लेखक परिचय

शाहिद नकवी

शाहिद नकवी

मै फिलहाल स्‍वतंत्र हूं ।इसके पहले देश के कई अखबारों मे उप सम्‍पादक और रिर्पोटर के रूप मे काम कर चूंका हूं ।

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loudspeakerअदालतों के लगातार सख्‍त र्निदेश के बाद भी सरकारें लाउडस्पीकर के बेजा
इस्‍तेमाल पर प्रभावी रोक नही लगा पा रही हैं ।जबकि दिन –रात लगातार बजने
वाले ये लाउस्‍पीकर बड़े पैमाने पर ध्वनि प्रदूषण तो फैला ही रहै हैं साथ
मे देश की साझी संकृति ,सामाजिक तानेबाने और साम्‍प्रद्रायिक एकता को भी
भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं ।यही लाउडस्पीकर समय समय पर नफरत का जहर
उगल कर कातिल भी बन रहे हैं । ग्रेटर नोएडा के दादरी इलाके के बिसेड़ा
गांव में हुई घटना की जड़ में एक लाउडस्पीकर है, जिससे हुई घोषणा के बाद
भीड़ एक शख्स की पीट-पीटकर हत्या कर देती है । इसी लाउडस्पीकर से की गयी
घोषणा के बाद ही एक मज़हबी स्‍थल के पास मौजूद भीड़ अचानक उन्मादी हो
जाती है और गांव के एक मुस्लिम परिवार के घर पर हमला कर देती है ।सालों
से चला आ रहा गांव का सदभाव बिगड़ जाता है ।सामाजिक रिश्‍ते नातों की
आवाज़ भी लाउडस्पीकर के शोर मे दब जाती है ।लोग ये भी भूल जातें हैं कि
इसी घर का एक नौजवान अपनों से दूर सरहदों पर देश के दुश्‍मनों से मुकाबला
कर रहा है ।एक आंकड़े के मुताबिक पिछले एक साल के भीतर देश मे और खास कर
उत्‍तर प्रदेश में जितनी भी सांप्रदायिक हिंसा हुई, उसमें हर पांचवी
हिंसा की घटना लाउडस्पीकर से निकली नफरत की आवाज़ से हुयी है । हर जगह
वही कहानी है जिससे हमारा हिन्दुस्तान कभी भी जल उठता है । हम समझ नहीं
रहे हैं या हम समझा नहीं पा रहे हैं कि देश के गाँवों तक मे ये भोपू
मुसीबत का सबब बन चुका है । ज़रा कल्‍पना करिये कि जब 19 वीं सदी के
अन्‍त मे लाउडस्पीकर का ईजाद करने वाले जॉन फिलिप रेइस ने क्‍या ये सोचा
होगा कि 140 साल बाद जब समाज विकसित हो कर नई – नई तकनीक खोज लेगा और
मंगल ग्रह पर जीवन की तलाश करेगा , तब यही भोंपू बेगुनाहों की मौत की
वजह बनेगा ।
ग्रेटर नोएडा का बिसेड़ा गांव मे भोंपू से
निकली नफरत भरी अफवाह ने सीधा नुकसान तो एक परिवार को पहुंचाया लेकिन अब
पूरा गांव इसकी सजा भुगत रहा है , एक हजार से अधकि परिवार का अमन चैन छिन
गया और कभी खामोश रहने वाला गांव पुलिस छावनी मे तब्‍दील हो गया है ।इस
घटना ने दुनियां भर के प्रचार तंत्र को देश की धमर्निपेक्षता पर भी सवाल
उठानें का मौका दे दिया । अंग्रेज़ी प्रेस के तमाम बड़े अंतरराष्ट्रीय
अख़बारों के साथ-साथ विश्व भर की भाषाओं में भी दादरी हत्याकांड को
प्रमुखता से कवर किया गया। अंग्रेज़ी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी
अख़लाक़ की मौत की ख़बर प्रकाशित की। साथ ही वाइस न्यूज़, हफ़िग्टन
पोस्ट, टाइम पत्रिका समेत तमाम प्रमुख अंग्रेज़ी वेबसाइटों ने दादरी
हत्याकांड की ख़बर को जगह दी।आयरलै्ंड के अखबार आयरिश टाइम्‍स ने सड़क पर
टहलती गाय की तस्‍वीर के साथ खबर प्रकाशित की थी । यही नहीं दुनिया भर की
कई भाषाओं के प्रकाशनों में भी इस ख़बर को जगह दी गई।ऊरूग्वे के स्पेनिश
भाषी समाचार पत्रों के अलावा जर्मन ,जापान , दक्षिण कोरिया,फ्रांस और
रूसी भाषा के अखबारों और वेबसाइटों ने इस घटना को जगह दी है ।पाकिस्तान
के उर्दू टीवी चैनलों और अख़बारों ने इस ख़बर पर तो आक्रामक रुख़
अख़्तियार करते हुए इसे चरमपंथ की वारदात क़रार दिया।
वैसे तो ये दिशर्निदेश है कि कब और कहां
लाउडस्पीकर बजाएं और किस स्तर तक जाएं। लेकिन देश के शायद किसी राज्य का
प्रशासन कभी ये जहमत उठाता हो कि कहां कितना लाउडस्पीकर बज रहा है, उसका
कोई हिसाब-किताब रखा जाए। पहले एक आरटीआई के तहत राज्यों से पूछा गया कि
क्या वो मंदिरों-मस्जिदों में लाउडस्पीकर्स की कोई मॉनिटरिंग करते हैं तो
ज्यादातर राज्यों ने नहीं में जवाब दिया । ग्रेटर नोएडा का बिसेड़ा गांव
इस लाउडस्पीकर से निकली नफरत भरी अफवाह की सजा भुगत रहा है।ऐसा नही है कि
लाउडस्पीकर की अफवाह तंत्र सिर्फ ग्रेटर नोएडा के दादरी इलाके के बिसेड़ा
गांव तक ही सीमित है।बल्‍कि एक अनुमान के मुताबिक 2014 में समूचे देश में
पुलिस ने सांप्रदायिक हिंसा के करीब एक हजार मामले दर्ज किए हैं तो उनमें
हर पांचवा मामला लाउडस्पीकर से फैलाए उन्माद का अंजाम था।यानी करीब 200
मामले लाउडस्पीकर पर नफरत की गूंज से निकले।उत्‍त्‍र प्रदेश के मुरादाबाद
के कांठ मे भी लाउडस्पीकर से निकली नफरत ने लोगों का अमन चैन छीना था
।इसके अलावा बिहार के पूर्णिया इलाके मे भी लाउडस्पीकर मौत की वजह बन
चुका है ।इसके बावजूद भी हमें मिली पांथिक स्वतंत्रता के नाम पर कमोबेश
हर मंदिर या मस्जिद की शोभा ऊंचे स्थानों पर लगे लाउडस्पीकर बढ़ाते ही
रहते हैं। धार्मिक कार्यक्रमों या जागरण जैसे आयोजनों में दिन-रात इतनी
ऊंची आवाज में भक्ति गीत-संगीत बजाया जाता है कि आसपास के घरों में लोगों
के लिए सो पाना और बच्चों के लिए पढ़ाई-लिखाई करना मुश्किल हो जाता
है।मुसलमानों के कई त्‍योहारों पर भी तेज आवाज मे लाउडस्पीकरों का लगातार
प्रयोग किया जाता है ।कई बार इसका सिलसिला देर रात तक चलता है ।कुछ मौकों
पर तो इसे रात मे ही बजाया जाता है । सामाजिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक व
धार्मिक आयोजनों में भी लाउडस्पीकरों का दुरुपयोग अधिक हो रहा है। ऊंचे
से ऊंचे स्थान पर हार्न लगाकर तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाने, लाउडस्पीकर
द्वारा विज्ञापन करके सामान बेचने से भी शान्तिपूर्ण जीवन में बड़ी बाधा
पहुंचती है।मौन, ध्यान, योग, प्रार्थना आदि कोई भी शोर को स्वीकृति नहीं
देता।यही नही कोई मत-पंथ या मज़हब भी लाउडस्पीकर बजाकर दूसरों की शान्ति
में विघ्न डालने की इजाज़त नही देता है।सवाल यही है कि क्‍या जब
लाउडस्‍पीकर आम लोगों की पहुंच से दूर थे तब मज़हब की जानकारी या उसका
प्रचार नही होता था ।होता था लेकिन तब लोग अपना मजहब दूसरों पर थोपना नही
चाहते थे ।तमाम अध्ययन बताते हैं कि ध्वनि प्रदूषण कई तरह की शारीरिक और
मानसिक समस्याएं पैदा करता है।हमारे आसपास अलग-अलग वजहों से होने वाला
शोर आज एक बड़ी समस्या बन चुका है। लोग आमतौर पर उसे प्रदूषण से जोड़ कर
नहीं देखते और परेशानी महसूस करने पर भी चुपचाप उसे झेल लेते हैं। जबकि
किसी भी रूप में तीखा शोर अन्य तरह के प्रदूषण से कम खतरनाक नहीं है।
दरअसल, जब भी प्रदूषण का सवाल आता है तो आमतौर पर हवा में घुलते जहरीले
तत्त्वों, धुंध-कोहरे या नदियों में बहाए जाने वाले खतरनाक रसायनों तक
बात सिमट कर रह जाती है। जल प्रदूषण से चिंतित संपन्न लोग पानी के लिए
बाजार के बोतलंबद पानी पर निर्भर होते जा रहे हैं। लेकिन ध्वनि प्रदूषण
से तो पैसे वालों को भी बाजार निजात नहीं दिला सकता, जो कि खुद तरह-तरह
के शोर का अड््डा है।
ध्वनि प्रदूषण की घातकता को मनुष्य गंभीरता से नहीं
लेता, जबकि शोर से न केवल बहरापन होता है, बल्कि उससे दैनिक कार्यकलापों
पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। चिकित्सकों व विशेषज्ञों द्वारा 30 डेसीबल
से ऊपर की ध्वनि को कर्कश शोर का नाम दिया गया है। एक शोध के अनुसार 120
डेसीबल ध्वनि से ऊपर के शोर में रहने वाला व्यक्ति आत्महत्या तक के लिए
मजबूर हो जाता है। तीसरी शताब्दी तक चीन में मृत्यु दण्ड प्राप्त व्यक्ति
को अधिक शोर वाले स्थान पर रखकर मृत्यु दण्ड दिया जाता था। इस समय देश के
अधिकांश नगरों में वाहनों का शोर 90 डेसीबल तक पहुंच गया है जिसे लगातार
सुनने से व्यक्ति स्थाई रूप से बहरा हो सकता है। 115 डेसीबल का शोर
लगातार 15 मिनट तक सुनने से ही बहरापन तथा मानसिक परेशानी व अन्य रोग हो
सकते हैं। ध्वनि प्रदूषण से मानसिक तनाव बढ़ता है, एकाग्रता नहीं रहती तथा
व्यक्ति उच्च रक्तचाप का रोगी बनता है, जो दिल की बिमारी का कारण बनता
है। ध्वनि प्रदूषण का असर मनुष्यों के साथ ही पशु-पक्षियों पर भी पड़ रहा
है। दिल्ली-एनसीआर सहित देश के तमाम बड़े शहरों और महानगरों मे वायु
प्रदूषण लगातार चर्चाओं में रहा है और ये खतरा विकराल रूप धारण करके
सामने आया है। पर्यावरण विभाग के शोध में पाया गया है कि यहां के लोगों
के सुनने की संख्या लगातार कम हो रही है। यदि इसी तरह ध्वनि प्रदूषण
बढ़ता रहा तो एक दशक में यहां बुजुर्ग बहरों की संख्या एक मुसीबत बनकर
उभरेगी। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार लोगों को 80-85 डेसिबल की ध्वनि
सबसे अच्छी रहती है। पॉल्यूशन विभाग के सर्वे के अनुसार देश के बड़े
शहरें में लोगों को 10 घंटे से ज्यादा 130-160 डेसिबल शोर का सामना करना
पड़ रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार तेज आवाज से लोगों के कान का पर्दा कमजोर हो रहा है
और नसों में सूजन आ रही है। इससे सुनने की क्षमता प्रभावित हो रही है।

शोर के चलते 70 फीसदी लोगों के कान 50 साल की आयु तक सुनने की 40 फीसदी
क्षमता खो चुके होते हैं। 50 साल की आयु से ही कानों की सुनने की क्षमता
प्रभावित हो रही है।
दरअसल किसी भी समस्या का समाधान कानून द्वारा ही किया
जाता है। ठीक उसी प्रकार ध्वनि प्रदूषण की रोकने के लिए भी कानून बनाए
जाने की आवश्यकता है। इंग्लैंड में शोर रोकथाम अधिनियम, 1960 बना है,
जिसमें रात 9 बजे से प्रातः 8 बजे तक ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर रोक है।
अमेरिका में ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम के लिए शोर नियंत्रण अधिनियम, 1972
बनाया गया है। लेकिन भारत में शोर नियंत्रण के लिए अलग से कोई केंद्रीय
कानून नहीं है। अभी हाल ही में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 में ऐसी
व्यवस्था रखी गई है, जिसमें किसी भी प्रकार के प्रदूषण के संदर्भ में
नियम बनाए जा सकते हैं और उन पर विधिसंगत कठोरता से पालन किया जा सकता
है। इस अधिनियम के तहत इसके सेक्शन 15 में नियमों का पालन न करने पर कड़ी
सजा प्रस्तावित है। कानून की अवहेलना करने वाले दोषी व्यक्ति को 5 वर्ष
तक सजा या एक लाख रुपए तक का आर्थिक दंड या दोनों दी जा सकती हैं। पहली
सजा के बाद भी यदि प्रदूषण जारी रहता है तो दोषी व्यक्ति को और आर्थिक
दंड दिया जा सकता है, जो पांच हजार रुपए प्रतिदिन तक हो सकता है। इस मसले
पर सर्वोच्च न्यायालय ने 2005 में ही साफ निर्देश दिए थे, जिसके तहत
राज्य सरकारों को लाउडस्पीकर, पटाखे चलाने और ध्वनि प्रदूषण के दूसरे
कारकों पर पाबंदी लगाने को कहा गया था।उच्चतम न्यायालय के अनुसार एक सभ्य
समाज में मजहब के नाम पर ऐसी गतिविधि की अनुमति नहीं दी जा सकती।
लाउडस्पीकर बजाने वाले को यह नहीं भूलना चाहिए कि पड़ोस के बच्चे को भी
शान्तिपूर्ण वातावरण में सोने, विद्यार्थी को अपने अध्ययन पर एकाग्रचित
होने, वृद्ध व अस्वस्थ व्यक्ति को बिना किसी ध्वनि प्रदूषण के आराम करने
का पूर्ण अधिकार है। उक्त निर्णय के बावजूद उस पर पूर्ण प्रतिबंध न लग
पाना आश्चर्यजनक, दु:खद व चिंतनीय है। ध्वनि प्रदूषण रेगुलेशन के मुताबिक
प्रशासन की लिखित इजाजत के बाद ही कहीं पर लाउडस्पीकर लगाया जा सकता है।
रिहायशी इलाकों में लाउडस्पीकर की आवाज की सीमा दिन में 55 डेसिबल है,
जबकि रात में 45 डेसिबल ही है ।बहर हाल दादरी की दर्दनाक घटना के बाद
उम्मीद की जानी चाहिए कि सर्वोच्च अदालत के र्निदेश के आलोक मे राज्य
सरकारें चेतेंगी और ध्वनि प्रदूषण पर लगाम लगाने की पहल करेंगी।वैसे केरल
जैसे राज्‍यों मे कुछ धर्मिक संथाओं ने आगे बढ़ कर लाउडस्‍पीकर से तौबा
करने के लिये लोगो को मनाने की पहल की शुरूआत की है । देश के
प्रधानमंत्री ने जिस तरह स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया है जिसका देश ने
आगे बढ़ कर स्‍वागत किया है पर इसमें पर्यावरण का और ध्‍वनि प्रदूषण के
पहलू को भी शामिल किया जाना चाहिए ।
** शाहिद नकवी **

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