लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी

राजस्थान स्थित रणथभौर नामक स्थान वैसे तो पूरे विश्व में देश के एकमात्र सबसे बड़े ‘टाइगर रिज़र्व क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। परन्तु पिछले दिनों रणथभौर का यही क्षेत्र हिन्दू-मुस्लिम सा प्रदायिक सद्भाव का भी एक ज्वलंत उदाहरण बना। रणथभौर टाइगर रिज़र्व क्षेत्र के अन्तर्गत एक ऐतिहासिक एवं प्राचीन मंदिर स्थित था जोकि गणेश धाम मंदिर के नाम से प्रसिद्ध था। परंतु इस मंदिर की इमारत की दशा अत्यंत दयनीय हो चली थी तथा यह पूरी तरह से जीर्ण अवस्था में पड़ा होने के कारण आम ाक्तजनों की अपेक्षा का सामना कर रहा था। काफ़ी लंबे समय से अपेक्षा के शिकार इस मंदिर पर राजस्थान के मुस्लिम समुदाय के मूल निवासी तथा वर्तमान में मुुंबई आधारित एक प्रसिद्ध उद्योगपति आशिक़ अली नथानी की नज़र इस खंडहर होते मंदिर पर पड़ी। उसी समय आशिक़ अली ने इस उस प्राचीन मंदिर का कायाकल्प किये जाने का संकल्प लिया तथा दो करोड़ रुपयों से अधिक की लागत से इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। गौर तलब है कि अभी कुछ ही समय पूर्व विश्व के सुप्रसिद्ध उद्योगपति तथा विप्रो कंपनी के मालिक अज़ीम प्रेम जी ने भी नौ हज़ार करोड़ रुपये जैसी भारी-भरकम रकम भारतीय शिक्षा के सुधार तथा विकास के लिए दान देकर पूरी दुनिया में वाहवाही बटोरी थी। इसके पश्चात आशिक़ अली नथानी द्वारा मंदिर के निर्माण के लिए दो करोड़ रुपये खर्च करना भी पूरे देश तथा दुनिया के लिए संाप्रदायिक सद्भाव की एक जीती-जागती मिसाल बन गया है।

गौरतलब है कि इस्लाम धर्म में बुतपरस्ती या मूर्तिपूजा की साफ मनाही की गई है। इस्लाम धर्म पर चलने वाले रूढ़ीवादी अनुयायी अल्लाह तथा कुरान शरीफ के सिवा किसी अन्य को नहीं स्वीकार करते। यही रूढ़ीवादी शिक्षा प्राय: दो अलग-अलग समुदायों के मध्य वैमनस्य तथा बाद में सांप्रदायिक दुर्भावना या सांप्रदायिक दंगों तक का कारण बन जाती है। इस मंदिर के निर्माण के दौरान आशिक़ अली को भी अपने धर्म के कुछ कठ्मुल्लाओं के विरोध का सामना करना पड़ा। परंतु इस उदारवादी सोच रखने वाले भारतीय मुस्लिम उद्योगपति ने कठ्मुल्लाओं की घुड़कियों या उनके विरोध की परवाह किए बिना गणेश धाम मंदिर के पुनर्निर्माण तथा जीर्णोद्धार पर दो करोड़ रुपये खर्च कर दिए। इस विषय पर आशिक़ अली का कहना है ‘कि गणपति बप्पा तथा 33 करोड़ देवी-देवताओं ने मुझे इस पावन कार्य के लिए प्रेरित किया है। इन्हीं देवी-देवताओं तथा अल्लाह की मेहरबानी से ही मैं इस योग्य बन सका हूं कि मैंने इस पवित्र काम को पूरा किया । हमें मंदिर और मस्जिद में कोई भेद नज़र नहीं आता। यह सभी भगवान,ईश्वर तथा अल्लाह को याद करने की ही जगह हैं।

आशिक़ अली ने कठ्मुल्लाओं के विरोध की परवाह करना तो दूर बजाए इसके उन्होंने गणेश धाम मंदिर के निर्माण में स्वयं पूरी दिलचस्पी दिखाई तथा बेहतरीन िकस्म के कारीगरों के हाथों से इसमें निर्माण का काम कराया। मंदिर के निर्माण के दौरान वे स्वयं निर्माण कार्य के निरीक्षण हेतु भी अपना बहुमूल्य समय निकाल कर कई बार निर्माण स्थल पर पहुंचे। पिछले दिनों मंदिर के पुनर्निर्माण के पश्चात विधिवत् पुन:संचालन के समय भी वे गणपति बप्पा का आशीर्वाद लेने उस जगह पर मौजूद रहे। आशिक़ अली ने यह भी घोषणा की कि वे शीघ्र ही उसी क्षेत्र में एक स्कूल तथा एक अस्पताल का भी निर्माण कार्य कराएंगे। आशिक़ अली के इस सौहार्द्रपूर्ण कदम की न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश में प्रसंसा की जा रही है। राजस्थान के लोग आशिक़ अली नथानी को देश में सांप्रदायिक सौहाद्र्र एवं सर्वधर्म सम भाव स्थापित करने वाले एक प्रतीक के रूप में देखकर स्वयं को भी गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। उपरोक्त घटना इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी उद्योगपति ने दो करोड़ रुपये खर्च कर मंदिर का निर्माण करा दिया। बल्कि इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि वर्तमान समय में हमारे देश में लगभग सभी संप्रदायों में ऐसी कट्टरपंथी एवं रूढ़ीवादी शक्तियां सक्रिय हैं जिन्हें सांप्रदायिक सौहाद्र्र तथा सर्वधर्म स भाव जैसी एकता संबंधी बातें फूटी आंखों नहीं भातीं। हमारे देश में इस समय कुछ ही धर्मगुरु ऐसे स्वर्णिम मिशन चला रहे हैं जहां सभी धर्मों का सार एक ही ईश्वर,अल्लाह,गॉड,तथा वाहेगुरु के रूप में बताया जाता है। अन्यथा अधिकांशतया लगभग प्रत्येक समुदाय के तथाकथित धर्मगुरु अपनी ढाई ईंट की अलग मस्जिद बनाए बैठे हैं। ऐसे विद्वेषपूर्ण होते जा रहे वातावरण में आशिक़ अली द्वारा उठाया गया इस प्रकार का सौहाद्र्रपूर्ण कदम निश्चित रूप से कट्टरपंथी विचारधारा रखने वाले तथा भगवान,ईश्वर,अल्लाह,गॉड,तथा वाहेगुरू को अपनी प्राईवेट लिमिटेड संपत्ति समझने वाले तथाकथित धर्मगरुओं के मुंह पर एक करारा तमाचा है।

कहने को तो सभी यह बात बड़ी ही आसानी से कह बैठते हैं कि ‘मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। परंतु अल्लामा इकबाल द्वारा लिखी गई इस पंक्ति पर अमल करना वास्तव में हर एक व्यक्ति के वश की बात प्रतीत नहीं होती । अब तो बढ़ती सांप्रदायिकता तथा धर्म-जाति व संप्रदाय के नाम पर बढ़ती जा रही दरिंदगी ने कई लेखकों व विशेषकों को इक़ बाल की उपरोक्त पंक्ति में इस प्रकार का संशोधन करने के लिए बाध्य कर दिया है। गोया-’मज़हब ही सिखाता है आपस में बैर रखना। भारत सहित दुनिया के आधे से अधिक देशों में चल रही सांप्रदायिकता की काली आंधी स्वयं इस बात का गवाह है कि आज दुनिया में सबसे ज्य़ादा कत्लोग़ारत,हिंसा व नफरत धर्म के नाम पर ही फैलाई जा रही है। हालांकि कोई भी धर्म हिंसा या न$फरत का पाठ हरगिज़ नहीं पढा़ता परंतु तमाम तथाकथित स्वार्थी व अर्धज्ञानी िकस्म के धर्मगुरुओं ने अपनी सीमित व संकुचित सोच के चलते धर्म,संप्रदाय तथा जाति के नाम का सहारा लेकर मानव समाज को इस प्रकार विभाजित कर दिया है कि ऐसा प्रतीत होने लग जाता है कि गोया मानवता में विभाजन का कारण ही केवल धर्म,जाति व संप्रदाय ही है।

परंतु हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। सभी धर्मों की बुनियादी तथा वास्तविक शिक्षाएं मानवता का पहला पाठ पढ़ाती हैं। परोपकार,मानवता की सेवा सभी धर्मों व विश्वासों का स मान,आदर व सत्कार करना,किसी को दु:ख तकलीफ या ठेस न पहुंचाना हर विश्वास व धर्म के लोगों की पहली शिक्षा है। ऐसे में यदि नफरत तथा हिंसा का कारण धर्म को ही बनाया जाए तो इसमें धर्म या धर्मग्रंथों का दोष तो कतई नहीं बल्कि दोष उन अर्धज्ञानियों,कठ्मुल्लाओं व पोंगा पडितों का है जो कभीअपने स्वार्थवश तो कभी राजनीतिज्ञों के बहकावे में आकर तो कभी अपनी सीमित एवं पूर्वाग्रही शिक्षाओं के चलते धर्म को ही कभी हथियार के रूप में प्रयोग करते हैं तो कभी इसी की ढाल भी बना लेते हैं। अन्यथा ईसा,मोह मद,नानक,चिश्ती,कबीर,रामानंद,ख़ुसरू,बुल्लेशाह तथा बाबा फऱीद जैसे इंसानियतपरस्त व खुदापरस्त लोगों का धर्म यह कतई नहीं था कि ईश्वर,अल्लाह व गॉड जैसी असीम शक्ति व उर्जा को छोटी-छोटी सीमाओं में बांध कर स्वयं इंसानों द्वारा ही उसके अलग-अलग कायदे व कानून निर्धारित किए जाएं और जो भी व्यक्ति उन्हीं अर्धज्ञानी लोगों द्वारा बनाए गए कायदे-कानूनों या नियमों का हूबहू पालन न करे या उससे डगमगाए उसे धर्म विरोधी,नास्तिक,अधर्मी या कािफर अथवा मुशरिक होने की संज्ञा दे दी जाए। आशा ही नहीं बल्कि विश्वास किया जाना चाहिए कि आशिक अली जैसे भारतीय मुसलमान रूढ़ीवादी एवं पूर्वाग्रही सोच रखने वाले लोगों के लिए स्वयं एक मिसाल साबित होंगे।

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1 Comment on "सांप्रदायिक सौहाद्र का प्रतीक बना एक और मुस्लिम उद्योगपति"

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himawant
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बिहार एवम राजस्थान के मुसलमान भाईयो मे धार्मिक सहनशीलता और सौहार्दय दिखाई देता है. लेकिन इस सौहार्दय को बिगाडने की कुटील चाल कट्टरपंथी करते रहते है. हिन्दु और मुसलमान की पुजा पद्धति भिन्न है लेकिन दोनो के पुर्वज एक हैं. यह हमारा मिलन बिन्दु है. जब तक हम दक्षिण एसिया मे हिन्दु-मुसलमान वैमनस्य को समाप्त नही करते तब तक इस खित्ते की उन्नति सम्भव नही है.

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