पर्यावरण को बचाने की दिशा में वन विभाग क्यों हैं उदासीन!

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(लिमटी खरे)
देश में संरक्षित वन, राष्ट्रीय बाघ अभ्यरण, राष्ट्रीय वन्यजीव अभ्यरण, राष्ट्रीय उद्यानों की कमी नहीं है। इसके बाद भी इन जगहों में पर्यावरण बचाने और मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय एवं राज्यों के वन विभागों की कथित उदासीनता ही कहा जाएगा कि इस मामले में देश की शीर्ष अदालत को संज्ञान लेने पर मजबूर होना पड़ा है।
हाल ही में देश की शीर्ष अदालत के द्वारा संरक्षित वन, राष्ट्रीय बाघ अभ्यरण, राष्ट्रीय वन्यजीव अभ्यरण, राष्ट्रीय उद्यानों में मानव गतिविधियों को रोकने की दिशा में जिस तरह की पहल की जा रही है वह पर्यावरण को बचाने की दिशा में एक बड़ा कदम निरूपित किया जा सकता है।
देश की शीर्ष अदालत के द्वारा वनों के संरक्षण को लेकर दायर की गई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत के द्वारा काफी सख्त रवैया अपनाया है। शीर्ष अदालत का यह रूख पर्यावरण को बचाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। इन जनहित याचिकाओं में शीर्ष अदालत का रूख यही लग रहा है कि वह पर्यावरण संरक्षण के मसले में किसी तरह की लापरवाही और ढील को बर्दाश्त शायद ही करे। इतना ही नहीं इसी दौरान शीर्ष अदालत के द्वारा एक आदेश जारी कर प्रत्येक संरक्षित वन भूमि को पर्यावरण के दृष्टिकोण से संवेदनशील क्षेत्र बनाने का निर्देश भी दिया है।
विधि के जानकारों के अनुसार संवेदनशील क्षेत्र का दायरा कम से कम एक किलोमीटर का होगा। इस एक किलोमीटर क्षेत्र में किसी भी तरह के कल कारखाने, निर्माण, औद्योगिक इकाईयां, खनन, इस तरह की मानवीय गतिविधियां जो वन, वन्य जीवों एवं वनों के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली होंगी उन्हें प्रतिबंधित किया जाएगा इसके अलावा इस दायरे में किसी तरह का स्थायी निर्माण भी नहीं कराया जा सकेगा।
जानकारों का कहना है कि शीर्ष अदालत को यह कदम शायद इसलिए उठाने पर मजबूर होना पड़ा है क्योंकि वनों को बचाने की दिशा में सूबाई सरकारें पूरी तरह नाकाम ही साबित होती दिख रहीं थीं और वन क्षेत्रों में इस तरह की गतिविधियों की तादाद बहुत तेजी से बढ़ी है। वन विभाग के द्वारा देश भर के नेशनल पार्क का ही अगर सर्वेक्षण करवा लिया जाए तो एक किलोमीटर क्षेत्र में न केवल रिसोर्टस बनी नजर आएंगी वरन आजकल डेस्टीनेशन मैरिज के नाम पर लाखों करोड़ों रूपए के पैकेज में इन स्थानों पर जंगल के अंदर कानफाडू शोर के साथ ही बारातें निकल रहीं हैं। इस पूरे मामले में वन विभाग पूरी तरह मजबूर ही नजर आता है।
केंद्र और राज्य सरकारों के वन विभाग का यह दायित्व है कि वह अपने अपने कार्यक्षेत्रों में वनों को सहेजने का काम करें। वन विभाग चाहे केंद्र सरकार का हो अथवा राज्य सरकारों का, सभी के पास वनों के संरक्षण के लिए न केवल संसाधन होते हैं वरन इनके पास पर्याप्त अधिकार भी होते हैं। इतना सब होने के बाद भी वन क्षेत्रों विशेषकर संरक्षित वन क्षेत्रों के लिए खतरा कम नहीं हो पा रहा है। वन क्षेत्रों में अवैध कटाई के साथ ही साथ यहां अतिक्रमण की समस्या सबसे अधिक है, जिससे वन क्षेत्रों का वास्तविक रकबा घटता जा रहा है जो वन्य जीवों के लिए उचित नहीं माना जा सकता है।
जानकारों का कहना है कि संरक्षित वन क्षेत्रों में स्थानीय लोगों को वनोपज को उगाने और मवेशी चराने की छूट होती है पर इसका लाभ उठाकर माफियाओं के द्वारा वन क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया जाता है और अवैध निर्माण यहां कर लिए जाते हैं। यहां इमारती लकड़ियों की कटाई की जाती है, साथ ही वन संपदा को हर तरह से नुकसान ही पहुंचाया जाता है।
वन भूमि के आसपास अतिक्रमण ही सबसे बड़ी समस्या है। शहरों के विस्तारीकरण और गांव में शहर बसाने की सोच के कारण ही यह समस्या दिन दोगुनी रात चौगनी बढ़ती जा रही है। दरअसल, शहरीकरण को ही विकास का पर्याय मान लिया गया है, जिसके कारण छोटे छोटे गांवों में भी अब कॉलोनी विकसित होती दिख जाती हैं। शहरीकरण के चलते वन भूमि को बचाना बहुत आसान शायद नहीं ही होगा।
देखा जाए तो वन संरक्षण कानून ही इसलिए लाया गया है ताकि वनों के विनाश और अवैध कटाई को रोका जा सके। इसके बावजूद भी दो तीन दशकों में जंगलों से पेड़ों की जिस तरह कटाई हो रही है, वह किसी से छिपा नहीं है। इससे पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है और इसका नतीजा प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आ रहा है।
वनों में इस तरह की गतिविधियों पर अगर रोक नहीं लगाई गई तो आने वाले कुछ दशकों में वन विशेषकर संरक्षित वन भी अपना मूल प्राकृतिक स्वरूप खो देंगे। अगर ऐसा हुआ तो पर्यावरण असंतुलन को रोका नहीं जा सकेगा और इसका भोगमान अंततः मनुष्य को ही भोगने पर मजबूर होना पड़ेगा। इससे बचने के लिए सरकारों को चाहिए कि वे संरक्षित वन में संवेदनशील क्षेत्र का दायरा बढ़ा देना चाहिए पर कम से कम एक किलोमीटर का दायरा इसके लिए रखना आवश्यक होगा।
आप किसी भी राष्ट्रीय उद्यान आदि के आसपास चले जाएं आपको वहां अतिक्रमण साफ तौर पर दिख जाएगा। वन विभाग के अधिकारियों का यह नैतिक दायित्व होता है कि वे इसे रोकें किन्तु बड़े वनाधिकारी अपने वातानुकूलित कक्षों से निकलकर मैदान में जाना ही नहीं चाहते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में विकास भी जरूरी है और पर्यावरण को बचाना भी जरूरी है। इसलिए दोनों के बीच सामंजस्य कैसे बैठ पाएगा यह सोचना हुक्मरानों का ही काम हैं। इसी तारतम्य में संरक्षित वन क्षेत्रों में संवेदनशील क्षेत्र बनाए जाने की अनिवार्यता में देश की शीर्ष अदालत की चिंता कहीं न कहीं छिपी दिखाई देती है।

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लिमटी खरे
हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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