लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान – ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार.
वर्तमान पता – लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी.
शिक्षा – बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय.
व्यवसाय – अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी.
साहित्यिक कृतियां – कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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जब-जब यह देश महानता की ओर बढ़ने की कोशिश करता है, कुछ आन्तरिक शक्तियां बौखला जाती हैं और इसे कमजोर करने की अत्यन्त निम्न स्तर की कार्यवाही आरंभ कर देती है। जाति और संप्रदाय इस देश के सबसे नाजुक मर्मस्थान हैं। इसे छूते ही आग भड़क उठती है। विगत सैकड़ों वर्षों का इतिहास रहा है कि भारतीय समाज की इस कमजोरी का लाभ उठाकर विदेशियों ने हमको गुलाम बनाया और हमपर राज किया। अंग्रेजों ने भारत की इस कमजोरी का सर्वाधिक दोहन किया। फूट डालो और राज करो की नीति उन्हीं की थी जिसे कांग्रेस ने अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के लिए ज्यों का त्यों अपना लिया। महात्मा गांधी और महामना मालवीय जी ने विराट हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता के लिए बहुत काम किया लेकिन उनके राजनीतिक उत्तराधिकारियों ने सत्ता के लिए सारे ऊंचे आदर्श भुला दिए और एक समुदाय के तुष्टिकरण के लिए  देश का विभाजन तक करा दिया। द्विराष्ट्र के सिद्धान्त के अनुसार मुसलमानों को पाकिस्तान जाना था और हिन्दुओं को हिन्दुस्तान में रहना था। कांग्रेस के समर्थन से पाकिस्तान तो बन गया लेकिन अधिकांश मुसलमान हिन्दुस्तान में ही रह गए। जिस समस्या के समाधान के लिए देश का बंटवारा हुआ था, वह ज्यों की त्यों बनी रही। बंटवारे के ईनाम के रूप में हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने १९५२ के आम चुनाव में कांग्रेस को थोक में वोट दिया। कांग्रेस को राजनीतिक गणित समझने में देर नहीं लगी। नेहरूजी कहते थे — By accident I am a Hindu. वही नेहरूजी अपने नाम के आगे पंडित लगाना नहीं भूलते थे। जब लोग उन्हें पंडितजी कहकर संबोधित करते थे तो वे अत्यन्त प्रसन्न होते थे। भोला-भाला ब्राह्मण समाज जो सदियों से सत्ता से बहुत दूर था, नेहरूजी के रूप में अपने को सत्ताधारी समझने लगा। नेहरू जी ने नाम के आगे पंडित लगाकर ब्राह्मणों का वोट साध लिया। जाति के आधार पर नौकरियों और जन प्रतिनिधियों के चुनाव का प्राविधान संविधान में डलवाकर उन्होंने दलितों को भी अपने पाले में कर लिया। भारतीय समाज के तीन बहुत बड़े वर्ग — मुसलमान, दलित और ब्राह्मण कांग्रेस के वोट-बैंक बन गए जिसका लाभ सोनिया गांधी तक ने उठाया। लेकिन शीघ्र ही इन तीनों समुदायों को यह समझ में आ गया कि कांग्रेस ने धरातल पर इनके लिए कुछ किया ही नहीं। परिणाम यह निकला कि कांग्रेस का यह वोट बैंक तितर-बितर हो गया। दक्षिण में द्रविड पार्टियों ने इसका लाभ उठाया तो उत्तर में लालू, मुलायम और मायावती ने। लालू और मुलायम ने M-Y(मुस्लिम यादव) समीकरण बनाया तो मायावती ने DMF(दलित मुस्लिम फोरम)। कुछ वर्षों तक यह समीकरण काम करता रहा और सबने सत्ता की मलाई जी भरकर खाई। किसी ने चारा खाया तो किसी ने समाजवादी पेंशन। किसी ने टिकट के बदले अथाह धन कमाया तो किसी ने फिल्मी सितारे नचवाए। जनता ने सब देखा। मोहभंग स्वाभाविक था। इधर पश्चिम के क्षितिज गुजरात में पूरे देश ने विकास और राष्ट्र्वाद के सूरज को उगते हुए देखा। नरेन्द्र मोदी के रूप में देश ने एक महानायक का उदय देखा। पूरा हिन्दू समाज मतभेदों को भूलाकर एक हो गया और दिल्ली ही नहीं अधिकांश राज्यों में राष्ट्रवादी सत्ता के शीर्ष पर पहुंच गए। ये जतिवादी और भ्रष्ट नेता मोदी को जितनी ही गाली देते, उनकी लोकप्रियता उतनी ही बढ़ती। सभी विरोधियों को बारी-बारी से मुंह की खानी पड़ी। फिर सबने अंग्रेजों और कांग्रेसियों की पुरानी नीति — फूट डालो और राज करो की नीति को लागू करने का एकजूट प्रयास किया।

महाराष्ट्र के कोरेगांव की घटना मात्र एक संयोग नहीं है। समझ में नहीं आता कि भारतीयों पर अंग्रेजों के विजय को भी एक उत्सव के रूप में मनाया जाएगा? कोरेगांव में अंग्रेजों के विजयोत्सव की २००वीं वर्षगांठ मनाने के लिए गुजरात से तथाकथित दलित नेता जिग्नेश मेवाणी पहुंचते हैं तो जे.एन.यू. दिल्ली से उमर खालिद। अंबेडकर जी के पोते प्रकाश अंबेडकर भी कहां पीछे रहनेवाले थे। वे भी आग में घी डालने पहुंच ही गए। खुले मंच से जाति विशेष को गालियां दी गईं। दंगा भड़क उठा। इसे देशव्यापी करने की योजना है। उमर खालिद, जिग्नेश मेवाणी, हार्दिक पटेल और राहुल गांधी की जुगलबन्दी कोई आकस्मिक नहीं है। तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम पुरुष वर्ग तो पूरे देश में अराजकता फैलाने के लिए उचित समय का इन्तज़ार कर ही रहा है, खालिद, मेवाणी, पटेल और राहुल की जुगलबन्दी भी सत्ता सुख के लिए देश को अस्थिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। यह और कुछ नहीं, राष्ट्रवाद के उदय और तमाम तिकड़मों के बाद भी चुनावों में हो रही लगातार हारों से उपजी हताशा का परिणाम है। लेकिन यह देशहित में नहीं है। योजनाएं जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की राष्ट्रद्रोही धरती पर बनती हैं और क्रियान्यवन गुजरात, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की धरती पर किया जाता है। इसमें अच्छा खासा विदेशी धन खर्च किया जा रहा है। सरकार का यह कर्त्तव्य बनता है कि इन राष्ट्रद्रोही शक्तियों की आय का स्रोत, इन्हें समर्थन करनेवाली ताकतों और इनके असली लक्ष्य का पता लगाए और समय रहते इनपर कार्यवाही करे।

One Response to “यह कैसी जुगलबन्दी”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    विपिन किशोरजी बिल्कुल समयोचित विषय पर सही सही तर्कशुद्ध विश्लेषण.
    जनतंत्र के इन नकारात्मक पहलुओं के कारण ही भारत आज भी जकडा गया है.
    हमारा सर्वसाधारण मतदाता छिछरे वैयक्तिक क्षुद्र लाभ देखकर मत देता है.
    पागल को दवा पिलाने का काम हमें करना है. पागल दवा तो पीता नहीं, पर थप्पड मारता है.
    ये जिग्नेश, हार्दिक, उमर खालिद और राहुल की तुच्छ जुगलबन्दी समझ में आती है;
    * पर ऐसा जटिल और भ्रमित जनतंत्र कहीं और देखा नहीं है.
    ईश्वर करे, युगों के बाद आया हुआ अवसर ना गँवाएँ.

    धन्यवाद.

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