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-तरुणराज गोस्वामी

यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि जिस भारत में युगों-युगों से मर्यादा पुरुषोत्तम करोड़ों के आराध्य रहे हैं उसी भारत में सालों से अयोध्या की भूमि पर अधिकार को लेकर मुकदमेबाजियां हो रही है। उस पर भी ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे कोई आसमान टूटकर गिरने जा रहा हो, जैसे निर्णय आते ही दंगे भड़क जायेंगे और सबकुछ लुट पिट जायेगा।

आज स्थितियां बानवे से कितनी ही आगे निकल आयी है आज हमारे पास पैसा कमाने और तरक्की की सोच के अतिरिक्त कोई सोच नही, आज हमारा ह्रदय लगातार होते आतंकी हमलो पर भी पसीजता नही, हममें से अधिकांश नक्सली हमलो पर प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते, कश्मीर में क्या हो रहा है या हो सकता है जानने की कोशिश ही नहीँ करते, लगातार आती भ्रष्टाचार की ख़बरें हमें परेशान नहीं करती। आज तो हम केवल औपचारिकताएं निभाते हैं, मोमबत्तियाँ जलाते हैं, ज्यादा से ज्यादा लिखकर शांत हो जाते है। अगले दिन सबकुछ भूलकर आगे बढ़ जाते हैं क्योंकि हम तो तरक्की करना चाहते हैं लेकिन अपना अतीत भूलाकर हम तरक्की की कौन सी दिशा पा सकेँगे? क्या भारत को अभी भी ऐसी ही तरक्की चाहिये जिसमें संस्कार जैसी कोई चीज़ ही न हो। विवेकानंदजी ने कहा था हम अपना गौरवमयी अतीत भूलाकर स्वर्णिम भविष्य का निर्माण नही कर सकते। फ़िर भी आज भारत के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग इतिहास को झूठलाकर नित नये जतन करते रहते हैं। एक वर्ग विशेष के और ज़्यादा नज़दीक साबित करने के ताकि यह लोग उस वर्ग के वोट पा सकें जो कि हमेशा ही थोक में डलते आये हैं। इसी प्रकार की राजनीति का परिणाम है कि आज दशकों से भूमि के एक टुकड़े पर अधिकार का मुकदमा अदालत के चक्कर काट रहा है वरना आखिर क्या कारण है कि संसद इस विषय में कोई कानून बनाकर विवाद का अंत कर देती। लेकिन कोई भी सरकार ऐसा करके अपने वोट पर चोट नहीं कर सकती तो फ़िर अदालत के निर्णय को ही स्वीकार कर अंतिम सत्य मानने का रास्ता रह जाता है।(चाहे हर कोई जानता हो कि अदालतों में प्रस्तुत किये जाने वाले तथ्य कैसे उत्पन्न किये जाते हैँ)

लाख मतभेदों के बावजूद आज अधिकांश लोग अदालत का निर्णय जानने को उत्सुक है। यह जानते हुए भी कि यह विषय सर्वोच्च न्यायालय पहुंचकर हल होने के लिये कई और दशको का समय लेगा,भारत का आम आदमी चाहता है कि अभी तो निर्णय आये और सरकारों ने जो ये आशंकित वातावरण बनाया है समाप्त हो। आम नागरिक आज विवाद नहीँ चाहता फ़िर भी नेताओँ विशेषकर धार्मिक नेताओँ को चाहिये कि अपनी वाणी पर संयम रखे, सरकारोँ को चाहिये कि चौराहों पर शस्त्रधारी पुलिस जवान खड़े करने के स्थान पर समाज के ठेकेदारों को यह जिम्मेदारी दे कि वे अपने आस-पास शांति स्थापित करें, प्रशासन किसी भी स्थिति में अपने कर्तव्य मार्ग से विचलित न हो।

रही बात अयोध्या में मंदिर निर्माण की तो वह तो एक न एक दिन हो ही जायेगा कुछ और दशक बाद सही।

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