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गंगा प्रसाद
मरते पत्रकार… निडर होते अपराधी

हर रोज कही ना कही कोई ना कोई और किसी ना किसी की डोर टूट ही जाती है…जमाने में जीना है तो जमाने के हिसाब से जीना होगा… अगर जमाने के हिसाब से नहीं जिया तो किसी ना किसी दिन जिंदगी की डोर तोड़ दी जाएगी…और ये भी नहीं मालूम होगा कि किसने क्यों और किसके कहने पर जान ली… जांचे होती रहेगी…सांसे टूटती रहेगी…साफगोई से कोई चीज सामने आएगी नहीं…एक एंजेसी दूसरी रिपोर्ट देगी और दूसरी एजेसी दूसरी रिपोर्ट देगी। लेकिन रिपोर्ट आप मिलाने बैठेगे तो कभी मिलेगी नहीं… और इसी में हमारी मीडिया उलझ जाएगी.. कि इसकी रिपोर्ट ये कहती है तो फिर दूसरी रिपोर्ट में ये कैसे सामने आया…. इसी सब के बीच जो मुद्दा होगा वो दब जाएगा… ना ये पता चलेगा कि किसने इस काम को अंजाम दिया और ना ये पता चलेगा ऐसा किस साजिस के तहत किया जा रहा है…
आज तक ये तो सुना था कि फैसले के पीछे गवाहों को या तो खरीद लिया जाता है या फिर फैसले ही खरीद लिए जाते हैं…ये अब जो रहा है वो ज्यादा ही भयावह होता जा रहा है…या तो इस भय को पैदा किया जा रहा है या फिर पैदा करने की कोशिश की जा रही है…इसका इतिहास पुराना है तो चलिए पहले इतिहास में ही देख लेते हैं क्यों किसी पत्रकार की हत्या की जाती है…जो सही मायने में पत्रकारिता करते हैं।
मुंबई में दिन दहाड़े एक सीनियर क्राइम पत्रकार को गोलियों से इसलिए भून दिया जाता है.. क्योंकि जेडे नाम ही काफी था…इस नाम को सुनकर लोगों की सांसे उपर नीचे होने लगती थी…पता नहीं कौन सी रिपोर्ट और किसके खिलाफ रिपोर्ट सामने आएगी….ये किसी को नहीं पता रहता था….इसी लिए जेडे क्राइम पत्रकार रुप में जाने जाते रहे…. इसी जुनून ने जेडे जैसे पत्रकार की जान ले ली…उत्तर प्रदेश में एक पत्रकार ही जलाकर हत्या कर दी जाती है….क्योंकि एक पत्रकार फेसबुक पर मंत्री के खिलाफ लिख रहा था..आरोप लगता है प्रदेश के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री पर इसके बावजूद प्रदेश सरकार अपने मंत्री को बचाने में लगी रहती है…इस घटना के तुरंत बाद मध्य प्रदेश से एक खबर आती है कि एक पत्रकार को दबंगों ने जिंदा जलाकर हत्या कर दी…
इन हत्याओं के पीछे कुछ भी हो लेकिन जमाने में अगर सरकार किसी को प्रोटेक्सन ना दे पाए और प्रदेश में क्राइम इतना बढ़ जाए कि लोग किसी के सामने कुछ बताने से डरे तो फिर अजादी का मतलब कहा रह गया…इससे अच्छा तो वही था जो अंग्रेज यहां रहकर कर रहे थे…
तो चलिए जो अभी हुआ उसको भी जान लेते हैं…आज तक के विशेष संवाददाता अक्षय सिंह हर विशेष खबर की रिपोर्टिंग करके आते थे और लोगों के सामने रिपोर्ट को परोसते तो अच्छा लगता था और ये कहते थे कि जिसने भी रिपोर्ट तैयार की है अच्छी रिपोर्ट तैयार की है…लेकिन ये किसी को नहीं मालूम था कि व्यापाम जो दानव बन गया है उसी का शिकार अक्षय सिंह भी हो जाएंगे….अक्षय सिंह व्यापम घोटाले की रिपोर्टिंग करने गए थे लेकिन वहां से अक्षय सिंह की रिपोर्ट तो नहीं आई जिसकी उम्मीद आज तक के सभी सीनियर पत्रकार लगाए बैठे थे…अगर कुछ आया तो वो अक्षय सिंह का पार्थिव शरीर….इस तरह से देखा जाए तो व्यापम की फेहरिस्त में मरने वालों संख्या में एक और इजाफा हो गया। साथ ही ये भी जुड गया कि एक पत्रकार की मौत व्यापम की रिपोर्टिंग करते वक्त हो गई।
सवाल ये भी लाजमी है कि जिस रिपोर्ट को खोजने अक्षय सिंह जैसे पत्रकार को जाना पडा…उससे यही सवाल उठता है कि जिस सवाल के उत्तर को खोजने में अक्षय ने जान दे दी। क्या वही सवाल मध्य प्रदेश में रहने वाले पक्षकारों के बीच में नहीं उठता होगा…अगर उठता है तो क्या इस लिए सवाल नहीं उठाया जाता है कि कही इस सवाल के बाद हमारा भी हश्र वहीं ना हो जो अक्षय सिंह का हो गया…या फिर सरकार का इतना डर है कि कोई रिपोर्ट अगर सरकार के खिलाफ करेंगे तो सरकार के लोग यहां जीने नहीं देंगे…अगर ऐसा है तो इसके मायने क्या निकाले जाए…तब तो यही माना जाए प्रदेश सरकार जिस व्यापम घोटाले की जांच अभी तक सीबीआई से कराने को लेकर आना कानी कर रही है उससे तो यही साबित होता है कि कही ना कही सरकार इस घोटाले में स्वंय सामिल है…अगर नहीं सामिल है तो फिर इतने दिन और इतनी हत्या जो हो गई उससे क्या साबित होता है….
आज ही खबर सुना है कि व्यापम घोटाले की सीबीआई से जांच के लिए सीएम शिवराज सिंह चौहान तैयार हो गए है…लेकिन सवाल वही है क्या व्यापम का सच और व्यापम से जुडे लोगों में जो दहसत का माहौल कायम है क्या वो कम होगा? और कोई इसकी जिम्मेदारी लेगा कि अब व्यापम से जुडे लोगों का हत्या नहीं होगी?
अंत में एक बात याद आ रही है…लोकसभा में बहस चल रही थी…बहस का केंद्र बिंदु था घोटाला, कांग्रेस की सरकार केंद्र की सत्ता से लेकर ज्यादातर राज्यों में थी…उस दौरान लोकसभा में सुषमा स्वाराज विपक्ष की भूमिका निभाते हुए घोटालों की एक लंबी फेहरिस्त को लेकर बोल रही थी जिसमें जीप घोटाले से  लेकर बोफोर्स फोटाले तक का जिक्र हुआ…इस बीच कांग्रेसी इतनी ज्यादा हल्ला मचा रहे थे जैसे लग रहा हो कि हमारी पोल ना खोलो…इसी बीच चंद्रशेखर उठकर बोलते है कि मुझे नहीं पता कि ये लोग किस रोष में चिल्ला रहे है…अगर सुषमा जी कुछ बोल रही हैं तो सुनना चाहिए…
यही हाल आज व्यापम का हो गया है इस घोटाले के पीछे इतने ज्यादा लोगों की हत्या हो गई है…ऐसा लग रहा कि जैसे मरने वाले सभी लोग चिल्ला रहे हो कि इस घोटाले को जल्दी सामने लाओं नहीं तो और कितने लोगों को अपनी जिंदगी से हाथ धोना पडेगा ये हमें भी नहीं मालूम है…अक्षय सिंह की आवाज तो ऐसे सभी के कानों में गुज रही है कि जैसे लग रहा है कि आज नहीं तो कल इस घोटाले का सच जरूर सामने आएगा…मैं नहीं ला सका लेकिन कोई ना कोई लेकर जरूर आएगा…..

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