लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

       चीनी सैनिकों की लद्दाख में दौलत बेग ओल्डी में 10 कि.मी. भीतर तक घुसपैठ करके बकायदा तंबू तानकर डेरा डाल लेना हेरतअंगेज है। यह स्थल वास्तविक नियंत्रण रेखा से भीतर 17 हजार फुट की उंचाई पर स्थित है। इस घुसपैठ की पुष्टि न सिर्फ भारतीय वायुसेना ने की है बल्कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने भी की है। इस घुसपैठ की आसानी इसलिए भी हुई क्योंकि भारत और चीन के बीच 4 हजार कि.मी. लंबी जो नियंत्रण रेखा है उसकी स्थायी पहचान नहीं हो पाई है। लिहाजा चीनी सैनिक भारतीय सीमा में घुसकर चट्टानों पर लाल रंग में चीन लिख जाते हैं। चीन के ये नापाक इरादे ब्रह्मपुत्र नदी के पानी को कब्जाने, अरुणाचल प्रदेश में सैनिक घुसपैठ बढ़ाना तो कभी इस प्रदेश को अपने नक्षे में शामिल करना विवाद का कारण बनते रहे हैं। चीन की नई घुसपैठ ऐसे समय में हुई है जब चीन के प्रधानमंत्री ली क्यांेग मई में भारत आने की तैयारी में है। ऐसे में भारत को सोचने की जरुरत है कि द्विपक्षीय व्यापार वार्ता और सैनिक अक्रामकता एक साथ कैसे संभव हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की केन्द्र सरकार केवल औद्योगिक और आर्थिक मामलों को ही तरजीह दे रही है।

चीन लगातार साम्राज्यवादी मंसूबो को विस्तार दे रहा है। व्यापार के बहाने चीन की सामरिक रणनीति जिस तरह से अमल में आ रही है,उससे लगता है,वह भारत को चैतरफा घेरने की कोशिश में लगा है। उसके इन नापाक मंसूबो को पकिस्तान अपनी सरजमीं पर उतारकर हवा दे रहे है। पाकिस्तान ने हाल ही में ग्वादर पोर्ट के निर्माण और उसके विकास की जिम्मेबारी चीन को सौंपी है। इससे चीन के दखल का विस्तार भारत की पश्चिमी सीमा तक हो जाएगा। देश की पूर्वी सीमा पर चीन बंगाल की खाड़ी,दक्षिण में हिंद महासागार और उत्तर में पाक अधिकृत कश्मीर में भी निर्माण कार्यों के बहाने अपनी मौजदूगी दर्ज करा चुका है। तिब्बत,अरूणाचल प्रदेश,अक्साई चीन और सिक्किम पर बेजा हस्तक्षेप से भी चीन बाज नहीं आता। हमारा कैलास मानसरोवर वह पहले ही हड़प चुका है। नेपाल और श्रीलंका में भी चीन का दखल बरकरार है।

भारत के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय राजनीतिक नेतृत्व ने कभी भी चीन के लोकतंात्रिक मुखौटे में छिपि साम्राज्यवादी मंशा को नहीं समझा। यही वजह रही कि हम चीन की हड़प नीतियों व मंसूबों के विरूद्ध न तो कभी दृढ़ता से खड़े हो पाए और न ही कड़ा रूख अपनाकर विश्व मंच पर अपना विरोध दर्ज करा पाए। अलबत्ता हमारे तीन प्रधानमंत्रियों, जवाहर लाल नेहरू,राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने तिब्बत को चीन का अविभाजित हिस्सा मानने की उदारता ही जताई। इस खुली छूट के चलते ही बड़ी संख्या में तिब्बत में चीनी सैनिकों की घुसपैठ शुरू हुर्ह। इन सैनिकों ने वहां की सांस्कृतिक पहचान, भाषाई तेवर और धार्मिक संस्कारों में पर्याप्त दखलंदाजी कर दुनिया की छत को कब्जा लिया। अब तो चीन तिब्बती मानव नस्ल को ही बदलने में लगा है। दुनिया के मानवाधिकारी वैश्विक मंचो से कह भी रहे हैं कि तिब्बत विश्व का ऐसा अंतिम उपनिवेष है,जिसे हड़पने के बाद वहां की सांस्कृतिक अस्मिता को एक दिन चीनी अजगर पूरी तरह निगल जाएगा। ताइवान का यही हश्र चीन पहले ही कर चुका है। चीन ने दखल देकर पहले इसकी सांस्कृतिक अस्मिता को नष्ट -भ्रष्ट किया और फिर ताइवान का बाकायदा अधिपति बन बैठा। चीन की ऐसी साम्राज्यवादी मंशा को अनदेखी करना भारत के लिए शुभ नहीं है।

भारत विरोधी मंशा के चलते चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर में दखल दिया है। इस बाबत चीन ने इस क्षेत्र में 80 अरब डाॅलर का पूंजी निवेष किया है। चीन की पीओके में शुरू हुईं ये गतिविधियां सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यहां से वह अरब सागर तक पहंुचने की जुगाड़ में लगा है। इसी क्षेत्र में चीन ने सीधे इस्लामाबाद पहुंचने के लिए काराकोरम सड़क मार्ग भी तैयार कर लिया है। इस हस्तक्षेप के बाद चीन ने पीओके क्षेत्र को पाकिस्तान का हिस्सा मानने की वकालत शुरु कर दी है। चीनी दस्तावेजों में अब इस इलाके को उत्तरी पाकिस्तान दर्शाया जाने लगा है। चीन ने पीओके-नागरिकों को नत्थी वीजा भी देना शुरु कर दिया है। चीन ने दुस्साहस से काम लेते हुए भारत की सीमा तक राजमार्ग बनाने में भी कामयाबी हासिल कर ली है। समुद्र तल से 3750 मीटर की उंचाई पर बर्फ से ढंके गैलोंग्ला पर्वत पर 3.3 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाकर सड़क मार्ग पूरा कर लिया है। यह सड़क सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि तिब्बत में मोशुओ का उंटी भारत के अरुणाचल प्रदेश का अंतिम छोर है। अभी तक यहां सड़क मार्ग नहीं था। मार्च 2012 में पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने संसद को दी एक जानकारी में कहा था कि ‘1948 से जम्मू-कश्मीर का लगभग 78000 वर्ग किमी क्षेत्र पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है। इसके अलावा 38000 वर्ग किमी भारतीय क्षेत्र 1962 से चीन के कब्जे में है।’ चीन भारत के खिलाफ नाजायज हरकतों को अंजाम दे सके, इस नजरिए से चीन ने पाकिस्तान की रजामंदी से पीओके का 5100 वर्ग किमी भू-भाग हासिल कर लिया है। इस भू-खण्ड पर चीन लगातार मिसाइलें तैनात कर रहा है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के मुख्यालय पेंटागन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भविश्य की रणनीति के तहत चीन अपनी सवा दो लाख सैनिकों वाली पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का तेजी से आधुनिकीकरण कर रहा है। चीन ने पहले भारतीय वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तरल ईंधन वाली सीएसएस-2 आईआरबीएम मिसाइलें तैनात कर रखीं थीं और अब उनकी जगह एमआरबीएक मिसाइलें तैनात कर दी गई हैं।

चीन भारत पर शिकंजा कसने की दृष्टि से नेपाल में भी रुचि ले रहा है। कम्युनिष्ट विचारधारा के पोशक चीन ने माओवादी नेपालियों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। चीन नेपाल में सड़कों का जाल बिछाने और विद्युत संयंत्र लगाने की दृष्टि से अरबों रुपये खर्च कर रहा है। इन्हीं कुटिल कूटनीतिक वजहों के चलते भारत और नेपाल के पुराने रिश्तो में हिंदुत्व और हिन्दी की जो भावनात्मक तासीर थी, उसका गाढ़ापन ढीला होता जा रहा है। नतीजतन नेपाल में चीन का दखल और प्रभुत्व लगातार बढ़ रहा है। चीन की ताजा कोशिशों में भारत की सीमा तक आसान पहुंच बनाने के लिए तिब्बत से नेपाल तक रेल मार्ग बिछाना शामिल है। चीन की क्रूर मंशा यह भी है कि नेपाल मे ंजो 20 हजार तिब्बती शरणार्थी के रुप में जीवन-यापन कर रहे हैं, यदि वे कहीं चीन के विरुद्ध भूमिगत गतिविधियों में संलग्न पाए जाते हैं तो उन्हें नेपाली माओवादियों के कंधों पर बंदूक रखकर नेस्तनाबूद कर दिया जाए। चीन भारत को चैतरफा घेरने की मुहिम में लगा तो जरुर है, लेकिन चीन को भारत की ओर से यह अहसास कराने की जरुरत है कि भारत उसकी तुलना में कतई कमजोर नहीं है।

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