लेखक परिचय

आलोक कुमार यादव

आलोक कुमार यादव

प्रवक्ता-समाजशास्त्र, विवेकानन्द ग्रामोद्योग स्नातकोत्तर महाविद्यालय, दिबियापुर, (औरैया) उ. प्र.] Editor- A Journal of Social focus Mob. 08057144394

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-आलोक कुमार यादव

भूमंडलीकरण के इस दौर में भारत के ग्रामीण जन जिन मुख्य समस्याओं से रू-ब-रू होना पड़ रहा है उनमें से एक भूजल स्तर का गिरना भी है। जल जीवन की अनिवार्यता है इतिहास इस बात का साक्षी है कि अधिकतर आदि सम्यताएं विभिन्न नदी-घाटियों में जन्मी और फली-फूली है। अनेक महत्वपूर्ण नगर, नदी, झील तालाब आदि किसी न किसी जल स्रोत के किनारे ही बसे है। शायद इसी कारण वैज्ञानिक गेटे ने जल को महत्वपूर्ण मानते हुए माना कि ”प्रत्येक वस्तु जल से ही उत्पन्न होती है व जल के द्वारा ही प्रतिपादित होती है। लेकिन अब जल के स्रोत उन्नत अवस्था में नही है। पृथ्वी पर उपलब्ध कुल पानी का केवल 0.3 प्रतिशत भाग ही साफ और शुध्द होता है।

जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने व गिरते भूजल स्तर को ध्यान में रखते हुए 1977 में सयुक्त राष्ट्र् संघ द्वारा आयोजित सम्मेलन मे वर्ष 1981 से 1990 तक के दशक को पेयजल दशक के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया था। पुन: सयुक्त राष्ट्र संघ ने 2003 को अन्तर्राष्ट्रीय स्वच्छ जल वर्ष के रूप में मनाया है।

भारत विश्व का सबसे बड़ा कृषि प्रधान देश है यहां की 80 प्रतिशत कृषि, वर्षा के जल के सहारे होती है। उसी तरह 80 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या अपनी घरेलू जल आपूर्ति का प्रबन्ध स्वयं करती है। विश्व में भारत भूजल का सबसे बड़ा प्रयोक्ता है।

जल की इस नाजुक हालात और लगातार बढती मांग को देखते हुए जहां खेती की सिचांई में पानी की कटौती की चर्चा होने लगी है वही उपलब्धता में भी लगातार कमी की बात कही जा रही है देश के विभिन्न क्षेत्रो में पड़ रहे सूखे और नल कूपों द्वारा पानी के अनियोजित दोहन के चलते भूगर्भिक जल में लगातार कमी होती जा रही है, जिसके दुष्परिणाम के रूप में हरित क्रान्ति के अगुवा पंजाब और हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश के कई जिला का भूमिगत पानी खतरनाक हालात तक नीचे चला गया है।

भारतीय ग्रामों में उत्पन्न हुई इस ज्वलंत समस्या के पीछे निम्न कारक मुख्यतया उत्तरदायी मानें जाते है-

1. स्वतन्त्रता के बाद देश के सिचिंत भू-भाग में जबरदस्त बढोत्तरी हुई है 1951 में 226 लाख हेक्टेयर भू-भाग सिंचित था वह सन् 2000 तक बढ़कर 10 हजार करोड़ हेक्टेयर से अधिक हो गया है।

2. आज भी अधिकतर भारतीय किसानों में फसल के अनुसार जलापूर्ति की जानकारी का सर्वधा अभाव पाया जाता है अधिकाशं किसानों में यह आज भी धारणा है कि अधिक पानी की आपूर्ति से अधिक उपज भी प्राप्ति होगी। जब कि इसके विपरीत वैज्ञानिक तथ्य यह है कि सिचाई के रूप में फसलों को संतुलित जल की कुशलता पूर्वक आपूर्ति से फसलों से उच्चतम उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

3. वर्तमान में सिचांई की पंरपरागत प्रणाली से हमारे खेतों तक पहुचने वाले पानी का 20 से 25 प्रतिशत तक भाग व्यर्थ में चला जाता है। नालियों के माध्यम से होने वाली सिचाई में फसलों की क्यारियों तक पहुचने के पूर्व ढेरों पानी नालियों द्वारा सोख लिया जाता है।

4.स्वतन्त्रता प्राप्ति उपरान्त भारत में सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा सर्वाधिक पॅूजी का निवेश जल पर ही किया गया है। आज कई बहुर्राष्ट्रीय कंपनियों जिनमें प्रमुख रूप से कोका कोला, पेप्सी, एक्वाफिना, और किल्ने ने बोतल बन्द पानी का धंधा शुरू किया है। देश के विभिन्न ग्रामीण हिस्सों में कोक और पेप्सी ने ‘कोल्ड डि्क्स’ बनाने के प्लांट लगाए। इससे भी जल का दोहन बड़े पैमाने पर किया गया। गावों में जल संकट लगातार क्यों बढता जा रहा है, इससे कई उपर्युक्त कारण है। लेकिन उनमे एक प्रमुख कारण पानी का व्यापारीकरण भी है। एक आंकड़ो के अनुसार भारत में प्रतिदिन 10 करोड पानी की बोतले बिक्री की जाती है। इसी तरह 5 करोड बोतले कोल्ड डि्ग्स की बिकती है। इसमें महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कोल्ड डि्क्स की एक केन को तैयार करने में 20 लीटर पानी की आवश्यकता होती है और पेय पीने के बाद शरीर को लगभग 9 गुना अतिरिक्त पानी की जरूरत होती है।

इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रतिदिन 10 खरब मिली लीटर पानी विभिन्न जल स्रोत्रों और भूजल के दोहन से निकाला जा रहा है।

आज समय की आवश्यकता है इस अमूल्य निधि को बचाये रखने की। यद्यपि जल राज्य का विषय है परन्तु केन्द्र सरकार ने जल संसाधन के संरक्षण हेतु कई महत्वपूर्ण प्रयास किये गए है।

दसवी योजना (04-05) में त्वरित ग्रामीण जल आपूर्ति कार्यक्रम लागू किया गया एवं 11वीं पंचवर्षीय योजना में भी जल संसाधन के विकास को उच्च प्रतियोगिता देते हुए उपलब्ध जल का वर्षा पोषित क्षेत्र में इष्टतम उपयोग करने पर दिया गया है। भूजल के सही ढंग से उपयोग को बढावा देने हेतु ”कृत्रिम भूजल संभरण सलाहकार परिषद का भी गठन किया गया है। वर्तमान में सरकार द्वारा इस समस्या से कुशल तरीको से निपटने हेतु केंद्रीय जल आयोग का गठन भी किया गया।

ग्रामीण जल उपलब्धता केंन्द्रीय सरकार के ‘भारत निर्माण’ का एक महत्वपूर्ण संघटक है, इसीलिए केन्द्र सरकार त्वरित सिचाई लाभ कार्यक्रम और वर्षा पोषित विकास कार्यक्रम तथा जल संसाधनों के प्रबन्धन और संर्वधन में भारी निवेश कर रही है।

भारत के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में फैली इस विश्वव्यापी समस्या का हल करने के लिए यदि निम्नलिखित सुझावों पर अमल किया जाये ंतो इस भूमंडलीकरण की समस्या को नियंत्रण में किया जा सकता है।

• कृषि के विकास में सिचाई की भूमिका तथा हरित क्रान्ति के दौरान भूजल के अधाधुंध दोहन से भूमिगत जल स्तर में गिरावट आई। इसके लिए यह आवश्यक हो जाता है कि जो पानी कारखानों तथा मल प्रवाह द्वारा दूषित हो जाता है, उसके पुर्नशोधन की व्यवस्था प्रत्येक क्षेत्र में की जाय।

• सिचाई दौरान 30 से 40 प्रतिशत जल टूटे फूटे और पुराने नलों से रिस-‘रिसकर व्यर्थ में चला जाता है। कुशल प्रबन्ध एवं वैज्ञानिक पध्दति द्वारा इस हानि को रोका जा सकता है ।

• वर्षा जल का 90 से 95 प्रतिशत भाग बहकर नदियों के रास्ते समुद्र में चला जाता है आज जरूरत है कि गॉव के पानी को गॉव में ही रोके, खेत के पानी को खेत में रोकें, मिट्टी को बहने से रोके, यह कार्य जन भागीदारी से ही सम्भव है।

• जल उपयोग तथा प्रबन्ध, समुदाय के सामाजिक ढंाचे से जुडा है इसलिए तकनीकी और सामाजिक पक्षों के बीच तालमेल होना आवश्यक है ।

• प्रत्येक राज्य द्वारा जल संरक्षण कार्यक्रम को गॉव में राष्ट्रीय रोजगार गारन्टी योजना में सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाय।

• राज्यों को भूजल संरक्षण कानून बनाने पर जोर देना होगा और प्रति व्यक्ति को जल की उपलब्धता उसकी गुणवक्ता और भूजल क्षरण के रोकथाम के बारे में ठोस कार्यवाही करनी होगी। जल सुरक्षा योजना को असली जामा पहनाना होगा। राज्यों को वर्षा जल संचयन के साथ भूजल के कृतिम पुर्नभरण सम्बन्धी जागरूकता कार्यक्रम और प्रशिक्षण पाठयक्रमों का आयोजन, वर्षा जल संचयन सुविधाओं को बढावा देने हेतु भवन उपनियमों में संशोधन, जल संचयन को प्रोत्साहन देने वालों को कर छूट जैसे उपाय भी करने होगें।

भारत को विश्व गुरू महाशक्ति बनने व ग्रामों को स्वावलंभी एवं आत्मनिर्भर बनने के लिए आवश्यक है जल के उचित संरक्षण, कुशल प्रबन्ध एवं किफायती उपयोग किया जाय। अन्यथा वह दिन दूर नहीं, जब पानी की बूंद तेल की बुंद से अधिक महगी हो जायेगी। इस के लिए आवश्यकता इस बात की है कि वैज्ञानिक विधि पर आधारित बहुपक्षीय रणनीति विकसित करने में आम व्यक्तियों के प्रयत्नों को बढावा दिया जाय और इस कार्य में सयुक्त राष्ट्र एजेंसियों, सरकार और स्वैच्छिक संस्थाओं का सहयोग प्राप्त किया जाए।

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2 Comments on "जल की उपलब्धता और भारतीय ग्राम"

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sunil patel
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जल ही जीवन है. आज जरुरत है वर्षा जल को सहेजने की. स्तिथि बहुत ही गंभीर है और भयावक होती जा रही है.

संगीता पुरी
Guest

भूमिगत पानी का नीचे चले जाने की निरंतरता बहुत ही गडबड संकेत है .. हमें शीघ्र ही इससे निबटने का प्रयास करना होगा !!

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