जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

Author:   जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी has posted 137 articles for us.

अमरीका का रहस्यमय वर्चुअल संसार

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी अमरीकी समाज विगत चालीस सालों में क्रमश: हाइपररीयल हुआ है। हाइपररीयल अवस्था में कोई इमेज टिकाऊ नहीं होती। बल्कि प्रत्येक इमेज में ‘छूमंतर’ वाला गुण होता है। इमेज की हम सतह देखते हैं , मर्म से अनभिज्ञ और अछूते रहते हैं। आप जिस क्षण इमेज देखते हैं उसी क्षण भूल जाते हैं। हम [...]

बुरे को अच्छा बनाने की कारपोरेट कला

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी हमें बार-बार यही बताया जा रहा है कि हम पूंजीवाद का समर्थन करें। हमें सहनशील बनने की सीखें प्रदान की जा रही हैं। हमें कहा जा रहा है कि हम तटस्थ रहें, विवादों, संघर्षों, मांगों के लिए होने वाले सामूहिक संघर्षों से दूर रहें, सामूहिक संघर्ष बुरे होते हैं। आम आदमी को तकलीफ [...]

तमाशबीनों के देश में लुटेरे

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी आज भारत तमाशबीनों का देश है। इसमें नागरिक नहीं तमाशबीन निवास करते हैं। तमाशबीनों की तरह आज हम सब एक-दूसरे को देख रहे हैं। पूरे समाज को देख रहे हैं। माओवादियों ने दंतेवाडा में बम के धमाके किए,निर्दोष लोग मारे गए, हम तमाशा देखते रहे। हाल ही में अहमदाबाद में दंगे हुए हम [...]

आतंक की टीआरपी और लाइव टीवी का स्रोत

आतंक की टीआरपी और लाइव टीवी का स्रोत

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी टेलीविजन में आतंक की खबरों का सबसे ज्यादा उपभोग अमीरों में नहीं होता। अभिजन में नहीं होता। टीवी कवरेज के बारे में यह मिथ है कि टीआरपी बढ़ाने के लिहाज से लाइव कवरेज का इस्तेमाल किया गया। यह संभव है टीआरपी बढ़े और यह भी संभव है टीआरपी घटे। किंतु यह निर्णय तुरंत [...]

टीवी में आतंकी इमेजों का स्वाँग

टीवी में आतंकी इमेजों का स्वाँग

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी मुंबई शांत और सामान्य है। भारत-पाक संबंध गरम और नरम हैं। 26 नबम्वर 2008 की घटना को लोग भूलने लगे हैं। शहर अपनी धुन में लौट आया है। शहर शांत है किंतु देश की राजनीति अशांत है। आतंक की खूबी है वह सत्ता को अशांत रखता है। सत्ता के सामने दो ही रास्ते [...]

डिजिटल मनमोहन के डिजिटल शत्रु

डिजिटल मनमोहन के डिजिटल शत्रु

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी मनमोहन सिंह जब से प्रधानमंत्री बने हैं। वे मीडिया और विशेषज्ञों की आलोचना में नहीं आते। उन्हें प्रधानमंत्री बने 6 साल से ज्यादा समय हो गया है। मीडिया में ममता बनर्जी, शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल, डी.राजा, कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं, कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों आदि की आलोचना दिखेगी लेकिन मनमोहन सिंह की आलोचना नहीं [...]

प्रायोजित विमर्श के खतरे और बहुलतावाद

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी उत्तर-आधुनिक स्थिति में बहुसांस्कृतिकवाद की धारणा हठात् चर्चा के केन्द्र में आ गई है। इस धारणा का बौद्धिकों के द्वारा विमर्श के लिए बढ़ता आकर्षण इस बात का संकेत है कि इसके पीछे मंशाएं कुछ और हैं। ये लोग फैशनेबुल वस्त्रों की तरह धारणाएं बदल रहे हैं, धारणाओं के प्रति मनमाना व्यवहार कर [...]

निर्दोष नहीं है पोर्न

निर्दोष नहीं है पोर्न

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी पोर्न और अर्द्ध पोर्न फिल्मों या धारावाहिकों में पुरूष को अमूमन सेक्स के अति आग्रहशील दिखाया जाता है। पुरूष को अनेक बार अनेक औरतों से सेक्स करते हुए दिखाया जाता है। वहीं दूसरी ओर औरत को सेक्स के चौकीदार के रूप में पेश किया जाता है। पुरूष का ध्यान आकर्षित करने वाली के [...]

मीडिया इमेजों में नकली औरत के खेल

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी कामुकता के कारण लिंगभेद पैदा होता है, अत: लिंगभेद को जानने का सबसे प्रभावी तरीका यही है कि कामुकता का गंभीरता से मूल्यांकन किया जाए। मेकनिन ने रेखांकित किया है कि लिंगों के बीच में विषमता का प्रधान कारण कामुकता है। मीडिया में स्त्रियों के विज्ञापन देखकर पहले यह कहा जा सकता था [...]

स्त्री अस्मिता और पुरबिया संस्कृति

-जगदीश्वर चतुर्वेदी स्त्री अपने शरीर के बारे में समझ बनाने के बाद ही उसे अस्वीकार या खारिज कर सकती है। इसके बाद ही सही रूप में लिख सकती है। पितृसत्ता और लिंगभेदीय संस्कृति की समाप्ति के बारे में लिखकर ही अर्थपूर्ण लेखन कर सकती है। दमन के बिना स्त्री की कल्पनाशीलता कभी खत्म नहीं होती, [...]

लिंगभेद की ऊहापोह तथा औरत की अस्मिता

-जगदीश्वर चतुर्वेदी स्त्री और पुरूष दो लिंग हैं और दोनों को अलग-अलग ही रहना चाहिए,अपने लिंग के प्रति वफादार होना चाहिए। लिंगों की स्वायत्त पहचान को किसी भी बहाने अस्त-व्यस्त नहीं करना चाहिए। लिंग की स्त्री और पुरूष के रूप में स्वायत्तता का अर्थ यह नहीं है कि स्त्री और पुरूष के बारे में परंपरागत [...]

ग्लोबलाइजेशन का शोक गीत

-जगदीश्वर चतुर्वेदी नव्य-उदारतावाद का मूल लक्ष्य है सामुदायिक संरचनाओं का क्षय और बाजार के तर्क की प्रतिष्ठा। इस तरह के आधार पर जो विमर्श तैयार किया जा रहा है वह वर्चस्ववादी है। विश्वबैंक, इकोनामिक कारपोरेशन एंड डवलपमेंट और आईएमएफ जैसी संस्थाओं के द्वारा जो नीतियां थोपी जा रही हैं उनका लक्ष्य है श्रम मूल्य घटाना, [...]

अधिकारहीन बनाती है ब्राँण्ड संस्कृति

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ग्लोबलाइजेशन के मीडिया तंत्र और विचारधारा की प्रतीकात्मक धुरी है ब्रॉण्ड। नॉमी क्लीन ने ”नो लोगो : लुकिंग एम एट दि ब्रॉण्ड बुलिस” (2000) में विस्तार से इस पहलू पर विचार किया है। नॉमी ने लिखा है ग्लोबलाइजेशन का युग ब्रॉण्ड का युग है।आप चारों ओर लोगोज देखते हैं। यहां तक कि आपकी [...]

अमरीकीवाद के पराभव का महाख्यान

अमरीकीवाद के पराभव का महाख्यान

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी आर्थिक मंदी ने नव्य-उदारताद को नंगा किया है। अमेरिकी नीति निर्धारकों का वैचारिक दारिद्रय सामने आया है। थोड़ा गंभीरता से जरा पीछे मुड़कर देखें तो पाएंगे कि 11 सितम्बर के बाद ग्लोबलाइजेशन की नीतियां बदली हैं। सारी दुनिया में अमेरिका ने ग्लोबलाईजेशन विरोधी ताकतों को आतंकवादी ताकतों के साथ एकमेक किया है। ग्लोबलाईजेशन [...]

अमरीकीकरण और फंडामेंटलिज्म की क्रीडाएं

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी अमरीकीकरण का एक अन्य प्रमुख तत्व है उपभोक्तावाद। यह पश्चिमीकरण की धुरी है। उपभोक्तावाद के बारे में अमूमन काफी कुछ कहा गया है। यह मूलत: अन्य पर वर्चस्व स्थापित करने की व्यवस्था है। अन्य को उपभोग के बहाने वर्चस्व के स्वामित्व में लेना, वर्चस्व स्थापित करना, वंचित करना इसका प्रधान लक्ष्य है। भौतिक [...]

स्त्री की मानवीय पहचान के लिए खतरा है पोर्नोग्राफी

स्त्री की मानवीय पहचान के लिए खतरा है पोर्नोग्राफी

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी पोर्नोग्राफी के विरोध में सशक्त आवाज के तौर पर आंद्रिया द्रोकिन का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। पोर्नोग्राफी की जो लोग आए दिन हिमायत करते रहते हैं वे उसमें निहित भेदभाव,नस्लीयचेतना और स्त्रीविरोधी नजरिए की उपेक्षा करते हैं। उनके लिए आंद्रिया के विचार आंखे खोलने वाले हैं। आंद्रिया ने अपने निबंध ‘भाषा, समानता [...]

ब्लॉग क्रांति से डरी हुई हैं वर्चस्वशाली ताकतें

ब्लॉग क्रांति से डरी हुई हैं वर्चस्वशाली ताकतें

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ब्‍लॉगिंग का परंपरागत मीडि‍या के साथ कोई बैर नहीं है। सच यह है कि परंपरागत मीडि‍या में काम करने वाले अधि‍कांश पत्रकारों के ब्‍लॉग हैं। हिंदी में एक खास बात यह है कि‍ नये युवा लेखक ब्‍लॉग बना कर लि‍ख रहे हैं। नये पेशेवर लोग लि‍ख रहे हैं। हिंदी में जो अभी कम [...]

क्या भारत बंद के साथ मीडिया खड़ा होगा

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी भारत के कारपोरेट मीडिया और केन्द्र सरकार में एक समानता है कि ये दोनों झूठ बोल रहे हैं और एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम कर रहे हैं। मीडिया का सरकार का पूरक बन जाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मौत है। सत्य के सार्वजनिक परिदृश्य से गायब हो जाने की शुरूआत है। [...]

पचास लाख इराकियों की हत्या ग्लोबल मीडिया चुप क्यों?

पचास लाख इराकियों की हत्या ग्लोबल मीडिया चुप क्यों?

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी इराक में इन दिनों युद्ध चल रहा है, इस युद्ध को 18 साल से ज्यादा समय हो गया है। अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्रों की ओर से इराकी जनता पर लगातार हमले किए जा रहे हैं। हमलावर सेनाओं ने अवैध रूप से पूरे इराक पर कब्जा किया हुआ है। आम जनता का जीवन [...]

चाक्षुषभाषा के रचनाकार उदयप्रकाश

चाक्षुषभाषा के रचनाकार उदयप्रकाश

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी उदयप्रकाश पर लिखना मुश्किल काम है। इसके कई कारण हैं पहला यह कि वह मेरे दोस्त हैं। दूसरा उनका जटिल रचना संसार है। उदयजी को मैं महज एक लेखक के रूप में नहीं देखता। बल्कि पैराडाइम शिफ्ट वाले लेखक के रूप में देखता हूँ। हिन्दी कहानी की परंपरा में पैराडाइम शिफ्ट वाले दो [...]

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