लेखक परिचय

डॉ नीलम महेन्द्रा

डॉ नीलम महेन्द्रा

समाज में घटित होने वाली घटनाएँ मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।भारतीय समाज में उसकी संस्कृति के प्रति खोते आकर्षण को पुनः स्थापित करने में अपना योगदान देना चाहती हूँ।

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quran-islamic-terrorism-jihadपठानकोट एयर बेस हमला, फ्रांस , तुर्की,पाकिस्तान ,इज़रायल ,ईराक ,सुमोलिया पैरिस ,और अब बांग्लादेश —-। दुनिया का शायद ही कोई ऐसा देश होगा जो आतंकवाद के जख़्मों से स्वयं को बचा पाया हो। अभी बांग्लादेश में एक सप्ताह के भीतर दो आतंकवादी हमले — एक ईद की नमाज़ के दौरान और उससे पहले 1 जुलाई 2016 को एक कैफे में जिसमें चुन चुन कर उन लोगों को बेरहमी से मारा गया जिन्हें कुरान की आयतें नहीं आती थीं।
आतंकवाद के विषय में ओशो ने कहा था —
“आतंक का कारण —आन्तरिक पशुता
आतंकवाद का एकमात्र निदान — अवचेतन की सफाई””
उनके अनुसार –“आतंकवाद बमों में नहीं है किसी के हाथों में नहीं है वह तुम्हारे अवचेतन में है।इसका उपाय नहीं किया गया तो हालात बद से बदतर हो जाएंगे”। आज के परिप्रेक्ष्य में यह कितना सत्य लग रहा है।
आप इसे क्या कहेंगे कि कुछ लोगों के हाथों में बम हैं और वे उन्हें अन्धाधुन्ध फेंक रहे हैं -बसों में कारों में बाज़ारों में! कोई अचानक ही आकर किसी के भी ऊपर बन्दूक तान देता है चाहे उसने उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ा हो! मानवीय संवेदनाओं का ह्रास हो चुका है और हिंसा अपने चरम पर है।
आज मनुष्य और मनुष्यता दोनों को धर्म के नाम पर मारा जा रहा है।
यह कितना बड़ा पाखंड है कि ईश्वर को न मानने वालों को समाज के विरोध का सामना करना पड़ता है किन्तु मानवता विरोधी विचारधारा को धर्म से जोड़ कर आतंकवाद फैलाया जा रहा है।
धर्म कोई भी हो आपस प्रेम करना सिखाता है तो वो कौन लोग हैं जो धर्म के नाम पर नफरत का खेल खेल रहे हैं ?
सम्प्रदाय और धर्म निश्चित ही अलग अलग हैं ठीक उसी प्रकार जैसे दर्शन और धर्म।
साम्प्रदायिक होना आसान है किन्तु धार्मिक होना कठिन ! लोग साम्प्रदायिकता की सोच में जीते हैं धर्म की नहीं लेकिन इससे अधिक निराशाजनक यह है कि वे इन दोनों के अन्तर को समझ भी नहीं पाते।
धर्म व्यक्तित्व रूपांतरण की एक प्रक्रिया है।यह अत्यंत खेद का विषय है कि इस मनोवैज्ञानिक तथ्य का उपयोग मुठ्ठी भर लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए मानवता के विरुद्ध कर रहे हैं ।
यह सर्वविदित है कि धर्म गुरु बड़े पैमाने पर लोगों को एकत्रित करने की क्षमता रखते हैं।अपने उपदेशों एवं वकतव्यों से लोगों की सोच बदल कर उनके व्यक्तित्व में क्रांतिकारी परिवर्तन भी ला सकते हैं। इसी बात का फायदा आज डाँ जाकिर नाइक जैसे लोग उठा रहे हैं।उनका अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रति स्पष्ट नजरिया होता है और अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए अपना शिकार चुनना भी बखूबी आता है।
अगर आप उन युवाओं के बारे में पढ़ेंगे जो ऐसी शख़्शियतों से प्रभावित होकर विनाश की राह पकड़ रहे हैं तो पाएंगे कि उनकी अज्ञानता और लालच का फायदा उठाकर उन्हें धर्म के नाम पर जिहादी अथवा फियादीन बनाकर ये तथाकथित धर्म गुरु अपने मुकाम को हासिल करते हैं।
दरअसल जहाँ विवेक अनुकूल नहीं होता वहाँ लालच और डर दोनों की विजय होती है।जैसे कि ओशो ने कहा था अवचेतन की सफाई उसी प्रकार अवचेतन में चेतना और ज्ञान का प्रकाश ही डर और लालच के अंधकार को दूर कर सकता है ।
काश कि मानव में धर्म के नाम पर किए जाने वाले दुश्प्रचार को समझने की चेतना होती।काश कि जिस जेहाद के नाम पर खून बहाने के लिए आतंकवादी तैयार किये जा रहे हैं उसका मतलब समझने लायक विवेक इन्हें अल्लाह ईश्वर ख़ुदा बख्श देता ।
“जिहाद” का अर्थ अंग्रेजी में “होली वाँर ” अर्थात् पवित्र युद्ध होता है ,वह युद्ध जो मानवता की भलाई के लिए लड़ा जाए ,अगर इसके शाब्दिक अर्थ की बात करें तो वह है “संघर्ष”। काश कि इसके असली अर्थ को समझने की बुद्धि इन धर्मगुरुओं के पास होती। काश कि यह युद्ध , यह संघर्ष वह स्वयं अपने भीतर के शैतान से करते न कि बाहर मासूम लोगों को शैतान बनाकर जेहाद की एक नई परिभाषा गढते !
यह वाकई चिंताजनक है कि जो लोग धर्म के नाम पर आतंकवाद फैला रहे हैं उनमें से किसी ने भी उस धर्म की कोई भी किताब नहीं पढ़ी है। वे केवल कुछ स्वयंभू धर्मगुरुओं के हाथों का खिलौना बने हुए हैं । आज समझने वाली बात यह है कि जो धर्म लोगों को जोड़ने का काम करता है कुछ लोग बेहद चालाकी से उस का प्रयोग लोगों को आपस में लड़वाने के लिए कर रहे हैं।
आतंकवाद से न किसी का भला हुआ है और न ही हो सकता है। जिस अमेरिका ने पाकिस्तान के सहारे तालीबान को खड़ा किया था आज वो स्वयं उससे घायल है। और तालीबान भी अब अकेला नहीं है अल कायदा लश्कर ए तैयबा आईएसआईएस हिजबुल मुहाजिद्दीन जैसे अनेकों संगठन आस्तित्व में आ चुके हैं। इन सबसे लड़ना आसान नहीं होगा। क्या ओसामा बिन लादेन को मार देने से आतंकवाद खत्म हो गया ? क्या इन आतंकवादी संगठनों के सरगनाओं को मार देने से यह संगठन खत्म हो जाते हैं ? नहीं क्योंकि आतंकवाद वो नहीं फैला रहे जिनके हाथों में बन्दूकें हैं बल्कि वो लोग फैला रहे हैं जिनके खुद के हाथों में तो धार्मिक पुस्तकें हैं लेकिन इनके हाथों में बन्दूकें थमा रहे हैं । जो खुद सामने आए बिना उस विचारधारा को फैला रहे हैं जिसके कारण एक ओसामा मर भी जाए तो उसकी जगह लेने के लिए दसियों ओसामा कतार में खड़े हैं ।मारना है तो उस विचार को मारना होगा जो हमारे ही बच्चों में से एक को ओसामा बना देता है।
डॉ नीलम महेंद्र

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