लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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indians britishभारत में शिक्षा पद्घति की प्रचलित परंपरा को बदलकर अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली को भारत में लागू कर अंग्रेज जाति के भारत में युग युगों तक शासन करने का सपना बुनने वाले लॉर्ड मैकाले ने जब इतिहास को थोड़ा दूर से देखा और उसका अंतिम समय आया तो उसे ‘सच का बोध हुआ’ और उसने कहा-मुझे विश्वास है कि सब प्रकार के अन्यायों में सबसे बुरा अन्याय एक जाति का दूसरी जाति पर शासन करना है। इसका अभिप्राय था कि लार्ड मैकाले को ये आत्मबोध हो गया था कि जिस धन संपदा के लिए लूटमार की, मारकाट की, वह राज्यैश्वर्य भोगकर भी छूटता जा रहा है, इसलिए जो भी अत्याचार किये गये वो निरर्थक ही थे। अत: भारतीयों पर अंग्रेज जाति का शासन उचित नही है।

अब अंग्रेजों की क्रूरता पर थोड़ा विचार करें। लखनऊ फतह के पश्चात की एक घटना देखिए। अंग्रेज इतिहासकार लिखता है ‘कुछ सिपाही अभी जीवित थे….। इनमें से एक को खींचकर मकान से बाहर एक रेतीले मैदान में लाया गया। उसे टांगों से पकड़कर खींचा गया, एक सुविधा की जगह लाया गया। कुछ अंग्रेज सिपाहियों ने उसके मुंह और शरीर में संगीनें भौंक कर उसे लटकाए रखा। दूसरे लोग एक छोटी सी चिता के लिए ईंधन जमा कर लाए, जब सब तैयार हो गया, तो उसे जिंदा भून दिया गया। इस काम को करने वाले अंग्रेज थे और कई अफसर खड़े देखते रहे किंतु किसी ने दखल न दिया। इस नारकीय अत्याचार की वीभत्सा उस समय और बढ़ गयी, जबकि उस अभागे दुखिए ने अधजली और जिंदा हालत में भागने का प्रयास किया। अचानक जोर लगाकर वह चिता से भाग उठा, उसके शरीर का मांस हड्डियों से लटक रहा था। वह कुछ गज दौड़ा फिर पकड़ लिया गया, वापस लाया गया, फिर आग पर रख दिया गया और जब तक राख नही हो गया, संगीनों से दबाकर रखा गया।’

1857 की क्रांति के समय अंग्रेजों ने जो अत्याचार भारतीयों पर ढाए उनके विषय में इतिहासकार सर जॉन लिखता है:-’(हमारे अधिकारी) बिना किसी तरह के मुकदमे का ढोंग रचे तथा बिना मर्द औरत या छोटे बड़े का विचार किये भारतवासियों का संहार कर रहे थे।’इसके बाद खून की प्यास और अधिक भड़की। भारत के गवर्नर जनरल ने जो पत्र इंगलिस्तान भेजे, उनमें हमारी ब्रिटिश पार्लियामेंट के कागजों में यह बात दर्ज है कि बूढ़ी औरतों तथा बच्चों का उसी तरह वध किया गया है, जिस तरह उन लोगों का, जो विप्लव के अपराधी थे। इन लोगों को बहुत बुरे ढंग से फांसी ही नही दी गयी बल्कि उन्हें गांव के अंदर जलाकर मार डाला गया, अंग्रेज बड़े गर्व से कहते थे कि हमने एक भी हिंदोस्तानी को नही छोड़ा और काले हिंदोस्तानियों को गोलियों से उड़ाने में हमें बड़ा मजा आता था।’

दिल्ली के अत्याचारों के विषय में लार्ड एलफिंसटन ने सर जॉन लॉरेंस को लिखा—

‘मोहसारे के खत्म होने के बाद हमारी सेना ने जो अत्याचार किये हैं उन्हें सुनकर हृदय फटने लगता है। बिना मित्र या शत्रु के भेद किये ये लोग सबसे एक सा बदला ले रहे हैं। लूट में तो सचमुच हम नादिरशाह से भी आगे बढ़ गये हैं। मांट गोमरी मार्टिन लिखता है-’जिस समय हमारी सेना ने नगर (दिल्ली) में प्रवेश किया तो जितने नगर निवासी शहर की दीवारों के भीतर पाये गये उन्हें उसी जगह जहां वे मिले संगीनों से मार डाला गया। आप समझ सकते हैं कि उनकी संख्या कितनी रही होगी, जब मैं आपको यह बताऊं कि एक एक मकान में चालीस चालीस और पचास पचास आदमी छिपे हुए थे। ये लोग विद्रोही नही थे, बल्कि शहरी थे, जिन्हें हमारी दयालुता और क्षमाशीलता पर विश्वास था। मुझे खुशी है कि उनका भ्रम दूर हो गया।’इस नरसंहार में दिल्ली में चारों ओर गिद्घ ही गिद्घ नजर आते थे। लॉर्ड रावर्ट्स लिखता है-’हम सुबह को लाहौरी दरवाजे से चांदनी चौक गये तो हमें शहर वास्तव में मुर्दों का शहर नजर आता था। कोई आवाज सिवाय हमारे घोड़ों की टापों के सुनाई नही देती थी। कोई जीवित मनुष्य नजर नही आया। हर तरफ मुर्दों का बिछौना बिछा हुआ था, जिनमें से कुछ मरने से पहले पड़े सिसक रहे थे।

हम चलते हुए बहुत धीरे धीरे बात करते थे, इस डर से कि कहीं हमारी आवाज से मुर्दे न चौंक पड़ें। एक ओर मुर्दों की लाशों को कुत्ते खा रहे थे और दूसरी ओर लाशों के आसपास गिद्घ जमा थे जो उनके मांस को नोंच नोंच कर स्वाद से खा रहे थे और हमारे चलने की आवाज से उड़ उड़कर थोड़ी दूर जा बैठते थे। सारांश ये है कि इन मुर्दों की हालत बयान नही हो सकती। जिस प्रकार हमें इन्हें देखने से डर लगता है उसी तरह हमारे घोड़े इन्हें देखकर डर से बिदकते थे और हिनहिनाते थे। लाशें पड़ी सड़ती थीं, उनके सडऩे से हवा में बीमारी फेेलने वाली दुर्गंध फैल रही थी।’

ख्वाजा हसन निजामी लिखते हैं-’दिल्ली शहर के बाहर इस तरह हजारों मर्द औरतें और बच्चे असहाय नंगेपांव, नंगे सिर, भूखे प्यासे फिर रहे थे। सैकड़ों बच्चे भूख, भूख चिल्लाते हुए माताओं की गोद में मर गये। सैकड़ों माताएं छोटे बच्चों का दुख न देख सकने के कारण उन्हें अकेला छोड़कर कुएं में डूब मरीं। शहर के अंदर हजारों औरतें ऐसी थीं कि जिस समय उन्होंने सुना कि कंपनी की फौज आ रही है तो बेइज्जती और मुसीबत से बचने के लिए कुओं में गिरने लगीं और इतनी अधिक गिरीं कि डूबने के लिए पानी नही रहा। अनेक कु एं लाशों से पट गये। सेना के अफसर का बयान है कि हमने इस तरह की सैकड़ों औरतों को कुओं से निकाला जो लाशों के ढेर के कारण डूबी न थीं और जिंदा पड़ी थीं या बैठी थीं। जिस समय हमने उन्हें निकालना चाहा, वे चीखने लगीं कि खुदा के लिए हमको हाथ न लगाओ और गोली से मार दो, हम शरीफ बहू बेटियां हैं, हमारी इज्जत खराब न करो।’दिल्ली में ऐसे भी लोग थे, जिनके घर की स्त्रियों की आबरू पर जिस समय हमला होने लगा, तो उन्होंने अपने हाथ से अपनी बहुओं और अपनी बेटियों को कत्ल कर दिया और फिर स्वयं आत्महत्या कर ली।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कैमरून भारत की यात्रा पर आये और अमृतसर जाकर 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के शहीदों को नमन किया। उन्होंने उस घटना को शर्मनाक बताया। हमने इतिहास में दर्ज अंग्रेजों की क्रूरता की झलक दिखाने के लिए इस लेख में उपरोक्त घटनाओं का उल्लेख किया है। इन तथ्यों के आलोक में जलियांवाला बाग हमारी शानदार बलिदानी परंपरा का प्रतीक है। यह उन अनेकों देशवासियों को मौन श्रद्घांजलि देता है जो अंग्रेजों की क्रूरतापूर्ण नीतियों की, भेंट चढ़ गये और जिनके लिए सचमुच आज तक न तो फूल चढ़े और न दीप जले। यद्यपि हमने शहीद दिवस 30 जनवरी घोषित किया है, लेकिन ये दिवस उन बलिदानियों का स्मारक नही है, जो हिंसा से मारे गये और अत्यंत निंदनीय और घृणित ढंग से जिन्हें अंग्रेजों ने समाप्त किया। उनकी समाधि तो जलियांवाला बाग ही हो सकती है, क्योंकि यह बाग साथ साथ अंग्रेजों की क्रूरता की कब्रगाह भी है। कैमरून एक अच्छी भावना से भारत आए, हम उनका स्वागत करते हैं, उन्होंने अंग्रेजी शासन की क्रूरताओं के लिए अफसोस व्यक्त किया और भी अच्छी बात है। उन्होंने इतिहास के अतीत को थोड़ी दूरी से देखा और उसमें अपनी भूमिका को सहज ही स्वीकार किया कि कहीं न कहीं वह गलत थे, तो ये आत्म स्वीकारोक्ति अप्रत्यक्ष रूप से हमारी बलिदानी परंपरा की पुष्टि है। इससे उन अनेकों नाम अनाम हुतात्माओं की आत्मा को शांति मिली है जिनके लिए हमने आज तक कोई दीप नही जलाया और जिन पर आज तक कोई फूल नही चढ़ाया। वफा की शुरूआत बेवफाओं से हुई यह दुख की बात है। वफादारी तो हमें दिखानी चाहिए थी। हम सोये रहे और वीरों की वीरता का बखान तक नही कर सके जबकि एक बेवफा लोगों का वंशज आया और अफसोस व्यक्त कर बहादुरों को सलाम ठोंक कर और हमें शर्मिंदा करके चला गया।

घटनाओं के लिए अपराध बोध से भर जाना भी स्वयं को पाप से मुक्त कराने के समान होता है। लेकिन साथ ही यह भी याद रखना चाहिए कि घटनाओं को एकदम भुला देना या उन्हें इतिहास के कूड़ेदान में फेंके रखना अपराध पर अपराध करने की पापवृत्ति की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। कैमरून तो संभवत: पाक साफ हो गये लेकिन हम कहां खड़े हैं हमें भी कुछ करना चाहिए। इतिहास की क्रूरता समाधि चाहती है, जो लोग राष्ट्रवेदी के लिए समिधा बन गये या बना दिये गये उनके सत्कृत्यों को वंदन करना प्रत्येक राष्ट्रवासी का पुनीत कत्र्तव्य होता है। क्योंकि उन्होंने जो कुछ भी किया था वह हमारी भलाई के लिए किया था हम उनकी सड़ती लाशों की सड़ांध को कब तक हवा में ही रहने देंगे? समय जवाब मांग रहा है। अभी हमने अपने इतिहास को भी स्मारक नही बनाया है। उसके पन्नों पर खून के छींटे लगे हैं। भटकती हुतात्माओं की शांति के लिए फिर एक भागीरथी चाहिए और फिर एक भागीरथ चाहिए। जब कैमरून लंदन से आकर बीते काल की घृणास्पद घटनाओं पर अफसोस व्यक्त कर सकते हैं तो हमें भी जागना होगा। कैमरून काले अध्यायों पर अफसोस व्यक्त कर गये और हम हैं कि स्वर्णिम पृष्ठों को भी छिपाए बैठे हैं, मुट्ठी नही खोल रहे, यद्यपि हमें पता है कि हमारी मुठ्ठी में हीरा है। यह हिंचक उचित नही। कैमरून सचमुच एक अच्छे मेहमान के रूप में आए और एक शिक्षा देकर चले गये। उनकी मेहमान नवाजी के बाद अब हम उनकी शिक्षा पर ध्यान दें।

इत्योम शम:।

 

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