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हृदयनारायण दीक्षित

सत्य सदा से है, सनातन है, चिरंतन है। गीता भारतीय अनुभूति का सत्यदर्शन है। पिछले सप्ताह (17 दिसम्बर) गीता जयंती के उल्लास थे। जयन्ती का मतलब जन्मतिथि नहीं होता। जयन्ती का जय सत्य की विजय है। तत्वबोध ही आनंदमगन विश्व की गारंटी है लेकिन विश्व तनावग्रस्त है। मनुष्य का वर्तमान ‘भविष्य तनाव’ में है। भारतीय अनुभूति में जीवन एक तीर्थ यात्रा है। तीर्थ यात्रा में धर्म, अर्थ, काम के साथ मोक्ष के भी आनंद होते हैं। पश्चिमी चिन्तन में जीवन एक संघर्ष है। पश्चिम का जीवन युध्दों का इतिहास है। इस युध्द का मूल अतिरिक्त भोग लिप्सा है। अतिरिक्त विलास की इच्छा है सो अतिरिक्त अर्थार्जन और अतिरिक्त उत्पादन की भागमभाग है। भारत का आधुनिक मन इसी तनाव का शिकार है। गीताकार की भविष्य दृष्टि सुस्पष्ट थी। गीता में आधुनिक समाज के मानसिक रोगों व विक्षिप्त मानसिकता के सहज उपचार हैं। गीता के रचनाकाल में ज्ञान-विज्ञान की साफ धाराएं थीं। योग विज्ञान की महत्ता थी, दर्शन की शिखर ऊचाइयां थीं। लेकिन तमाम संशय भी थे अनेक तरह के द्वन्द्व भी थे। गीता में सारे संशयों का स्पष्टीकरण है। द्वन्द्व से निर्द्वन्द्व चेतना की यात्रा है।

मनुष्य प्रकृति का अंश है। मनुष्य और प्रकृति की प्रीति ही संस्कृति है, मनुष्य और सूर्य की प्रीति गायत्री है लेकिन मनुष्य और सत्य की प्रीति गीता है। गीता जीवन रहस्यों की कुंजी है। गीता दर्शन में जीवन की छन्दबध्दता, लूय, सुर और समस्वरता की गारंटी है। जीवन की समस्वरता जरूरी है। वीणा के तार ज्यादा कसे होने पर छन्द नहीं देते। ज्यादा ढीले होने पर भी प्रीति सुर नहीं उगते। गीता का योग समरसता, समसुरता, समत्व प्रज्ञा का ही पर्यायवाची है। तब कंपन और अंकपन के बीच अनहदनाद उगता है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया – ”ज्यादा खाने वाले अथवा बिल्कुल न खाने वाले लोगों के लिए योग नहीं है। योग ज्यादा सोने वाले और बहुत अधिक जागने वालों के लिए भी नहीं है”। (गीता .6.16) गीता में भोजन और निद्रा जैसी रोजमर्रा की जिन्दगी से जुड़ी सामान्य बातों की भी महत्वपूर्ण चर्चा है। इसी श्लोक के बाद (6.17)’युक्ताहार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु’ वाला सुविख्यात श्लोक है अर्थात् आहार विहार का संयम जरूरी है। यहां दोनों का ठीक संतुलन बनाने के निर्देश हैं। कर्म और चेष्टाएं भी नियमबध्द रखने का उपदेश है। प्रश्न है कि यह नियम कौन बतायेगा? जीवन की समस्वरता स्वयं ही नियम खोलती है। पूरी प्रकृति लयबध्द, नियम आबध्द है। ‘ऋग्वेद’ के ऋषि ने इसी नियम को ‘ऋत’ कहा। मनुष्य प्रकृति का हिस्सा है तो मनुष्य को भी प्राकृतिक नियमों का पालन करना चाहिए।

गीताकार ने नियम के लिए बहुत खूबसूरत शब्द प्रयुक्त किया है – युक्त। कहते हैं आहार विहार युक्त हो, कर्मचेष्टाएं भी युक्त हों। श्लोक की दूसरी पंक्ति में कहते हैं – ‘युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवित दुखहा’। डॉ. राधाकृष्णन् का अनुवाद है, जिसकी निद्रा और जागरण नियमित है, उसमें एक ऐसा अनुशासन (योग) आ जाता है जो सब दुखों का नाश कर देता है। लेकिन मूल श्लोक में निद्रा – जागरण शब्द नहीं है, यहां ‘स्वप्नाबोधस्य’ शब्द आये हैं। विषयों से पृथक चेतना ही निद्रा है, जागरण इसका उल्टा है, तब व्यक्ति संसार से जुड़ जाता है। गीताकार ने स्वप्न और बोध शब्दों का प्रयोग किया है। स्वप्न सोते हुए देखे जाते हैं, जागते हुए भी देखे जाते हैं। कामनाएं ही स्वप्न संसार रचती हैं। स्वप्न गहन संसारी चेतना है। इसीलिए झूठा होने पर भी स्वप्न सदा सत्य रहने का आभास देता है। बोध आंतरिक जागरण है। तब कामनाओं का संसार नहीं होता है। गीताकार ने ‘स्वप्न और बोध’ जैसे शब्दों के जरिए एक खास संदेश दिया है। जीवन में स्वप्न की भी उपयोगिता है। दुनिया के सभी महान लोग स्वप्नदर्शी थे लेकिन बोध के कारण शिखर पुरूष बने।

कामनारहित चित्त ही गीता की मुख्य भूमि है। यही योग की भूमिका है। योग के लिए नियमबध्दता की अपरिहार्यता है। आगे कहते हैं, जब चित्त योग के अनुशासन में आत्मा में स्थित हो जाता है – ‘आत्मन्येवावतिष्ठते’, तब वह सभी प्रकार की कामनाओं से मुक्त हो जाता है और योग युक्त कहा जाता है – ‘युक्त इत्युच्यते तदा’। (वही 6.18) योग की शुरूवात में कामनाएं हैं, ऐषणाएं हैं। ज्यादा खाने, न खाने, ज्यादा सोने कम सोने और स्वप्न देखने या बोध में होने की अराजक अनुशासनहीनता है। लेकिन योग सिध्दि के बाद सारी आकांक्षाएं शून्य हो जाती हैं। गीता उंगली पकड़ कर धीरे-धीरे भोजन निद्रा, आदि की बातें सिखाती है और एक स्थिर चित्त की निर्मिति के उपाय बताती है। चित्त चंचल होता है। कंपन में होता है, चित्त का कंपन शरीर पर आता है, शरीर भी कंपन में होता है। अकंपित चित्त दर्पण होता है। शांत झील जैसा धीर, गंभीर। जैसे हम होते हैं, उसी की पारदर्शी प्रतिच्छाया देता है। योग अकंपित चित्त की लब्धि का मार्ग है।

दीपक प्रकाश उपकरण है। भारत का मन प्रकाश अभीप्सु है। प्रकाश ज्ञानवाची है ही। दीपक की ज्योति भी वायु के झोंकों में कांपती है। उसकी जिजिवीषा वायु थपेड़ों से जूझती है, ज्योति लहराती है, बड़ी होती है, कंपन के प्रभाव में कई दफा बुझने का आभास देती है, वायु का झोंका थमता है, ज्योति फिर से जल उठती है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, वायु रहित स्थान मे रखी दीप ज्योति नहीं हिलती, ठीक इसी प्रकार – सोपमा स्मृता, योगी आत्मा में ही स्थिर रहता है। (वही 6.19) दीपक के कम्पन का कारण वायु है। मनुष्य चित्त की चंचलता का कारण इच्छाएं हैं। इच्छा से कंपन है, इच्छा शून्यता से स्थिरिता है। योग चित्तवृत्ति के ही निरोध का पर्याय है। आगे यही बात और स्पष्ट करते हैं, योग सिध्द की अवस्था में चित्त की गतिविधियां शांत हो जाती हैं – ‘चित्तं निरूध्द योगसेवया’। (वही 6.20) चित्त प्रशांत हो जाता है, तब वह आत्मा के द्वारा आत्मा को देखता है, – ‘आत्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि’। वह इसी में आनंदित रहता है। (वही) यहां आत्मा से आत्मा देखने की बात मजेदार है। प्रशांत चित्त कामना रहित हो जाता है, व्यक्तिगत स्व सम्पूर्ण हो जाता है। सम्पूर्णता ही सम्पूर्णता को देखती है। योग सतत साधना है। ‘पतंजलि योग सूत्र’ में निरंतर अभ्यास पर जोर दिया गया है। चित्त की वृत्तियां अचानक शांत नहीं होती, यहां शनैः शनैः एक क्रमिक विकास होता है।

योग सिध्दि आह्लादकारी अनुभूति है। संसार तो भी रहता है, विषयों के आनंद भी रहते हैं लेकिन तब सुख और आनंद चयन की सुविधा होती है। सामान्य व्यक्ति विषयों से बंधा रहता है, वह मन के द्वारा संचालित होता है। वह स्वयं अपना स्वामी नहीं होता। लेकिन योगाभ्यास से प्रशांत हुआ स्व बुध्दि द्वारा ग्रहण किए जाने वाले इन्द्रिय सुख उठाता है, इन्द्रियों से परे परम आनंद को भी प्राप्त करता है और सत्य तत्व से कभी विचलित नहीं होता। (वही 6.21) तब योग साधक की दृष्टि बदल जाती है। लाभ हानि समझने की उसकी परिभाषा में भी बदलाव आते हैं। योग सिध्दि से प्राप्त आनंद ही उसे सबसे बड़ा लाभ दिखाई पड़ता है। श्रीकृष्ण कहते हैं इस आनंद की प्राप्ति से बड़ा कोई दूसरा लाभ नहीं होता – ‘यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः’। (वही 6.22) अंतर्तम की यही लब्धि सबसे बड़ा लाभ है अंतर्तम की ऐसी चित्तदशा पाकर वह बड़े से बड़े दुःखों में भी विचलित नहीं होता। भारतीय दर्शन का उद्देश्य दुख समाप्ति है लेकिन योग दर्शन के साथ-साथ विज्ञान भी है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा दुख-संयोग से वियोग (अलग हो जाने) ही योग है – ‘तं विद्याद् दुखसंयोग वियोगं योग संजिज्ञम’। इसका अभ्यास दृढ़ इच्छाशक्ति संकल्प और धीर चित्त द्वारा ही किया जाना चाहिए। (वही 6.23) योग विज्ञान में कहीं भी अंध आस्था नहीं है। विज्ञान और दर्शन की यात्रा में आस्था की कोई जरूरत भी नहीं होती लेकिन ‘विज्ञान और दर्शन’ के प्रति आस्था के अभाव में योग की यात्रा की शुरूवात भी नहीं होती। भारतीय दर्शन परम्परा में विद्या के प्रति आस्था जरूरी है, वही मुक्ति का मार्ग है – ‘सा विद्या या विमुक्तये’।

* लेखक उत्तर प्रदेश विधान परिषद् सदस्य हैं।

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