लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

 

शेख अब्दुल्ला ने 1931 -1932 में मुस्लिम कॉन्फ्रेंस की स्थापना की थी । मुस्लिम कान्फ्रेंस का वास्तविक उद्देश्य समस्त कश्मीरियों के हितों के लिए लड़ना नहीं था। बल्कि वे केवल कश्मीरी मुसलमानों के हितों के लिए लड़ रहे थे।

 

शेख अब्दुल्ला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़कर लौटे थे और वहीं से द्विराष्ट्रवाद के सिद्वांत से प्रभावित थे। इसीलिए 1931 -32 में उनका आंदोलन राजशाही अथवा सामन्तवाद के खिलाफ नहीं था बल्कि इसके विपरीत हिंदुओं के खिलाफ था। यही कारण था कि उन्होंने अपनी पार्टी का नाम मुस्लिम कॉन्फ्रेस रखना बेहतर समझा। अंग्रेजी शासन की भी यही मंशा थी कि भविष्य में यदि जिन्ना की मांग के अनुसार भारत का विभाजन करना पड़ा तो जम्मू कश्मीर पाकिस्तान में चला जाए, इसीलिए ब्रिटिश सरकार भी रियासत में हिन्दू , मुस्लिम विवाद बढ़ाकर यह आशा कर रह थी कि मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का उग्र होता हुआ आंदोलन अन्ततः कश्मीर से हिन्दुओं को भाग जाने जाने के लिए विवश कर देगा और कश्मीर पाकिस्तान में शामिल हो सकेगा ।

 

परन्तु शेख अब्दुल्ला की महत्वाकांक्षा शायद अंग्रेजों के इस षड्यंत्र में समा नहीं रही थी। शेख अब्दुल्ला का कालान्तार में मुस्लिम नेतृत्व के प्रश्न पर जिन्ना से विवाद हो गया। जिन्ना अपने आप को हिन्दुस्तान के मुसलमानों का निर्विवाद नेता मानते थे। दूसरी ओर शेख अब्दुल्ला थे तो चाहे एक रियासत के ही रहने वाले परन्तु अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ने के कारण उनका दृष्टिकोण और चिंतन व्यापक हो गया था। वह भी कहीं भीतर ही भीतर अपने आप को मुसलमानों का कद्दावर नेता मानने लगे थे । जाहिर है कि जिन्ना के नेतृत्व में बन रहे पाकिस्तान में शेख अब्दुल्ला के लिए सम्मानजनक जगह नहीं हो सकती थी। इसीलिए शेख स्वतंत्र कश्मीर का सपना देखने लगे थे। महाराज हरि सिंह को हराकर स्वतंत्र देश के राजा बनने का सपना।

 

उधर इस पूरे माले में साम्यवादी अपना ही षड्यंत्र रच रहे थे। रुस में साम्यवादी क्रांति के बाद दुनिया भर में साम्यवादी विचारों का प्रचार -प्रसार भी बढ़ा था और लोगों में एक नई आशा भी पनपी थी। रुस की सफल क्रांति के बाद अनेक देशों में साम्यावादी दलों की स्थापना हुई थी। भारत में भी इन्हीं दिनों सी0पी0आई ने आकार ग्रहण करना शुरु किया था। जिन्ना भारत को लेकर द्विराष्ट्रवाद सिध्दांत को प्रतिस्थापित कर रहे थे। लेकिन सी0पी0आई की दृष्टि में भारत एक राष्ट् नहीं है बल्कि अनके राष्ट्रो का समूह है। और पार्टी की मान्यता थी कि प्रत्येक राष्ट्र को भारत से अलग होने का अधिकार है। अंग्रेजों के जाने से लगभग एक वर्ष पहले सी0पी0आई0 के मुखपत्र ‘ पीपुल्स एज’ ने अपने 5 मई, 1946 के एक अंक में लिखा था-”साम्प्रदायिक आधार पर संवैधानिक हल तलाशने के बजाय बेहतर होगा कि भारत में रह रही सभी राष्ट्रीयताओं को देश से अलग होने का अधिकार दे दिया जाए। अखबार ने आगे लिखा कि देश का भाषा और संस्कृति के आधार पर वैज्ञानिक वर्गीकरण कर दिया जाए और प्रत्येक राष्ट्रीयता को अलग होने का अधिकार दिया जाए।”

 

इसके साथ ही कम्यूनिस्ट पार्टी सशस्त्र क्रांति के माध्यम से सत्ता हथियाने का ताना-बाना भी बुन रही थी। क्योंकि कम्यूनिस्टों के मसीहा रुस में सत्ता का परिवर्तन खुनी क्रांति के माध्यम से हुआ था। कम्युनिस्ट पार्टी देश के भीतर ऐसे स्थानों में लगी हुई थी जहां अग्रेजों के चले जाने के बाद सशक्त क्रांति के बल पर सत्ता प्राप्त कर कम्युनिस्ट शासन की स्थापना की जा सकती थी। 20 वीं शताब्दी के 5 वें दशक में जब अंग्रेज यहां से बोरिया-बिस्तर समेट रहे थे तो ई0एम0एस0 नम्बूदरीपाद और ई0के0 गोपालन केरल में पाकिस्तान जिंदाबाद और मोपलास्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हुए घूम रहे थे। उद््देश्य था सशस्त्र क्रांति के बल पर केरल, मोपलास्तान में सशस्त्र क्रांति के बल पर स्वतंत्र कम्यूनिस्ट सत्ता की स्थापना करना।

 

कम्यूनिस्टों ने सशस्त्र क्रांति के लिए पहला चयन तो हैदराबाद रियासत का किया, जो पार्टी के सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन के नाम पर प्रसिध्द हुआ और दूसरे स्थान के लिए कम्यूनिस्टों की दृष्टि में कश्मीर सबसे उपयुक्त स्थान हो सकता था। उसका मुख्य कारण इस रियासत की भौगोलिक सीमा थी। रियासत रुस और चीन की सीमा के साथ लगती थी। चीन में पहले माओ के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता पर कब्जा करने के लिए आंदोलन चला रही थी। कश्मीर में ऐसा सशस्त्र आंदोलन चलने पर रुस से आसानी से सहायता प्राप्त हो सकती थी और देर -सवेर सशस्त्र शक्ति के बल पर कश्मीर को एक स्वतंत्र साम्यवादी देश बनाया जा सकता था। लेकिन इसके लिए जरुरी था कि रियासत भारत में शामिल न हो और साथ ही शेख अब्दुल्ला की पार्टी में घुसपैठ करके उसके ढांचे का भविष्य में इस्तेमाल किया जाए।

 

उधर शेख अब्दुल्ला को भी लगता था कि यदि उसकी छवि मुसलमान नेता की बनी तो रियासत का राजा बनने का उसका स्वप्न पूरा नहीं हो सकता और न ही उसे अपने इस आंदोलन में भारत की सहायता प्राप्त हो सकती है। इसलिए शेख अब्दुल्ला भी चाहते थे कि यदि साम्यवादी उनके साथ मिल जाते हैं तो उसकी छवि पंथनिरपेक्ष नेता की बन जाएगी। अब नई परिस्थितियों में भारत सहायता कर सकता था। साम्यवादी अपनी योजना के कारण शेख अब्दुल्ला के साथ जाने को लालायित थे और अब्दुल्ला अपनी सफलता के लिए उनका प्रयोग करने को आतुर था। इस पृष्ठभूमि में शेख अब्दुल्ला ने मुस्लिम कान्फ्रेस का नाम बदलकर नेशनल कॉन्फ्रेस कर दिया। कश्मीर में साम्यवादी पार्टी के ज्यादातर सदस्य कश्मीरी हिन्दू ही थे। पार्टी ने डा0 एन0एन0 रैना की अध्यक्षता में अपनी एक शाखा वहां स्थापित की हुई थी। इन कश्मीरी हिन्दू कम्यूनिस्टों के नेशनल कॉन्फ्रेस में आ जाने के कारण शेख अब्दुल्ला की छवि पंथनिरपेक्ष नेता की बनने लगी और इस छवि को कारण पं0 जवाहर लाल नेहरु भी अब्दुल्ला के साथ आ खड़े हुए। अब्दुल्ला ने समय , स्थान देखकर मार्क्सवादी और समाजवादी शब्दावली का प्रयोग करना भी शुरु किया। नेशनल कॉन्फ्रेस में कश्मीरी कम्युनिस्ट हिन्दुओं के आ जाने के बाद भविष्य में भी शेख को कोई खतरा नहीं हो सकता था। क्योंकि इन कम्यूनिस्ट हिंदुओं का कोई जनाधार नहीं था। अब्दुला को ऐसे जनाधारविहीन हिन्दू नेताओं की ही जरुरत थी। धीरे -धीरे अब्दुल्ला ने ऐसा आभास देना शुरु कर दिया, मानो वह चिंतन के स्तर पर समाजवादी खेमे से ही ताल्लुक रखता हो । पंजाब से जाने-माने कम्युनिस्ट श्री बी0पी0एल0बेदी और उनकी यूरोप मूल की पत्नी करेवा बेदी के आ जाने के बाद अब्दुल्ला को अपनी इस छवि के प्रसार करने लिए के लिए बहुत सहायता मिली। बेदी दम्पत्ति ने ही 1944 में ”नया कश्मीर” नाम से कश्मीर के लिए नया मेनीफेस्टो तैयार किया था। गहराई से देखने से पता चलता है। इसका बहुत सा हिस्सा ‘पीपुल्स एज’ में छपे मार्क्सवादी साहित्य में से लिया गया है। इसे तैयार करने में एन0एन0 रैना और मोती लाल मिस्त्री ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी लेकिन यह मैनिफेस्टो वे शेख अब्दुल्ला के नाम से ही प्रचारित -प्रसारित किया गया । इसके छपने के बाद कम्युनिस्ट नेता अब्दुल्ला को मजलुमों का मसीहा बताने लगे।

 

नया कश्मीर में भूमि पर उसी का हक जो उसको जोतते है -लागू करने की बात कही गई थी । शेख के दोनों हाथ में लड्डू थे क्योंकि रियासत में बडी भूमि वाले हिन्दू थे और उन पर खेती करने वाले कश्मीरी मुसलमान थे। शेख का मुस्लिम कॉन्फ्रेस वाला एजेण्डा पूरा हो रहा था और कम्यूनिस्टों का सर्वहारा क्रांति का। यह ठीक है कि इसमें कम्युनिस्टों ने शस्त्र नहीं उठाए थे परन्तु इसकी क्षतिपूर्ति शेख करने वाले थे । जब उन्होंने कहा कि जिनकी भूमि का अधिग्रहण कर दिया जाएगा , उनको मुआवजा नहीं दिया जाएगा । कम्युनिस्टों की चाल थी कि रियासत , भारत में शामिल न हो ताकि बाद में उसे क्रांति द्वारा आजाद देश घोषित कर दिया जाए ।

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