लेखक परिचय

डॉ नीलम महेन्द्रा

डॉ नीलम महेन्द्रा

समाज में घटित होने वाली घटनाएँ मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।भारतीय समाज में उसकी संस्कृति के प्रति खोते आकर्षण को पुनः स्थापित करने में अपना योगदान देना चाहती हूँ।

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owaisiआज भारत एक दोराहे पर खड़ा है और दोराहे पर आप ज्यादा देर तक खड़े नहीं रह सकते,राह चुननी ही पड़ती है।जिस प्रकार से हमारे देश में आज जानबूझकर विवाद पैदा किए जा रहे हैं,हमें सोचने पर विवश होना ही पड़ेगा कि इन विवादों के पीछे मकसद क्या हैं और हमें कौन सी राह चुननी होगी।
कुछ दिन पहले हमारी सेनाओं के द्वारा बलात्कार  करने सम्बन्धी कन्हैया का बयान और अब ओवेसी का भारत माता की जय बोलने सम्बन्धी यह विवादित बयान!ऐसे बयान न सिर्फ हमारी सेनाओं के मनोबल को गिराने का काम करते हैं बल्कि आम आदमी को भी देश के नेताओं के बारे में पुनः विचार करने पर विवश करते हैं।कन्हैया के बारे में तो हम सब कुछ जान ही चुके हैं,अब कुछ तथ्य ओवेसी के बारे में जान लें तो विवेचना आसान और दिलचस्प हो जाएगी।ए ई एम ई एम के प्रमुख और सांसद हैं ओवेसी ।मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन की स्थापना 1928 में नवाब महमूद नवाज़ खान ने की थी और यह हैदराबाद को एक अलग मुस्लिम राज्य बनाए रखने की वकालत करता था।1948 में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था।1957में  इसकी पुनः बहाली हुई जब इसके नाम में आल इंडिया जोड़ा गया और इसके संविधान में बदलाव किया गया ।उस समय कासिम रजवी इस पार्टी के अध्यक्ष थे और वे हैदराबाद राज्य के विरुद्ध कार्यवाही के दौरान जेल में डाल दिए गए थे।उसके बाद वे पाकिस्तान चले गये थे और जाते जाते इस पार्टी की बागडोर उस समय के मशहूर वकील अब्दुल वहाद ओवैसी के हाथ में दे गए ।तभी से यह पार्टी इस परिवार द्वारा संचालित है।इस पार्टी को पहली चुनावी जीत 1960 में एक नगर पालिका चुनाव में मिली थी।साम्प्रदायिकता और भड़काऊ भाषणों के सहारे धीरे धीरे लगातार इसकी शक्ति में इज़ाफा होता जा रहा है।2009 में इसने विधानसभा की सात सीटें जीती थी और उसके बाद महाराष्ट्र के नांदेड़ नगरपालिका में 11 सीटों पर जीत हासिल कर के हलचल मचा थी।ओवेसी के बारे में यह जानना आवश्यक है कि उन्होंने लंदन से वकालत की पढ़ाई करी है लेकिन देश के मुसलमानों को मदरसों में पढ़ाने के हिमायती हैं।ये भारत के ऐसे नागरिक हैं जो अफजल गुरु और इशारत जहाँ जैसे मुसलमानों को ही सच्चा मुसलमान मानते हैं।इनकी राजनीति मुसलमानों से शुरू होकर हिन्दुओं पर खत्म होती है।अभी महाराष्ट्र के लातूर में दिया गया इनका  ताजा विवादित बयान कही पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों की ही कड़ी तो नहीं है?
उनका कहना है कि वे भारत माता की जय नहीं बोलेंगे क्योंकि हमारे संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है।किसी भी देश का संविधान उस देश के स्वाभिमान,संस्कृति,सम्प्रभुता,एकता और तरक्की के लिए होता है।अगर संविधान की दुहाई देकर इस देश के नागरिक उसका उपयोग इस देश के ही खिलाफ करने लगें तो क्षमा चाहूँगी मेरे विचार से समय आ गया है कि संविधान में संशोधन करके उसको मजबूत बनाया जाए और इसकी कमियों को दूर किया जाए।
यह कहाँ तक उचित है कि भारत में रहने वाला,यहाँ की हवा में साँस लेने वाला ,भारत माता की धरती से उपजा अनाज खाकर पोषण प्राप्त करने वाला नागरिक उसकी ही जय बोलने में शर्म महसूस करे?माना कि मुस्लिम धर्म में मूर्ति पूजा की इजाज़त नहीं है लेकिन भारत माता किसी मूर्ति का नाम नहीं है!वह हमारी जन्म भूमि है,कर्मभूमी है,धरती का वह हिस्सा है जहाँ हमारे पूर्वजों ने वास किया है,एक अन्तराष्ट्रीय नक्शा है जिस पर हमारा अधिकार है और जिस पर हमें नाज़ है।जहाँ अधिकार होते हैं वहाँ कर्तव्य भी होते हैं,कुछ अधिकार आपको संविधान देता है तो कुछ कर्तव्य आपको आपके संस्कार सिखाते हैं।भारत को खतरा उसके पड़ोसी  देशों (चीन,पाकिस्तान आदि) से न होकर उसके भीतर पोषित हो रहे ऐसे संस्कार हीन देशवासियों से है जिन्हें अपनी जन्मभूमि से मिलने वाले अधिकारों का ज्ञान तो है लेकिन उसके प्रति अपने कर्तव्यों का नहीं!
भारत हमारे देश का नाम है,वह इस देश में जन्म लेने वाले हर बेटे की माँ है उसकी गोद में हर हिन्दू और मुसलमान खेलता है।जब भारत माता की गोद कोई भेदभाव नहीं करती अपने बच्चों के साथ तो ये कैसे बेटे हैं जो माँ को बाँटने का काम कर रहे हैं और क्यों?
उन्हें आदर्णीय मोहन भागवत जी के बयान पर एतराज है उनका कहना है कि आज देश प्रेम की बात वो कर रहे हैं जिनका स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान नहीं था तो इनको यह याद दिलाना बेहतर होगा कि 1930 में आर एस एस के चीफ डॅा के बी हेडगेवार स्वतंत्रता की लड़ाई में जेल में डाले गए थे।1940 में वो संघ ही था जिसने हिन्दू महासभा के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार का विरोध किया था।गांधी जी के असहयोग आंदोलन में वे इस हद तक व्यस्त हो गए थे कि उन्होंने संघ संचालक की जिम्मेदारी डाँ परान्जपई को दे दी थी।हमारे देश में स्वतंत्रता की लड़ाई शुरू से ही सम्पूर्ण भारत की आजादी की लड़ाई थी लेकिन वह मुस्लिम लीग ही था जिसने पृथक मुस्लिम राष्ट्र की मांग रखी थी।जिन्ना की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के परिणाम स्वरूप पाकिस्तान का निर्माण हुआ जो एक मुस्लिम राष्ट्र तक सीमित रहा लेकिन भारत माता के सुपूतों ने भारत की आजादी का जश्न सही मायने में सम्पूर्ण आजादी के साथ ही मनाया,हर बन्धन को नकार कर खुले दिल से हर उस शख्स का स्वागत किया जो भारत में आना चाहता था और आज भी करता है।और शायद इसीलिए भारत की विश्व में पहचान एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की है लेकिन अफसोस की बात है कि इसे ही भारत की कमजोरी बनाकर बारबार इसकी अस्मिता पर हमला किया जा रहा है।
1920 में जिन्ना ने कहा था कि मैं महात्मा गाँधी को महात्मा नहीं बोलूँगा और आज ओवेसी बोल रहे हैं कि मैं भारत माता की जय नहीं बोलूँगा!
“भारत माता की जय”यह नारा संघ का नहीं है और न ही आदर्णीय मोहन भागवत जी का है।स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई से लेकर आज तक इसी का उपयोग हो रहा है।अशफाक उल्लाह ख़ान जब काकोरी कांड में जेल गए थे तो उन्होंने कहा था –“भारत माता की जय!”राम प्रसाद बिस्मिल के साथ जब फाँसी पर झूले थे  तो कहा था –भारत माता की जय!वीर अब्दुल हमीद ने जब भारतीय सेना के साथ मिलकर पाकिस्तान के टैंक तोड़े थे  तो कहा था –“भारत माता की जय!” हमारे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आज़ाद के कार्यक्रमों में नारे लगते थे –“भारत माता की जय!”
अफसोस की बात है कि ओवेसी जैसे नेता हमारे देश की आजादी की लड़ाई को अपने लहू से सींचने वाले अश्फाक उल्लाह खान ,अजीमुल्लाह खान ,मौलाना अबदुल कलाम आज़ाद,रफी अहमद किदवई,वी अबदुल हमीद जैसे मुसलमानों की बजाय औरंगजेब ,अफजल गुरु और इशारत जहाँ जैसे मुसलमानों से तकल्लुफ़ रखते हैं।आज देश में यदि कोई कहे कि मैं मुसलमान अथवा ईसाई हूँ तो वह अल्पसंख्यक कहलाता है लेकिन अगर कोई कहे कि मैं हिन्दू हूँ,तो वह साम्प्रदायिक हो जाता है।संविधान में नहीं लिखा कि भारत माता की जय बोलो यह बात सही है लेकिन यह भी तो नहीं लिखा कि मत बोलो ।क्योंकि हमारा संविधान हमें भारत माता की जय बोलने के लिए नहीं कहता इसलिये आप नहीं कहेंगे तो क्या हर काम आप डर या मजबूरी में ही करते हैं?मोहन भागवत जी का बयान हमारे बच्चों में देश प्रेम से जुड़े संस्कारों का बीज डालने वाला कदम था और आपका बयान विद्रोह सिखाने वाला कदम है।आज देश के हर बुद्धि जीवी –खास और आम को यह समझना चाहिए कि अगर देश की एकता की रक्षा करनी है तो हर नेता
को पार्टी लाइन से ऊपर उठ कर भविष्य में होने वाले चुनावों और उनके परिणामों की चिंता छोड़ कर सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत जुटानी ही होगी।इस बयान के अगले ही दिन आप कहते हो “जय हिन्द “!हमारे देश की सीमाओं की रक्षा तो हमारे जवान कर ही रहे हैं लेकिन उतनी ही आवश्यकता देश की रक्षा उसको भीतर से खोखला करने में लगे कन्हैया और ओवेसी जैसे लोगों से करने की है जो शब्दों के मायाजाल का प्रयोग देश में अराजकता फैलाने के लिए करते हैं ।महाराष्ट्र सरकार द्वारा उठाया गया कदम निश्चित ही सराहनीय है जिसमें उसने महाराष्ट्र विधानसभा में ओवेसी की पार्टी के विधायक वारिस पठान को निष्कासित करने का निर्णय लिया है।ओवेसी जैसे लोगों की दिक्कत यह होती है कि उन्हें राज्यसभा में जावेद अख़तर साहब के भारत माता की जय के नारे सुनाई नहीं देते और न ही रहमान साहब की आवाज सुनाई देती है जिसमें वे पूरी शिद्दत से सारे जहाँ के सामने गाते हैं –“माँ तुझे सलाम””!अन्त में ओवेसी साहब से मैं एक ही बात कहना चाहूँगी  “भारत माता की जय””

डॅा नीलम महेंद्र

One Response to “ माँ के जय घोष मे शर्म क्यो ?”

  1. Himwant

    अरविन्द केजरीवाल अपनी सभाओं के अंत में “भारत माता की जय” के नारे लगाता है. अब जब उसने भारत मां के विरुद्ध नारे लगाने वालो का साथ दिया तो उसकी पोल खुल गई है. एक ओवैसी नारा लगाने से इनकार करता है. लेकिन भारत में रहने वाले सभी हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई बौद्ध जैन आदी इत्यादी धर्मावलम्बी भारत मां की जय चाहते है.

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