लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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-गंगानंद झा-

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मैं समझता था कि मेरी चेतना में  मुसलमानों की पहचान समझे जाने वाले प्रतीकों के विरुद्ध कोई पूर्वाग्रह नहीं था । पर सीवान ने मुझे बतलाया कि मेरे अवचेतन में कितने विकृत पूर्वाग्रह थे । मैं अपनी ही प्रतिक्रिया से चौंक गया जब एक दिन किश्वर के घर पर बैठा फैज साहब से बातें कर रहा था । एक टेलिग्राम आया जिसे पढ़कर अन्दर बैठी भाभी बिलख बिलख कर रोने लगीं। उनके गाँव से किसी निकट के आत्मीय की मौत की खबर आई थी । मैं चौंक गया था । मुसलमान लोग भी अपनों की मौत पर हमारी ही तरह शोकाकुल होते हैं । यद्यपि दूसरे ही क्षण मुझे अपने ऊपर ताज्जुब हुआ , क्या मैं मुसलमानों को मानवेतर प्राणी समझता हूँ ?  उस क्षण के पूर्व मुझे नहीं पता था कि मैं ऐसे सोच सकता हूँ । अपनी इस प्रतिक्रिया की एक ही व्याख्या है मेरे पास कि यहाँ हिन्दू मुसलमान घरों में घुट्टी में ही बताया जाता है कि हिन्दू जो काम करेगा, मुसलमान उसका उलटा ही करेगा ।

प्रगतिशीलता और धर्म-निरपेक्षता के अलमबरदार अनेक व्यक्तियों के आचरण कभी कभी चौंकानेवाले अनुभव होते हैं । एक साहब परेशान थे कि उनके साथ उठने बैठनेवाला एक युवक   एक मुसलमान लड़की के साथ कुछ ज्यादा ही घनिष्ठ हो रहा था । उन्हें संभावना दिख रही थी कि कहीं यह संबंध विवाह तक न जा पहुँचे । उन्होंने युवक के पिता से संपर्क कर उन्हें अपनी आशंका  से अवगत कराया तथा इसे रोकने के लिए कुछ सोचने को कहा । लड़के के पिता ने कहा, ‘ आजकल जब विभिन्न जाति-धर्म के लड़के लड़कियाँ आपस में मिलते जुलते हैं तो ऐसे संबंधों से परहेज करने की बात ही अटपटी हो जाती है ।’

उन्हें अधिक ताज्जुब तब हुआ जब उन प्रबुद्ध व्यक्ति ने कहा कि और जाति की बात अलग है, पर मुसलमान की लड़की से आपका लड़का अगर विवाह करे तो आपको बहुत मुश्किल होगी ।

लड़के के पिता ने कहा, ‘ मुश्किल तो परंपरावादी परिवेश में स्वजाति से बाहर किसी से भी करने से होगी । आज के माता-पिता को इसके लिए तैयार रहना ही चाहिए ।’

शेख मोहल्ले में रहने से ही हम जान पाए कि रोजाना जिन्दगी के रीति- रिवाज, टोटके और अंधविश्वास हिन्दू मुसलमानों के एक जैसे हैं, चेचक जैसी असाध्य समझी जाने वाली बीमारी में एक जैसा परहेज रखा जाता रहा है । सब कुछ हिन्दुस्तानी है, हिन्दु मुसलमान जैसा कुछ भी नहीं ।

फैजुल हसन साहब के साथ पारिवारिक निकटता का कायम होना हमारी महत्वपूर्ण उपलब्धि थी । उनकी लड़कियाँ मेरी छात्राएँ थीं । राखी के दिन वे दोनों बहनें थाल में राखी और मिठाई लेकर आतीं और हमारे बच्चों को राखियाँ बाँधती। हम उन्हें पेसे देते । हमें अच्छा लगता । ईद के दिन हम उनके धर पर बाकायदे जाया करते ।

ईद बकरीद के अवसर ऐसे होते जब हमारे और साथी भी मुसलमान साथियों के घर ईद मिलने जाया करते। कुछ हिन्दू साथी टालना चाहते, पूछने पर कहते , ‘ मुसलमान लोग हिन्दुओं को भोजन देने के पहले उसपर थूक लगा देते हैं, ताकि जूठन खाकर हिन्दू धर्मभ्रष्ट हो जाए ।’ मेरे समझाने की कोशिश अक्सर व्यर्थ ही होती । बाद में मैंने एक बार मेरे पड़ोस में रहने वाले मास्टर साहब एजाजुल हक से पूछा कि क्या इस बात का कोई आधार है । मास्टर साहब ने कहा,’  नहीं, यह गलत है कि सारे मुसलमान ऐसा करते हैं ; सच्चाई यह है कि शिया लोग ऐसा करते हैं ।’ कहना नहीं होगा कि मास्टर साहब सुन्नी थे ।

हाशिम साहब बड़े मजे के व्यक्ति थे । मुझसे गपशप में निकटता-बोध का माहौल बनाते हुए कहते कि हम शेख हैं, मुसलमानों में ब्राह्मणों के समकक्ष । अपने गाँव की बातें बतलाते कि वहाँ सामाजिक जीवन में धर्म के बजाय जाति पर आधारित भेदभाव, ऊँच नीच का चलन था । शेख और ब्राह्मण हिन्दू और मुसलमानों के बीच समान रूप से श्रेष्ठता के अधिकारी थे । अगर शेख साहब को पता चला कि किसी मुसलमान ने पण्डित जी से बदतमीजी की है या पंडितजी को मालूम हो कि किसी हिन्दू ने शेख साहब की शान में ऊँच-नीच किया है तो वे पूरी सजा देते । हाशिम साहब ने बतलाया कि अभी भी उन्होंने अपने स्कूल में शेख, सैयद, पठान तथा ब्राह्मण और कायस्थ को ही शिक्षक के पद पर जगह दी है। छोटी जाति का एक भी शिक्षक उनके स्कूल में नहीं था ।

पाकिस्तान के बनने से मुसलमान परिवारों में जो स्थितियाँ बनी उनकी कुछ झलक हमें मिली ।

हमारे मकान के सामनेवाला घर एक कोठीनुमा इमारत था । उसके मालिक मोहम्मद इस्लाम चमड़े के सफल और सम्पन्न व्यवसायी थे । हाशिम साहब को उनके प्रति प्रतिवेशी-सुलभ ईष्या थी । मुझसे उनके संबंध में बताते हुए कहते कि वह जाति के रांकी हैं , हिन्दुओं के बनियों के समकक्ष । इनके पुरखे पौधों से अर्क़ निकालने का काम करते थे, इसलिए इनका नाम अर्की पड़ा, जो बिगड़कर राँकी हो गया है । पर ये लोग अपने को ऊँची नस्ल का जाहिर करने के लिए कहते हैं कि हमारी जाति का असली नाम इराकी है, क्योंकि हमारे पूर्वज इराक से आए हैं ।

यह बात आम तौर पर देखी गई कि अपने को संभ्रान्त तथा प्रतिष्ठित कहने के लिए आम तौर पर ये अपने पूर्वजों को अरब से आए हुए ही कहलवाना चाहते । इस्लाम के आने के पहले के भारत से वे अपनी सम्बद्धता नहीं समझते प्रतीत होते थे । इससे इस धारणा को आधार मिलता कि इनमें भारत की अस्मिता के प्रति लगाव नहीं है । जब कि हिन्दू लोग मानना चाहते कि भारत के मुसलमान अधिकतर धर्मान्तरित हिन्दू पूर्वजों के वंशधर हैं । हिन्दुओं की विडम्बना थी कि धर्मान्तरित की पहचान देकर वे उन्हें अपने से हीन मानना चाहते और दूसरी और अरब के प्रति लगाव की बात से स्वदेश के हित से उदासीन मानना चाहते ।

पाँच साल हाशिम साहब के घर में रहने के बाद हम नया मकान ढूँढ़ रहे थे; एक शाम जब मैं टहल कर वापस लौट रहा था तो दरवाजे तक पहुँचते ही कान में आवाज आई । इस्लाम साहब मुझे पुकार रहे थे । मुझे कुछ ताज्जुब-सा हुआ क्योंकि उनसे मेरी दुआ-सलाम भी बड़ी मामूली सी थी । ‘ प्रोफेसर साहब, इस मोहल्ले को पाकिस्तान बना दीजिएगा क्या?’ उन्होंने मुझे आश्चर्यचकित करते हुए कहा ।

मैंने जब सवाल को साफ करने का अनुरोध किया तो उन्होंने कहा , ‘ आप मोहल्ला छोड़ रहे हैं, तब तो यह मोहल्ला पाकिस्तान ही हो जायगा न ?’ मैंने कहा,’  ऐसी कोई बात नहीं है . इस मकान में असुविधा है, इसलिए दूसरा आवास तलाश रहा हूँ ।’

मेरे द्वारा बतलाए जाने पर कि अभी तक किसी मकान का पता नहीं चला है मुझे,  उन्होंने कहा, ‘  इस मोहल्ले से आपको कोई दिक्कत नहीं है तो मैं आपके लिए मकान तलाश करूँ?’

मुझे आश्चर्य हुआ कि आखिर यह करोड़पति आदमी , जिससे मेरी कोई व्यक्तिगत घनिष्ठता नहीं, मेरे लिए क्यों मकान तलाशेगा । हो सकता है चुहल कर रहा हो, क्योंकि हाशिम साहब का किराएदार था मैं, जिनसे उसके सरोकार बहुत मधुर नहीं ही थे । सो मैंने बात टालने के लिए कहा,’ ठीक है, मेहरबानी होगी आपकी, पर मैं तो पूजा की छुट्टियों में घर जा रहा हूँ एक महीने के बाद ही आउँगा ।’ इस्लाम ने कहा, ‘ आप अपने घर का पता हमें दे दीजिए । पता लगते ही मैं आपको डाक से खबर कर दूँगा ।’मैंने कागज के एक टुकड़े पर अपना पता लिखकर दे दिया और चला गया ।

छुट्टियों के बाद वापस आने पर सनसनीखेज खबर मिली कि इस्लाम साहब मय परिवार के पोशीदा तौर पर पाकिस्तान चले गए । आश्चर्य का ठिकाना नहीं था मेरे लिए। पूरी कहानी रहस्य रोमांच से भरी हुई थी । इस्लाम एक अरसे से पाकिस्तान खिसकने की योजना बना रहे थे । अपने छोटे भाई को कई साल पहले ही वहां स्थापित कर चुके थे तथा बीच-बीच में पूँजी का किस्तों में स्थानान्तरण कर रहे थे । इस बार अन्तिम रूप से पूरे परिवार को जाना था । लोगों को भनक न लगने पाए, इसलिए अपनी दो लड़कियों का मैट्रिक परीक्षा के लिए फॉर्म फरवा दिया कि अगले मार्च में आयोजित होने वाली परीक्षा में वे बैठेंगी । साथ ही उनकी शादी की बात भी चलाई गई । इसके लिए घर की सफाई और पुताई होने लग गई थी । फिर अजमेर-शरीफ जियारत करने की तैयारी हुई और शाम की ट्रेन से अजमेर शरीफ जाने के लिए घर से सब लोग निकले । फिर गर्दनिया पासपोर्ट से पाकिस्तान दाखिल हो गए ।

यहाँ के घर में उनका साला रह गया था । उससे मेरी मुलाकात हुई तो मैंने कहा,’ खुद तो वे पाकिस्तान जाने को कदम बढ़ाए हुए थे और मुझसे कहा कि शेख मोहल्ले को मैं पाकिस्तान बना रहा हूँ ।’ आफताब ने मायूसी से जवाब दिया, ‘ आप साहब का इशारा नहीं समझे । वे चाहते थे कि आप हमारे मकान में आ जाएँ ।’

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