लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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डा. राधेश्याम द्विवेदी ‘नवीन‘

आर्यावर्त के भारतखण्ड में ब्रजमण्डल की धरती है ।

बारह वन चौबीस उपवन में अगर वन की बस्ती है ।।

विन्ध्यांचल अरावली मध्य , भन्दर कौमूर पहाड़ियां हैं ।

भदरौली रसूल मदनपुरा , चुड़ियाली की चोटियां हैं।

जरौती सुनौठी पथसाल , चित्रखुदी  पहाड़ियां  हैं।

बदरौली जजौली में , आदिम युग की थातियां हैं ।

शिलाओं की चित्रित गुफाओं में , हथियार पुरानी मिलती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में ,……

यह एक समय में बनी नहीं , कत्थई रंग में रंगी हुई।

लम्बे-भद्दे बैल यहां , मानव की  छापें  बनी  हुई।

साड़ मचान और हथियार , ढ़ालें तलवार शिकारी हैं।

रामायण के दृश्य खुदे ,  रेखाओ  में घुड़सवारी है ।

पहाड़ी गुफाओं के दृश्यों में , ज्यामितीय चित्र झलकती है । आर्यावर्त के भारतखण्ड में ,……

पाषाण ताम्र लौहकालों की, गजब निशानियां निकली हैं।

गोमेद अकीक स्फटिक की  कलाकृतियां भी  खिली हैं।

गैरिक मृदभाण्ड चित्रित सिलेटी, बरतन यहां निकले हैं।

उत्तरी काले औ चमकीले , सहयोगी पात्र भी मिले हैं।

आदि मानवों से विकसित  सैक्यरिक्य नगरी यह बनती  है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में ,……

श्रीकर जैनों की नगरी ही , आगे सीकरी बनती है।

मन्दिर और मूर्तियों में , उत्कृष्ट शान ये रखती है।

प्राचीन नगर का प्रतिरूप , सीकरी नगर कहाता है।

बृन्दावन करौली सा , षक्तिपीठ नहीं बन पाता है।

सनातन जैन बौद्ध इस्लाम की , संगम नगरी यह बनती  है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में ,……

जनपद सूरसेन शौरीपुर , अपना यशकीति बढ़ाया है।

बसुदेव और  देवकी ने , श्रीकृष्णावतार कराया  है ।

अंगी नेमि परषुराम ने , यहां तपोभूमि बनाया  है ।

इसी नगर में कंस ने , अपना कारागृह बनाया है ।

कैलास रुनकता वृृथला पोइया , इसको पावन करती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में….

बाह भदावर राजाओं ने , जहां पें धाक जमाया है।

चन्द्रराज सिकरवार ने, सीकरी राजधानी सजाया है।

चांदवार के जयपाल ने , आगरा किला बनवाया है।

आगे चलकर यही किला , बादलगढ़ कहलाया  है ।

लोदी के बयाना सूबे में , भूक्षेत्र ये सारा लगती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..

सिकन्दरा में सिकन्दर लोदी , राजधानी अपनी बनवाया है।

बाबर तुर्क ने जीत यहां पे , मुगलों की नींव जमाया  है।

यमुनापार से अपनी सत्ता को  ,चारो ओर फैलाया  है ।

नई सियासत का परचम भी , देश में इस लहराया है  ।

हुमायूॅ को कर परास्त , षेरशाह  भूमि यह जीती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..।

सड़क  सराय कोस मीनारें , सूरी ने बनवाया है  ।

न्याय प्रशासन बन्दोबस्त में ,अद्भुत नाम कमाया है।

हेमूं नाम के  मंत्री ने , अनाज मण्डी लगवाया  है ।

आगे चलकर ये सिमसन – मोतीगंज कहलाया है ।

सूरी की शुरूवातों पर, अकबर की मंजिलें बनती हैं। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..।

फतेहपुरसीकरी आगरा किला, पूरा उद्धार कराया है।

सुलहे कुल दीने इलाही ,प्यारा पैगाम सुनाया  है  ।

देश के नवल अंचलों से ,नवरत्नों को खोजवाया है।

स्वयं अशिक्षित फिर भी , विद्वानों को बसवाया  है।

अकबराबाद नया शहर बसा, अकबर महान की हस्ती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में….।

जहांगीर ने सिकन्दरा में , अकबर का मकबरा बनवाया है।

ग्यासबेग का एत्माद्दौला ,रत्नों का डिब्बा कहलाया  है।

तुज्के जहांगीरी में यारों ,  अपना बृतान्त लिखवाया है ।

न्याय हेतु जंजीर व घंटा , आगराकिले में लगवाया है।

पत्नी विदुशी नूरजहाॅ की , जहाॅ पे नूर बरसती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…।

शाहजहां ने कलाकौषल का, अद्भुत रचना रचवाया है।

यमुनातट मुमताजगंज में , ताज महल बनवाया है ।

श्वेत स्फटिक शिलाओं से ,प्रेम प्रतीक दर्षाया है।

प्रेम पयोध अगाध जहां , दो रूहों को मिलवाया है।

जन्नत से भी उनकी निगाहें, एकटक हमें देखती हैं। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…।

शरदयामिनी शशी की किरणें ,  अठखेली करती हैं।

यौवन और सौन्दर्य देख , रूपपरी भी आहें भरती हैं।

देख यहां की कलानिधि पे , बरबस निगाहें पड़ती हैं।

यहां रुप की कोमलता पर , बल्लरियां बल खाती हैं ।

हिन्दुस्तान नहीं दुनिया की , गजब अजूबा बनती हैं। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…

यहीं कहीं षबनम भी ,  हर षव पर मोती  बोती है ।

ताजमहल में यहीं कहीं , मुमताज महल भी सोती है ।

यहीं कहीं प्यारा उसका , उपबन का माली सोता है ।

मुगलकाल के वैभव की , हरियाली यहां पर होता  है ।

नीलाम्बर में धवल बिम्ब , यह पलपल रुप बदलती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…।

यहीं अशोक कदम्ब वृक्षों पर, कोयल काली कूंकती है।

यहीं शरब बुलबुल मतवाली , चंहचंह चंहचंह करती है।

मुमताजमहल की मधुर मधुरिमा ,पलपल मन को हरती है।

जिसके आलम में शोहरत भी , तिलतिल नेह को भरती है।

रूप सलोनी विहवल मन हो ,जुबां न मुख से निकलती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…।

शाहजहां की रुह भटकती , यमुना की बेदी में ।

बुर्ज मुसम्मन में कैद, बाग मेहताब की गोदी में।

काला ताज न बन पाया, जगह आज खाली है ।

उसके अरमानों की दुनियां ,उजड़ी और खयाली है।

मुमताज के यौवन पर मोहित, पूनम की चांदनी चमकती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…।

औरंगजेब किले की खाई्र, ताज संरक्षित कराया था ।

जयसिंह सूबेदार शहर की ,चहारदीवारी लगवाया था।

जाटों का जब राज्य रहा ,तहसीलें यहां अनेक बनी।

शमसाबाद मलपुरा कड़हरा , नाहरगंज  लोहामण्डी।

दिन अच्छे जैसे गुजरे, दुर्दिन में आंसू बन गिरती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..।

जयपुर का सवाई प्रतापसिंह, महलों में नाचा करता था।

जहांदारशाह शीशा कंघी ले, सुन्दरियों को सजवाता था।

लाल कुॅवरि के कहने पर , बजवैये  बड़ा पद पाते  थे।

मदिरा के नशे में होके चूर ,बादशाह को भी लतियाते थे।

वैश्याओं हिजड़ों की गरिमा , इन दिनों यहां दीखती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..।

चारों कोनो से घेरकर बैठै , शिवजी से रक्षा होती है ।

मराठों से सत्ता छीन , ईस्ट इण्डिया हुकूमत करती है।

अठारह सौ चार में दीवानी , पांच में कलेक्टरी बनती है।

नौ में स्टील के प्रयासों से ,बन्द अमर द्वार भी खुलती है।

तैंतीस में आगरा प्रेसीडेन्सी, पैतीस में पष्चिमोत्तर बनती हैं। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…।

सत्तावन का विद्रोह बड़ा था , अंग्रेज किले में कैद हुए।

अवसाद में केल्विन की मृत्यु ,आगरा किले में दफन हुए।

कम्पनी राज खारिज करके ,  ब्रिटिश राज सत्ता पाया।

खन्दारी बाग में कोर्ट लगा ,  भरतपुर हाउस कहलाया।

अठारह सौ साठ में पुरातत्व , आगरा शहर में खुलती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..।

दंगे फसादें दबा दबाकर , दरबार-ए आगरा लगती है ।

रेलवे का विस्तार हुआ , जो देश प्रदेश को जोड़ती है।

छाछठ में सूबे का हाईकोर्ट, आगरा शहर में खुलता है।

सड़सठ में नगरपालिका बन, इसे सुन्दर नगर बनाता है।

अड़सठ में सूबा खत्म हुआ , राजधानी इलाहाबाद जाती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..।

मुगल इमारतों का ये शहर , सैरगाहें सुन्दर सजती  हैं।

दुनिया के दर्शक आते हैं , पर्यटन नगर यह बनती  है।

भय के कारण अंग्रजों ने , हाईकोर्ट यहां से हटवाया है।

आगरा का वैभव आक़े गिरा , जिसको प्रयाग ने पाया है।

केल्विन की बीमारी से प्रेरित, मानसिक अस्पताल यहां खुलती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..

स्मिथ और बेनसन ने , बन्दोबस्त बहत्तर करवाया है।

दो सौ बारह मुहल्लों में, इस पूरे शहर को बंटवाया है ।

अस्सी में कलैक्टर बेकर ने ,बेकर गार्डन लगवाया है।

आजादी मिल जाने पर , सुभाष पार्क  कहलाया है ।

पानी की निरन्तर पूर्ति को ,जल संस्थान नब्बे में खुलती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..।

वाल्स के राजकुमार कुमारी , उन्नीस सौ में आये थे।

मैकडोनाल  निज पार्क में, विक्टोरिया मूर्ति लगवाये थे।

सन् चैसठ में इसे हटा ,मोती नेहरु को लगा दिया।

हिन्दुस्तानी उद्यान बना  , शाहजहां का नाम दिया।

लापरवाही व जरुरत से, नित नित यह रुप बदलती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..।

 

शहर आगरे का लम्बा  ,  विस्तार बहुत ही खूबियां हैं ।

इमारतें मन को भाती हैं ,  खुशबू बिखेरती बागियाॅ हैं ।

महबूब दिलेरों के किस्से ,  सुकुमारों की सुगन्धियां है।

गुलजार चमन यहां होता है,रंगीली यहां की गलियां हैं।

नूरजहां मुमताज अनार की , कलियां यहां पर खिलती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..

आबो हवा है खुष्क ख़ुशी के  फूल यहां खिलते हैं।

हरियाली का शहर रहा , बाग-बाग यहां पर होते है।

ऊॅची-ऊॅची दीवाल दरख्त पे, षहद के छत्ते लगते हैं।

फूल फलों से लदी यहां , वृक्षों की टहनियें झुकते हैं ।।

तरो ताजी हरी सब्जियां , यहां खूब ही बिकती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..।।

सदैव भरी पूरित रहती ,  यमुना में नावें चलती थीं।

घाटों पर लोग नहाते , जलचर की झुण्डें चलती थीं।

अब पानी को रोक दिया , गन्दा नाला बन बहता है।

स्नान की बातें दूर हुई, आचमन नहीं कोई करता है।

सूर्यपुत्री कालिन्दी यमुना , यहां अब आंहें भरती हैं। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..

वेवारसी और लापरवाही ने , बहुत बड़ा नुकसान किया।

मकबरा हवेली या बुर्जी, निज सम्पत्ति जैसा तोड़ दिया।

यमुना किनारा बेलनगंज , पुराने शहर देखे जाते ।

मार्केट एपार्टमेंट बना , छिप-छिपकर तोड़े जाते।

गूंगी सरकार बेपरवाह अधिकारी , जनता आंखें बन्द रखती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..

यारो इस भूतहे शहर में , अब कैसी यह हवा चली।

स्वार्थ और बेरुखी में , अब है किसी को होष नहीं ।

अपना निजी हर कोई देखे , पूरे शहर को देखे नहीं।

हम अतीत को खोते जाते , यह आगे का बढना नहीं ।

जनता मुर्दावत रूखसत है , उसमें न आत्मा बसती है। आर्यावर्त के भारतखण्ड में…..

करता हूॅ ईष्वर से दुवा मैं , जन गण मन सब जग जाये।

आत्म अतीत शहर का अपने , खूब बखूब पहचान बनाये ।

खायंे-पीयें खूब मौज करें , मस्ती का आलम बन जाये।

दूनी चैगुनी करें तरक्की , इतिहास ना अपना बिसरायें ।

जिन्दा दिल व सच्चे मन से , ‘ बसुधैव कुटम्बकम्‘ बनती है।

आर्यावर्त के भारतखण्ड में   ,   ब्रजमण्डल की  धरती है ।

बारह बन चौबीस उपवन मंे   ,  अगर बन की बस्ती  है ।।

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3 Comments on "अगर बन"

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Satyadev Gupta
Guest

Being a Brijvasi myself from Bharat Pur District of Rajasthan, I very much appreciate this descriptive poem relating to history and geography of Brij mandal. I would like to request Dwivediji’s permission if I could keep in touch with him if I have any question or exchange views, in future. For that, if he could provide his contact information, directly on my email.

I have become a regular reader of Pravakta and I deeply appreciate what you are doing, so beautifully and effectively. My sincere thanks to Pravakta Parivaar

Y.P.Agrawal
Guest

Agarvan Kavita pure agra ka itihas ko dikhata hai. yeh kavita chote school ke bachchon ke pathyakarm me samil karna chahiye.

akhileshdubey
Guest

Bahut sundar pure bharatvarsh ka chitran Kiya hai aapne. Sarahneey.

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