लेखक परिचय

ललित गर्ग

ललित गर्ग

स्वतंत्र वेब लेखक

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peopleललित गर्ग –

सफलता का कोई शाॅर्टकट नहीं होता। अपने कार्य के प्रति समर्पण और उसके प्रति प्यार-ये दो ऐसे प्रमुख कारण हंै जो किसी भी व्यक्ति को सफल बना सकते हैं। सफलता और पुरस्कार ही जीवन की सार्थकता नहीं हो सकती। हां, इनका महत्व इतना जरूर है कि ये दोनों चीजें जीवन में आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करती हंै। प्रायः सभी के मन में विकास करने की तमन्ना रहती है। हरेक व्यक्ति के मन में वार्तमानिक स्थिति से ऊपर उठकर कुछ नया सृजन और नया निर्माण करने की ललक रहती है। इस हेतु वह प्रयास भी करता है और कुछ अंशों में सफल भी होता है। कुछ व्यक्ति ऐसे भी देखे जाते हैं, जो प्रयास तो करते हैं किंतु सफल नहीं हो पाते। इसका मूल कारण संकल्प का अभाव, पुरुषार्थ की तीव्रता में कमी, समर्पण एवं लक्ष्य के प्रति एकाग्रता और तन्मयता की अल्पता को माना गया है। इसी संदर्भ में भगवान महावीर ने सफल जीवन का निचोड. रखते हुए कहा कि जो भी व्यक्ति अपना वर्तमान और भविष्य उज्ज्वल, श्रेष्ठ देखना-पाना चाहे वह जीए जाने वाले प्रत्येक क्षण के प्रति सावधान रहे। इसीलिये ‘समयं गोयम! मा पमायए’ का बोधि स्वर गूंजा। बस, यही क्षण जीवन का सार्थक है, जिसे उम्र की परवाह किए बिना हमें पूरी जागरूकता से जीना चाहिए और यही जागती आंखों का सच है जिसे पाना हमारा मकसद होना चाहिए।
यदि हममें दृढ़ विश्वास है, कुछ कर गुजरने की ललक है, कुछ पाने की तमन्ना है, सकारात्मक सोच है और ‘ना’ या ‘असंभव’ शब्द का जीवन में स्थान नहीं है तो ही हम अपने जीवन को सफल एवं सार्थक बना सकते हैं। हमारी सोच इस प्रकार हो कि हम हारते हैं जो जीतते भी हम ही हैं। असफल होते हैं तो सफल भी होते हैं, मृत्यु है तो जीवन भी है, निराशा है तो आशा भी है। अनूठे और विलक्षण कहलाने वाले लोगों की सोच सामान्य व्यक्तियों से बिल्कुल हटकर होती है। उन्हें निराशा की राह नहीं आशा की किरणें दिखायी देती हैं, उनके मन में दृढ़ इच्छाशक्ति होती है लक्ष्य प्राप्ति की, सफलता की और उन्नत जीवन की। वे विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों को समझने की पर्याप्त क्षमता रखते हैं और विपरीत परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ लेने की उनमें क्षमता होती है। यदि मंजिल प्राप्त किये बिना ही यह सोचकर दबे पांव आगे बढ़ रहे हैं कि शिखर पर पहुंच पाऊंगा या नहीं तो मन में डर, निराशा, घबराहट, आदि जैसे द्वंद्व संभव होने वाले कार्य को भी असंभव बना देते हैं। ऐसे द्वंद्वों को त्याग कर हिम्मत से काम लेना चाहिए। साथ ही उदासी त्यागकर मन को प्रफुल्लित बनाना चाहिए। उम्र एक छोटा-सा भाव है जो अनेक गलतियों के रास्ते खोल देता है। भीतर-ही-भीतर शंका, ईष्र्या,उत्तेजना, विद्रोह की भीड़ उमड़ पड़ती है। एक क्षण भी यह सोचने का अवकाश नहीं होता कि ‘मैं भी कुछ हूं।’ इसके वितरीत कुछ लोग है जिनमें कुछ होने अहसास होता है और जो दृढ़ संकल्प और कर्म में सातत्य बनाकर चलते हैं।
संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान दामोदर सातवेलकर साठ वर्ष की उम्र तक एक पाठशाला में ड्राइंग पढ़ाते रहे। रिटायर होने के बाद उन्होंने संस्कृत सीखी और संस्कृत भाषा के क्षेत्रा में इतना काम किया कि देखने वाले दंग रह गए। वेदों का शुद्ध पाठ तैयार करने से लेकर भारतीय संस्कृति का प्रगतिशील स्वरूप प्रतिपादित करने तक के क्षेत्र में उन्होंने इतनी सफलता अर्जित की कि आज भी जहां संस्कृत के संबंध में कहीं कोई मतभेद उठता है तो उसके समाधान एवं निराकरण के लिए सातवेलकर के ग्रंथों को ही आधार माना जाता है। महात्मा गांधी 45 वर्ष की उम्र के बाद ही एक क्रांतिकारी संत के रूप में उभरकर सामने आए थे।
दादा भाई नौरोजी साठ वर्ष की उम्र में पहली बार बम्बई काॅन्शिल के सदस्य चुने गए और इकसठ वर्ष की उम्र में कांग्रेस के सभापति बने। राजनीति के क्षेत्रा को छोड़कर अन्य क्षेत्रों का अवलोकन करने पर यह तथ्य स्पष्ट हो रहा है कि विकास उम्र से प्रतिबद्ध नहीं है। यूनानी नाटककार साफाप्लाज ने 90 वर्ष की उम्र में अपना प्रसिद्ध नाटक ‘आडीपस’ लिखा था। अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि मिल्टन 44 वर्ष की उम्र में अंधे हो गये थे। अंधा होने के बाद उन्होंने अपना सारा ध्यान साहित्य रचना पर केन्द्रित किया और पचास वर्ष की उम्र में अपनी प्रसिद्ध कृति ‘पैराडाइज लास्ट’ लिखी। 62 वर्ष की उम्र में इनकी एक और प्रसिद्ध कृति ‘पैराडाइज रीजेण्ड’ प्रकाशित हुई। जर्मन कवि गेटे ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘फास्ट’ 80 वर्ष की उम्र में लिखी थी। 92 वर्षीय अमेरिकी दार्शनिक जानडेवी अपने क्षेत्र में अन्य सभी विद्वानों से अग्रणी थे। उन्होंने 60 वर्ष की उम्र में दर्शन के क्षेत्र में प्रवेश किया
कई बार व्यक्ति थोड़ा पुरुषार्थ करके ही निराश हो जाता है और वह सोचने लगता है कि जवानी गई अब बुढ़ापे में क्या किया जा सकता है? यह सोचकर वह थककर बैठ जाता है लेकिन वृद्धावस्था किसी भी स्थिति में प्रगति में बाधक नहीं है। सफलता और प्रगति का उम्र से कोई अनुबंध नहीं है, किसी भी उम्र में आदमी प्रगति कर सकता है। भगवान महावीर ने कहा था कि प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा समान है। न कोई बड़ा है और न कोई छोटा। सबकी आत्मा ज्ञान, श्रद्धा, चरित्र और शक्ति-सम्पन्न है। इसलिये विकास करने के लिये उम्र कोई बाधा नहीं है। इस दुनिया में बहुत ऐसे व्यक्ति भी हुए हैं, जिन्होंने अपनी यौवन अवस्था को अत्यंत सामान्य सी स्थिति में बिताया और उसके बाद में उनके मन में उन्नति करने की उदग्र आकांक्षा ने जन्म लिया और अपने प्रखर प्रयत्नों से विकास के अंतिम बिन्दु तक पहुंच गए। इन्फोसिस के संस्थापक श्री नारायण मूर्ति का उदाहरण हमारे सामने है, एक ऐसा कर्मयोगी जो केवल सोचता और बात ही नहीं करता बल्कि हमेशा अपने विचारों को कार्यरूप में परिणित करता हुआ दिखाई देता है। उम्रदराज होकर उन्होंने जो सफलता के मानक गढ़े वे सचमुच उनके उत्साह एवं जीवन के प्रति लगाव का परिचायक हंै।
जाॅर्ज बर्नाड-शा 93 वर्ष की अवस्था में इतना लिखते थे कि 40 वर्ष की उम्र में भी इतना नहीं लिखा। दार्शनिक वैनदित्तो क्रोचे 80 वर्ष की अवस्था में भी नियमित रूप से दस घंटे लगातार काम करते थे। 85 वर्ष की उम्र में उन्होंने दो महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं जिनकी चर्चा विश्व साहित्य में होती है। माटिस मैटर लिंक का देहांत 88 वर्ष की उम्र में हुआ, अपनी मृत्यु के कुछ दिन पूर्व ही उन्होंने अपनी अंतिम पुस्तक पूरी की थी। उस पुस्तक का नाम था ‘द एवार्ट आॅफ सेतु आल’-यह पुस्तक उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना समझी जाती है। दार्शनिक कांट को 74 वर्ष की अवस्था में उनकी एक रचना के आधार पर दर्शन के क्षेत्र में प्रतिष्ठा मिली।
ये आंकड़े इस तथ्य को पुष्ट कर रहे हैं कि उत्साह, लगन, संकल्प और पुरुषार्थ बना रहे तो किसी भी उम्र या स्थिति में युवा रहा जा सकता है। यौवन अथवा सक्रियता का आयु विशेष से संबंध नहीं, वह वृद्धावस्था में भी अक्षुण्ण रह सकती है। कई बार यह क्षमता और सक्रियता बचपन में ही आश्चर्यजनक रूप से विकसित होती देखी गई है। आचार्य तुलसी ने सही कहा है कि जहां उल्लास और पुरूषार्थ अठखेलियां करे, वहां बुढापा कैसे आए? वह युवा भी बूढा होता है, जिसमें उल्लास और पौरुष नहीं होता। यही कारण है कई ऐसी विभूतियां भी हुई हैं, जिन्होंने खेलने व खाने की उम्र में ही अद्वितीय उपलब्धियां अर्जित कर लीं। मुगल सम्राट अकबर 14 वर्ष की उम्र में ही गद्दी पर बैठे और 18 वर्ष की उम्र में बैरम-खां को हटाकर स्वतंत्र रूप से कार्यभार संभाल लिया। सम्राट अशोक जब सिंहासन पर आसीन हुआ तब मात्र 20 वर्ष की उम्र थी। छत्रपति शिवाजी ने 19 वर्ष की उम्र में तोरण का किला जीता था। महाराजा रणजीतसिंह जी ने 19 वर्ष की उम्र में लाहौर पर विजय प्राप्त की थी। आचार्य तुलसी 22 वर्ष की उम्र में विशाल धर्मसंघ के आचार्य बने। विश्व-विजय के अभियान पर निकलते समय सिकंदर की उम्र मात्र 20 वर्ष की थी। जूलियस सीजर ने 24 वर्ष की उम्र में एक भयंकर डाकू गिरोह को गिरफ्तार किया था।
वृद्धावस्था में युवकों जैसी सक्रियता और अल्पायु में प्रौढ़ों जैसी परिपक्वता का परिचय देने वाले इन उदाहरणों से यह सिद्ध हो रहा है कि विकास से आयु का कोई तालमेल नहीं है। आयु न तो कार्यक्षमता को मंद बनाती है और न ही उत्तेजित करती है। कार्यक्षमता व्यक्ति की सुव्यवस्थित योजना, दूरगामी सोच, सकारात्मक दृष्टिकोण और सघन प्रयास से निरंतर बढ़ती रहती है। अतः जीवन में सफलता के सुमन खिलाने की मानसिकता हो तो व्यक्ति को निष्ठापूर्वक क्रियाशील बने रहना चाहिए।

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