लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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इंसानियत

इंसानियत

निर्मल रानी
इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत सहित पूरे विश्व में मानवता को शर्मसार करने वाली तमाम घटनाओं की ख़बरें सुनने को मिलती रहती है। चारों ओर संकीर्णता,कट्टरपंथी वैचारिकता,स्वार्थ,लालच,धर्म व जाति आधारित वैमनस्य जैसी सामाजिक बुराईयों का बोलबाला है। धर्मांधता व जातिवाद जैसे संकीर्ण विचार रखने वाले लोग मानवता को तिलंाजलि देकर अपने-अपने नापाक मिशन को आगे बढ़ाने की ग़रज़ से मानवता का गला घोंटने को आमादा हैं। परंतु इन सबके बावजूद कहीं न कहीं से आए दिन ऐसे समाचार भी प्राप्त होते रहते हैं जिन्हें सुनकर यह विश्वास होता है कि दुनिया में ऐसी बुराईयां कितनी ही परवान क्यों न चढ़ें परंतु इंसानियत आज भी कहीं न कहीं जि़ंदा ज़रूर है। और यह कहने में भी कोई हर्ज नहीं कि यह संसार ऐसे ही मानवतापरस्त विचारों तथा कारगुज़ारियों की बदौलत चल रहा है।
देश में जब कभी सांप्रदायिक दंगों की कहीं से खबरें आती हैं तो उन्हीं दुर्भाग्यपूर्ण समाचारों के बीच यह खबर भी ज़रूर सुनाई दे जाती है कि एक संप्रदाय के किसी परिवार को किसी दूसरे संप्रदाय के व्यक्ति ने पनाह देकर या उसे अपने घर में छुपा कर उसकी जान बचाई हो। कभी यह खबर सुनाई देती है कि किसी एक धर्म के लडक़े अथवा लडक़ी की शादी किसी दूसरे धर्म से संबंध रखने वाले उसके पारिवारिक मित्र द्वारा केवल इसलिए रचाई गई क्योंकि बच्चों के माता-पिता इस दुनिया से चल बसे थे। मिसाल के तौर पर सलमान खान के पिता सलीम खान ने गत् वर्ष अपनी एक गोद ली गई हिंदू मां-बाप की बेटी अर्पिता की शादी में करोड़ों रुपये खर्च कर उसकी शादी एक उच्च कोटि के एवं प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में कराई। ऐसी सैकड़ों मिसालें हमारे देश में सुनने को मिलती रहती हैं। हमारे देश में होने वाले विभिन्न धर्मों के धार्मिक आयोजनों व धार्मिक रीति-रिवाजों में भी लगभग यही स्थिति है। जहां विभिन्न धर्मों के संकीर्ण सोच रखने वाले लोग अपने-अपने धार्मिक त्यौहारों व रीति-रिवाजों को अपने ही सीमित परिवार या समाज में रहकर मनाने जैसी मानसिकता रखते हैं वहीं हमारे देश में तमाम लोग ऐसे भी हैं जो एक-दूसरे धर्म के त्यौहारों में पूरे जोश,उत्साह तथा श्रद्धा के साथ शरीक होकर इस बात का सुबूत देते हैं कि इंसानियत का तक़ाज़ा यही है कि प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी धर्म अथवा जाति का क्यों न हो उसे सभी धर्मां के धार्मिक त्यौहारों में शरीक होना चाहिए। एक-दूसरे की खुशियों तथा दु:ख-सुख में शामिल होना मानवता का परिचायक है।
पिछले दिनों हरियाणा के यमुना नगर जि़ले में ऐसी ही एक घटना घटित हुई जिसने एक बार फिर यह साबित किया कि इंसानियत वास्तव में सभी धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर है। हुआ यह कि महेंद्र कोचर नामक एक शिक्षित एवं एक बड़ी औद्योगिक कंपनी में पूर्व अधिकारी रह चुके बुज़ुर्ग व्यक्ति का देहांत हो गया। स्वर्गीय कोचर अपनी अत्यंत दयनीय पारिवारिक परिस्थितियों से दो-चार थे। उनका विवाह एक धनाढ्य औद्योगिक परिवार में लगभग पांच दशक पूर्व हुआ था। उनकी पत्नी आधुनिक विचारों की थी तथा उसके निजी जीवन की अनेक बातें ऐसी थीं जिसका इस आलेख में जि़क्र करना मुनासिब नहीं है। संक्षेप में कोचर की अपनी पत्नी के साथ गुज़र-बसर नहीं हो सकी। इस दंपत्ति को एक पुत्र की प्राप्ति हुई और श्रीमती कोचर उस पुत्र को गोद में ही लेकर अपने पति से अलग हो गई। उधर श्रीमती कोचर अपने बच्चे का पालन-पोषण अपने दम पर करने लगी और आगे चलकर वह बच्चे समेत विदेश में जा बसी। इधर महेंद्र कोचर के जीवन में तन्हाई के वातावरण ने अपना घर बनाया। वे इन्हीं पारिवारिक परिस्थितियों के चलते अपनी नौकरी से भी हटा दिए गए। उनके जीवन के लगभग तीन दशक इसी तनावपूर्ण माहौल में गुज़रे।
लगभग 18 वर्ष पूर्व उनके जीवन में एक ईसाई वृद्ध महिला ने प्रवेश किया। वह महिला भी विधवा थी। कोचर ने अपने जीवन का अकेलापन मिटाने के लिए उस ईसाई महिला के साथ रहना शुरु कर दिया। अब कोचर पर ईसाईयत के संस्कार हावी होने लगे। वे अपनी जेब में बाईबल लेकर कहीं आते-जाते तथा ईसा मसीह की शिक्षा का जि़क्र करते सुनाई देते। यहां तक कि उन्होंने चर्च में भी आना-जाना शुरु कर दिया। लगभग 15 वर्षों तक साथ रहने के बाद उनकी ईसाई महिला मित्र का भी देहांत हो गया। इन पंद्रह वर्षों के दौरान उन्होंने यमुना नगर में ही एक मंहगे इलाके में स्थित अपनी एक आलीशान कोठी बेच डाली और अपना सारा साज़ो-सामान लेकर अपनी ईसाई महिला मित्र के घर में रहने लगे थे। इस महिला के देहांत के पश्चात उसके परिवार के लोगों ने उसके घर पर कब्ज़ा कर लिया। और कोचर को एक बार फिर घर से बेघर होने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसी दौरान कोचर ने अपना एक और मकान जगाधरी में ही खरीद लिया था। इस ईसाई महिला की मृत्यु के बाद कोचर का स्वास्थय भी तेज़ी से गिरने लगा। और अपने हालात से तंग आकर वे समय से पहले टूटने लगे।
धीरे-धीरे गत् एक वर्ष में उनका स्वास्थय इतना गिरा कि उनके पास उनकी सेवा करने हेतु कोई भी व्यक्ति न ही उनके अपने हिंदू धर्म से संबंध रखने वाला न ही कोई रिश्तेदार उनके करीब नज़र आया और न ही उस ईसाई धर्म से संबंधित कोई व्यक्ति उनका मददगार साबित होता दिखाई दिया जिस धर्म के प्रति उन्होंने विगत लगभग दो दशकों से आस्था जतानी शुरु की थी। इत्तेफाक से जगाधरी के करीब भंभौली के निकट पडऩे वाले रजपुरा गांव के निवासी हरदेव सिंह जोकि सिख जट परिवार से संबंध रख्रते हैं तथा उस क्षेत्र के एक जाने-माने समाज सेवी भी हैं, से उस ईसाई महिला तथा कोचर से काफी पहले का परिचय था। जब कोचर ने स्वयं को असहाय पाया तथा अपने इर्द-गिर्द अपनी सेवा हेतु उन्हें कोई भी हिंदू या ईसाई,रिश्तेदार या संबंधी खड़ा हुआ नज़र नहीं आया तब उन्होंने हरदेव सिंह व उनकी समाजसेवी पत्नी की शरण में जाना उचित समझा। उधर हरदेव सिंह का परिवार भी उनकी तीमारदारी में जी-जान से जुट गया। यहां तक कि उन्हें बीमारी की अवस्था में अपने घर लाकर रखा,अस्पताल में भर्ती कराया तथा उनकी सेवा करने का हरसंभव प्रयत्न किया। आिखरकार लगभग दो सप्ताह पूर्व बुज़ुर्ग कोचर का देहांत हो गया।
जिस समय हरदेव सिंह तथा उनकी समाजसेवी पत्नी मंजीत कौर एवं उनका सरपंच पुत्र कोचर की सेवा में दिन-रात लगा रहता था उसी समय कोचर ने अपने इन तीमारदारों को वसीयत के रूप में कुछ हिदायतें दीं। एक तो उन्होंने यह इच्छा व्यक्त की कि उनके मरणोपरांत उनका अंतिम संस्कार तथा उनका रस्म भोग क्रिया आदि वे अपने ही धार्मिक रीति-रिवाजों अर्थात् जट सिख समुदाय के तौर-तरीकों से ही करें। दूसरी बात उन्होंने यह कही कि उनके मरणोपरांत कुछ निर्धारित धनराशि मंदिर-मस्जिद,चर्च तथा गुरुद्वारे में समान रूप से दान की जाए। इसके अतिरिक्त वे अपनी संपत्ति का वारिस भी हरदेव सिंह को बना गए। गत् दिनों हरदेव सिंह ने कोचर के संस्कार के बाद रजपुरा के गुरुद्वारे में स्वर्गीय कोचर की तेरहवीं का आयोजन किया था जिसमें उन्होंने किसी मृतक व्यक्ति के सगे-संबंधी की भूमिका अदा करते हुए सैकड़ों लोगों को भोजन कराया और अंतिम क्रिया की सभी रस्में पूरी श्रद्धा भाव के साथ संपन्न कराई। हरदेव सिंह के बारे में यह भी पता चला है कि वे सडक़ दुर्घटना में घायल होने वाले किसी भी व्यक्ति को अपनी सेवाएं समय-समय पर देते रहते हैं। रेड क्रास सोसायटी के अतिरिक्त उन्हें जि़ला प्रशासन व राज्य सरकार द्वारा कई बार समाजसेवा हेतु सम्मानित भी किया जा चुका है। हरदेव सिंह की समाज के प्रति नि:स्वार्थ सेवा का ही परिणाम है कि जहां उनकी पत्नी मंजीत कौर गांव की पंच निर्वाचित हो चुकी हैं वहीं पिछले दिनों हरियाणा में हुए सरपंच के चुनाव में हरदेव का सिंह का बड़ा पुत्र मात्र 23 वर्ष की आयु में निर्विरोध गांव का सरपंच निर्वाचित किया गया।
बहरहाल, हरदेव सिंह जैसे समाजसेवी लोगों की कारगुज़ारियां एक बार फिर किसी भी मनुष्य को यह सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं कि वास्तव में सगे-संबंधी,रिश्तेदार या स्वधर्मी समाज इतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि ज़रूरत के वक्त काम आने वाला वह व्यक्ति जो धर्म व जाति की सीमाओं से ऊपर उठकर केवल इंसानियत व मानवीय मूल्यों को तरजीह देता हो। इसमें कोई शक नहीं कि ऐसे समाचार ही इस धारणा को और मज़बूत करते हैं कि मानवता का धर्म सभी धर्मों से कहीं ऊपर है। निश्चित रूप से यही वजह रही होगी कि कोचर के देहांत के बाद और उनकी बीमारी के समय यानी उनके जीवन के अंतिम दौर में भी न तो उनके अपने हिंदू धर्म का कोई व्यक्ति अथवा संगठन या रिश्तेदार उनके करीब खड़ा दिखाई दिया न ही ईसाई धर्म का कोई व्यक्ति उनके करीब नज़र आया। बल्कि मानवता के धर्म से परिपूर्ण हरदेव सिंह जोकि न हिंदू थे न ईसाई बल्कि केवल मानवीय मूल्यों की कद्र करते हुए उन्होंने अपना फजऱ् पूरा किया। और यह साबित कर दिया कि इंसानियत है मज़हब सबसे बड़ा जहां में।

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1 Comment on "इंसानियत है मज़हब सबसे बड़ा जहां में"

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Himwant
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इंसानियत का मतलब है धर्म. जो अचार – संहिता इंसान के धारण योग्य है वही धर्म है.

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