लेखक परिचय

जगदीश वर्मा ‘समन्दर’

जगदीश वर्मा ‘समन्दर’

सह सम्पादक-प्रखर क्रान्ति चक्र साप्ताहिक, मथुरा । मुख्य सम्पादक- विश्व शांति सन्देश, मासिक पत्रिका, मथुरा । मैनेजिंग एडिटर इन मैट्रो मीडिया, मथुरा (डीटीपी पब्लिेकशन एण्ड एडर्वटाइजिंग)

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पिछले एक महीने में तीन ऐसे जानकार लोगों की असामयिक मृत्यु की खबर सुन चुका हूँ जिन्होनें अपने जीवन की युवावस्था भी पूरी तरह नहीं जी थी । जो अभी बस परिवार की जिम्मेदारियां उठाने लायक बनने की प्रक्रिया में ही थे । जिनका परिवार अभी-अभी शुरू ही हुआ था । जिनके माँ-पिता अपनी जिम्मेदारी निभाकर वृद्धावस्था में बेटे का राज भोगना चाहते थे । लेकिन काल के क्रूर हाथों ने किसी के अरमान पूरे नहीं होने दिये । तीनों मृतकों में इन बातों के साथ एक बात और समान थी और वो था मृत्यु का कारण । तीनों जवान मौंते अचानक से हदृय गति रूक जाने के कारण हुईं ।

युवावस्था में ही हदृय अपना काम करना छोड़ रहा है तो इसके पीछे कहीं ना कहीं भागमभाग जिन्दगी, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, दो जून की रोटी की चिन्ता और पारिवारिक जिम्मेदारियों के अहसास का भारी तनाव भी जिम्मेदार है । इसमें कोई शक नहीं है कि मौजूदा परिस्थितियों में किसी परिवार का आर्थिक रूप से बेहतर हो जाना बड़ी बात है । पारम्परिक रूप से इसकी जिम्मेदारी परिवार के बेटों पर होती है । आज के युवाओं पर बेफ्रिकी के चाहे जितने आरोप लगते हो लेकिन यह भी सच है कि उम्रभर वे इस जिम्मेदारी के अहसास से छूट नहीं पाते हैं । आजाद ख्याल युवक भी जब अकेले पड़ते हैं तो उन्हें बाप के झुकते कंधे और माँ के चेहरे की सलवटें अपनी नाकामी का आईना दिखाते हैं ।

यहीं से उसकी कोशिशें शुरू होती हैं जो उसे कुछ करने की तमन्ना जगाती हैं । दुनियाँ भर के चुटकुले सुना कर हंॅसी बिखेरने वाला मस्तमौला आम युवक रोजगार की तलाश में जाने कब संजीदा हो जाता है खुद उसे भी पता नहीं चलता । बेरोजगारी दूर करने का वायदा करके कुर्सी पाने वाली राजनीति भले ही मुकर जाती हो लेकिन गरीब परिवार का वो बेटा एक घर का वायदा पूरा करने में पूरी जी जान लगा देता है जिसके माता पिता ने अपना जीवन किराये के घर में गुजार दिया हो । समाज में अपनी जगह बनाते ऐसे युवाओं को जब समय के साथ नयी जिम्मेदारियां मिलती हैं तो तनाव और चिन्ता उसके दिल और दिमाग को खाने लगती हैं । युवाओं के मस्तिष्क में ब्लड प्रेशर यूँ ही नहीं उछाल मारता ।

चिन्ता और तनाव की यह महीन बीमारी जाने कब उसे अन्दर ही अन्दर खत्म कर रही होती है खुद उसे भी पता नहीं चलता । हाँ इसका एक इशारा जरूर मिलता है, ऐसे दिल को एकान्त पसन्द आता है और बनावटी हसीं हंसने में अजीब नहीं लगता। सारी जिम्मेदारियों को समेटने वाली जिद कभी-कभी खीज में बदलने लगती है जो वास्तव में खुद पर आने वाला गुस्सा होता है । ऐसी परिस्थतियों में अगर परिवार उसकी मेहनत को सम्मान ना दे सके और दोस्त उसकी आखों का खालीपन ना देख पायंे तो यकीन मानिये वो हदृय चाहें कितना भी युवा हो, जीवन की चाह और उमंग खो देता है ।

बिल्कुल हमारे बुजुर्गों को युवाओं के प्रेम की जरूरत है, लेकिन इस भौतिकतावादी संसार में कहीं ना कहीं युवाओं को भी उस साथ और अपनत्व की जरूरत है जो उनमें इतनी हिम्मत भर दें कि वे अपनी वेदना आपके सामने कह सकें, बता सकें । और कम से कम हमें भी दोस्ती का इतना हुनर तो सीख ही जाना चाहिये कि हम अपने दोस्त की आखों में अपनी जरूरत को पढ़ सकें, जान सकें, समझ सकें । ताकि फिर कोई अपना इस तरह ना चला जाये कि हम उससे इतना भी ना पूछ सकें, ‘‘कुछ तो बात है, बता तो सही’’ । हमारे कई अपने इस सवाल का अभी भी इन्तजार कर रहे हैं, पूछ के देखियेगा, हो सकता है कि आपके कंधे पर कोई अपना पूरा दुख रो दे । आपकी आत्मीयता उसके दिल का बोझ कुछ कम कर देगी, यकीन मानिये ।

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