आगामी चुनाव जीतने के लिये समाजवादियों का सबसे बड़ा दांव

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुनावों से ठीक पहले बसपा , भाजपा और कांग्रेस को परेशान करने के लिये 17 अति पिछड़ी जातियों कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निशाद, कुम्हार,प्रजापति,धीवर, बिंद,भर,राजभर,धीमर, बाथम, तुरहा, गोडिंया, मांझी व मछुआ को एस सी का दर्जा देने का ऐलान किया है। अब यह प्रस्ताव केंद्र सरकार के विचाराधीन भेजा जायेगा। सपा सरकार ने यह फैसला करके एक तीर से कई निशाने लगाने का अनोखा प्रयास किया है।

मृत्युंजय दीक्षित

आगामी विधानसभा चुनाव जीतने के लिए समाजवादी पार्टी ने अब हर प्रकार का हथकंडा अपना लिया है। समाजवादियों ने ठान लिया है कि उसे 2017 में अपनी सरकार हर हाल में वापस लानी है। इसलिए उसने जाति, धर्म और विकास का अजूबा काकटेल प्रस्तुत कर दिया है।समाजवदी दल व सरकार दोनों ने ही धनबल और बाहुबल का खजाना भी खोल दिया है। समाजवादी सरकार के युवा मुख्यमंत्री जहां प्रतिदिन हजारों करोड़ रूपये की परियोजनाओं का शिलान्यास, लोकार्पण व उद्घाटन कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर अपने पूरे कार्यकाल में यादव और मुस्लिम समाज के हित में राजनीति करते रहे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुनावों से ठीक पहले  निछड़ी जातियों को भी लुभाने का सबसे बड़ा दांव खेल ही दिया है।समाजवादी विकास के साथ आरक्षण को भी गर्म रखना चाहते हंै।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुनावों से ठीक पहले  बसपा , भाजपा  और कांग्रेस को परेशान करने के लिये 17 अति पिछड़ी जातियों कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निशाद, कुम्हार,प्रजापति,धीवर, बिंद,भर,राजभर,धीमर, बाथम, तुरहा, गोडिंया, मांझी व मछुआ को एस सी का दर्जा देने का ऐलान किया है। अब यह प्रस्ताव केंद्र सरकार के विचाराधीन भेजा जायेगा। सपा सरकार ने यह फैसला करके एक तीर से कई निशाने लगाने का अनोखा प्रयास किया है।  राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि अभी तक प्रदेश की राजनीति में समाजवादियों की छवि परिवारवाद को बढ़ावा देने, यादववाद और मुस्लिमवाद की राजनीति करने की रही है। इन जातियों पर भाजपा और बसपा की अच्छी पकड़ है। विगत 2014 के लोकसभा चुनावों में इन जातियों का 43 प्रतिशत वोट भाजपा की झोली में चला गया था जिसे तोड़ने के लिये समाजवादियो ने यह झूठा और गहरा दांव चला है। समावजवादी सरकार का यह सबसे हास्यास्पद, विवादास्पद फैसला है। इस फैसले के बाद सपा का यह दावा भी झूठा हो रहा है कि अगला चुनाव विकास के नाम पर लड़ा जायेगा। प्रदेश सरकार के मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति दावा कर रहे हैं कि सरकार का यह फैसला पिछड़ी जातियों के कल्याण के लिए मील का पत्थर साबित होगा। बसपा नेत्री मायावती ने उक्त फैसले को चुनावी हथकंडा और भाजपा ने जनता के साथ धोखा करार दिया है। विरोधी दलों का कहना है कि यह एकमात्र चुनावी स्टंट है। विरोधी सरकार से पूछ रहे हैं कि सपा  10 साल तक यूपीए की सहयोगी रही तब आखिर इन जातियों को अनुसूचित जाति की सूची मेें क्यों नहीं शामिल किया गया?

विपक्ष का कहना है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह ने भी यह प्रस्ताव किया था और 2012 के चुनावी घोषणा पत्रमें भी यह प्रसताव का हिस्सा था इसके बावजूद सरकार का कार्यकाल पूरा होने के बाद सरकार ने यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा है। सपा सरकार की यह सरासर नौटंकी और पिछड़ी जातियों के साथ महाधोखा है। सपा दावा कर रही है कि पूर्व में सपा मुखिया मुलायम सिंह ने पिछड़ी जातियों को हक दिलाने के नाम पर पहले की सरकार में फैसला लिया था लेकिन बसपा नेत्री मायावती ने अपनी सरकार बनने के बाद इस फैसले को रदद कर दिया था।

वहीं दूसरी ओर इस मामले में सबसे बड़ा तथ्य यह है कि वर्ष 2006 में मुलायम सरकार ने अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति की सूची और 3 अनुसूचित जातियों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए शासनादेश जारी किया था । अंबेडकर महासभा व अन्य दलित संगठनों ने इसे न्यायालय में चुनौती दी थी जिसे बाद में माननीय हाईकोर्ट ने पूरी तरह से रदद कर दिया था। जबकि केंद्रीय व्यवस्था है कि केंद्र रजिस्ट्रार जनरल आॅफ इंडिया और राष्ट्रीय अनूसुचित जाति आयोग से परामर्श के बाद संसद के माध्यम से ही किसी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल कर सकता है अथवा निकाल सकता है।संविधान के अनुच्छेद – 341में राष्ट्रपति राज्यपाल से परामर्श कर तथा संसद से कानून पास करवाकर इस सूची मेेें किसी जाति को शामिल या बाहर कर सकते हैं। इसमें राज्य सरकार को कोई अधिकार प्राप्त नहीं हैं। एक प्रकार से समाजवादी सरकार का यह पिछड़ी जातियों के साथ सबसे बड़ा महाछल है। सरकार का दावा है कि इन 17 जातियों का रहन- सहन, खान- पान एक जैसे हैं और इनकी हालत दलितों से भी अधिक दयनीय है। अतः इन जातियों को एससी की सूची में शामिल करके उन्हंे दलितों के समक्ष सुविधाएं दी जा सकेंगी। समाजवादी सरकार का यह सबसे बड़ा वास्तविक चुनावी हथकंडा व एक प्रकार से लोकलुभावनी राजनीति का ही हिस्सा भर है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर चुनावों की घोषणा के कुछ दिन पहले ही इस प्रकार का ऐलान किया क्यांे जा रहा है?सपा मुखिया और बबुआ यदि इन पिछड़ों के इतने हितैषी बनना चाह रहे हैं तो अब तक इनके लिए अब तक के कार्यकाल में शुरू में ही बड़े ऐलान क्यों नहीं किये गये?  क्या सीएम अखिलेश यादव चुनावों से ऐन पहले इन पिछड़ी जातियों  व मुस्लिम समाज को लुभाने के लिए मुख्यमंत्री पद पर कोई नया चेहरा लाने का साहस दिखा सकते है? क्या सपा सरकार का यह निर्णय आरक्षण व जातिवाद की राजनीति के नाम पर पीएम मोदी , भाजपा व संघ पर नये सिरे से आरोप लगाने के लिये चली गयी चाल तो नहीं है? इस फैसले के बाद अब सपा मुखिया और बबुआ जनता के बीच जाकर वोट मांगेगे और कहेंगे कि हम तो कर रहे हैं लेकिन केंद्र सरकार हमारा रास्ता रोक रही है। अपने आधे – अधूरे काम के साथ सपा मुख्यमंत्री व  मुखिया जनता से वोट मांगेंगे। अब जनमानस बहुत समझदार हो गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस प्रकार के फैसलों के माध्यम से बहुसंख्यक हिंदू समाज को वोटोंकी राजनीति में बांट देने की भयंकर राजनैतिक साजिश भी रची जा रही है ताकि बहुसंख्यक हिंदू समाज की नींव मजबूत न हो सके । जब बहुसंख्यक समाज मजबूत होकर नहीं रहेगा तभी इन परिवारवादी दलों की राजनीति चमकती रहेगी। अपने पूरे कार्यकाल में सपा सरकार ने कहीं भी इन जातियों के कल्याण के लिए कोई काम नहीं किया है। प्रदेश के हर थाने में यादव- मुस्लिम गठजोड़ का कोरम पूरा किया जाता रहा। गांवों में इन जातियों पर खूब तरह- तरह के अत्याचार भी सरकार के कार्यकाल में हुए हैं। पहले इन जातियों को दलित बनाया जायेगा फिर इन्हें बौद्धधर्म अपनाने की सलाह दी जायेगी । वहीं इन जातियों को मुस्लिम गठजोड़ में भी शामिल करने की साजिशें रची जायेंगी।

यह बिलकुल तय बात है कि अभी तक यह जातियां भाजपा व बसपा को ही वोट देने का काम करती रही हैं। पूर्व में यह जातियां कांग्रेस के साथ थी वह भी इन जातियों को अपने पक्ष में करने के लिए लोकलुभावन बातें कर रही हैं। इन्हीं सबसे ध्यान बंाटने के लिए मुख्यमंत्री ने यह साजिश रच दी है।

इसमें एक बात यह भी उठ रही है कि क्या आरक्षण के ही सहारे भारत सुपर पाॅवर बन सकता है? क्या देश की सभी समस्याओं का समापन आरक्षण ही है ? क्या आरक्षण से भ्रष्टाचार समाप्त हो सकता है ? क्या आरक्षण के बिना भारतीय राजनीति एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती? आजादी के 70 साल होने वाले हैं और हम अभी भी घिसी पिटी राजनीति के ढर्रे पर चल रही है। आजादी के 70 साल बाद भी इन पिछड़ी जातियों को इस प्रकार के राजनैतिक नौटंकी के सहारे की आवश्यकता ही क्यों पड़ी। इससे साफ पता चल रहा है कि आजादी के बाद इन सभी तथाकथित दलों ने सभी योजनओं को सही ढंग से लागू ही नहीं किया। इन पिछड़ी जातियों को आजादी के बाद से अब तक केवल राजनैतिक मोहरा ही बनाकर रखा गया है। आज देशभर में पिछड़ी जातियों के बुरे हाल के लिए वे ही दल जिम्मेदार है जो आज उनके सबसे बड़े हितैषी बनकर उठ खड़े हो जाते है। समाजवादी दल बार बार पिछड़ी जातियों के हक में झूठ की दरिया बहा रहा है। यदि यह समाजवादी पिछड़ों के इतने ही हितैषी है तो आज संसद में एक भी सांसद पिछड़ा नहीं है आखिर क्यांे? कहा जाता है कि इन जातियों का कुल वोट प्रतिशत 20 प्रतिशत से भी अधिक है। बस समाजवादी यादवों के साथ अतिपिछड़ों औरेमुसलमानों का वोट हथियाकर सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं। समाजवादी अच्छी तरह से जान गये हैं कि इस बार सत्ता में वापसी अब बहुत आसान नहीं रह  गयी है। वह भी तब जब पूरे देशभरमें नोटबंदी हो गयी हो।

 

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