क्या युवा-प्रेम, सच में प्रेम है?

 पियुष द्विवेदी ‘भारत’

मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा कि वो एक लड़की से बहुत प्यार करता है! उसके बिना नही रह सकता! तब मैंने उससे पूछा कि कैसी है वो लड़की? वो बोला, “मेरे लिए वो दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की है, बस!” मैंने उसे समझाते हुवे कहा, “देखो भाई, केवल खूबसूरती सबकुछ नही होती, गुण भी होने चाहिए! तुम ये बताओ कि उस लड़की में तुमने ऐसा क्या देखा, कि तुम उससे इतना प्यार करने लगे?” मेरे इस प्रश्न पर काफी सोचने के बाद वो बोला, “मै अधिक कुछ नही जनता, मुझे तो बस इतना पता है कि वो बहुत अच्छी है, और मै उसके बिना नही रह सकता!” खैर, अब ये तो मेरा मित्र था, जिसकी हालत ये है कि जिससे इसे बेशुमार प्यार है, उसके दो गुण तक नही बता सका, पर ये हालत सिर्फ मेरे मित्र की नही, वरन आज के अधिकत्तर प्रेमी ऐसे ही हैं! आज का प्यार क्षणिक आवेश और नेत्राकर्षित करने वाले रूप के संयोग से उत्पन्न हो जाता है! ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या युवा-प्रेम, जो एक लड़का-लड़की के मध्य पनपता है, अब सिर्फ यौवनाकर्षण मात्र रह गया है?

पूर्व में सच्ची भावनाओं के प्रति जो आकर्षण प्रेम रहता था, अब उसका स्थान शारीरिक-सौंदर्य और साज-सज्जा ने ले लिया है! और ऐसा नही है कि ये परिवर्तन सिर्फ किसी एक पक्ष में हो, ये परिवर्तन उभयपक्षी (लड़का-लड़की) है! उदाहरण के तौर पर, एक लड़का सज-धज के सड़क, नौकरी, या जहाँ कही भी है, वो हर आती-जाती लड़की पर नज़र रखे हुवे है, हर दूसरी लड़की पर वो अपना अनंत प्रेम उड़ेलने का प्रयास करता है, पर शीघ्र उसे सफलता नही मिलती, बल्कि चप्पल, सेंडल और गालियाँ मिलतीं हैं, पर वो हार नही मानता, अपना प्रयास जारी रखता है, और आखिर उसे सफलता मिल ही जाती है, कोई न कोई लड़की उसके अनंत प्रेम को समझ ही लेती है! इसके बाद वो जाते हैं पेट-पूजा के लिए, एक ऐसे होटल में, जो लड़की की पसंद का है, और वहां लड़की के फरमाईशी व्यंजनों द्वारा लड़के का पर्याप्त आर्थिक-दोहन होता है! फिर बारी आती है शॉपिंग, सिनेमा आदि की, यहाँ का भी समस्त भार लड़के के सर ही होता है, और लड़का इसे सहर्ष स्वीकारता भी है! इन सबके बदले लड़के को मिलती हैं कुछ मीठी-मीठी, मक्खन-लगाऊं बातें, और बहुत मेहरबानी होने पर, बेमन से दिए गए एकाध चुम्बनों की अनुभूति, और लड़का इतने में ही बाग-बाग हो जाता है! और ऐसा नही है कि हरबार लड़के लुटते ही हैं, कई बार लड़कियों को लूट भी लेते हैं! कुल मिलाकर वर्तमान दौर में प्रेम का जो स्वरुप है, ये उसका एक काल्पनिक चित्रण था, पर वास्तविकता भी इससे अधिक भिन्न नही है!

मेरे एक अध्यापक मित्र हैं, जिनसे एक बार मेरी प्रेम पर चर्चा होने लगी, उस दौरान उन्होंने कहा, “प्रेम, जो एक लड़का-लड़की के मध्य होता है, मात्र यौवनाकर्षण ही है! अपनी इस बात को प्रमाणित करने के लिए उनका तर्क था कि एक लड़का, एक लड़की के लिए अपने उस माँ-बाप तक की अवहेलना कर दे रहा है, जिन्होंने उसको बचपन से पाल-पोषकर इस लायक बनाया कि वो किसीसे प्रेम कर सके, तो क्या ये प्रेम है? कहाँ प्रेम है इसमे? अगर उसे, उस लड़की से इतना प्रेम है, तो फिर माँ-बाप से क्यों नही? ये प्रेम हो ही नही सकता, ये सिर्फ यौवनाकर्षण और उसके कारण उपजा शारीरिक-स्वार्थ है! और इसी स्वार्थन्धता को लोग प्रेम का अंधापन कहते हैं!” उनकी इस बात से मै पूर्णतया तो नही, पर काफी हद तक सहमत हूँ! मुझे इस बात से सहमत होने में कोई समश्या नही दिखती कि वो व्यक्ति किसी और से क्या प्रेम करेगा, जो अपने माँ-बाप के प्रेम की कद्र नही किया, वास्तव में कहें तो ऐसा व्यक्ति प्रेमी नही, सिर्फ और सिर्फ स्वार्थी हो सकता है!

सच्चा-प्रेम कैसा होता है? इस विषय पर तो अनेकों मत हैं! कुछ लोगों ने प्रतिदानपूर्ण प्रेम को श्रेष्ठ कहा, तो कुछ ने दानपूर्ण को! पर अगर अपनी बात करूँ, तो मै समझता हूँ कि सच्चा-प्रेम वही है, जिसमे दान हो! प्रतिदान की प्रत्याशा से किया गया प्रेम, अप्रत्यक्ष स्वार्थ का ही एक रूप होता है! अगर प्रतिदान से पुष्ट प्रेम पूर्ण होता है, तो वो प्रेम सम्पूर्ण होगा, जिसमे दान हो! जहाँ तक मै समझता हूँ, आपका प्रेम चौरासी लाख योनियों में से कोई भी हो, फिर चाहें वो आपसे घृणा ही क्यों न करता हो, पर अगर आपके मन में उसके लिए प्रेम है, तो प्रतिक्षण-प्रतिपल तत्पर रहिए उसकी खुशी के लिए अपना सर्वश्व न्योछावर करने को! बेशक, मेरी इन बातों पर आज के आधुनिक लोगों को, खासकर युवाओं को, हँसी आएगी, पर वास्तव में जिसे प्रेम कहा जाता है, वो इन्ही बातों के बीच पलता है, और यहीं से निकलता है! अरे बंधुओं! ये प्रेम इतना सरल नही है, जितना आज के युग ने इसे समझ लिया है! अतः मेरी इन बातों पर हँसने के बजाय, इन्हें अपने प्रेम में लाने का प्रयास करें, अगर ऐसा कर लिए, तो प्रेम सफल हो जाएगा! एक शेर के साथ विदा लूँगा-

 

“सबकुछ देकर दिया कुछ नही,

लगे जो ऐसा, यही प्रेम है!”

 

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