, लोग ईश्वरीय ज्ञान वेदों को पढ़ते नहीं हैं, प्रतिदिन नारियों तथा समाज के दुर्बल लोगों पर अत्याचार होते हैं, शोषण और अन्याय होता है तो भगवान कृष्ण के बाद कोई अवतार क्यों नहीं हुआ? इसका उत्तर किसी भी अवतार को मानने वाले व्यक्ति व विद्वान के पास नहीं है। इसके विपरीत वेदों की मान्यता है कि ईश्वर के सर्वव्यापक व सर्वशक्तिमान होने के कारण ईश्वर का अवतार नहीं होता और न ही ईश्वर को अवतार लेने की आवश्यकता है। ईश्वर के जो भी करणीय कार्य हैं वह उन्हें बिना अवतार लिये सरलता व अपने स्वभाव से करता है। किसी बड़े से बड़े दुष्ट को मारना उसके लिये ऐसा है जैसे किसी चींटी को मसलना व इससे भी न्यून कोटि का काम है।

ईश्वर ही सज्जन व दुर्जन लोगों को जन्म देता है। दुर्जनों परमात्मा नहीं बनाता अपितु वह अपने अज्ञान व उससे उत्पन्न दुष्कर्मों को करके बनते हैं। उनकी जब भी मृत्यु होती है तो उनके शरीर से उनकी आत्मा व प्राण जो कि सूक्ष्म शरीर का भाग होते हैं, उन्हें स्थूल शरीर से पृथक करने का काम परमात्मा ही करता है। अब यह कार्य यदि परमात्मा आवश्यक समझे तो पहले भी कर सकता है, उसे अवतार लेने की आवश्यकता क्या है? प्रतिदिन असंख्य मनुष्य व अन्य प्राणी जन्म ले रहे हैं, यह सब ईश्वर के द्वारा उसकी बनाई व्यवस्था से ही तो हो रहा है। उस परमेश्वर ने ही सूर्य, पृथिवी, चन्द्र व अन्य सभी ग्रहों व उपग्रहों सहित पूरे ब्रह्माण्ड को बनाकर निराकार व सर्वव्यापक स्वरूप से धारण किया हुआ है। क्या यह कार्य एक अवतार की तुलना में कोई छोटा कार्य है? ईश्वर ही हमें सुख देता है। हमें सत्कर्मों को करने की प्रेरणा व दुष्कर्मों को न करने वा उन्हें छोड़ने की प्रेरणा भी करता है। अतः ईश्वर के लिए ऐसा कोई कार्य नहीं है जिसे वह बिना मनुष्य जन्म धारण वा अवतार लिये न कर सके। इस कारण ईश्वर को किसी भी कारण से अवतार लेने की आवश्यकता नहीं है और न ही ईश्वर का अवतार हुआ है।

वेदों के विद्वानों की यह मान्यता है कि राम व कृष्ण ईश्वर के अवतार नहीं अपितु अपने समय के महापुरुष व दिव्यात्मायें थीं जिनके गुण, कर्म व स्वभाव ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव के प्रायः अनुकूल थे। ईश्वर अजन्मा है, वह जन्म नहीं लेता तथा जीवात्मा जन्म धारण करने वाला है। जन्म लेना जीवात्मा का गुण धर्म है ईश्वर का नहीं। ईश्वर सर्वज्ञ है और जीव अल्पज्ञ है। मर्यादा पुरुषोत्तम रामचन्द्र जी ने और न योगीराज कृष्ण जी ने कहीं यह नहीं कहा कि वह सर्वज्ञ हैं और न यह कहा कि वह जीव नहीं परमेश्वर हैं। गीता ईश्वरीय ग्रन्थ नहीं अपितु महर्षि वेदव्यास की रचना है। महाभारत ग्रन्थ में विगत पांच हजार वर्षों में मूल ग्रन्थ का पांच गुणा भाग प्रक्षेप को प्राप्त हुआ हैं। यह ऐतिहासिक प्रमाणों से विदित होता है जिसका आर्यसमाज प्रचार करता है। महाराज भोज के समय में महाभारत में लगभग बीस हजार श्लोक थे जो आज बढ़कर एक लाख से अधिक हो गये हैं। गीता क्योंकि महाभारत का अंग है, अतः उसमें भी उसी मात्रा में प्रक्षेप होने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। गीतर में कृष्ण जी द्वारा अर्जुन को कहा गया है कि तेरे और मेरे अनेकानेक जन्म हो चुके हैं। मैं अपने सभी पूर्व जन्मों को जानता हूं परन्तु तू नही जानता। इसका कारण कृष्ण जी का उच्च कोटि का योगी होना था। यह भी हो सकता है िकवह मुक्तात्मा व विदेह कोटि के जीव हों। गीता में उनके द्वारा जन्म शब्द का प्रयोग किया है अवतार लेने व लीला करने की बात कहीं नहीं की है जैसा कि हमारे अवतारवाद व मूर्तिपूजा को मानने वाले बन्धु कहते हैं। इससे भी यह ज्ञात होता है कि ईश्वर का अवतार नहीं होता और राम व कृष्ण जी अवतार नहीं अपितु वेदों में वर्णित ईश्वर के समान श्रेष्ठ गुणों को धारण करने से दिव्य व महापुरुष थे। उनके गुण व आदर्श वेद, ऋषि दयानन्द व आर्यसमाज की मान्यताओं के अनुकूल है।

चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ईश्वर द्वारा चार ऋषियों को सृष्टि की आदि में दिया गया ज्ञान है। यजुर्वेद के 40/8 मन्त्र में ईश्वर ने अपने स्वरूप का उद्घाटन कर कहा है कि वह अकायम् अर्थात् शरीर, नस नाड़ी आदि के बन्धन से रहित है वा अजन्मा है। पूरा मन्त्र निम्न हैः

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः।।

इस मन्त्र का ऋषि दयानन्द कृत अर्थ है ‘वह परमात्मा सब में व्यापक, शीघ्रकारी और बलवावन् जो शुद्ध, सर्वज्ञ, सब का अन्तर्यामी, सर्वोपरि विराजमान, सनातन, स्वयंसिद्ध, परमेश्वर अपनी जीवरूप सनातन प्रजा को अपनी सनातन विद्या से यथावत् अर्थों का बोध वेद द्वारा कराता है। वह परमेश्वर कभी शरीर धारण व जन्म नहीं लेता, जिस में छिद्र नहीं होता, नाड़ी आदि के बन्धन में नहीं आता और कभी पापाचरण नहीं करता, जिसमें क्लेश, दुःख, अज्ञान कभी नहीं होता। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे परामेश्वर के गुण हैं वैसे गुण, कर्म, स्वभाव अपने भी करना। जैसे वह न्यायकारी है तो मनुष्य आप भी न्यायकारी होवे।

उपर्युक्त मन्त्र में ईश्वर को अकायम्, अव्रणम् एवं अस्नाविरम् कहा है। यह गुण धर्म मनुष्य वा जीवात्मा में नहीं घटते हैं। परमात्मा शरीर, रंग-रूप तथा नस-नाड़ी के बन्धनों से रहित है। अकायम् कहकर उसे शरीर रहित अर्थात् शरीर न धारण करने वाला बताया है। अतः इस प्रमाण से ही ईश्वर के अवतार लेने वा मूर्ति पूजा का खण्डन हो जाता है।

महाभारत युद्ध के बाद देश में सर्वत्र अज्ञान का अन्धकार फैल गया था। अविद्या के कारण मनुष्यों ने अवतारवाद, मूर्तिपूजा, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष व जन्मना जातिवाद को प्रचलित किया व यह समय के साथ प्रचलित हो गये। इनके कारण ही मनुष्य समाज कमजोर हुआ और अन्ततः इन अविद्याओं के कारण ही देश गुलाम हुआ जो लगभग 13 सौ वर्षों तक चला। आज भी अविद्या अनेक रूपों अर्थात् मत-मतान्तरों के रूप में विद्यमान है जिससे मनुष्य आपस में निकट आने के स्थान पर परस्पर दूर ही हो रहे हैं। इसी कारण मनुष्य ईश्वर के निकट होने के स्थान पर उससे भी दूर हो रहे हैं। महर्षि दयानन्द ने उन्नीसवीं शताब्दी में वेदों का ज्ञान प्राप्त कर अपने पुरुषार्थ एवं ईश्वर की प्रेरणा से सत्य वैदिक धर्म का प्रचार किया। उनके प्रयासों से आज हम ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति के सत्य स्वरूप को जानते हैं और ईश्वर को प्राप्त करने के साधन व उपायों का भी हमें ज्ञान है। ऋषि दयानन्द ने स्वयं अपने ज्ञान, अनुभव व आचरण से इसका सत्य उदाहरण हमारे सामने प्रस्तुत किया है। हमारा कर्तव्य हैं कि हम ऋषि दयानन्द द्वारा बतायें वेद व वेदानुकूल मार्ग पर चलकर अपना व दूसरों का भी कल्याण करें। मृत्यु तो एक दिन सबकी आनी है परन्तु जो ऋषि दयानन्द, पं. लेखराम व स्वामी श्रद्धानन्द आदि की तरह धर्म के लिए जीता व बलिदान देता है, मनुष्य जीवन उसी का सफल कहा जाता है। ईश्वर का अवतार नहीं होता, यह ध्रुव सत्य है। वेदों में व सत्य शास्त्रों में इसका विधान व उल्लेख नहीं है। युक्ति व प्रमाण से भी इस मान्यता का पोषण नहीं होता।

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