लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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डा. राधे श्याम द्विवेदी
हाथी सिंह को पूछे ना कोई, दुर्बल को बलि दिया जाता ।
सांप विच्छू निर्भय विचरें, केचुआ कटियां लग जाती है।।
अहिंसा नीति को अपनाकर, भारत स्वयं कमजोर हुआ।
आतंकियों को पोषित करके, काश्मीर केराना बनाती है।।1।।

भगवा को आतंकवाद कह, हिन्दू तिरस्कृत किया जाता।
आक्रान्ताओं का हरा रंग, इस देश में पांव फैलाती है।।
हम अपना सनातन भूल चुके, भगवे को बदनाम किया।
त्याग तपस्या बलिदान वीरता, भगवा अब गिड़गिड़ाती है।।2।।

नीला आकाश प्रकृति का है, हरा को सब ने अपनाया ।
मूल चेतन आत्म रंग भगवा, ऋषियों मुनियों की थाती है।।
आध्यात्म परहित बलिदान परंपरा, भगवा से अभिव्यक्त हुआ ।
वीर सिक्खों के पताके में, भगवा का ही रंग लहराती है।।3।।

राष्ट्रीय ध्वज के शीर्ष में लगा, भगवा को आदर हमने दिया।
विदेशी हमले से ही आकरके, हरा रंग यहां फहराती है ।।
भारत का मूल स्वरूप चेतना, औ गरिमा को गिरा दिया।
हरा को बढ़ाचढ़ा करके, सभ्यता संस्कार धुलवाती है ।।4।।

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