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मैं होली हूँ – सतीश सिंह

मैं होली हूँ - सतीश सिंह सदियों से मैं खुशियों की तस्वीर होली हूँ . अमराई की खुशबू हूँ, सबके दिल की धड़कन हूँ . रंगों का त्यौहार हूँ जो रंगों से कतराए उसके लिए शैतान हूँ जीवन के सफ़र में मैं बरगद की छावं हूँ अमराई की खुशबू हूँ, सबके दिल की धड़कन हूँ . फागुन की मेहरबानियाँ कछुए भी खरगोश हो गए जनमानस ...

February 28th, 2010 | लेखक : सतीश सिंह | 271 views | 1 Comment »
Posted in Category: कविता | Tags: Holi, Satish Singh, मैं होली हूँ, सतीश सिंह, होली

राकेश उपाध्‍याय की दो कविताएं

राकेश उपाध्‍याय की दो कविताएं 1.ईश्वरत्व के नाते मैंने नाता तुमसे जोड़ा... कल मैंने देखा था तुम्हारी आंखों में प्यार का लहराता समंदर उफ् कि मैं इन लहरों को छू नहीं सकता, पास जा नहीं सकता।। कभी-कभी लगता हैं कि इंसान कितना बेबस और लाचार है सोचता है मन कि आखिर क्यों बढ़ना है आगे, लेकिन ...

February 25th, 2010 | लेखक : राकेश उपाध्याय | 305 views | 3 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Love, प्रेम

कविता : अब हैरान हूँ मैं ….

कविता : अब हैरान हूँ मैं .... जीवन की इस भीड़ भरी महफ़िल में, एक ठहरा हुआ सा वीरान हूँ मै, क्यों आते हो मेरे यादों के मायूस खंडहरों में , अब चले जाओ बड़ा परेशान हूँ मै ... तुमसे मिलकर ही सजोयी थी चंद खुशियाँ मैंने, पर तुम्हें समझ ना पाया ऐसा अनजान हूँ मैं, बड़ा मासूम बनकर उस दिन जो ...

February 12th, 2010 | लेखक : शिवानंद द्विवेदी | 309 views | 2 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem

कविता : मेरी माँ …

कविता : मेरी माँ ... आज फिर अल्लसुबह उसी तुलसी के विरवा के पास केले के झुरमुटों के नीचे पीताम्बर ओढ़े वो औरत नित्य की भांति दियना जला रही थी ! मै मिचकती आँखों से उसे देखने में रत था , वो साधना वो योग वो ध्यान वो तपस्या, उस देवी के दृढ संकल्प के आगे नतमस्तक थे ! वो नित्य अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग थी और मैं अनभिज्ञ अपनी ...

February 9th, 2010 | लेखक : शिवानंद द्विवेदी | 3,505 views | 6 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Maa, मां

रंगीन पतंगें

रंगीन पतंगें अच्‍छी लगती थीं वो सब रंगीन पतंगें काली नीली पीली भूरी लाल पतंगें कुछ सजी हुई सी मेलों में कुछ टंगी हुई बाज़ारों में कुछ फंसी हुई सी तारों में कुछ उलझी नीम की डालों में उस नील गगन की छाओं में सावन की मस्‍त बहारों में कुछ कटी हुई कुछ लुटी हुई पर थीं सब ...

February 8th, 2010 | लेखक : ए. आर. अल्वी | 254 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Kites, पतंग

ए. आर. अल्वी की कविता: गांधी की आवाज़

ए. आर. अल्वी की कविता: गांधी की आवाज़ फिर किसी आवाज़ ने इस बार पुकारा मुझको खौफ़ और दर्द ने क्‍योंकर यूं  झिंझोड़ा मुझको मैं तो सोया हुआ था ख़ाक के उस बिस्‍तर पर जिस पर हर जिस्‍म नयीं ज़िन्दगी ले लेता है बस ख़्यालों में नहीं अस्‍ल में सो लेता है आंख खुलते ही एक मौत का मातम देखा अपने ही शहर ...

January 29th, 2010 | लेखक : ए. आर. अल्वी | 243 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Mahatma Gandhi, ए. आर. अल्वी, कविता, गांधी की आवाज़, महात्‍मा गांधी

मत आना लौट कर

मत आना लौट कर मत आना इस धरा पर तुम लौट कर, इस विश्वास के साथ कि तुम्हारे तीनों साथी अब भी बैठे होंगे, कान आंख और मुंह बंद कर बुरा ना सुनने, देखने और कहने के लिए, मत आना तुम इस धरा पर लौट कर इस आशा के साथ कि तुम्हारी लाठी अब ...

January 28th, 2010 | लेखक : केशव आचार्य | 243 views | 3 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem, कविता

कविता: जंगल का ‘गणतन्त्र’

कविता: जंगल का ‘गणतन्त्र’ लेखक एवं पत्रकार राकेश उपाध्याय स्फुट कविताएं भी लिखते रहते हैं। उनकी कविताएं पूर्व में प्रवक्ता वेब पर प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रवक्ता के लिए उन्होंने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर एक खास व्यंग्यात्मक कविता रची है। इसे हम अपने पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा है ...

January 27th, 2010 | लेखक : राकेश उपाध्याय | 464 views | 4 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Independence Day, कविता, गणतंत्र दिवस

मां शारदे मुझे सिखाती

मां शारदे मुझे सिखाती दौर नया है युग नया है हानि-लाभ की जुगत में चारों ओर मची है आपाधापी मां शारदे मुझे सिखाती तर्जनी पर गिनती का स्‍वर न काफी भारत की थाती का ज्ञान न काफी सिर्फ अपना गुणगान न काफी मां शारदे मुझे सिखाती नवसृजन की भाषा सीखो मानव मुक्ति का ककहरा सीखो भव बंधन के बीच चलना सीखो मां शारदे ...

January 20th, 2010 | लेखक : स्मिता | 258 views | 2 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem, कविता, मां शारदे

सुदर्शन ‘प्रियदर्शिनी’ की पांच कविताएं

सुदर्शन ‘प्रियदर्शिनी’ की पांच कविताएं औल कल मेरी औल कट जायेगी इतने बरसों बाद। जब मिट्टी से टूटता है कोई तो औल कटती है बार बार। कल मै बनूँगी नागरिक इस देश की जिस को पाया मैने सायास पर खोया है सब कुछ आज अनायास़। कल मेरी औल कटेगी  भटकन इतना मायावी तांत्रिक जाल इतना भक भक उजाला इतना भास्कर देय तेज इतनी भयावह हरियाली इतना ताम - झाम इतने मुहँ बाये खडे सगे संबधी पहले से ही तय रास्ते पगडडियां और छोड देता है वह नियन्ता हमें सूरदास की तरह राह टटोलने।   भय अक्सर जिंदगी में कट पिट कर छिटपुट खुशियां आती ...

January 16th, 2010 | लेखक : सुदर्शन प्रियदर्शनी | 199 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: कविताएँ, प्रियदर्शनी, सुदर्शन

नज़्म/ मेरे महबूब

 नज़्म/ मेरे महबूब मेरे महबूब ! उम्र की तपती दोपहरी में घने दरख्त की छांव हो तुम सुलगती हुई शब की तन्हाई में दूधिया चांदनी की ठंडक हो तुम ज़िन्दगी के बंजर सहरा में आबे-ज़मज़म का बहता दरिया हो तुम मैं सदियों की प्यासी धरती हूं बरसता-भीगता सावन हो तुम मुझ जोगन के मन-मंदिर में बसी मूरत हो तुम मेरे महबूब मेरे ताबिन्दा ख्यालों में कभी देखो सरापा अपना मैंने दुनिया से छुपकर बरसों तुम्हारी परस्तिश की है... -फ़िरदौस ख़ान

January 2nd, 2010 | लेखक : फ़िरदौस ख़ान | 225 views | 2 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: नज़्म

नववर्ष पर तीन कविताएँ

नववर्ष पर तीन कविताएँ नववर्ष से तुम एक बार फिर वैसे ही आ गए और मैं एक बार फिर वैसे ही तुम्हारे सामने हूँ हमेशा की तरह अपने साथ आशाओं के दीप ले आये हो तुम हौले-हौले मेरे पास अपने भीतर की तमाम उर्जा इकठ्ठा कर पुन: चल दूँगा मैं भी तुम्हारे साथ 2 नववर्ष में मैं हर नववर्ष में बुनता हूँ सपने किसी सुकुमार सपने की तरह फिर भी रह जाता है वह सपना बनकर हर पल टूटता है वह मैं इसी उधेड़बुन में रहता हँ शायद ...

December 30th, 2009 | लेखक : सतीश सिंह | 548 views | 2 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: New Year, नव वर्ष

पाँच प्रेम कविताएँ

पाँच प्रेम कविताएँ 1 इंतजार मैं तो भेजता रहूँगा हमेशा उसको 'ढाई आखर' से पगे खत अपने पीड़ादायक क्षणों से कुछ पल चुराकर उन्हें कलमबद्ध करता ही रहूँगा कविताओं और कहानियों में मैं सहेज कर रखूँगा सर्वदा उन पलों को जब आखिरी बार उसने अपने पूरेपन से समेट लिया था अपने में मुझे और दूर कहीं हमारे मिलन की खुशी में चहचहाने लगी थी चिड़ियाएं ऐसा नहीं है कि मैं भूलने ...

December 26th, 2009 | लेखक : सतीश सिंह | 5,335 views | 8 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Love poem, प्रेम कविता

कविता / मेरा मन

कविता / मेरा मन ई मेल के जमाने में पता नहीं क्यों आज भी मेरा मन ख़त लिखने को करता है। मेरा मन आज भी ई टिकट की जगह लाईन में लग कर रेल का आरक्षण करवाने को करता है। पर्व-त्योहारों के संक्रमण के दौर में मेरा मन बच्चों की तरह गोल-गप्पे खाने को करता है। फोन से तो मैं हमेशा डरा रहता हूँ पता नहीं कौन, कब कौन सी खबर सुना दे ...

December 13th, 2009 | लेखक : सतीश सिंह | 266 views | 3 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem, कविता

सतीश सिंह की पाँच प्रेम कविताएं

सतीश सिंह की पाँच प्रेम कविताएं 1- चुपके से मैं तो चाहता था सदा शिशु बना रहना इसीलिए मैंने कभी नहीं बुलाया जवानी को फिर भी वह चली आई चुपके से जैसे चला आता है प्रेम हमारे जीवन में अनजाने ही चुपके से। ------------ 2. याद वैशाख के दोपहर में इस तरह कभी छांह नहीं आती प्यासी धरती की प्यास बुझाने न ही आते हैं इस तरह शीतल फुहारों के साथ मेघ इस तरह शमशान में शांति भी ...

December 5th, 2009 | लेखक : सतीश सिंह | 374 views | 3 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Love Poems, प्रेम कविताएं

सतीश सिंह की कविताएं

सतीश सिंह की कविताएं आम आदमी   राहु और केतु के पाश में जकड़ा रहता है हमेशा   कभी नहीं मिल पाता अपनी मंज़िल से   भीड़ में भी रहता है नितांत अकेला   भूल से भी साहस नहीं कर पाता है ख्वाब देखने की   संगीत की सुरीली लहरियां लगती है उसे बेसूरी   हर रास्ते में ढूंढता है अपने जीवन का फ़लसफ़ा   खड़ी फसल नहीं दिखा पाती है उसे जीवन का सौंदर्य   वैराग्य ...

November 30th, 2009 | लेखक : सतीश सिंह | 153 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Satish Singh poem, सतीश सिंह

भष्ट्राचार की कहानी : कविता – सतीश सिंह

भष्ट्राचार की कहानी : कविता - सतीश सिंह भष्ट्राचार की कहानी  लिख दो  इतिहास के पन्नों पर कोड़ा के भष्ट्राचार की कहानी   भर दो उसमें गरीबों के खून की स्याही   ताकि सदियों तक   पढ़ा जा सके आज के इतिहास में  मूल्यों से बेवफाई।

November 10th, 2009 | लेखक : सतीश सिंह | 285 views | 1 Comment »
Posted in Category: कविता | Tags: Poems, Satish Singh, कविता, भष्ट्राचार, भष्ट्राचार की कहानी, सतीश सिंह

अवमूल्यन : कविता – सतीश सिंह

अवमूल्यन : कविता - सतीश सिंह पता नहीं कब और कैसे धूल और धुएं से ढक गया आसमान सागर में मिलने से पहले ही एक बेनाम नदी सूख़ गई एक मासूम बच्चे पर छोटी बच्ची के साथ बलात्कार करने का आरोप है स्तब्ध हूँ खून के इल्ज़ाम में गिरफ्तार बच्चे की ख़बर सुनकर इस धुंधली सी फ़िज़ा में सितारों से आगे की सोच रखनेवाला एक होनहार छात्र बम विस्फ़ोट में मारा गया घर के सामने वाला अंतिम ज़मीन ...

November 9th, 2009 | लेखक : सतीश सिंह | 210 views | 2 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Poems, Satish Singh, अवमूल्यन, कविता, सतीश सिंह

पाती : कविता – सतीश सिंह

पाती : कविता - सतीश सिंह पाती मोबाईल और इंटरनेट के ज़माने में  भले ही हमें नहीं याद आती है पाती   पर आज़ भी विस्तृत फ़लक सहेजे-समेटे है इसका जीवन-संसार   इसके जीवन-संसार में हमारा जीवन कभी  पहली बारिश के बाद सोंधी-सोंधी  मिट्टी की ख़ुशबू  की तरह फ़िज़ा में रच-बस जाता है तो कभी नदी के दो किनारों की तरह एक-दूसरे से जुड़कर भी अलग-अलग रहने के लिए मज़बूर हो जाता है    कभी बर्तन से छिटक कर तड़पती मीन की तरह अंतिम सांसे गिनता रहता है       तो ...

November 9th, 2009 | लेखक : सतीश सिंह | 116 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Poems, Satish Singh, कविता, पाती, सतीश सिंह

प्रोफेशनल

प्रोफेशनल कुछ भी दिल से नहीं लगाते इसलिए हैं अपने काम के प्रति बहुत ही प्रतिबध्द। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए किसी भी हद को पार कर सकते हैं। इन्हें गलती से लौटाए ज्यादा पैसे रखने में कोई गुरेज़ नहीं। बेशर्मी से चार लोगों के बीच अकेले चाय पी सकते हैं। मांग सकते हैं दूसरों की तंगी में भी अपना दिया उधार। दूसरों से मांग कर अख़बार पढ़ना, खाना खाना या फिर ...

November 8th, 2009 | लेखक : सतीश सिंह | 123 views | Comments Off
Posted in Category: कविता | Tags: Professional, Satish Singh, कविता, प्रोफेशनल, सतीश सिंह

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