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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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बलबीर पुंज 

कमरतोड़ महंगाई और सरकारी तंत्र में सार्वजनिक धन की लूट-खसोट से ऊब चुकी देश की 121 करोड़ आबादी को बीते साल की आखिरी सौगात में धोखाधड़ी हाथ लगी। देश भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने के लिए एक सशक्त लोकपाल कानून पारित होने की आशा लगाए बैठा था, किंतु कांग्रेसनीत सरकार ने आधी रात को लोकतंत्र की हत्या कर दी। लोकसभा में पटखनी खा चुकी सरकार राज्यसभा में अपने अल्पमत को देखते हुए पहले से ही यह पटकथा लिख चुकी थी। परिणामस्वरूप लोकपाल बिल एक बार फिर लटक गया। यह देश के साथ विश्वासघात नहीं तो क्या है?

उत्तर प्रदेश के चुनाव सिर पर हैं और जनता की भावनाओं की अनदेखी करने वाली कांग्रेस अपने खोखले वायदों से मतदाताओं को लुभाने में व्यस्त है। प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी दस साल में उत्तर प्रदेश का कायापलट कर देने का दावा कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश क्या प्राय: पूरे भारत में प्रारंभिक चालीस वर्षों तक कांग्रेस का एकछत्र राज रहा है। इतनी लंबी अवधि में जब दलित-वंचित वर्ग का उत्थान नहीं कर पाए तो एक रात दलित की बस्ती में प्रायोजित पूरी-सब्जी खाने मात्र से उनका कल्याण हो जाएगा?

कांग्रेस अल्पसंख्यकों (केवल मुसलमानों) के विकास व उत्थान की चिंता में दुबली हुई जा रही है। मुसलमानों को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री से लेकर राहुल गांधी तक दो-तीन जुमले-सच्चर समिति, रंगनाथ मिश्र आयोग, प्रधानमंत्री पंद्रह सूत्रीय योजना और आरक्षण सबकी जुबान पर हैं। क्या आरक्षण की बैसाखी देकर मुसलमानों का उद्धार संभव है? अल्पसंख्यकों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थितियों पर सच्चर समिति द्वारा तैयार रिपोर्ट के आधार पर रंगनाथ मिश्र आयोग ने अल्पसंख्यकों के लिए 15 प्रतिशत आरक्षण की संस्तुति की है, जिसमें से 10 प्रतिशत अकेले मुसलमानों के लिए हैं।

अभी पिछले दिनों सरकार ने पिछड़े वर्ग के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत कोटे में से मात्र 4.2 प्रतिशत मुस्लिमों के लिए आरक्षित करने की घोषणा की है। यह क्या रेखांकित करता है? और क्या मजहब के आधार पर आरक्षण संविधान सम्मत है? आजाद भारत में संविधान निर्माताओं ने हाशिए पर खड़े समाज के संरक्षण और उसके उत्थान के लिए प्रावधान बनाए, किंतु संविधान सभा में जब मजहब पर आधारित आरक्षण की मांग उठी तो सात में से पांच मुस्लिम सदस्यों-मौलाना अबुल कलाम आजाद, मौलाना हिफजुर रहमान, बेगम ऐजाज रसूल, हुसैन भाई लालजी और तजामुल हुसैन ने इसका कड़ा विरोध करते हुए इसे राष्ट्रीय एकता-अखंडता के लिए खतरा बताया।

26 मई, 1949 को संविधान सभा में जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, यदि आप अल्पसंख्यकों को ढाल देना चाहते हैं तो वास्तव में आप उन्हें अलग-थलग करते हैं..हो सकता है कि आप उनकी रक्षा कर रहे हों, पर किस कीमत पर? ऐसा आप उन्हें मुख्यधारा से काटने की कीमत पर करेंगे। 27 जून, 1961 को जवाहर लाल नेहरू ने मजहब के आधार पर आरक्षण देने से रोकने के लिए राज्य सरकारों को भेजे पत्र में लिखा था, मैं किसी भी तरह के आरक्षण को नापसंद करता हूं। यदि हम मजहब या जाति आधारित आरक्षण की व्यवस्था करते हैं तो हम सक्षम और प्रतिभावान लोगों से वंचित हो दूसरे या तीसरे दर्जे के रह जाएंगे। जिस क्षण हम दूसरे दर्जे को प्रोत्साहन देंगे, हम चूक जाएंगे।.. यह न केवल मूर्खतापूर्ण है, बल्कि विपदा को आमंत्रण देना है।

आज उनका प्रपौत्र उनकी ही कर्मभूमि से अपने चुनाव प्रचार का प्रारंभ करते हुए मजहब के आधार पर मुसलमानों के लिए अलग से आरक्षण का वायदा करता है तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की पहल पर केंद्र की संप्रग सरकार भारतीय संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक होने का दावा करती हैं। आयोग दर आयोग मुसलमानों के उत्थान व कल्याण के लिए योजनाओं की सिफारिश की जाती है। सरकार उन पर अमल करने का वायदा करती है, किंतु यथार्थ क्या है? क्यों मुस्लिम पिछड़े हुए हैं? इसका उत्तर है कि जहां सेक्युलर दलों ने मुसलमानों के थोक वोट बैंक के लिए उन्हें मुख्यधारा से काटने का काम किया वहीं मुसलमानों ने भी इन सेक्युलर छलावों में ही अपना प्रभुत्व बनाए रखने का अवसर देखा है। पर सवाल यह है कि इसमें पिछड़े मुसलमान कहां खड़े हैं?

जब तक मुस्लिमों के पिछड़ेपन के वास्तविक कारणों का ईमानदारी पूर्वक निदान नहीं ढूंढा जाता, मुसलमानों को मुख्यधारा में लाना संभव नहीं है। मजहब के आधार पर आरक्षण का दुष्परिणाम यह होगा कि आरक्षण का लाभ मुस्लिम समुदाय का क्रीमी लेयर ही उठा ले जाएगा और वास्तविक पिछड़ा वर्ग हाशिए पर ही रह जाएगा। हालांकि मुसलमान लेखक और पंथनिरपेक्षी यह बात बहुत जोर देकर कहते हैं कि भारत में इस्लाम का प्रसार तलवार के बल पर नहीं, बल्कि उसके समतावादी चरित्र के कारण हुआ। यदि यह बात सत्य है तो एक समतावादी समाज और मजहब को मानने वाले लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था कैसे न्यायोचित ठहराई जा सकती है?

सच्चाई यह है कि मुसलमानों में चार मुख्य जातियां-अशरफ, अतरज, अजरब और अजलब विद्यमान हैं। इनमें अजरब और अजलब की आर्थिक दशा कमजोर है। अशिक्षा, बहुपत्नी विवाह, अनियंत्रित जनन दर आदि मुसलमानों की बुनियादी समस्याएं हैं। उन्हें दूर किए बगैर आरक्षण का झुनझुना दिखाना कांग्रेस की धोखेबाजी नहीं तो क्या है? अपना भविष्य खुद तय करने के लिए मुसलमानों को अपने हितों की चिंता करने के साथ-साथ सेक्युलर छलावों से अब तक मिले लाभों का भी हिसाब करना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं।)

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