योगविद्या को हिंदू आस्था का अंग मानने पर झिझक क्यों?

हरिकृष्ण निगम

आज जब लगभग डेढ़ करोड़ लोग मात्र अमेरिका में ही योगाभ्यास, ध्यान और प्राणायाम से जुड़े हुए हैं इसकी अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता एवं स्वास्थ जीवन के संदर्भ में प्रासंगिकता को समझा जा सकता है। यह भारतीय वैकल्पिक चिकित्सा पध्दति की बढ़ती हुई स्वीकृति का भी सूचक है जिसके बीच में आस्था, नस्ल, रंगभेद या कोई और विभाजन रेखा नहीं आती हैऔर मानव मात्र के लिए यह उपयोगी सिध्द हो रही है। योग भारत की पहचान का एक नया सांस्कृतिक ब्रांड बन चुका है और यह हमारे समाज के बहुआयामी पक्ष को उजाकर करने के साथ-साथ विदेशों में यह अहसास भी करा चुका है कि योग के बीज हिंदू आस्था में है और इसका अभ्यास करने वालों को स्वाभाविक रूप से स्वतः पुरातन धार्मिक ग्रंथ में विद्यमान इसकी जड़ों तक जाना चाहिए। हमारी आस्था के मूल तत्व यौगिक प्रक्रियाओं को मूलभूत रूप से प्रेरणा के माध्यम बना चुके हैं। स्पष्ट है कि योग-संबंधी विश्वव्यापी लहर हिंदू आस्था का अविभाज्य अंग है और इस शृंखला की जानकारी मनुष्य के शारीरिक और अध्यात्मिक लाभ में उपयोगी सिध्द हो सकता है।

इन्हीं सब बातों को लेकर आज तक आकर विभिन्न चर्च संप्रदाय और हमारे देश के कुछ दुराग्रही बुध्दिजीवी व्यर्थ चिंतित होकर दुष्प्रचार में जुट गए हैं। विडंबना यह है कि हमारे देश के ही अंग्रेजी मीडिया के एक बड़े बर्ग ने जिसमें हमें ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ अगुवाई करता दीखता है हाल में अपने सांप्रदायिक पृष्ठ पर योग को हिंदू आस्था से जोड़ने पर आपति उठा रहा है। यह मानते हुए भी कि योग का आकर्षण वैश्विक है वह कह रहा है इसलिए हिंदू धर्म को इस पर अपनी ऑनरशिप नहीं प्रदर्शित करनी चाहिए। क्या कोई भारतीय योगाभ्यास के प्रारंभिक व शास्त्रोक्त स्वामित्व पर संशय प्रकट कर सकता है? यह एक त्रासदी है कि अंग्रेजी मीडिया में सहधर्मी ही सदियों से स्थापित सत्य को नकारने में लगे हैं। चर्चो के विरोध को तो समझा जा सकता है क्योंकि वे मूल रूप से अपने अनुयाईयों की संख्या में कमी को योग की लोकप्रियता के कारण भी मानते हैं। पर हमारे कुछ सहधर्मियों का अपना ही आस्था पर विषवमन करना एक जघन्य अपराध सा प्रतीत होता है। स्वयं पश्चिम में योग से संबंधित प्रभावी अभ्यासों और क्रियाओं पर आज विपुल साहित्य उपलब्ध है और अमेरिका में हो योग क्रियाओं पर स्वत्वाधिकारों और पेटेंट कराने की होड़ भी लगी है पर इस वास्तविकता की दृष्टि से बावजूद वे सब योग के लिए पुरातन हिंदू धर्म और आचारसंहिता के प्रति ॠृणी दिखते हैं पर हमारे कुछ अंग्रेजीपरस्त बुध्दिजीवियों और कुछ पत्रकारों की विस्मयजनक कुटिलता तो यहां तक प्रकट हुई है कि हमें हिंदू आस्था के अनूठेपन के गुण गाना बंद कर इसकी विशिष्ट जीवन शैली के बौध्दिक संतुलन के कट्टरपंथ को हटाना चाहिए। इस छद्म वाग्जाल से वे सेमिटिक धर्मों को खुशकर हिंदू आस्था को शुध्द मूल्यों की केंद्रीयता को नकारना चाहता है। वे क्यों यह कहने में बेचैनी महसूस करते हैं कि हिंदू आस्था द्वारा ही योग का सृजन हुआ है। मात्र इसलिए कि कुछ लोग अनेक पध्दतियों की चर्चा करते हैं इसलिए संशय पैदा करने के लिए आज कुछ लोग दुराग्रहवश कर रहे हैं कि योगाभ्यास में सांगठनिक क्रमबध्द या व्यवस्थित पाठ्यक्रम जैसा कुछ नहीं है और इसलिए अनेक व्यवसायिक दृष्टिमुक्त व्यक्ति अपने-अपने रूप में इस पर स्वत्वाधिकार जताएं तो कोई आश्चर्य नहीं।

सारांश यह है कि आज हमारे देश में भी एक ऐसा वर्ग पैदा हो चुका है जो मानव जाति को योग द्वारा हिंदू धर्म को दिया हुआ योगदान भी नकारना चाहता है। हिंदू आस्था का योग अभिन्न अंग है, यह तथ्य नकारना अपने मुंह पर थूकने जैसा है। यदि योग को भी धर्मनिरपेक्षता का बाना पहनाने का यत्न चलता रहा तो हिंदू आस्था में परिभाषित उच्चतम लक्ष्यों की प्राप्ति के माध्यम के रूप में इसे तिरस्कृत किया जा सकता है। जब कुछ लोग योग को स्वस्थ और तनावग्रस्त जीवन या ईश्वर प्राप्ति के साधन के रूप में प्रचारित नहीं करना चाहते हैं।

आज प्रतिद्वंद्विता और प्रचार के युग में ऐसे विज्ञापन भी देखने को मिल सकता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। वजन घटाने के लिए योग, पतले होने के लिए योग, बेहतर सेक्स जीवन के लिए योग, एक्यू-योग द्वारा कायाकल्प, भावनात्मक उपचार पध्दति और योग, प्राकृतिक चिकित्सा, योग, प्रेक्षा, ध्यान, एक्यूप्रेशर, चुंबक, पिरामिड, सुजोक आदि के मिले जुले रूप की खिचड़ी को भी आज वैकल्पिक चिकित्सा को अधिक योगाभ्यास कह कर प्रचारित किया जा रहा है जहां इसे हिंदू आस्था से काट कर एक ‘सेक्यूलरवादी’ रूप देकर भरसक प्रयास किया जा रहा है। कोई इलेक्ट्रोमैगनेट बेल्ट या सुजोक सिम्युलेटर मशीन को भी योग के उपकरण कह कर उनका विपणन कर रहा है। योग न तो ‘रिकी’ है न ‘क्रिस्टल हीलिंग’ अथवा ‘कलर’ या ‘एरोया’ थिरेपी सम्मोहन चिकित्सा। योग वस्तुतः शरीर, मास्तिष्क और आत्मा में संतुलन बनाने की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। पर आज के इस दौर में आपको मीडिया और दूसरे प्रचारतंत्र यही परामर्श दे सकते हैं कि आप योगाभ्यास करें और चाहे तो पिजा, बर्गर या मंसाहार व तामसिक भोजन को न छोड़े। आप टी. एल. सी. और दूसरी अनेक टी. वी. चैनलों पर कम-से-कम वस्त्रों में योगाभ्यास अथवा आसनों को करती हुई युवतियों को भी बिना झिझक हीनता ग्रंथि के देख सकते हैं। योग और एक दृश्यातिरेक का आनंद एक नए विकृत समाज का बाजीकरण इससे अच्छा नहीं हो सकता। शायद यह दुष्प्रचार उस साजिश की पूर्वपीठिका है जहां आज योग को हिंदू धर्म से काटकर इसको व्यवसायिक लाभ के दृष्टिाकोण से एक सेक्यूलर गतिविधि कहा जा रहा है।

हम भूलें नहीं कि यह एक दिश अनुभूति है, आत्म-संयम द्वारा शांति-प्राप्ति का दैवी माध्यम है। यह एक उत्पाद नहीं है जिसके विपणन की रणनीति पर हर प्रकार के लटके-झटकों से बनाई जाए जैसा आज हो रहा है। चारित्रिक शुचिता को योग की अवधारणा से पृथक नहीं किया जा सकता है। योग और स्वच्छंद दिनचर्या या खान-पान की अनियमितता व उच्छृंखलता दो अलग-अलग ध्रुव हैं पर आज का परिदृश्य जिस प्रकार का है उसमें मूल लक्ष्य से होने वाला भटकाव स्पष्ट है।

3 thoughts on “योगविद्या को हिंदू आस्था का अंग मानने पर झिझक क्यों?

  1. योग वास्तव में हिन्दू धर्म की एक विद्या हैं जिसको पढ़कर विश्व महान बन सकता हैं, स्कुल की किताबों में योग की शिक्षा होनी चाहिए जिससे पढकर बालक महान बन सकते हैं योग न तो कोई धर्म बदलने को कहता हैं न भाषा योग से तन मन दोनों स्वस्थ रहते हैं सुखी जीवन के लिए योग अति आवश्यक हैं योग कोई आज से तो हैं नहीं यह तो सनातन हैं |

  2. बहुत संयम और सहनशीलता दिखाने पर कुछ लोग हिन्दू धर्म को १८५७ की खोज भी कह सकते हैं!

    अपने धर्म और उसके योगदान को गर्व से अपना कहिये और जिन्हें अच्छा लगे वह हमारी विधाओं का लाभ और हमारे धर्म का हिस्सा बन सकने का आनंद ले सकते हैं.

    बाकी, सभी धर्मों का हम स्वागत करते हैं . सभी धर्मों में सद्भावना बढे . ऐसी कामना हिन्दू धर्म के अनुयायी करते हैं .

  3. श्री निगम जी ने लेख में बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है. योग तो हिन्दू धर्म की एक विद्या, जीवन पद्यति है है जिसे कोई भी कर सकता है, अपना सकता है. योग तो नहीं कहता की आप योग करने पर हिन्दू धर्मं का पालन करे, किन्तु अगर कुछ लोग कहते है की योग हिन्दू धर्म का अंग है तो गलत भी क्या है, वे कोई टैक्स तो नहीं मांग रहे है, कोई धर्म परिवर्तन तो नहीं करवा रहे है. अगर वे लोग यह नहीं कहे तो कुछ सालो बाद हमारे बच्चो की स्कूल की किताबो में लिखा होगा की ब्रिटेन वासिओ ने गुलामी के समय भारत को धर्य रखने के लिया ब्रिटेन से लाकर योग सिखाया था.

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