नारी नहीं बंटेगी

—विनय कुमार विनायक
सृष्टिकर्ता ब्रह्मा या खुदा
बिना पचड़े में पड़े नारी
गीता-बाइबल-कुरान में
पढ़ती रही एक ही बात

संतान की सुरक्षा, करुणा,
दया, ममता प्रेम, अहिंसा
और सृष्टि की हिफाजत!

जल प्रलय से पहले
और जल प्रलय के बाद
नारी रही सिर्फ नारी!

एक सी कथा-व्यथा
एक सा उभार-धसांन-सिकन
एक ही नारी जाति!

किन्तु बदलता रहा नर
सर्वदा मुखौटा लगा कर
कभी वक्ष पर रखकर पत्थर
बना था देव-दानव!

कभी वक्ष पर तानकर
कपास का डोर बना
आर्य-अनार्य मानव!

देव इन्द्र और आर्य पुरुरवा के
बीच उर्वशी रही नारी!
सिर्फ एक नारी! बनी नहीं
देवजाति/बनी नहीं आर्या!

किन्तु उर्वशी कुक्षिज आयु बना नर
आर्य कुल,वंश,जाति का कुलधर!

मित्र और वरुण के
बाहुपाश में बंधकर,
अगस्त-वशिष्ठ सा जनकर
श्रेष्ठ मंत्रद्रष्टा ब्राह्मण
किन्तु उर्वशी बनी नहीं
कभी ब्राह्मण जाति!

कि ब्रह्मर्षि वशिष्ठ भार्या
अक्षमाला थी अधम योनिजा!
शक्ति मुनि पत्नी थी स्वपाकी!
पाराशर प्रिया थी कैवर्त्या!
कि नारी बनी नहीं ब्राह्मणी!

कि नारी के उतुंग वक्ष को
कभी बांध नहीं पाया
कच्चे कपास का डोर!

कि ऐ नर!
मत बांधो नारी को
जाति-धर्म-मजहब के
भेदभावपूर्ण बंधन में
कि नारी महाचित्ति की
महाशक्ति है,आदि शक्ति है
कि नारी को दाढ़ी-मूंछ नहीं होती!

कि काट-छांटकर दाढ़ी-मूंछ
नारी को बांट नहीं पाओगे
हिन्दू,मुस्लिम और ईसाई में
कि नारी शिखा नहीं बढ़ाती!

भले बांट लो ईश्वर को
जाति धर्म संप्रदाय के खांचों में
किन्तु नारी नहीं बंटेगी!
ईश्वर तुम्हारी रचना है
किन्तु नारी है ईश्वरीय!

सात फेरे में बांधकर
भले भ्रम पाल लो उसे हिन्दू,
मुस्लिम, ईसाई बनाने का!

लेकिन वह सर्वदा
निर्भ्रान्त जनेगी अपने जैसी
संतति दाढ़ी-मूंछ रहित
बिना तिलक-खतना-वपतिस्मा
उपनयन संस्कार के हीं!
—विनय कुमार विनायक

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