लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

Posted On by &filed under राजनीति.


-श्रीराम तिवारी-
narendra modi   यदि आप सुबह की शुरुआत बीते हुए कल के किसी झगड़े या कलह से करेंगे तो आप का आज का दिन बिना उमंग -उत्साह के ही बीत जाएगा। इस नकारात्मक स्थति में आने वाले कल की सुबह खूबसूरत कैसे हो सकती है ? यदि आप  असत्य और पाखंड की  भित्ति पर  देश की ,समाज की या खुद के घर  की  बुनियाद डालेंगे तो  इसकी क्या गारंटी है कि आपके सपनों का  महल  ताश के पत्तों की मानिंद अचानक  ही  बिखर नहीं  जाएगा ?  एक साल पहले भारत की १६ वीं  लोक सभा  के चुनाव में एनडीए याने भाजपा को नरेंद्र मोदी के नेतत्व में अप्रत्याशित महाविजय प्राप्त हुयी थी। अपने धुआँधार  चुनाव प्रचार और  सुविचारित साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के बलबूते पर हुई बम्फर विजय के बरक्स  मोदी जी ने  भारतीय  बहुसंख्यक  हिन्दू जन मानस  सहित तमाम  अधिसंख्य जनता के   मनोमष्तिष्क  में  सुशासन ,विकास और भृष्टाचार विहीन सुराज का दावा  किया था।
महज एक साल में ही उनके हाथों के तोते उड़ने लगे हैं । हर राज्य सरकार को आर्थिक संकट से जूझना पड़  रहा है।  यहाँ तक की खुद भाजपा के अधिपत्य वाली राज्य सरकारों को भी बार-बार  माँगने पर भी फंडिंग नहीं हो पाई  है। मोदी जी द्वारा  आम चुनावों में जनता को दिखाए गए सब्जबाग अब भाजपा  के गले पड़ने लगे हैं। हीरोपंती वाली लहर अब जन -आक्रोश की सुनामी में बदलने को बेताब है। मोदी सरकार के कामकाज को लेकर केवल किसान -मजदूर या मध्यमवर्ग में ही आक्रोश नहीं है ।  बल्कि अम्बानी-अडानी  जैसे  दो-चार ‘खुशनसीब’ को छोड़कर अधिकांस उद्यमी और  व्यापारी  भी  इस सरकार के कामकाज से  संतुष्ट नहीं हैं । लोक सभा और  राज्य सभा में  विपक्ष  का तो मोदी सरकार से खुश होने का सवाल ही नहीं है।  किन्तु अंदरखाने की हलचल है कि विगत एक साल में हिन्दुत्ववादी एजेंडे पर कुछ  नहीं किये जाने के कारण मोहन भागवत और  ‘संघ’सहित  उसके अनुषंगी भी मोदी सरकार से नाराज हैं । जिन्हे इस तथ्य  बात पर यकीन ने हो वो तोगड़िया या आचार्य धर्मेन्द्र से तस्दीक कर सकते हैं ।
                    स्वामी निश्चलानंद , शंकराचार्य स्वरूपानंद , सुब्रमण्यम स्वामी, गोविंदाचार्य, अन्ना हजारे, स्वामी रामदेव, राजगोपाल हर कोई इस सरकार से नाखुश है।   खैर ये तो दूर  के रिश्तेदार हैं किन्तु आडवाणी, राजनाथ, सुषमा, गडकरी और वसुंधरा तो उसी खानदान के  ही हैं ! फिर  इन सबको कोई न कोई प्रबलम  क्यों है ? यदि सब कुछ ठीक ठाक है । विकाश  और सुशासन है तो ये सभी मोदी जी से खुश क्यों नहीं हैं ?
२ ६ मई -२०१५ को  भारत की वर्तमान  ‘मोदी’ सरकार  को सत्तारूढ़ हुए ठीक  एक  साल  पूरा हो रहा है ।   विगत एक साल पहले  वर्तमान सत्तापक्ष याने ‘मोदी सरकार’ को  ऐतिहासिक  रूप से प्रचंड बहुमत प्राप्त हुआ  था  ।  देश के नीम  दक्षिणपंथी बुर्जुआ और साम्प्रदायिक तत्वों  के अपावन गठजोड़ की इस इकतरफा  विजय में  यूपीए-२ की घोर असफलताओं की महती भूमिका  प्रमुख रही है।हालाँकि  यूपीए और एनडीए के  वर्गीय  स्वार्थों में  साम्प्रदायकता का एक महीन सा फर्क ही है , वरना आर्थिक नीतियों में तो ये दोनों ही सहोदर हैं। इसीलिये   कार्पोरेट जगत की चरम मुनाफाखोरीके अलम्बरदार भी  हैं।  पूँजीवाद से प्रेरित विदेशी पूँजी और उसकी क्षुद्र आकांक्षाओं  की पूर्ती के लिए  मोदी सरकार ज़रा ज्यादा  समर्पित हैं।

अपनी  निर्मम पराजय के उपरान्त  राजनैतिक रूप से हासिये पर आ चुकी कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी अब भले ही किसान -मजदूर के पक्ष में  वकालत करते  दिखाई दे  रहे हैं , वरना  यूपीए के १० साल के राज में तो  उनकी यह  बानगी कभी कहीं भी  देखने को नहीं मिली । उलटे हुड्डाजी  के हरियाणे में तो किसानों की जमीने छीनकर [जीजाश्री] रावर्ट वाड्रा को  ही समर्पित की जाती रहीहैं । यह उदाहरण तो उस हांडी का एक अदना सा चावल मात्र है वरना  मनमोहनसिंह की यूपीए  सरकार तो भ्रष्टाचार की खीर मलाई बांटने के लिए दुनिया भर में बदनाम रही  है। यूपीए के  भृष्टतम  निजाम और आकंठ महँगाई से त्रस्त जनता  के दिलों में उम्मीदों के  दीप जलाकर ,जातीय -साम्प्रदायिक चासनी पिलाकर, हिंदुत्व की दूरदशा  पर किंचित मगरमच्छ  के आंसू बहाकर, आवाम  को विकास और सुशासन के  सपने दिखाकर ,युवा  वर्ग   को लच्छेदार मुहावरों में  बरगलाकर मोदीजी, एनडीए  और भाजपा द्वारा विगत एक बर्ष पूर्व  सत्ता  हस्तांतरण किया गया था ।

साल  भर तक बाद चौतरफा असफलताओं से  जनता का ध्यान डायवर्ट करने के निमित्त योजनाओं और कार्यक्रमों के बरक्स पूरा साल गुजरने के बाद अब कालेधन का  अध्यादेश रुपी झुनझुना बजाया जा रहा है। अब एक नए ‘महाझून्ठ’ का सहारा लिया जाता रहा है। विगत एक साल की  उपलब्धियों  का सार संक्षेप यह है कि प्रधान मंत्री  जी ने  विदेशों में भारत की छवि को बुरी तरह धूमिल किया है।भारत के गौरवशाली अतीत को स्याह और भारत को ‘गन्दा’ देश निरूपित किया है।  खुद की वर्चुअल इमेज और वैश्विक पहचान बनाने के लिए इस निर्धन राष्ट्र का अरबों रुपया हवाई यात्राओं और प्रधानमंत्री की तीर्थ यात्राओं में बर्बाद किया गया है ।  विदेशों में देश को कंगाल और बीमार बताया गया है और इन्ही  यात्राओं के बहाने  अपना व्यक्तित्व महिमा मंडित किया जाता रहा है।  विगत वर्ष सिर्फ’मन की बातें ‘ ही होती रहीं हैं। कभी हवा में  बातें –  कभी  जमीन पर बातें , कभी समुद्र में  बातें , कभी भूटान में बातें ,कभी आस्ट्रिलिया  में बातें ,कभी जापान में बातें, कभी कनाडा में बातें ,  कभी जर्मनी -फ़्रांस – इंग्लैंड में बातें , कभी चीन में बातें !  बातें ! बातें !! बातें !!!.  सिर्फ बातें ही बातें -आवाम के कानों में गूँज रही हैं।

शायद बातों का वर्ल्ड रिकार्ड  बनाया जा चुका  है। लेकिन बातों का  नतीजा  अब तक केवल ठनठन गोपाल ही है।  अपने पूर्ववर्तियों  की गफलत, चूक-नासमझी  और  आपराधिक कृत्यों  के कारण नाराज जनता ने मोदी सरकार कोएक साल पहले  सत्ता में पहुँचाया था। किन्तु इस प्रचंड राजनैतिक महाविजय के वावजूद, हर तरह से निष्कंटक – निरंकुश सत्ता  हासिल करने के  वावजूद ,भारत की  यह अब तक की सबसे असफल और निकम्मी सरकार साबित हुयी है।  वैसे भी  जो लोग भरम फैलाकर सत्ता में  आ जाते  हैं  उनसे किसी भी  तरह के सकारात्मक बदलाब, सुशासन या क्रांतिकारी विकाश  की  उम्मीद करना  नितांत मूर्खता ही है! यदि आप साल भर  तक केवल अपने पूर्ववर्तियों की असफलताओं का या  उनके गिरते राजनैतिक जनाधार  का दुनिया भर में  सिर्फ ढिंढोरा ही पीटते  रहे हैं ! यदि आप अपनी व्यक्तिगत खुशनसीबी  पर  विगत साल भर  केवल  इतराते  ही रहे  हैं ! यदि आपने देश में अभी तक एक फुट भी नयी रेललाइन  नहीं बिछाई ! यदि आपने देश के लाखों गाँवों में से कहीं भी  एक कुंआँ  भी नहीं खोदा, यदि सिचाई या  शुद्ध  पेय जल की व्यवस्था नहीं की ! यदि आप कालेधन का एक रुपया भी देश में  नहीं ला  पाये , यदि आप किसानों को आत्महत्या या  बेमौत मरने से नहीं रोक पाये , यदि आप कश्मीर में अमन  नहीं ला पाये , यदि आप राम लला का मंदिर  नहीं बना पाये , यदि आप घोंगालगांव [निमाड़]के जलमग्न  हजारों किसानों के आंसू नहीं पोंछ पाये , यदि आप  राज्यों के बीच जल बटवारे का न्यायिक  निर्वहन नहीं कर पाये , यदि आप बलात्कार ,हत्या और अपराध पर नियंत्रण नहीं कर पाये , यदि आप पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकी हाफिज सईद तो क्या आपने लाडले दाऊद को भी वापिस नहीं ला पाये , यदि आप श्रीलंका, नेपाल बांग्लादेश के सामने लगातार झुकते रहे  हैं, यदि आप  चीन की  चिरौरी करते रहे और उसकी दादागिरी के सामने खीसें निपोरते रहे। यदि आप किसी भी विषय पर देश की जनता का दिल नहीं जीत पाये तो  आने वाले ४ साल में  क्या  आसमान के तारे तोड़ लेंगे।

प्रचंड बहुमत है तो यह सरकार ५ साल अवश्य चल जाएगी।  लेकिन सत्ताधारी नेतत्व को नहीं भूलना चाहिए कि  ”जिन्दा कौम पांच साल इंतज़ार नहीं करती ” तब वे इतिहास से कोई  सबक  नहीं सीखकर केवल प्रतिगामी प्रयोग करने के फेर में क्या ‘माया मिली  न राम ‘ही जपा करेंगे ?

14 Responses to “एक साल में ही सुशासन, विकास की लहर जनाक्रोश की सुनामी में बदलने को बेताब”

  1. इंसान

    सम्पादक जी, देखता हूँ इकबाल हिन्दुस्तानी जी और डा: अशोक कुमार तिवारी जी की टिप्पणियों के प्रतिउत्तर में मेरी टिप्पणियां “आपने कहा” स्तंभ पर दिखाई नहीं गई हैं| हो सकता हैं सुनामी बने पाठकों की टिप्पणियों की बौछार में बह गईं हों| जैसे बहुत से लेख महीनों “मुख्य पृष्ठ” पर बने रहते हैं, मैं सुझाव दूंगा कि स्वयं पाठकों में स्वस्थ परस्पर संवाद हेतु उनकी टिप्पणियाँ “आपने कहा” स्तंभ पर अवश्य दिखाई जानी चाहिएं क्यों न स्तंभ की लंबाई ही बढ़ानी पड़े| धन्यवाद|

    Reply
  2. इक़बाल हिंदुस्तानी

    Iqbal hindustani

    श्रीराम तिवारी जी ने लेख में सच्चाई ब्यान की है। सभी जानते हैं सच कड़वा होता है लेकिन एक और सच है कि रोगी को ठीक करने के लिये कड़वी दवा ही देनी पड़ती है। मोदी भक्तों की आँखे एक साल बाद भी खुल नहीं रही हैं लेकिन काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती। झूठे वादे और बड़े बड़े दावे करके बेशक सत्ता में आया जा सकता कॉर्पोरेट के खज़ाने के बल पर लेकिन जब उसी कॉर्पोरेट के एजेंट बनकर आम आदमी के खिलाफ सरकार चलाओगे तो पोल खुलनी ही है।
    अब रही बात विकल्प की तो लेखक ने तो कांग्रेस और राहुल की भी जमकर खिंचाई की है। रविन्द्र भार्गव और “इंसान” जैसे मोदी भक्तो की समस्या ये है कि आँखों पर भगवा चश्मा लगाकर देखते हैं। बीजेपी या मोदी की उनके कामों के आधार पर आलोचना का मतलब ये नहीं है कि लेखक कांग्रेस या कथित सेक्युलर दलों का समर्थक है। निष्पक्ष और तटस्थ क़लमकार किसी का सपोर्टर या विरोधी नहीं होता। उसके चिंतन के केंद्र आम आदमी गरीब और कमज़ोर जनता होती है और जो उसके हितों यानि जनता के खिलाफ चलेगा लेखक उसका जमकर विरोध करेगा ही न वो डरता है और न लालच में आता है जो आप उसे खरीदकर अपनी तरह मुंह बन्द कर सको। अभी तो एक साल हुआ है 5 साल होने तक मोदी को विपक्ष विरोध और दुश्मनों की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी उनका जन बिरोधी काम ही उनको सत्ता से बाहर करदेगा।

    Reply
    • शिवेंद्र मोहन सिंह

      चूहे के हाथ हल्दी की गांठ लगी और वो खुद को पंसारी समझने लगा। मियां हरे चश्मे से देखने से भी हरियाली नहीं आती है। बिल्कुल ठीक कहा कि रोगी को ठीक करने के लिये कड़वी दवा ही देनी पड़ती है। ​तो जब कड़वी दवा दी जा रही है हल्ला गुल्ला क्यों मच रहा है ? देश की माली हालत साल भर पहले ​क्या थी ये क्या आँखों से नहीं दीखता है ? और आज क्या है ये अगर नहीं दिखता है तो समस्या दिमाग में है। जरा UN की रिपोर्ट पढ़ लीजिये उसे भाजपा के अंधभक्त और संघ ने नहीं बनाया है।

      — ​​
      सादर,

      Reply
    • इंसान

      मैं व्यक्तिगत रूप से मोदी-भक्त नहीं हूँ केवल राष्ट्रवादी हूँ| कल तक अरविन्द केजरीवाल जी को राष्ट्रवादी मान भ्रष्टाचार-की-जननी कांग्रेस का छाया कहते बीजेपी का विरोध करता रहा हूँ| भारतीय राजनीतिक क्षितिज पर नरेन्द्र मोदी जी के उजागर होने पर मुझे विश्वास हो चला था कि केजरीवाल की आआप और मोदी जी के नेतृत्व में बीजेपी दोनों मिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विकल्प बन भारत का पुनर्निर्माण कर पाएंगे| लेकिन भारतीय राजनैतिक इतिहास में तथाकथित नेताओं ने राष्ट्रवाद का उल्लंघन कर सदैव राष्ट्र-विरोधी तत्वों का साथ दिया है और परिणामस्वरूप आज हम सब दीमक के टीले पर बैठ राष्ट्रवादी मोदी जी का विरोध करने में किंचित भी संकोच नहीं करते हैं| नंगा नहाए क्या निचोड़े क्या? तुम नंगे नहीं हो और न ही भूखे हो और जैसा कि चित्र से ज्ञात होता है तुम्हारे शरीर पर वस्त्र हैं और अवश्य ही सर पर अच्छी खासी छत भी होगी| यह सब इस लिए कि तुम उस शासकीय व्यवस्था में विशेषाधिकृत पले बड़े हुए हो जो देशवासियों को समान रूप में संसाधन प्रदान करने में विफल रही है| एक नहीं, हज़ार नहीं, लाखों नहीं, देश की कुल जनसंख्या का दो-तिहाई जनसमूह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत निर्वाह करने को बाध्य है| तथाकथित स्वतंत्रता से पहले पूर्वी पंजाब के छोटे से गाँव में जन्म ले, देश-विदेश का भ्रमण करते मैंने जो देखा समझा है इस अधेड़ आयु में मैं उसका निचोड़ बताता हूँ| रात का भूला यदि प्रातः घर लौट आता है, उसे भुला नहीं कहते| विडंबना तो यह है कि भारतीय राष्ट्रवाद के संदर्भ में यह मुई रात ख़त्म ही नहीं होने को आती है| बरखुरदार, अँधेरे में कलम, मेरा मतलब है पाँव और कब तक चलाते रहोगे? कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस और बीजेपी की जमकर खिंचाई कर विश्व मोहन तिवारी जी का भूरा बंदर बने फिरंगियों को आह्वान देते हो? वे अब कभी नहीं आएंगे क्योंकि वैश्विकता और उपभोगतावाद में भूरा बंदर गोरी चमड़ी से और न डर नर-भक्षक शेर बने बलात्कारी बन चुका है| इसके अतिरिक्त और मैं अब तुम्हें कैसे बताऊँ कि राष्ट्रवाद के अभाव के वातावरण में फिरंगी अभी भी ‘सुदूर-नियंत्रण’ द्वारा अपना प्रभुत्व बनाए हुए हैं| कैसे भूल सकते हो, तुम राष्ट्रमण्डल देश के निवासी हो|

      Reply
  3. इंसान

    ठीक ही तो कहा है, ‘यदि सुबह की शुरुआत बीते हुए कल के किसी झगड़े या कलह से करेंगे तो आज का दिन बिना उमंग-उत्साह के ही बीत जाएगा। इस नकारात्मक स्थति में आने वाले कल की सुबह खूबसूरत कैसे हो सकती है?’ दीमक के टीले पर बैठे कोई कैसा भविष्य देख पाएगा? उस पर विडंबना यह कि स्वयं दीमक आने वाले भविष्य की कल्पना कर रहा है!

    Reply
  4. डॉ.अशोक कुमार तिवारी

    कॉरपोरेट घरानों की है सरकार !
    Nov. 29 राजनीति, व्यापार
    अभी 02-4-15 को समाचार आया था और वह भी केवल सोशल मीडिया पर कि दिल्ली सरकार ने एसीबी को रिलायंस के बारे में पुन: जाँच के अधिकार दे दिए हैं -(ज्ञातव्य हो कि 49 दिनों के आप के शासन के वक्त बनी एसीबी के पावर को जो रिलायंस पर जाँच के लिए बनाई गई थी वर्तमान केंद्र सरकार ने रिलायंस के दबाव में आकर उससे जाँच का अधिकार छीन लिया था इसीलिए बिजली कम्पनियों की ऑडिट और ‘ नीरा राडिया टेप ‘ पर सुप्रीम कोर्ट के जाँच आदेश को पूरा नहीं किया जा सका है )- फिर क्या था पूर्व की तरह भ्रष्टाचार रूपी बारूद में आग लगाने का काम हुआ : — –
    1) रिलायंस के पहले सेनापति दिल्ली के राज्यपाल अपनी रुहेली तलवार और बीजेपी की सेना लेकर केजरीवाल पर दौड़ पड़े….. और लगातार हमले की रिलायंस की बात मानते हुए अपने पद की गरिमा भी भूल गए ??? रिलायंस के नए – नए एजेंटों को लाकर दिल्ली सरकार की ऑफिस में फाइलों में गड़्बड़ी करने के लिए बैठाकर संसदीय व्यवस्था के स्थान पर ( जिसमें राज्य में मुख्यमंत्री और केंद्र में प्रधानमंत्री वास्तविक प्रधान होते हैं ) अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था लाने का गैर संवैधानिक कार्य कर रहे हैं ???
    2) दूसरी तरफ से कांग्रेस-बीजेपी नेताओं की रिश्तेदार जो महिला समितियों में बैठी हैं – पता नहीं कहाँ से एक महिला को लाकर कुमार विश्वास पर झूठा बलात्कार का आरोप लगाने की कोशिश कर दी हैं ……
    3) बिकाऊ मीडिया (18 चैनल्स को खरीदकर रिलायंस ने पत्रकारिता की अंतिम क्रिया कर दी है) जो नेपाल में पिट चुकी है उन्हें तीसरी तरफ से आम आदमी पार्टी पर हमले के लिए तैनात कर दिया गया है केजरीवाल अभिमन्यू की तरह चक्रव्यूह में घेर लिए गए हैं
    4) बिन्नी साजिया-किरणबेदी आदि पिटे-पिटाए मोहरों को भी अपनी बचीखुची ताकत बटोरकर पुन: हमला करने का फरमान रिलायंस ने जारी कर दिया है जिससे सच्चे देशभक्तों का ध्यान बँटा रहे …
    5) किसान आंदोलन के नाम पर बीजेपी से लड़ाई का दिखावा कर रही कांग्रेस ने भी अपने तथाकथित सच्चरित्र नेता दिग्विजय सिंह को आप के खिलाफ मोर्चे पर लगा दिया है…
    6) केंद्र के इशारे पर दिल्ली पुलिस ने दिल्ली सरकार के भ्रष्टाचार निरोधक सेल पर ही अपहरण का आरोप लगा दिया है जिससे भ्रष्टाचार बदस्तूर जारी रह सके ???
    – सहारा है तो दिल्ली के चौहान-तोमर वंशजों का ( देखना है इस नेकी-बदी के जंग में वे कब तक चुप रहते हैं)
    भारत के पहले आईएएस नेताजी सुभाष जी को तो इन भ्रष्टाचारियों ने खत्म ही करवा दिया है अब वर्तमान आईएएस कैडर के जननायक केजरीवाल के पीछे पड़े हैं ——
    लोकसभा चुनाव के बाद के जनादेश में आम-गरीब की जगह कौन कितने दमख़म से है इसका फैसला उद्योगपत्तियों का एक ‘ख़ास’ तबका कर रहा है। मतलब ये कि जो राजनीतिक दल रिलायंस जैसी कंपनियों के हित ज्यादा साधेंगे सिक्का उन्हीं का खनकेगा। यानी, धर्मोन्मादी पैदल सेनाएं (राजनीतिक दल) चाहे कुरूक्षेत्र में विजयी हो गई हैं, लेकिन असली जीत तो पाए हैं आधुनिक युग के तथाकथित प्रणेता – मुकेश अंबानी।(जिनकी पत्नी नीता अम्बानी की मुम्बई इण्डियंस जीतती है तो उन्हीं के स्कूल के बच्चे उनके सामने ही कचरे-पोलिथिन की पैकेट और प्लास्टिक पाइप से केवल मैदान को ही नहीं पाट देते हैं बल्कि चीयर गर्ल्स और गावस्कर जैसी महान हस्तियों पर भी उछालते हैं पिछले साल इसी स्टेडियम में कलकत्ता से हारने के बाद शहरुख खान व उनके परिवार को भी अपमानित किया गया था । जामनगर ( गुजरात ) के इनके स्कूल में हिंदी शिक्षक-शिक्षिकाओं के साथ जानवरों जैसा सलूक करके निकाला जाता है उनकी बच्ची को बोर्ड परीक्षा तक नहीं देने दिया जाता है अक्सर लोग आत्महत्याएँ करते हैं पुलिस रिपोर्ट नहीं लिखती है ? कम्पनी अधिकारियों से प्रताड़ित होकर नवागाँव की महिला सरपंच झाला ज्योत्सना बा को पूरे परिवार के साथ 23-2-15 को आत्महत्या का प्रयास करना पड़ता है – अभी तक पुलिस ने रिपोर्ट नहीं लिखा है,जिनकी एंटालिया बिल्डिंग वक्फ कमेटी की जमीन पर बनी है जो गवर्नमेंट ऑडिट कभी नहीं कराते हैं जिन्हें प्रधानमंत्री तक गले लगाते हैं ???)
    इंडिया इंक के विकल्प कोई अकेले नरेंद्र मोदी नहीं है और न राहुल गांधी हैं। ममता बनर्जी से लेकर मुलायम सिंह तक अनेक विकल्प हैं। सबको पूरे संसाधन दे रही है कॉरपोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियां, विदेशी चंदे की सुनामी चला रहीं है। अब इंडिया इंक ‘ कंपनी क़ानून ’ में भी छूट का दबाव बना रही है। इंडिया इंक चाहती है कि किसी राजनीतिक दल को कितना चंदा दिया गया कंपनियों पर इसका खुलासा करने का दबाव न डाला जाए। एक तरह से भारत जैसे देश में जहां सत्ता समीकरण अक्सर बदलते रहते हैं वहां जनता-जनार्दन ने कोई अनचाहा फेरबदल कर दिया तो उनके कारोबारी हित सत्ता बदलने के बाद भी सुरक्षित रहें इसकी पूरी सुरक्षा की मांग की जा रहीं है। इंडिया इंक ने सरकार को संदेश दिया है कि प्रस्तावित नए कंपनी एक्ट में पॉलिटिक्ल फंडिंग के बारे में बताने का जो प्रावधान है उसे हटाया जाए। कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री(सीआईआई) ने सरकार को लिखकर गुहार लगाई है कि वह नए कंपनीज़ ऐक्ट के सेक्शन 182(3) में बदलाव करे।इस सेक्शन में कहा गया है कि कॉरपोरेट्स को उन पॉलिटिक्ल पार्टियों के नामों का खुलासा अपने प्रॉफिट ऐंड लॉस अकाउंट में करना होगा,जिन्हें वे चंदा देते हैं। इसके लिए रेप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल ऐक्ट,1951 के सेक्शन 29ए के तहत रजिस्टर्डइकाइयों को पॉलिटिक्ल पार्टियों के तौर पर परिभाषित किया गया है।
    कॉरपोरेट घरानों के आगे सब नतमस्तक हैं
    खैर, मंच से दलितों, शोषितों, दबे-कुचले गरीब वर्ग की हिमायत में अपने महान नेताओं के भाषण सुन कर होश में आ पाएँ तो थोड़ा ध्यान यहां भी दे दीजिएगा। जो पूंजी इन्हें कुर्सी दिलवाने में सबसे अहम भूमिका निभाएगी बदले में अपना हिस्सा तो उसे लेना ही लेना है।यानी मंच से बेशक ये सारे नेता गरीबों के सबसे बड़े हमदर्द दिखते हो सच्चाई तो उनके सत्ता में आने के बाद फिर से हमारे सामने होगी। इस देश में सत्ता बनाने-बिगाड़ने के खेल में कॉरपोरेट घरानों की भूमिका को अभी भी आप नहीं समझे, तो आपको अपने अपने ईश्वर और अपने अपने अवतार मसीहा की भेड़ धंसान में निर्विकल्प अनंत समाधि मुबारक।
    यदि बीजेपी-मीडिया-रिलायंस-कांग्रेस-महिला समितियाँ वास्तव में देशभक्त हैं और महिलाओं का भला करना चाह्ती हैं तो निम्न मामलों में तुरंत कार्यवाहियाँ करें : ——-
    1) रिलायंस की प्रताड़नाओं से तंग आकर रिलायंस पेट्रोलियम फैक्ट्री जामनगर ( गुजरात ) से सटे गांव ” नवागांव की महिला सरपंच झाला ज्योत्सना बा घनश्याम सिंह ने ( २3- २-१५ ) को अपने पूरे परिवार के साथ आत्महत्या कर लिया है, इस कुकृत्य को छुपाने की कोशिस की जा रही है — क्या आप मरने वाले किसानों को न्याय दिलाएंगे ( Contact- 9978041892 ) ??? इस किसान परिवार ने स्थानीय थाने से लेकर मुख्यमंत्री- प्रधानमंत्री और उच्च और सर्वोच्च न्यायालय तक गुहार लगाई थी पर सब रिलायंस के आगे – बेकार ” सब हमारे जेंब में हैं ” ऐसा रिलायंस के अधिकारी खुलेआम कहते हैं और यह साबित होता है क्योंकि महिला सरपंच तथा उनके परिवार द्वारा आत्महत्या के प्रयास पर भी अभी तक केस दर्ज नहीं हुआ है !
    2) एक चतुर्थ श्रेणी महिला कर्मचारी सपना ( 9824597192) को रिलायंस द्वारा बहुत घृणित और अमानवीय व्यवहार के साथ निकाला गया वो गरीब महिला अधिकारियों के पैर पकड़कर फुट-फुट कर रोती रही और ये रिलायंस के राक्षस अधिकारी हँसते हुए महिलाओं की दुर्दशा करते रहते हैं ——- पर गरीबों की कौन सुनता है ???
    3)रिलायंस कंपनी के स्कूलों में हिंदी शिक्षक -शिक्षिकाओं के साथ जानवरों जैसा व्यवहार होता है,उनकी बच्ची को बोर्ड परीक्षा तक नहीं देने दिया जाता है लिखित निवेदन तथा महामहिम राष्ट्रपति-राज्यपाल सीबीएसई आदि के इंक्वायरी आदेश आने पर भी सरकार चुप है ?
    4) अहमदाबाद में रिटायर्ड शिक्षिका श्रीमती जशोदाबेन को अपने सेक्यूरिटी के बारे में जानकारी के लिए आर टी आई से भी जवाब नहीं मिल रहा है तथा 26जनवरी 15 को टीवी के सामने बैठकर उन्हें रोना पड़ता है ???
    —वैवाहिक स्थिति को लेकर मोदी जी को नोटिस की गुहार को गुजरात हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है ( देखिए राजस्थान पत्रिका- 12-12-14,पेज नम्बर – 01), अदाणी एस.ई.जेड. को रियायती जमीन देने के खिलाफ दायर याचिका को भी गुजरात हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है(देखिए राजस्थान पत्रिका- 12-12-14,पेज नम्बर – 04), — आप गुजरात हाई कोर्ट की स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं —

    Read more: http://mediadarbar.com/…/corporate-houses-and-political-p…/…

    मीडिया दरबार
    खबरों की खबर
    MEDIADARBAR.COM

    Reply
      • इंसान

        स्वाभाविक चंचल मन, इस अधेड़ आयु में भी मैं बचपने को नहीं भूल पाता हूँ और इस कारण अपनी बात समझाने में जान-बूझ अधर्म कर बैठता हूँ| श्री प्रभु जी के समीप रहने की लालसा में उस अधर्मी के साथ मिल बैठने में भी मैं कभी संकोच नहीं करता जिसे प्रभु जी ने स्वयं अपने दो हाथों से गढ़ा हो| ऐसे में अब देखता हूँ कि लेखक द्वारा कही ‘very exclusive & revolutaionary comments of dr Ashok tiwari’ टिप्पणी को समीप से पढ़ते डा: अशोक तिवारी जी—दूर नीचे बैठे रमश सिंह जी, क्या सुन रहे हो?—को विनयपूर्वक पूछ पाऊंगा कि आप रिलायंस से तंग आ रावण की लंका में विकल्प क्योंकर ढूँढ़ते हो? श्री रामायण के नायक और खलनायक में उलझ सुग्रीव को कैसे भूल गए? राष्ट्रवादी मोदी जी कोई और नहीं अन्याय से लड़ते स्वयं सुग्रीव ही हैं| आधुनिक इतिहास के महाराणा प्रताप सिंह बन किसी भामाशाह को ढूँढ़ते भारत के भाग्य जगाने आए हैं| जो अनपढ़ गरीब अभी भी खुले में आकाश तले जंगल-पानी करता हो क्या आप उससे इक्कीसवीं सदी में संसाधन जुटाने के लिए कहते हैं? यदि मेरी बात समझ पाए हैं तो आप अपनी व्यक्तिगत व्यथा को न्यायालय में ले जा (भूलें मत न्यायालय की विधि पूर्वक कार्यप्रणाली भी मोदी शासन को ही ठीक करनी है) उसका समाधान ढूँढ़ें, व्यर्थ ही रिलायंस के समीप उसका भारत पुनर्निर्माण में योगदान ढूँढने आये मोदी जी को ही नहीं बल्कि उन पर उज्ज्वल भविष्य की आशा लगाए सभी भारतीयों को लपेट आप अपनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का दोषी समझते हैं| मेरी न भी मानो, तनिक सोचो मोदी जी दीमक के टीले को और कितनी क्षति पहुंचा पाएंगे? जब चिरकाल से लुटेरों, आक्रमणकारियों, और कांग्रेस के बीच स्थिर बैठे रहे हो तो मोदी जी भी हमारे आपके नगण्य अस्तित्व को अस्थिर नहीं कर पाएंगे| क्या हुआ जो हम और आप भी थाली लौटा लिए देश के उन दो-तिहाई जनसमूह के संग कतार में बैठ जाएंगे जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के आश्रय हो गए हैं| परन्तु अनंत प्रश्न बना रहेगा, अपना कीमती वोट किसे देंगे? मन में राष्ट्रवाद होगा तो प्रश्न का उत्तर वह सुंदर समृद्ध भारत होगा जिसकी कल्पना अभी केवल एक निठल्ला भारतीय कवि ही कर सकता है| निर्वाचनों में बहुसंख्यक समर्थन प्राप्त कर मोदी जी १२५-करोड भारतीयों में कर्मशील संगठित लोगों को उनके साथ चलने का आह्वान करते कवि की कल्पना को साकार करने का कह रहे हैं| उन्हें मत रोको|

        Reply
  5. ravindra bhargava

    aapne modiji ki kamiya batlaie magar vikalp kya he fir bahi nahru khandaan RAHUL gandhi?

    Reply
    • श्रीराम तिवारी

      shriram tiwari

      To fight against croni Capitalism ,To fight against neolebral economic Corporate following polcey, to fight aginst the Communalism, to fight against the tererrism,to fight against the corrupation that maust be our sociao-political-econamic policay.After that we must tri the socialist reform in the nataion .that will be our alternative policy.

      Reply
    • इंसान

      आपके प्रश्न के उत्तर में श्रीराम तिवारी जी की खानसामा-अंग्रेजी में टिप्पणी ने वर्षों पहले बीती एक घटना को तरो ताज़ा कर दिया है| रेलगाड़ी में भाड़े का भगवा चोगा पहने एक दक्षिण-भारतीय वृद्ध व्यक्ति को ‘कहाँ जा रहे हैं?’ पूछने पर वह बोले ‘गौ हत्या करने|’ उत्सुकता वश दल के अन्य सदस्यों से पूछने पर मालूम हुआ कि वे लोग गौ हत्या के विरोध में किसी प्रदर्शन में भाग लेने कानपुर जा रहे हैं| मानता हूँ गलती मेरी है जो मैंने आप दोनों की वार्ता को पढ़ लिया और लेखक द्वारा दिए उत्तर को लेकर मन क्षोभित हो उठा|मन ही मन में श्रमिक संघ के उन बेचारे सदस्यों का सोचता हूँ जिनके कंधों पर चलते लेखक उनको बहुत पीछे छोड़ आए हैं| अंग्रेजी और हिंदी के विषम संघ में हम अपने सोच-विचारने की शक्ति ही खो बैठे हैं उस पर दुस्साहस यह कि राष्ट्रीय स्तर के गंभीर विषयों पर लिख औरों को भ्रमित कर रहे हैं|

      Reply
    • आर. सिंह

      आर. सिंह

      तो आप यह कहना चाहते हैं कि मोदी जी भी टिना (There is no alternative) फैक्टर का लाभ उठा रहे हैं.

      Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *