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    योगः कर्मसु कौशलम्

    अरविंद जयतिलक

    आज योग दिवस है। इस दिवस को समूचा विश्व तन्मयता से मना रहा है। चूंकि योग के विज्ञान की उत्पत्ति भारत में ही हुई और हम गर्व से कह सकते हैं कि योग भारत की ही देन है। भारतीय ग्रंथों में योग परंपरा का विस्तृत उल्लेख है। योग विद्या में भगवान शिव को आदि योगी कहा गया है। भगवान शिव के बाद वैदिक ऋषि-मुनियों ने योग की परंपरा को आगे बढ़ाया। योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द युज से हुआ है। इसका अर्थ है स्वयं के साथ मिलन। महर्षि पतंजलि को योग का प्रणेता कहा जाता है। उन्होंने अपने योगसूत्रों के माध्यम से उस समय विद्यमान योग की प्रथाओं, इसके आशय एवं इससे संबंधित ज्ञान को व्यवस्थित एवं कुटबद्ध किया। पतंजलि के अनुसार चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरुष का स्व स्वरुप में अवस्थित होना ही योग है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिल नही योग है। भगवद्गीता के अनुसार दुख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र और शीत-उष्ण इत्यादि द्वंदों में समभाव रखना ही योग है। कर्तव्य कर्म बंधक न हो इसलिए निष्काम भावना से उत्पे्ररित होकर कर्तव्य करने का कौशल योग है। आचार्य हरिभद्र के अनुसार मोक्ष से जोड़ने वाले सभी व्यवहार योग हैं। आधुनिक आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर का कहना है कि योग सिर्फ व्यायाम या आसन नहीं है। यह भावनात्मक एकीकरण और रहस्यवादी तत्व का स्पर्श लिए हुए एक आध्यात्मिक ऊंचाई है। प्रसिद्ध संवाद योग याज्ञवल्क्य में जो कि बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित है, में याज्ञवल्क्य और शिष्या ब्रह्मवादी गार्गी के बीच कई सांस लेने संबंधी व्यायाम, शरीर की सफाई के लिए आसन और ध्यान का उल्लेख है। गार्गी द्वारा छांदोग्य उपनिषद में भी योगासन के बारे में कहा गया है। अथर्ववेद में उल्लिखित संन्यासियों के एक समूह वार्ता द्वारा शारीरिक आसन जो कि योगासन के रुप में विकसित हो सकता है पर बल दिय गया है। यहां तक कि संहिताओं में भी उल्लिखित है कि प्राचीन काल में मुनियों, महात्माओं और विभिन्न साधु और संतों द्वारा कठोर शरीरिक आचरण, ध्यान और तपस्या का अभ्यास किया जाता है। महाभारत के शांतिपर्व में भी योग का विस्तृत उलेख है। भारत में उपलब्ध उपषिदों और योग वशिष्ठ में भी योग के बारे में जानकारी मिलती है। योगऋषि पतंजलि के उपरांत अन्य-अनेक भारतीय ऋषियों एवं योगाचार्यों ने योग की परंपरा को आगे बढ़ाया। स्वामी विवेकानंद ने शिकागो के धर्म संसद सम्मेलन में अपने ऐतिहासिक भाषण के जरिए संपूर्ण विश्व को योग की महत्ता से सुपरिचित कराया। महर्षि महेश योगी, परमहंस योगानंद और रमण महर्षि जैसे अनेक पुरोधाओं ने भी योग से पश्चिमी दुनिया को प्रभावित किया। यह योग की बड़ी उपलब्धि है कि उसके शास्त्रीय स्वरुप, दार्शनिक आधार और सम्यक स्वरुप को किसी अन्य धर्म ने नकारा नहीं है। यहां तक कि संसार को मिथ्या मानने वाले अद्वैतावादी भी योग का समर्थन किए हैं। अनीश्वरवादी सांख्य विद्वान भी योग का अनुमोदन करते हैं। बौद्ध ही नहीं मुस्लिम सूफी और ईसाई मिस्टिक भी किसी न किसी प्रकार अपने संप्रदाय की मान्यताओं और दार्शनिक सिद्धांतों के साथ योग का सामंजस्य किए हैं। सच तो यह है कि योग का किसी धर्म विशेष से संबंध नहीं है। यह धर्म, आस्था और अंधविश्वास से परे एक सीधा-सा प्रायोगिक विज्ञान है जो जीने की कला सीखाता है। इसे एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति के रुप में भी देखा जाता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने एक स्थान पर कहा है कि योगः कर्मसु कौशलम्’ अर्थात् योग से कर्मों में कुशलता आती है। गीता में कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग की विशद् मीमांसा की गयी है। बौद्ध धर्म में कहा गया है कि कुशल चितैकग्गता योगः अर्थात कुशल चित् की एकाग्रता ही योग है। दूसरी शताब्दी के जैन पाठ तत्वार्थसूत्र के अनुसार योग मन, वाणी और शरीर सभी गतिविधियों का कुलयोग है। भारतीय दर्शन में, षड् दर्शनों में से एक का नाम योग है। भारत में योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया  है जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने का काम होता है। योग शब्द भारत से बौद्ध धर्म के साथ चीन, जापान, तिब्बत, दक्षिण-पूर्व एशिया और श्रीलंका में फैला। सूफी संगीत के विकास में भारतीय योग अभ्यास का काफी प्रभाव है, जहां वे दोनों शारीरिक मुद्राओं आसन व प्राणायाम को अनुकूलित किया है। प्राचीन काल में योग की इतनी अधिक महत्ता थी कि 11 वीं शताब्दी में भारतीय योगपाठ अमृतकुंड का अरबी व फारसी भाषाओं में अनुवाद किया गया। आज दुनिया के सभी देशों में योग की स्वीकार्यता बढ़ी है। योग के जरिए लोगों को अपनी व्यस्त दिनचर्या को स्वस्थ व व्यवस्थित रखने में मदद मिल रही है। चिकित्सकों की मानें तो योग से न केवल व्यक्ति का तनाव दूर हो रहा है बल्कि मन व मस्तिष्क को शांति भी पहुंच रही है। योग के जरिए दिमाग और शरीर की एकता का समन्वय होता है। योग संयम से विचार व व्यवहार अनुशासित होता है। योग की सुंदरताओं में से एक खूबी यह भी है कि बुढे़ या युवा, स्वस्थ या कमजोर सभी के लिए योग का शारीरिक अभ्यास लाभप्रद है। योगाभ्यास से रोगों से लड़ने की शक्ति में वृद्धि होती है। त्वचा पर चमक बनी रहती है और शरीर स्वस्थ, निरोग व बलवान रहता है तथा अंतश में शांति का उद्भव होता है। भारतीय योग और दर्शन में योग का अत्यधिक महत्व है। सच कहें तो आध्यामिक उन्नति या शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए योग की आवश्यकता एवं महत्व को प्रायः सभी दर्शनों एवं भारतीय धार्मिक संप्रदायों ने एकमत से स्वीकार किया है। आज अगर योग को लेकर दुनिया का आकर्षण बढ़ा है और उसके सामथ्र्य और उपयोगिता को पहचाना गया है तो निःसंदेह यह योग की वैज्ञानिक महत्ता का प्रतिफल है।

    अरविंद जयतिलक
    अरविंद जयतिलकhttps://www.pravakta.com/author/arvindjaiteelak
    लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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