लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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notocorruptionकलयुग में एक मुस्लिम फ़कीर अपनी दुआ बिना कैश और काइंड लिये हुए राहगीरों को अता फ़रमा रहा है-अल्लाह आपकी नाज़ायज़ तमन्नाओं को पूरा करे। अल्लाह आपको ज़कात और ख़ैरात देने के काबिल बनाये। अल्लाह आपको हाज़ी-नमाज़ी और पाज़ी बनाये। अल्लाह आपको कोड़ा की सोहबत में रखे। अल्लाह आपको अच्छी कंपनियों के खाते अता फ़रमाये। अल्लाह आपको दीपावली में ढेर सारे तोहफ़े अता फ़रमाये। अल्लाह आपको ऐसी सलाहितों से नवाज़े, जिससे आप मोमेन्टो लेने के काबिल बन सकें। अल्लाह आपको कुत्तों की तरह दुम हिलाने से बचाये। अल्लाह आपको सफेदपोश फ़कीर न बनाये। अल्लाह आपको भीगी बिल्ली बनने का मौका न दे। अल्लाह आपको तहसीलदार, कलेक्टर या फिर नेता बनाये।

फ़कीर की कुछ नाज़ायज़ दुआओं को दीपावली के एक सप्ताह पूर्व भगवान ई. सी या बोर्ड की मीटिंग में बिना सेवा शुल्क लिये पास कर देते हैं, लेकिन ज़ायज़ दुआओं को तत्काल प्रभाव से ख़ारिज़ कर देते हैं। पूरा माहौल अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी, टके सेर ख़ाजा” का है।

नाज़ायज़ दुआओं के पास होते ही बडे व्यापारियों से संबंध रखने वालों की बाँछें खिल उठती हैं। खासकरके कारपोरेट लोन देने वाले बैंक कर्मचारियों की। बैंकों के वाणिज्यिक शाखाओं में भी चहल-पहल बढ़ जाती है।

मेरी तैनाती डेस्क ऑफिसर के रुप में दीपावली के एक-दो महीने पहले बैंक के दिल्ली स्थित एक वाणिज्यिक शाखा में होती है। मैं एक शातिर से दिखने वाले पुराने डेस्क ऑफ़िसर से दीपावली के कारण बदले माहौल के बारे में दरियाफ्त करता हँ- सभी कर्मचारियों और अधिकारियों के चेहेरे पर आज़कल इतनी चमक क्यों है? मेरे प्रश्‍न पूछने के अंदाज़ से ही शातिर डेस्क ऑफ़िसर झट से ताड़ जाता है कि मैं भी उसी की बिरादरी का हूँ। यद्यपि मैंने भरपूर कोशिश की मेरी कमीनगी मेरे चेहरे पर दृष्टिगोचर न हो, किन्तु एक कमीने ने दूसरे कमीने को पहचानने में तनिक भी गलती नहीं की। उसने मुझसे बोला, भाई साहब, आप क्या जानना चाहते हैं, मैं अच्छी तरह से समझ गया हूँ?

आपका इशारा पुष्‍पम-प्रत्रम की तरफ़ है न! अगर ऐसा है तो आपका अंदाज़ा सोलहों आना सही है। दीपावली इस शाखा में तोहफ़ों का ऐसा मौसम है, जिसपर ग्रीन हाउस गैसों का भी असर बेअसर है।

मैं थोड़ी देर के लिए प्रभा खेतान के उपन्यास ”पीली ऑंधी” के कथा-संसार में डूब गया और उस मारवाड़ी व्यापारी पात्र को याद करने लगा जो अपने काम को अमलीज़ामा पहनाने के लिये 5 से 25 फ़ीसद तक कमीषन तोहफे में दे देता था। मुझे ”नमक का दारोगा” का वह पात्र भी याद आने लगा, जो तनख्वाह को दूज़ का चाँद समझता था और रिष्वत को बहती गंगा।

काश! मेरी इस नाज़ायज़ तमन्ना को अल्लाह-ताला पूरा करके उस फ़कीर की दुआ को सच साबित कर देते। मेरी कुछ ऐसी ही मन:स्थिति उस वक्त थी। फ़िर भी बड़ी मुश्किल से अपनी खुशी को ज़ज्ब करके मैंने उस घाघ डेस्क ऑफ़िसर से पुनश्‍च: पूछा-किस तरह का तोहफ़ा मिलता है? देखो, शासकीय कर्मचारियों जैसे जलवे तो यहाँ नहीं रहते, फिर भी अंधे को यदि बटेर मिल जाये तो क्या बुराई है।

यहाँ तोहफ़े खातों के हिसाब से मिलते हैं। अगर तुम्हारे पास बड़ी निजी कंपनियों के ख़ाते हैं तो तुम्हें कीमती तोहफ़े मिल सकते हैं। अन्यथा तुम्हें पेन-पेंसिल, मिक्सचर, बिस्किट से ही काम चलाना पड़ेगा।

पिछले साल एक डेस्क ऑफ़िसर कम तोहफ़ा मिलने के कारण दु:खी होकर हाइपर टेंशन का शिकार हो गया था। बड़ी मुश्किल से उसकी हालत सामान्य हो पाई थी। इसलिए अगर तुम्हारे साथ ऐसा होता है तो तुम नर्वस नहीं होना। अगले साल के दीपावली तक खुदा तुम पर अपनी नज़रें इनायत कर सकता है।

अरे यार ! तुम मुझे इस तरह से डरा क्यों रहे हो? डरा नहीं रहा हूँ, वरन् आगाह कर रहा हूँ। तुम्हारे पास सरकारी कंपनियों के खाते हैं। सरकारी कंपनियाँ बैंकवालों को तोहफे नहीं देती हैं, बल्कि उनसे उलटे तोहफे लेती हैं। तुम्हें मोमेन्टो देने के लिए स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड या एन.सी.डी.सी जाना पड़ सकता है। मोमेन्टो क्या होता है यार? तुम एकदम गधे हो क्या? बैंक के अधिकारी सरकारी कंपनी के चेयरमेन को तोहफा सीधे तौर पर थोड़े न दे सकते हैं, उन्हें तोहफे को मोमेन्टो बताना पड़ता है।

ज्यादा दुख़ी मत होना, यहाँ कुछ ऐसे भी डेस्क ऑफिसर हैं ज़िनको इतना तोहफ़ा मिलता है कि उन्हें घर से जूट की बोरी और रस्सी लेकर आना पड़ता है। चपरासी को दीपावली के 15 दिन पहले से ही खिला-पिलाकर वे पटा लेते हैं। ताकि उनका तोहफ़ा सही-सलामत उनके घर पहुँच जाये।

टुच्ची कंपनियाँ आटा-दाल, मसाला, तेल, मैदा, सूजी इत्यादि देकर ही अपना काम चलाती है। ऐसी कंपनियों की प्राईसिंग फ़ाइन नहीं होती है। इस तरह की कपनियाँ बैंक को 11 से 15 फ़ीसद तक ब्याज देती हैं। इन्हें हर तरह की छूट से महरुम रखा जाता है। बावजूद इसके इनके काम में अनावश्‍यक रुप से देरी न हो, इसके लिए ये साबुन-क्रीम तोहफे में देने के लिए विवश हो जाते हैं।

अच्छी कंपनियाँ आपको घड़ी, गोल्ड चेन, अमेरिकन टूरिस्ट के बड़े बैग, चाँदी के टी-सेट इत्यादि दे सकती हैं। इन कंपनियों की प्राईसिंग फ़ाइनर होती है। इन कंपनियों पर बैंक हमेशा मेहरबान रहती है। इन कंपनियों के लोन खातों में अप-फ्रन्ट फी, प्रोसेसिंग फी इत्यादि बैंक माफ कर देती है।

तोहफों की शृंखला में ”संपत्ति प्रबंधन दल” (ए एम टी ) का मुखिया, बड़ा अधिकारी होने के नाते हमेशा अगली पादान पर रहता है। इनको कंपनी एन. पी. ए तोहफे देने की हिमाकत नहीं कर सकती। इनको हर किस्म के महंगे तोहफे दिये जाते हैं। मुम्बई में तो तोहफे में इन्हें लाखों की नगदी मिलती है। इतना ही नहीं प्रशिक्षु अधिकारियों तक की बोली हजारों में लगती है। पर दिल्ली में काइंड ज्यादा चलन में है। मोबाईल वाउचर से लेकर आपके बेटे-बहु या बेटी-दामाद के लिए हनीमून के पैकेज का इंतज़ाम भी कंपनी वाले कर सकते हैं। रिटायरमेंट के बाद आपकी कंपनी में नौकरी की व्यवस्था भी दीपावली के तोहफे के दायरे में रहकर किया जा सकता है।

इन बड़े अधिकारियों को दीपावली के बाद भी तोहफे मिलते रहते हैं। उनकी चमड़ी इतनी मोटी रहती है कि वे दीपावली के बाद आने वाले तोहफों को सार्वजनिक रुप से रिष्वत की संज्ञा तो जरुर देते हैं। फिर भी वे उसे लेने से नहीं हिचकते हैं।

जय हो लक्ष्मी मैया की। उनकी महिमा अतुलनीय है। लक्ष्मी मैया की ऐसी महिमा की बारिष सभी गरीबों पर होनी चाहिए। भारत के गरीबों का बेड़ा पार लक्ष्मी मैया ही कर सकती हैं। हे मैया, अगली दीपावली तक मुझे एन.सी.डी.सी का वित्तीय सलाहकार बना देना ताकि कोई बैंक वाला मुझे भी मोमेन्टो तोहफे में देने पर मज़बूर हो जाये।

-सतीश सिंह

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