Archive for the Category ‘कविता’
सुदर्शन ‘प्रियदर्शिनी’ की पांच कविताएं
औल
कल मेरी
औल
कट जायेगी
इतने बरसों बाद।
जब मिट्टी
से टूटता
है कोई
तो औल
कटती है
बार बार।
कल मै बनूँगी
नागरिक
इस देश की
जिस को
पाया मैने
सायास
पर खोया है
सब कुछ आज
अनायास़।
कल मेरी
औल कटेगी
भटकन
इतना
मायावी
तांत्रिक जाल
इतना भक भक
उजाला
इतना भास्कर
देय तेज
इतनी भयावह
हरियाली
इतना ताम - झाम
इतने मुहँ बाये
खडे सगे संबधी
पहले से ही
तय रास्ते
पगडडियां
और छोड देता
है वह नियन्ता
हमें सूरदास
की तरह
राह टटोलने।
भय
अक्सर
जिंदगी में
कट पिट
कर
छिटपुट
खुशियां आती ...नज़्म/ मेरे महबूब
मेरे महबूब !
उम्र की
तपती दोपहरी में
घने दरख्त की
छांव हो तुम
सुलगती हुई
शब की तन्हाई में
दूधिया चांदनी की
ठंडक हो तुम
ज़िन्दगी के
बंजर सहरा में
आबे-ज़मज़म का
बहता दरिया हो तुम
मैं
सदियों की
प्यासी धरती हूं
बरसता-भीगता
सावन हो तुम
मुझ जोगन के
मन-मंदिर में बसी
मूरत हो तुम
मेरे महबूब
मेरे ताबिन्दा ख्यालों में
कभी देखो
सरापा अपना
मैंने
दुनिया से छुपकर
बरसों
तुम्हारी परस्तिश की है...
-फ़िरदौस ख़ान नववर्ष पर तीन कविताएँ
नववर्ष से
तुम
एक बार फिर
वैसे ही आ गए
और मैं
एक बार फिर
वैसे ही
तुम्हारे सामने हूँ
हमेशा की तरह
अपने साथ
आशाओं के दीप
ले आये हो तुम
हौले-हौले
मेरे पास
अपने भीतर की
तमाम उर्जा
इकठ्ठा कर
पुन:
चल दूँगा
मैं भी
तुम्हारे साथ
2
नववर्ष में
मैं
हर नववर्ष में
बुनता हूँ सपने
किसी सुकुमार सपने की तरह
फिर भी
रह जाता है वह
सपना बनकर
हर पल
टूटता है वह
मैं
इसी उधेड़बुन में रहता हँ
शायद ...पाँच प्रेम कविताएँ
1
इंतजार
मैं तो भेजता रहूँगा
हमेशा उसको
'ढाई आखर' से पगे खत
अपने पीड़ादायक क्षणों से
कुछ पल चुराकर
उन्हें कलमबद्ध करता ही रहूँगा
कविताओं और कहानियों में
मैं सहेज कर रखूँगा
सर्वदा उन पलों को
जब आखिरी बार
उसने अपने पूरेपन से
समेट लिया था अपने में मुझे
और दूर कहीं
हमारे मिलन की खुशी में
चहचहाने लगी थी चिड़ियाएं
ऐसा नहीं है कि
मैं भूलने ...कविता / मेरा मन
ई मेल के जमाने में
पता नहीं क्यों
आज भी मेरा मन
ख़त लिखने को करता है।
मेरा मन
आज भी
ई टिकट की जगह
लाईन में लग कर
रेल का आरक्षण
करवाने को करता है।
पर्व-त्योहारों के संक्रमण के दौर में
मेरा मन
बच्चों की तरह
गोल-गप्पे खाने
को करता है।
फोन से तो
मैं हमेशा डरा रहता हूँ
पता नहीं
कौन, कब
कौन सी
खबर सुना दे
...सतीश सिंह की पाँच प्रेम कविताएं
1-
चुपके से
मैं तो चाहता था
सदा शिशु बना रहना
इसीलिए
मैंने कभी नहीं बुलाया
जवानी को
फिर भी
वह चली आई
चुपके से
जैसे
चला आता है प्रेम
हमारे जीवन में
अनजाने ही
चुपके से।
------------
2.
याद
वैशाख के दोपहर में
इस तरह कभी छांह नहीं आती
प्यासी धरती की प्यास बुझाने
न ही आते हैं इस तरह शीतल फुहारों के साथ मेघ
इस तरह शमशान में शांति भी ...सतीश सिंह की कविताएं
आम आदमी
राहु और केतु के पाश में
जकड़ा रहता है हमेशा
कभी नहीं मिल पाता
अपनी मंज़िल से
भीड़ में भी रहता है
नितांत अकेला
भूल से भी साहस नहीं कर पाता है
ख्वाब देखने की
संगीत की सुरीली लहरियां
लगती है उसे बेसूरी
हर रास्ते में ढूंढता है
अपने जीवन का फ़लसफ़ा
खड़ी फसल नहीं दिखा पाती है
उसे जीवन का सौंदर्य
वैराग्य ...अवमूल्यन : कविता – सतीश सिंह
पता नहीं
कब और कैसे
धूल और धुएं
से ढक गया आसमान
सागर में मिलने से पहले ही
एक बेनाम नदी सूख़ गई
एक मासूम बच्चे पर
छोटी बच्ची के साथ
बलात्कार करने का
आरोप है
स्तब्ध
हूँ
खून के इल्ज़ाम में
गिरफ्तार
बच्चे की ख़बर सुनकर
इस धुंधली सी फ़िज़ा में
सितारों से आगे की
सोच रखनेवाला
एक होनहार छात्र
बम विस्फ़ोट में
मारा गया
घर के सामने वाला
अंतिम ज़मीन ...पाती : कविता – सतीश सिंह
पाती
मोबाईल और इंटरनेट
के ज़माने में
भले ही
हमें नहीं याद आती है
पाती
पर आज़ भी
विस्तृत फ़लक
सहेजे-समेटे है
इसका जीवन-संसार
इसके जीवन-संसार में
हमारा जीवन
कभी
पहली बारिश के बाद
सोंधी-सोंधी
मिट्टी की ख़ुशबू
की तरह
फ़िज़ा में रच-बस जाता है
तो कभी
नदी के
दो किनारों की तरह
एक-दूसरे से जुड़कर भी
अलग-अलग रहने के लिए
मज़बूर हो जाता है
कभी
बर्तन से छिटक कर
तड़पती मीन
की तरह
अंतिम सांसे
गिनता रहता है
तो ...प्रोफेशनल
कुछ भी
दिल से
नहीं लगाते
इसलिए
हैं अपने काम के प्रति
बहुत ही
प्रतिबध्द।
लक्ष्य प्राप्त करने के लिए
किसी भी हद को
पार कर सकते हैं।
इन्हें गलती से लौटाए
ज्यादा पैसे रखने में
कोई गुरेज़ नहीं।
बेशर्मी से
चार लोगों के बीच
अकेले चाय पी सकते हैं।
मांग सकते हैं
दूसरों की तंगी में भी
अपना दिया उधार।
दूसरों से मांग कर
अख़बार पढ़ना, खाना खाना
या फिर ...










