लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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– पंकज झा

राजनीति विज्ञानी और हावर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहे सैमुएल हटिंगटन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ में यह स्थापना दी थी कि अब विचारों की समाप्ति का युग है. उनकी बातों को थोडा सरलीकृत किया जाय तो यह था कि अब संघर्ष, विचारधाराओं के कारण नहीं बल्कि सभ्यताओं के मध्य अंतर के कारण होगा. वर्तमान भारत और मीडिया के सम्बन्ध में इस विचार का थोडा पेरोडी बनाया जाय तो कहा जा सकता है कि अब भारत के मुख्यधारा के कहे जाने वाले मीडिया में भी विचारों के साथ-साथ समाचारों के समाप्ति का युग भी आ गया है. यहाँ संघर्ष अब किसी बेजुबानों को जुबां देने के लिए, किसी अव्यक्त को व्यक्त करने के लिए नहीं अपितु मीडिया(यों) के बीच मौजूद आर्थिक अंतर के लिए होगा/हो रहा है. बड़ी-बड़ी कंपनियों का शक्ल लिए जा रहे इन समाचार माध्यमों में कोरपोरेट हित के अलावा भी कोई बातें होती होंगी, जन सरोकारों की बात भी आपको पढ़ने-देखने-सुनने को मिलता होगा ऐसा नहीं लगता. अगर कुछ समूह गांव-गरीब-किसान की बात करते भी हों तो स्वाभाविक तौर पर नहीं बल्कि लोकतंत्र को कमज़ोर करने वाले तत्वों द्वारा प्रायोजित-प्रभावित हो कर ही. सरकारी विज्ञापनों-रेवडियों की आंधी में चाहे तो सरकार का जनसंपर्क विभाग हो जाने वाले या फिर सरकार या संसदीय व्यवस्था को तार-तार करने का मंसूबा पाले देशी-विदेशी समूह, अ-सरकारी गिरोहों द्वारा उपलब्ध करवाए गए फंड को पा कर लोकतंत्र के खिलाफ युद्ध करने वाले समूहों के मध्य आपको निष्पक्ष मीडिया ढूंढें नहीं मिलेगा.

चूँकि बात विचारों से ही शुरू हुआ था तो यह याद दिलाना होगा कि ‘पेड न्यूज़’ के मामले में सबसे बदनाम हुए और सर्कुलेशन के हिसाब से देश का सबसे बड़ा अखबार होने का दावा करने वाले समूह ने तो ‘विचारों’ के लिए अपना दरवाज़ा पूरी तरह से बंद ही कर दिया हुआ है. विज्ञापन के लोभवश भले ही वो प्रखंड स्तर तक का संस्करण निकालें, गांव से लेकर ब्लाक स्तर तक का राजस्व उन्हें चाहिए. लेकिन जब विचारों की बात आयेगी तो उन्होंने यह तय करके रखा है कि बस दिल्ली के कुछ दसेक उनके स्तंभकार ही विद्वान और विचारवान हैं. अपने “पैनल” के अलावा उन्हें और किसीके विचार सुनने-पढाने है ही नहीं. जहां इस अखबार का भी पहले यह नियम था कि सम्पादकीय पेज का निचला आलेख कम से कम प्रादेशिक संस्करणों में अलग-अलग हुआ करता था वही अब तो चाहे छत्तीसगढ़ के ‘ताडमेटला’ में सौएक ज़वान मर जाये या फिर कही और बस को उड़ा कर सैकड़ों आम नागरिकों की ह्त्या कर दी जाय उन्हें तो बस तुर्की या अज़रबैजान के बारे में हार्वर्ड से पढ़े विद्वानों का ही लेख चाहिए.

अगर समाचार और विज्ञापनों की बात की जाय तो खासकर विगत लोकसभा चुनाव में जिस तरह से पैसा लेकर विज्ञापन को ही समाचार बना देने का चलन शुरू हुआ उसके बाद तो कुछ कहने को रह ही नहीं जाता. यहां आशय यह नहीं है समाचार कंपनियां ‘साधू’ बन जाय. एक सीमा तक आप अपना व्यावसायिक हित देखें इसमें बुराई भी नहीं है. आखिर आपके अनुसार आपको हज़ारो समाचार कर्मियों का पेट भी भरना होता है. लेकिन कोई तो लक्ष्मण रेखा खीची जानी ही चाहिए. जिस तरह से विज्ञापन के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं, उससे भी आगे अब, जब विज्ञापन को ही समाचार बना दिया जाता है, इलेक्ट्रोनिक मीडिया में जिस तरह टीआरपी बढ़ाने के लिए हथकंडे अपनाए जाते हैं. जैसा हाल ही में एक बिना दर्शक के अंग्रेज़ी चैनल द्वारा किया गया या फिर भूत-प्रेतों वाले चैनल में किया जाता है. फिर प्रखंड स्तर से लेकर दिल्ली तक अपनी हैसीयत के अनुसार कथित पत्रकारों द्वारा वसूली, ट्रांसफर पोस्टिंग, लाबीइंग से कमाई की जाती है, उसके बाद तो माध्यमों के बारे में कहने को कुछ बच ही नहीं जाता.

अभी झारखण्ड के प्रखंड स्तर के ऐसे ही एक कर्मियों को अपने ब्यूरो प्रमुख द्वारा मासिक वसूली के दबाव की बात हो या फिर कारगिल रिपोर्टिंग से ‘देवत्व’ प्राप्त महिला पत्रकार के हाथ घोटाले में काले होने की. पिछली सरकार के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान विपक्ष के सहयोग से किये स्टिंग ऑपरेशन को बेच देने का विश्वासघात हो या फिर ‘इशरत’के नाम पर गैरजिम्मेदार रिपोर्टिंग करने, फिर पोल खुल जाने पर माफी मांगने वाले बड़े कहे जाने वाले पत्रकार और चैनलों की. एजेंसियों द्वारा बार-बार नक्सल जैसे संवेदनशील मुद्दे पर गलत खबर चला कर, न्यायालय तक का अवमानना कर बाद में समाचार को बिना किसी खेद के रद्द कर देने वाले एजेंसी की हो या फिर निहित स्वार्थवश प्रतिबंधित नक्सलियों का महिमामंडन कर 76 जावानों की शहादत का पृष्ठभूमि तैयार करने वाली लेखिका की. हर तरफ आपको व्यवसायवाद की ऐसी बेशर्म गली, दुकानदारी का ऐसा अंधा सुरंग दिखेगा, जहां आप वास्तविक जनसरोकारों के विचार-समाचार प्रकाश की व्यवस्था ढूंढते रह जायेंगे. वैसे भी इतने स्वार्थों के मध्य आप निःस्वार्थ सच्चाई की कल्पना कैसे कर सकते हैं?यहां तो ऐसे शर्मनाक हालत हैं कि जहां सैकड़ों चैनल, हज़ारों बड़े मझोले अखबार और लाखों छोटी पत्रिकाएं जहां, महंगाई की विकरालता तक को जाने-अनजाने भी मुद्दा नहीं बना पाया, वहां केवल फिल्म ‘पिपली लाइव’ अपने एक गीत सखी सैयां तो खूबे कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात हैं , से वह सन्देश देने में सफल रहा है.

ऊपर वर्णित ऐसे हालत में फिलहाल तो उम्मीद की किरण कुछ वैकल्पिक माध्यमों में ही नज़र आता है. खासकर स्थान-समय-काल की सीमाओं से परे इंटरनेट एक ऐसा माध्यम उभर कर सामने आया है जहां हिन्दी के कुछ मुट्ठी भर ब्लोगरों-मोडरेटरों ऐसा काम कर दिखाया है जो हज़ारों करोड के बुनियादी ढांचा वाले और लाखों के पैकेज पर काम करने वाले अपने कर्मियों की बदौलत भी नहीं हो पाया. कुछ साइटों का ही नाम लेना मुनासिब ना होते हुए भी कहना होगा कि ‘भड़ास4मीडिया डॉट कॉम, रविवार डॉट कॉम, विस्फोट डॉट कॉम, प्रवक्ता डॉट कॉम, मोहल्लालाइव डॉट कॉम’ सरीखे साईट अपने नाम मात्र के संसाधनों की बदौलत ही बड़ा पाठक वर्ग हासिल करने में सफल रहा है. यहां तक कि देश के ढेर सारे अखबार जो स्तंभकारों को पैसा देना मुनासिब नहीं समझते उनका काम भी इन्ही साइटों के आलेख से चल जाता है.

इस तरह के तमाम साइटों का संचालन करने वाले लोगों की विचारधारा चाहे जो हो लेकिन उनमें यह समानता है कि सभी जनसंचार माध्यमों को समझने वाले, सामान्यतः उससे ऊबे हुए और अल्प संसाधन में किसी सरफिरे की तरह जुटे हुए लोगों द्वारा शुरू किया गया है और सफल रहा है. जैसे-जैसे लोगों में जागरूकता आयेगी, मध्य वर्ग की आर्थिक क्षमता में वृद्धि होगी, नेट इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या बढ़ेगी, जैसे-जैसे लोगों की व्यस्तता बढ़ेगी, मुख्याधारा के मीडिया से जैसे-जैसे लोगों का मोहभंग होते जाएगा वैसे-वैसे हिन्दी के साइटों की मारक क्षमता में भी वृद्धि होती जायेगी.

यहां बहुत से इस तरह के साइटों का नाम लेना संभव नहीं हुआ है. और जिनका लिया भी गया है वह उनकी पवित्रता का लाइसेंस नहीं है. लेकिन इतना ज़रूर है कि जब-तक यहां भी गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा का दौर शुरू नहीं हो जाता. जब-तक यहां भी व्यावसायिकता पूरी तरह घुसपैठ नहीं कर पाता. जब तलक अखबारों का रीडरशिप के लिए किये जाने वाले युद्ध और चैनलों का टीआरपी की आस में उल-जुलूल हरकतों की तरह यहां भी एलेक्सा रेटिंग के लिए संघर्ष शुरू नहीं कर दिया जाता तब तक तो उम्मीद की किरण यहां से फूटती भी है. चुकि इन तमाम लोगों के भी बीवी बच्चे होंगे ही और समाज के आम लोगों की तरह इनकी आशाएं-आकांक्षायें भी कल को परवान चढेगी ही. लेकिन जब-तक ऐसा अवसर इन्हें नहीं मिलता तब-तक यह कहा जा सकता है कि फिलहाल तो वैकल्पिक मीडिया ही विकल्प है. रही कल की बात तो कल किसने देखा है.

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3 Comments on "वैकल्पिक मीडिया की ज़रूरत"

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Anil Sehgal
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An average person believes as authentic whatever he listens from TV or reads from a newspaper. He is not aware of existence of “paid news”. In my view, foremost campaign of media dot com should be to point out falsity contained in specific “paid news”.

prabha mujumdar
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बहुत ही अच्छा लेख है. रातो रात महिमा मंडित करने या मटियामेट करने की शक्ति के कारण बहुत स्वार्थ जुड गये है. तेज रफ्तार के दबाव मे अध कचरी और अपुष्ट खबरे बरस रही है. गिरोह बन्दी जोर पकड रही है.
प्रभा मुजुमदार

Vishwash Ranjan
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मीडिया मैं होते हुए भी मीडिया को आइना दिखाने का आपका आलेख बहुत ही सराहनीय है. आप को बताना चाहूँगा की अखबारों द्वारा पाठको के पत्र को मतलब लेटर टू एडिटर को स्थान ही नहीं दिया जा रहा है. मैं भास्कर की बात कर रहा हूँ. जिस तरह सरकार जिन नागरिकों से टैक्स लेती है उन्ही के प्रति जवाबदेह नहीं है, उसी तरह कई प्रमुख अखबार भी जिन पाठकों के दम पर चल रहे हैं उन्ही की आवाज को दबाने का प्रयास कर रहे हैं. इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी की दैनिक भास्कर ने अपना लेटर टू एडिटर वाला कोलम… Read more »
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