लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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sanskritभारत के विभिन्न प्रान्तों में विद्यालयों में भाषा सम्बद्ध नीति समान नहीं है। कहीं दो भाषाएँ पढ़ाई जाती है तो कहीं तीन। उनमें जो एक भाषा सब प्रान्तों में अनिवार्य रूप में पढ़ाई जाती है वह अंग्रेजी है। अधिकांश पढ़े लिखे लोगों के 62 वर्षों के अथक प्रयत्नों के पश्चात् भी हमारे देश के 10 प्रतिशत लोग अंग्रेजी समझ पाते हैं और 1 प्रतिशत बोल पाते हैं। 100 प्रतिशत भारतीयों की मातृभाषा कोई न कोई भारतीय भाषा है, जिनकी जननी संस्कृत है। यदि संस्कृत को सभी प्रान्तों में अध्ययन के लिए अनिवार्य भाषा बनाया होता और अंग्रेजी इतना परिश्रम संस्कृत सीखने पर किया होता तो भारत के सभी लोग आपस में जुड़ जाते और क्षेत्रीय भाषाओं को समझ पाते। बिना संस्कृत जाने आप भारतीय भाषाओं का पूरी तरह से आस्वाद नहीं उठा सकते। उदाहरण के रुप में ‘वन्दे मातरम्’ इस गान को लिया जाए। इसमें मूल बांग्ला शब्दों की तुलना में संस्कृत शब्द अधिक हैं। इस कारण अधिकतर जनता ‘वन्दे मातरम्’ को संस्कृत गीत मानती है। ‘जन-मन-गण’ इस गीत की स्थिति भी ऐसी ही है। क्या बिना संस्कृत जाने राष्ट्रगानों का अर्थ समझ में आ जायेगा?

भारत की सभी भाषाओं पर अंग्रेजी, फारसी, अरबी इत्यादि विदेशी भाषाओं का आक्रमण जारी है। वार्तापत्र, दूरदर्शन एवं दैनिक व्यवहार में मिली जुली भाषा का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। ऐसी ही स्थिति रही तो भारत की किसी भी भाषा को शुद्ध बोलना अधिकांश लोगों के लिए असंभव हो जायेगा। इस संकट का एक कारण है मण्डी में आनेवाली विविध नूतन वस्तुओं के लिए नामों का भारतीय आविष्कार उपलब्ध न होना। इस कार्य को संस्कृत भाषा माध्यम से निश्चित पूरा किया जा सकता है। 1700 धातु 22 उपसर्ग और 20 प्रत्ययों के आधार पर संस्कृत में अनगिनत शब्दों का सृजन किया जा सकता है और भारतीय भाषाओं को बचाया जा सकता है। वर्तमान में 27 लाख 20 हजार शब्द संस्कृत भाषा में प्रयुक्त होते हैं। वें अर्थवाही हैं। उदाहरण के लिए हृदय शब्द को लीजिए। इसमें प्रथम धातु है हृ याने हरण करना, दूसरा है दा याने देना और तीसरा है य याने घुमाना। यह तीनों कार्य हृदय करता है।

संस्कृत भारत को जोड़ती है। यदि कोई व्यक्ति भारतभ्रमण पर निकलता है और दक्षिण भारत पहुँच जाता है तो उसे सामान्य शब्दों जैसे- पानी, खाना इत्यादि के प्रयोग की आवश्यकता पड़ती है। किन्तु दक्षिण भारत में पानी, खाना इन शब्दों को अल्प लोग ही समझ पाते हैं। उनकी अपनी भाषाओं में पानी के लिए तन्नी, वेल्लम्, नीरू जैसे शब्द हैं। किन्तु यदि आपने संस्कृत शब्द- जल, भोजन इत्यादि का प्रयोग किया तो सभी इन्हें समझ जायेंगे और आपको भूखे, प्यासे रहने की नौबत नहीं आयेगी। झारखण्ड के अधिक लोग अस्वस्थ हो जाने पर वेल्लोर का रूख करते हैं। उन्हें यह अनुभव निश्चित रूप से आता होगा। पूरा भारत अधिकांश संस्कृत शब्दों को समझता है, जैसे- चित्रम्, फलम्, चायपानम्, मधुरम् इत्यादि।

संस्कृत को बोलने के कारण सभी भारतीयों के मन में यह भाव अवश्य क्रौंधता है कि सभी भारतीय भाषाएँ संस्कृतोत्मव है। सभी भाषाओं में लगभग समान भावों की अभिव्यक्ति है। अत: तमिल् और कन्नड, कन्नड और मराठी, असमिया और बांग्ला ऐसे संघर्ष नहीं होते। भारत की एकात्मता दृढ़ होती।

भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम मात्रा नहीं है। वह संस्कारों की वाहक है। महाराष्ट्र में गुलाम दस्तगीर बिरासदार नाम के एक मुसलमान सज्जन है। धाराप्रवाह संस्कृत बोलते हैं तथा भाषण करते हैं। राज्य सरकार के द्वारा नियुक्त संस्कृत के प्रचारक हैं। सज्जन, सरल, नम्र और देशभक्त हैं। इसका कारण घर के संस्कार नहीं तो संस्कृत भाषा के संस्कार हैं। क्या संस्कृत बोलनेवाला व्यक्ति गाली दे सकता है? कभी नहीं।

इंग्लैंड देश में St. James School इस संस्था के तत्वावधान में कई विद्यालय चलते हैं। आश्चर्य यह है कि इस संस्थान के विद्यालयों में 6 वर्ष तक संस्कृत भाषा अनिवार्य रूप में पढ़ाई जाती है। उन विद्यालयों में पढ़ने और पढ़ानेवाले दोनों गोरे लोग हैं। उन्हें यह पूछने पर कि यहाँ संस्कृत क्यों पढ़ाई जाती है, वे कहते हैं –

1) Sanskrit stands at the root of very many eastern and western languages, including English and most other European languages, Classical or modern. Its study illuminates their grammer and etymology.

2) Innumerable English words can be shown to desire from forms still extant in Sanskrit.

3) Sanskrit literature embodies a comprehensive map of the human makeup, spiritual, emotional mental and physical. It presents a new way of understanding our relation to the rest of creation and lays out the laws productive of a happy life.

4) The word ‘Sanskrit’ means ‘Perfectly Constructed’. Study of its grammar brings order to the mind and clarifies the thinking.

आजकल बाबा रामदेवजी के कारण भारत के अधिकांश नागरिक यह जान गये हैं कि कपालभाती और भ्रामरी प्राणायाम का स्वास्थ्य पर कैसा अनुकूल प्रभाव पड़ता है। संस्कृत भाषा बोलते समय अधिक बार अ: इस स्वर का उपयोग करना पड़ता है। अ: का उच्चारण करते ही पेट की हवा बाहर छोड़नी पड़ती है और बिना किसी प्रयास के कपालभाती प्राणायाम हो जाता है। अं इस स्वर के उच्चारण में ‘मकार’ का उच्चारण सम्मिलित है। भ्रामरी प्राणायाम में मकार का ही उच्चारण होता है। अत: विद्यालयं, जीवनं, क्षेत्रं इत्यादि शब्दों के सतत उच्चारण से अनायास भ्रामरी प्राणायाम होता रहता है।

ऐसी ज्ञान, विज्ञान, कला जैसे समस्त शास्त्रों को अभिव्यक्त करनेवाली इस वैश्विक, संस्कारदायिनी और सटीक भाषा को क्या हमें भुला देना चाहिए? या उस संस्कृत माता के अमृतरूपी दूध को प्राशन कर सुसंस्कारित, सम्पन्न, विश्वकल्याणकारी समाज का निर्माण करना चाहिए?

जयतु संस्कृतम्! जयतु भारतम्!

-श्रीश देवपुजारी

अ.भा. मन्त्री

संस्कृत भारती

18 Responses to “विद्यालयों में संस्कृत क्‍यों पढ़ानी चाहिए”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन उवाच

    ==अंगेज़ी पर संस्कृत प्रभाव के== अनगिनत उदाहरण मुझे मिले हैं। मैं स्ट्रुक्चरल इंजिनियरिंग का विशेषज्ञ हूं। और उसकी पारिभाषिक शब्दावली पर काम कर रहा हूं।
    आपके अवलोकन के लिए एक सूचि प्रस्तुत हैं।
    हर उदाहरण में, “कृ” धातु का ही “क्रि” अपभ्रंशित रूप है। हर शब्दमें कुछ करने का ही भाव है, जो कृ का वास्तविक अर्थ है।
    Creation, एक इश्वरकी “कृति” के अर्थमें, accreditation किसी कार्यका सत्यापन, concrete= एक ठोस निर्माण अर्थात “कृति” के अर्थमें crest= एक शिखर, चोटी, शीर्ष की कृति या प्राकृतिक निर्माण इस अर्थमें, decrement= घटानेकी क्रिया, discretion=विवेक पूर्ण निर्णय लेनेकी क्रिया, procreate= जन्म देना, उत्पन्न करने की क्रिया, recreation=,पुनः उत्पन्न करने की क्रिया। उदाहरणार्थ:
    accreditable, accreditation, accreditations, accredited,accrediting, accredits, anticreative, cocreate, cocreated, cocreates, cocreating, cocreator
    concrete, concreted, concretely, concreteness, concretenesses, concretes, concreting, concretion, concretionary, concretions, concretism
    concretisms,concretist, concretists, concretization, concretizations, concretize, concretized, concretizes,concretizing, create, created,creates,crest,crestal
    crested, crestfallen, crestfallenly, crestfallenness, crestfallennesses, decrease, decreased, decreases, decreasing,
    decreasingly, decree, decreed, decreeing, decreer, decreers, decrees, decrement, decremental, decremented, decrementing, decrements, discretion, discretionary, discretions, procreate, procreated, procreates, procreating, procreation, procreations, procreative, procreator, procreators, procreate, procreated, procreates,procreating, procreation, procreations,procreative, procreator, procreators, recreates, recreating,recreation, recreational, recreationist, recreationists, recreations, recreative

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    (१)जितनी सरलतासे और गतिसे, यह टिप्पणीयां देवनागरी लिपि और संस्कृतजन्य शब्दावलिका प्रयोग करते हुए,और जितनी न्य़ूनतम जगहमे लिखी जा रही है, उन्ही विचारोंको यदि अंग्रेजीमे लिखा जाय, तो निश्चितहि कमसे कम देढ गुना, और शायद दो गुना समय, और जगह लग सकती है।
    (२) संसारमे १८ भाषापरिवार प्रमुख है। सभीसे सर्वाधिक समृद्ध भारत-यूरोपीय परिवार समझा जाता है।इस परिवारकी अतुलनीय और समृद्ध भाषा है, संस्कृत।जिसके धातुओंका,प्रत्ययोंका, उपसर्गोंका सिंचन सारी परिवारकी भाषाओंमें हुआ है।संस्कृत शब्दोमें, विचार शीघ्रतासे,समुचित रूपसे, और संक्षेपमे, व्यक्त करनेकी क्षमता और उतनीहि सक्षम हमारी देवनागरी लिपिभी है। यह दुगुना लाभ है।
    (३)संसारमे तीन प्रकारकी लिपियां: चित्रलिपि, भावलिपि और ध्वनिलिपि जिसके अंतर्गत देवनागरी समझी जाती है, ऐसी ३ प्रकारकी लिपियां संसारमे हैं। इसमे देवनागरी का स्थान सभीसे श्रेष्ठ है। संस्कृतको देवनागरी लिपि का असामान्य लाभ और विश्वका समृद्धातिसमृद्ध शब्द भंडार प्राप्त है। बंधुओं जिस रत्नोंकी खान पर हम बैठे हैं, शायद मतिभ्रमित (ब्रेन वॉश्ड ) होनेके कारण हमे जानकारी नहीं है। हम स्वतः इस आश्चर्यसे अभिभूत केवल इस लिए नहीं है, क्यों कि यह हमे बिना प्रयास मिला हुआ है। (मेरी मान्यता है)
    (४) इस टिप्पणीमेभी जितना कहना चाहता हूं, कह नहीं पाउंगा। एक उदाहरण देकर इसे समाप्त करता हूं।
    (५) हमारे पास बेजोड़, शब्द रचना शास्त्र है।उदाहरण–> नीचे मुख पेशियों के नाम (अभिनवं शारीरम्‌- से ) प्रस्तुत है। इनपर विचार करें। संस्कृत पर्याय के साथ अंग्रेजी संज्ञा दी गई है।(अ) भ्रूसंकोचनी: Corrugator supercilli ( भ्रू को संकॊचनेवाली पेशी),(आ) नेत्र निमीलनी: –Orbicularis Oculi (नेत्र बंद करनेवाली),(इ) नासा संकोचनी: Compressor naris(नाक का संकोच करनेवाली पेशियां)(ई) नासा विस्फारणी: Dilator naris( नाक विस्फारित करने वाली),(उ) नेत्रोन्मीलनी(आंख खोलनेवाली)इत्यादि
    विशेषताएं —>(क) संस्कृत संज्ञा का स्पेलिंग याद करना नही पड़ेगा।—> (ख) उसकी व्याख्या, संज्ञाके साथ पता चलती है।—>(ग) स्पेलिंग और व्याख्या रटते जो समय बिताएंगे, उसके २५ % समय में आप हिंदी/संस्कृत में अध्ययन कर सकते हैं।
    अर्थात, सोचिए सोचिए सोचिए, और चौंकिए आप जब हिंदीमे भी सोचते हैं, बोलते हैं, संस्कृतके शब्दोंका उपयोग किए बिना आप बोल नही सकते।प्रयत्न करके देखिए। संस्कृतके पेड को काटनेके लिए भी आप उसी पेडपर चढते हैं। इतना संस्कृतका योगदान, सारे भारत-यूरोपीय परिवारको हैं। ६२ वर्ष हुए पिंजडा खुला है, पर मतिभ्रमित पंछी उडना नहीं चाहता।
    और विश्व के विद्वान, संस्कृत को अप्रतिम देन मानते हैं।यह जाननेपर मैने भी स्वतः ही अध्ययन प्रारंभ किया है।ज्यादा जगह के लिए क्षमा चाहता हू। टिप्पणीकार स्ट्रक्चरल इंजिनयरिंग के प्राध्यापक है,और उच्च स्ट्रक्चर की संस्कृत संज्ञाओंपर काम कर रहे है।
    अंतमे, यदि प्रश्न पूछेंगे, तो जानकारीके आधारपर उत्तर देनेका प्रयास करूंगा। सारे उत्तर तो मै भी नहीं जानता।

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  3. sunil patel

    यह सिद्ध है की संस्कृत एक उच्च स्तरीय भाषा है. संस्कृत के बारे कहना सूरज को दिया दिखाना है. संस्कृत दुनिया मैं एकमार्त्र सम्पूर्ण भाषा है.

    संस्कृत स्कूल में सिखाई जाती है. यह केवल पास होने के लिए सीखी जाती है. बच्चा उतना हे सीखता है और तब तक हे सीखता है जब तक स्कूल के पाठ्यक्रम में होती है. कुछ चुनिन्दा बड़े सहरो में ही संस्कृत स्कूल होते है.

    मैं संस्कृत सीखना चाहता हु तो इन्टरनेट पर कहीं भी फ्री मुफ्त मैं संस्कृत सिखाने वाले ऑनलाइन संसथान नहीं है. हां बहुत सी वेबसाइट संस्कृत सिखाती है पर वो कनाडा, अमेरिका और विदेशी साईट होती है तो संस्कृत के ऑनलाइन कोर्सेस करती है.

    जरुरत है संस्कृत को आम आदमी तक पहुचने की और संस्कारित भाषा का साहित्य सस्ते मैं सर्व सुलभ उपलब्ध कराने की.

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  4. समन्‍वय नंद

    Samanwaya Nanda

    देवपुजारी जी द्वारा लिखित लेख काफी अच्छा है । संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए कार्य करने वाले श्री देवपुजारी जी को सर्वप्रथम उनका धन्यवाद करना चाहता हूं ।

    कुछ लोग भारत में ही संस्कृत का विरोध क्यों करते हैं । संस्कृत भारत का आधार है । बिना संस्कृत के भारतीय सभ्यता व संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती । अगर किसी को भारत को जानना है तो निश्चित रुप से उसे संस्कृत जानना होगा । अंग्रेजी से भारत को नहीं जाना जा सकता । अंग्रेजी में अनुवादित ग्रंथों से भारत को जानना संभव नहीं है ये तो सभी स्वीकार करेंगे ।
    अंग्रेजों की शिक्षा पद्धति ने एक नये किस्म के लोग तैयार हुए । इसका श्रेय लार्ड मेकाले को दिया जा सकता है । लार्ड मेकाले के शब्दों में ही – अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से ऐसे लोगों का निर्माण होगा जो शरीर से काले रहेंगे लेकिन उनकी मानसिकता अंग्रेजी रहेगी, भारत के प्रत्येक मानबिंदु प्रतीक उनके दृष्टि में हेय होगी – अंग्रेजों को इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि अगर भारत को समाप्त करना है तो भारतीय सभ्यता के आधार को जिसके बलबूते भारतीय सभ्यता, संस्कृति टिकी हुई है उसे समाप्त करना होगा । यहां भारत को समाप्त करने का अर्थ लोगों को समाप्त करना नहीं है बल्कि भारतीयता को समाप्त करना है ।
    अंग्रेज चले गये । लेकिन अब उनके स्थान पर काले अंग्रेजों ने मोर्चा संभाल लिया और वह भी वही अंग्रेजी व्यवस्था के माध्यम से ।

    इकबाल ने लिखा है कि कुछ बात ऐसी है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी । भारत में कुछ बात ऐसी है जो जिसके कारण भारत की हस्ती मिटती नहीं है । वह कुछ बात क्य़ा है । उस कुछ बात में संस्कृत भी है ।
    सभी को ध्यान में होगा कि 2007 में काशी के डा. संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में तत्कालीन राज्यपाल ने संस्कृत को बैलगाडी युग की भाषा बताया था । जाहिर है इस पर छात्र भडक गये । उ.प्र. तत्कालीन राज्यपाल पुलिस सेवा में रह चुके थे । क्या उन्हें नहीं पता था कि संस्कृत विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में अगर वह संस्कृत विरोधी बय़ान देंगें तो उसका विरोध होगा । उनकी इस बात की जानकारी रही होगी । लेकिन इसके बावजूद भी उन्होंने संस्कृत विश्वविद्यालय में संस्कृत के खिलाफ बोला । उन्होंने ऐसा क्यों किया । यह सब एक सोची समझी रणनीति के तहत हो रहा है ।

    हर मजेस्टी की सरकार ने दो सौ साल से अधिक समय तक कुछ बात को मिटाने का प्रयास किया । लेकिन दुर्भाग्य से वह इसमें सफल नहीं हुए । अब भी काले अंग्रेजों द्वारा वह मशाल चली हुई है । इसी क्रम में और भी लोग जुडते जा रहे हैं । लेकिन हमें परेशान होने की आवश्यकता नहीं है । ऐसे लोग संस्कृत का विरोध करेंगें । हमें अपना कार्य करते रहना है । उन पर ध्यान नहीं देना चाहिए । क्योंकि संस्कृत के संरक्षण से ही एकं सद विप्रा बहुधा वदन्ति का सिद्धांत बचेगा, बसुधैव कुटुंबकम, सर्वे भवंतु सुखीनाः का सिद्धांत बचेगा जिससे पूरे विश्व का कल्याण हो सकेगा ।

    धन्यवाद

    समन्वय

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  5. sachin

    एक सहायता चाहूगा आप सभी से
    हिन्दी रॊमन लिपी का प्रयॊग करते हुए मै किस प्रकार चन्द्रबिन्दु लगा सकता हु?
    क्र्पया कुजी क्रम बताये|

    Reply
  6. sachin

    @राकेश जी,
    मेरी प्रथम टिप्पणी लेखक के लिए थी|और जहा तक मै जानता हु , यदि टिप्पणी मे विशेषतया किसी कॊ सबॊधित नही किया जाता तॊ वह टिप्पणी लेखक के लिए हॊती है|
    यदि आपने मेरी टिप्पणी ध्यान पूर्वक पढी हॊती, तॊ आपकॊ मेरे वक्तव्य “भाषा कॆवल अभिव्यक्ति का माध्यम है|व्यक्ति कॊइ भी भाषा बॊलॆ महत्वपूर्ण बात यह है कि वह् अपना अभिप्राय दूसरॆ व्यक्ति कॊ समझा सकॆ” से साफ पता चल जाता कि मै लेखक के वक्तव्य “भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम मात्रा नहीं है” कॊ चुनौती दे रहा था|
    और अग्रजी के प्रयॊग हेतु मै पहले ही क्षमा मागने के साथ कारण भी बतला चुका हु|और आपकॊ यह भी बताना चाहुगा कि वॊ आधी टिप्पणी आग्ल भाषा मे इस कारण है कि मैने प्रथमतया ऊपर उपलब्ध लिपी परिवर्तन विकल्पॊ पर ध्यान नही दिया,परन्तु जैसे ही मैने उन पर ध्यान दिया,मैने हिन्दी मे लिखना प्रारम्भ कर दिया|
    अब आप कहेगे कि मै आग्ल वाक्य मिटा भी सकता था,इसका कारण यह है कि मै अपने कार्यालय से वह टिप्पणी , कुछ देर के चायकाल मे लिख रहा था , इस हेतु मेरे पास वक्त का अभाव था|अत:
    मैने उसे आग्ल भाषा मे ही रहने देने का निर्णय लिया|
    और राकेश जी आप मेरी मूर्खता वाली टिप्पणी का गलत अभिप्राय ना ले|
    मै यह मानता हू कि इस ससार हम सभी मूर्ख है| बडे से बडा ज्यानी भी जीवन मे कॊई ना कॊई मूर्खता,जाने या अनजाने,अवश्य करता है|इस हेतु शास्त्रॊ मे अनेक उदाहरण है|रावण उन्ही उदाहरणॊ मे से एक है|
    अत: हम सभी कॊ निरन्तर ज्यान कि तलाश मे रहना चाहिए तथा कभी भी स्वय कॊ ज्यानी नही समझना चाहिए|
    आप यदि मुझे ज्यानी समझते है , तॊ मै इतना ही कहूगा कि मै तॊ निरा मूर्ख हु|इस मायाज़ाल मे ज्यान की तलाश मे भटक रहा हु|इसी हेतु मै लॊगॊ के साथ वाद‍ विवाद करने कॊ तत्पर रहता हु|
    आशा है आप मन मे कॊई क्लेश् ना रखते हुए मेरी धारणा कॊ समझने का प्रयत्न करेगे|

    Reply
  7. Rakesh Singh

    @सचिन जी आपकी पहली टिप्पणी के ठीक ऊपर की टिप्पणी देखिये वो मेरी है और मैंने लिखा है की “इसका विरोध शायद ही (सेकुलरों को छोड़ कर) कोई करेगा” | इसकेबाद आपने अपनी टिप्पणी मैं ये लिखा – “How much confident you are in saying that nobody will oppose sanskrit.” | आपने तो लेखक को संबोधित कर लिखा नहीं | यदि किसी व्यक्ती विशेष को संबोधित कर टिप्पणी लिख रहे हैं तो @ लगना ना भूलिए, नहीं तो कोई भी टिप्पणी करने वाला इसपे टिप्पणी करेगा .. और मैं समझा की आप मेरी टिप्पणी पे बोल रहे हैं |

    और हाँ यदि हिंदी मैं पोस्ट किया गया है तो स्वाभाविक है की टिप्पणी भी हिंदी मैं ही दिया जाना चाहिए … आपने अंग्रेजी फिर हिंदी दोनों लिखा है, वो भी एक ही टिप्पणी मैं | इसलिए मैंने वो शब्द लिखा … आजकल लोग अपनी विद्वता अंग्रेजी मैं ही झाड़ते हैं | और हाँ आप कृपया मैंने अंग्रेजी वाली बाते कहीं वो यहीं तक सिमित है … उसे अन्यथा ना लें |

    ऊपर आपको बता ही चुका हूँ की मैं बिच मैं क्यों आया …. ये आप समझने से रहे …… ठीक है आपकी नजर मैं मैं मुर्ख … पर मेरी नजर मैं तो आप बहुत बड़े ग्यानी हैं … आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद .

    Reply
  8. sachin

    और एक बात स्पष्ट करना चाहुगा,मॆरी प्रथम प्रतिक्रिया मॆ शास्त्र शब्द सभी धर्मॊ की धार्मिक किताबॊ कॆ लिए प्रयॊग किया गया है|

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  9. sachin

    @राकॆश जी,
    इस अपराध कॆ लिए मै क्षमा चाहुगा|मॆरॆ पास हिन्दी कूजीपटल नही है|ईसी हॆतु मै आग्ल भाषा का प्रयॊग कर रहा था|परन्तु आपनॆ भी अवश्य ध्यान दिया हॊगा कि मॆरी पूर्व प्रतिक्रिया मॆ भी मैनॆ हिन्दी का प्रयॊग किया है|ऐसा कॆवल इसलिए सम्भव हॊ पाया कि यहा पर रॊमन लिपि का प्रयॊग कर प्रतिक्रिया दॆना सम्भव है|
    एक् अन्य बात मै कहना चाहुगा,वह यह है कि यदि आप कॊ मॆरॆ लॆख या मॆरॆ विचार पसन्द नही है तॊ आप क्र्प्या अपना आक्रॊश स्पष्ट रूप सॆ व्यक्त करॆ|यदि आपकी उपरॊक्त प्रतिक्रिया लॆखक द्वारा आती तॊ वह बॆहतर हॊता|
    शास्त्रॊ मॆ भी लिखा है(मै शास्त्रॊ कॊ नही मानता , परन्तु आप मानतॆ है इसलिए शास्त्रॊ का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हू),दॊ व्यक्तियॊ कॆ वार्तालाप मॆ अनुचित प्रकार सॆ विध्न डालनॆ वाला मूर्ख हॊता है|
    आशा करता हु कि आपकॊ मॆरी यह प्रतिक्रिया ठॆस नही पहुचाएगी|

    Reply
  10. Rakesh Singh

    @सचिन जी … आप अपने अंग्रेजी को अपने ब्लॉग तक ही सिमित रखें तो अच्छा रहेगा … यहाँ हिंदी मैं पोस्ट लिखा गया है तो कृपया कर हिंदी मैं ही जवाब देने की कोशिश करें |

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  11. Rakesh Singh

    हाँ एक बात कहना तो मैं भूल ही गया था की संस्कृत की खुसबू से भी घृणा करने वाले क्रिश्चियन मिसनरी, newly converted christian और मुल्ला लोग सबसे पहले विरोध करंगे |

    ये लोग तो आज तक हिंदी को स्वीकार नहीं करते हैं | एक के नजर मैं इंग्लिश तो दुसरे की नजर मैं उर्दू …

    पिछली टिप्पणी का तात्पर्य था की संस्कृत का विरोध कोई दक्षिण भारतीय राज्य नहीं करेगा, जैसा की हिंदी को लेकर हो रहा है |

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  12. sachin

    How much confident you are in saying that nobody will oppose sanskrit.
    Isn’t this assumption based on the fact that everybody in India is Brahminic.
    Its a fact that sanskrit isn’t wide spread in India because it is considered ‘devabhasha’,and only Brahmins were allowed to teach that and only the dwijas were allow to learn that.
    why force a useless language(when it is neither anybodies’ mother tongue,nor it will help get people get employment).
    The only way people could earn using sanskrit is, by fooling people,as many of the pandas do in haridwar and mathura(or for that matter any major shrine, be it srirangam in trichy also).
    भाषा कॆवल अभिव्यक्ति का माध्यम है|व्यक्ति कॊइ भी भाषा बॊलॆ महत्वपूर्ण बात यह है कि वह् अपना अभिप्राय दूसरॆ व्यक्ति कॊ समझा सकॆ|यदि मनुष्य धर्म, जातिवाद,भॆदभाव इत्यादि त्याग कर कॆवल मनुष्यता का पालन करॆ तॊ यह् भाषा आदि विवाद उत्पन्न ही ना हॊ|किन्तु जॊ लॊग जॊ धर्म कॆ नाम पर उचित‍‍‍ अनुचित सब कुछ मान लॆतॆ है|यदि वह शास्त्रॊ मॆ लिखा हॊ तॊ वह गलत हॊ हि नही सकता,ऐसा यकीन रखनॆ वालॆ लॊग कभी मनुष्यता नही समझ सकतॆ व वह हमॆशा ही इन बॆकार बातॊ मॆ वक़्त खराब करतॆ रहॆगॆ|

    Reply
  13. Rakesh Singh

    आपके विचार से १००% सहमती |

    किसी भी देश को एक-जुट और रास्ट्रियता को बनाये रखने मैं भाषा का महत्वपूर्ण योगदान होता है | भारत के साथ एक बड़ी दिक्कत ये है की एक सर्वमान्य भाषा नहीं है | हिंदी का विरोध तो हम लोगों ने देख ही लिया, संस्कृत को यदि रास्ट्र भाषा के रूप मैं योजनाबद्ध तरीके से आगे बढाया जाए तो इसका विरोध शायद ही (सेकुलरों को छोड़ कर) कोई करेगा |

    संस्कृत जोर पकडेगी तो हमारी संस्कृति की खुसबू और महकेगी |

    Reply
  14. डा.बुद्धिनाथ मिश्र

    मै लॆखक‌ कॆ विचारॊ सॆ पूरी तरह‌ सहमत हू|संस्कृत भाषा को मृत भाषा मानने वालों का भ्रम इतना पक्का है कि उसे तोड़ने के लिए बड़े हथौड़े की जरूरत है। हम अभी यदि अपने को स्वतंत्र मानने की भूल न करते हुए अपनी प्राचीन निधियों को समझें और उनका ठीक से उपयोग करें तो अभी भी मानसिक गुलामी के फ़ंदे से निकल सकते हैं।

    Reply
  15. शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

    shastri nityagopal katare

    बहूत्तमं लिखितवान भवान् एतदर्थं साधुवादः । संस्कृतं किमर्थं पठनीयमावश्यकस्ति अस्मिनं विषये मम लेखंमपि पठन्तु भवन्तः।
    शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
    योग का व्यावहारिक रूप है संस्कृत भाषा के रहस्य
    -शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

    दुनिया की पहली पुस्तक की भाषा होने के कारण संस्कृत भाषा को विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं कोई संशय की गुंजाइश नहीं हैं।इसके सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिध्द है।
    सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्य की धनी हाने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है। इतना सब होने के बाद भी बहुत कम लोग ही जानते है कि संस्कृत भाषा अन्य भाषाओ की तरह केवल अभिव्यक्ति का साधन मात्र ही नहीं है; अपितु वह मनुष्य के सर्वाधिक संपूर्ण विकास की कुंजी भी है। इस रहस्य को जानने वाले मनीषियों ने प्राचीन काल से ही संस्कृत को देव भाषा और अम्रतवाणी के नाम से परिभाषित किया है। संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं वल्कि संस्कारित भाषा है इसीलिए इसका नाम संस्कृत है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं वल्कि महर्षि पाणिनि; महर्षि कात्यायिनि और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है । जिस प्रकार साधारण पकी हुई दाल को शुध्द घी में जीरा; मैथी; लहसुन; और हींग का तड़का लगाया जाता है;तो उसे संस्कारित दाल कहते हैं। घी ; जीरा; लहसुन, मैथी ; हींग आदि सभी महत्वपूर्ण औषधियाँ हैं। ये शरीर के तमाम विकारों को दूर करके पाचन संस्थान को दुरुस्त करती है।दाल खाने वाले व्यक्ति को यह पता ही नहीं चलता कि वह कोई कटु औषधि भी खा रहा है; और अनायास ही आनन्द के साथ दाल खाते-खाते इन औषधियों का लाभ ले लेता है।
    ठीक यही बात संस्कारित भाषा संस्कृत के साथ सटीक बैठती है।जो भेद साधारण दाल और संस्कारित दाल में होता है ;वैसा ही भेद अन्य भाषाओं और संस्कृत भाषा के बीच है।संस्कृत भाषा में वे औषधीय तत्व क्या है ? यह जानने के लिए विश्व की तमाम भाषाओं से संस्कृत भाषा का तुलनात्मक अध्ययन करने से स्पष्टहो जाता है।
    संस्कृत में निम्नलिखित चार विशेषताएँ हैं जो उसे अन्य सभी भाषाओं से उत्कृष्ट और विशिष्ट बनाती हैं।
    १ अनुस्वार (अं ) और विसर्ग(अ:)
    सेस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण और लाभ दायक व्यवस्था है, अनुस्वार और विसर्ग। पुल्लिंग के अधिकांश शब्द विसर्गान्त होते हैं —
    यथा- राम: बालक: हरि: भानु: आदि।
    और
    नपुंसक लिंग के अधिकांश शब्द अनुस्वारान्त होते हैं—
    यथा- जलं वनं फलं पुष्पं आदि।
    अब जरा ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है। अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण करेंगे उतनी बार कपालभाति प्रणायाम अनायास ही हो जाता है। जो लाभ कपालभाति प्रणायाम से होते हैं, वे केवल संस्कृत के विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं।
    उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है । भ्रामरी प्राणायाम में शवस को नासिका के द्वाराछोड़ते हुए भौंरे की तरह गुंजन करना होता है, और अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है। अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा , उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जावेगा।
    कपालभाति और भ्रामरी प्राणायामों से क्या लाभ है? यह बताने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि स्वामी रामदेव जी जैसे संतों ने सिद्ध करके सभी को बता दिया है। मैं तो कवल यह बताना चाहता हूँ कि संस्कृत बोलने मात्र से उक्त प्राणायाम अपने आप होते रहते हैं।
    जैसे हिन्दी का एक वाक्य लें- ” राम फल खाता है“
    इसको संस्कृत में बोला जायेगा- ” राम: फलं खादति”
    राम फल खाता है ,यह कहने से काम तो चल जायेगा ,किन्तु राम: फलं खादति कहने से अनुस्वार और विसर्ग रूपी दो प्राणायाम हो रहे हैं। यही संस्कृत भाषा का रहस्य है।
    संस्कृत भाषा में एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता जिसमें अनुस्वार और विसर्ग न हों। अत: कहा जा सकता है कि संस्कृत बोलना अर्थात् चलते फिरते योग साधना करना।
    २- शब्द-रूप
    संस्कृत की दूसरी विशेषता है शब्द रूप। विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक ही रूप होता है,जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 रूप होते हैं। जैसे राम शब्द के निम्नानुसार 25 रूप बनते हैं।
    यथा:- रम् (मूल धातु)
    राम: रामौ रामा:
    रामं रामौ रामान्
    रामेण रामाभ्यां रामै:
    रामाय रामाभ्यां रामेभ्य:
    रामत् रामाभ्यां रामेभ्य:
    रामस्य रामयो: रामाणां
    रामे रामयो: रामेषु
    हे राम! हेरामौ! हे रामा:!
    ये 25 रूप सांख्य दर्शन के 25 तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिस प्रकार पच्चीस तत्वों के ज्ञान से समस्त सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही संस्कृत के पच्चीस रूपों का प्रयोग करने से आत्म साक्षात्कार हो जाता है। और इन 25 तत्वों की शक्तियाँ संस्कृतज्ञ को प्राप्त होने लगती है।
    सांख्य दर्शन के 25 तत्व निम्नानुसार हैं।-
    आत्मा (पुरुष)
    (अंत:करण 4 ) मन बुद्धि चित्त अहंकार
    (ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका जिह्वा नेत्र त्वचा कर्ण
    (कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद हस्त उपस्थ पायु वाक्
    (तन्मात्रायें 5) गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द
    ( महाभूत 5) पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश
    ३- द्विवचन
    संस्कृत भाषा की तीसरी विशेषता है द्विवचन। सभी भाषाओं में एक वचन और बहु वचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयागी और लाभप्रद है।
    जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्यां और रामयो:। इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।
    ४ सन्धि
    संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। ये संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।ऐंसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।
    ”इति अहं जानामि” इस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में वाक् इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है।
    यथा:- १ इत्यहं जानामि।
    २ अहमिति जानामि।
    ३ जानाम्यहमिति ।
    ४ जानामीत्यहम्।
    इन सभी उच्चारणों में विशेष आभ्यंतर प्रयत्न होने से एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का सीधा प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फल स्वरूप मन बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं नीरोग हो जाता है।
    इन समस्त तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है। यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। इसीलिए इसे देवभाषा और अमृतवाणी कहते हैं।
    (-शास्त्री नित्यगोपाल कटारे)

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  16. वैनतॆय:

    श्रीश महाभाग नमॊनम:|
    बहु सम्यक् भवान् वर्णितवान् संस्कृतस्य राष्ट्रस्य एकात्मताया:कृतॆ परमॊपयॊगिताम् अपितु अपरिहार्यताम्|अहम् लन्दन्नगरॆ निवसामि |अत्रापि यूरॊपीया:विविधा: भाषा: अपि संस्कृतॆन एव एकसूत्रताम् अनुभवन्ति |पॊलिश् भाषया ऒष्ठ:‍ ‘ऊस्टा’भवति |विहारॆ यत् ‘हवा मिठाइ’ तत् तत्र ‘वाता‍सुकरावा’ उच्यतॆ |वात= वायु:/सुकरावा=श‌र्करा | इटालियन्,फ्रॆन्च्,पॊलिश्,पॊर्तुगीज़्,स्पैनिश् भाषासु ‘चत्वारि’ इत्यर्थॆ ‘क्वात्रॊ’ वदन्ति|आङ्ग्लॆ ‘क्वार्टर्’ चतुर्थ: भाग: भवति |एवम् तु पदॆ पदॆ(इटालियन्=पॆदॆ)अनुभवाम:|अन्धा: एव एतत् द्रष्टुम् न शक्नुवन्ति|
    इङ्ग्लिश् महिला श्रीमती ऎन् ग्लॆज़ियर् अत्रत्या |सा खिचडीपरिवॆषणसमयॆ परिवॆषकाय वदति‍‍ ‘अलम् अलम् इत्यलम्’|
    ‍‍‍__वैनतॆय:

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