लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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familyश्री राम कृष्ण श्रीवास्तव

1  हम अपने माता पिता होने का दायित्व बड़ी कुशलता से निभाते हैं। अपने बच्चे को योग्यतम शिक्षा और ज्ञान देकर समाज में सम्मान के साथ रहने के लिए उसे उचित मार्ग दर्शन देते हैं। जिसके आधार पर वह अपनी योग्यता से वो सब कुछ अर्जित करने की क्षमता और सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है जो आप उसे देकर जाने वाले हैं।

2  लेकिन क्या कभी आपने यह सोचा है कि आपके असहाय होने पर आपकी मृत्योपरान्त उसे जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता पडे़गी वह आपने अपने बच्चे को दिया है क्या? जिसे वह जीवन में कभी स्वयं अर्जित नहीं कर सकता।

3 क्या आपने उसे जेनेटिक (जीन्स) रक्त सम्बन्धों की श्रृंखला के पारिवारिक सम्बन्ध देने के विषय में कभी सोचा है।

4  जिस दिन आप ’’एक ही बच्चा’’ रखने का निर्णय लेते हैं, उसी दिन आप अपने बच्चे के समस्त पारिवारिक, सामाजिक और रक्त सम्बन्धों के भावनात्मक एवं मानवीय सम्बन्धों को मार देते हैं।

5  वास्तव में परिवार में बच्चे को अकेला रखने के दुष्प्रभाव से हमारा ध्यान भंग है। हम कमाने के चक्कर में अपने संतान के स्वाभाविक रक्त सम्बन्धों की हत्या कर रहे हैं। 6  हमारी इकलौती संतान के समस्त जेनेटिक, सामाजिक रिश्ते जैसे सगे भाई, बहन, चाचा, ताऊ, मौसा, मौसी, मामा, आदि समाप्त हो रहे हैं। सारा पारिवारिक व सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न होने लगा है। रिश्ते सिमटने लगे हैं, व्यक्ति एकाकी जीवन की ओर अग्रसर होने लगा है।

7  परिणाम स्वरूप डिप्रेशन, आत्महत्या और एकाकी जीवन जीने वाले बृद्धो की हत्याओं, कोर्ट में जमानत, अर्थी में कंधा, फ्लैटों में सड़ती हुई लाशे और लड़की के अपहरण में कोई साथ नही जैसे उदाहरण सामने आने लगे हैं।

8  हमने बच्चे को खिलौना समझ लिया है। खिलौना नही है वह। अपने आप में पूर्व व्यक्तित्व है वह। सारे व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक सम्बन्धों की आवश्यकता है उसे। आप उसे दे नही रहे और वह स्वयं अर्जित नही कर सकता।

9  हमारा भाई है हमारी बहन है हमारे चाचा, मामा आदि भी हैं। क्या हमारी संतान या उसकी भावी पीढ़ी को इन सब रिश्तों की आवश्यकता कभी महसूस नही होगी। कितने अदूरदर्शी है आप। आप सोचे जब आप इस संसार में नहीं होंगे इन रिश्तों की अहमियत तब पता चलेगी।

10 अपने सुख के लिए, सुविधाओं को अर्जित करने के लोभ में हमने ’’एक ही संतान’’ का निर्णय तो ले लिया लेकिन जिस समाज में हमारी संतान रहेगी उसे कौन चलायेगा। कभी सोचा है। जब हमारी इकलौती संतान अपने वयस्क अवस्था में होगी तब समाज का कैसा रूप होगा इसकी परिकल्पना करके देखें।

तब आपको लगेगा कि आपका यह ’’एक संतान’’ का निर्णय आपकी इकलौती संतान के लिए और राष्ट्र के लिए कितना भयावह निर्णय है।

आज ही संज्ञान लें:

अपनी इकलौती संतान को सम्पूर्ण पारिवारिक सम्बन्ध दें।

संकल्प करें: ’’हम अपनी संतान को भाई भी देंगे बहन भी देंगे’’

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