लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

Posted On by &filed under महत्वपूर्ण लेख.


विपिन किशोर सिन्हा

कम्युनिज्म का अन्तर्द्वन्द्व, विरोधाभास और विफलता-१

कम्युनिज्म का अन्तर्द्वन्द्व, विरोधाभास और असफलता-२

परिवार के संबंध में भी कम्यून्स का प्रयोग प्रत्येक कम्युनिस्ट देश को भारी पड़ा। लोगों ने कम्यून्स में रुचि लेना बन्द कर दिया। विवशता में कम्यून्स में रहते हुए भी विशेष पुरुष, विशेष स्त्री में परस्पर स्वाभाविक आकर्षण और एक साथ रहने की इच्छा को दबाया नहीं जा सका। जिन बच्चों का पालन-पोषण राज्य के द्वारा किया गया, उनका समुचित विकास नहीं हुआ। बहुत कम समय में ही कम्यून्स की पद्धति को छोड़ना पड़ा और कम्यून्स टूट गए। स्त्री और पुरुष एक साथ, एक ही फ्लैट में बच्चों के साथ रहने लगे और इस तरह बिना विवाह-संस्था के भी परिवार संस्था की पुनर्वापसी हुई। बाद में बहुसंख्यक जनता ने पितृत्व के अधिकार की मांग की, जिसे स्वीकार करना पड़ा। परिवार संस्था और विवाह-संस्था, जो कम्युनिज्म या मार्क्सवाद के अनुसार एक प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ मान्यता थी, सारे कम्युनिस्ट देशों में अल्प समय में ही पुर्जीवित हो उठी।

जिन मज़दूरों के नाम पर सभी कम्युनिस्ट देशों का शासन चलता था, उन्हीं मज़दूरों की स्थिति बद से बदतर होती चली गई। कम्युनिस्ट देशों में मज़दूरों का जीवन घोर पूंजीवादी देशों के मज़दूरों से भी खराब था। पूंजीवादी देशों मे मज़दूरों को संगठन बनाने और हड़ताल का अस्त्र प्राप्त था और है भी। मज़दूरों का यह अधिकार कम्युनिस्ट देशों में तुरन्त समाप्त किया गया। अपनी सुविधाओं और वेतन में वृद्धि के लिए पूंजीवादी देशों में मज़दूरों का हड़ताल पर जाना एक आम बात है, लेकिन कम्युनिस्ट देशों में मज़दूर ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकता। सातवें दशक में जब सोवियत रूस कम्युनिज्म के गिरफ़्त में था, एक बार अमेरिका ने मास्को में अमेरीकी मज़दूरों के जीवन पर एक प्रदर्शनी का आयोजन किया। अमेरिका में मज़दूर किस तरह के घर में रहता है, क्या खाता है, क्या पहनता है, किन सुविधाओं का उपयोग करता है, आदि सारी बातें चित्रों और माडलों के माध्यम से प्रदर्शित की गईं। रूस के मज़दूरों की विशाल भीड़ उसे देखने के लिए उमड़ पड़ी। वे देखना चाहते थे कि एक पूंजीवादी देश में जहां कम्युनिस्टों के अनुसार मज़दूरों का क्रूर शोषण होता है, कैसे रहते हैं? किन्तु जब उन्होंने देखा कि उनकी तुलना में अमेरिका के मज़दूरों को न केवल सुख-सुविधाएं ही अधिक हैं, उनका जीवन-स्तर भी ऊंचा है, आश्चर्यचकित रह गए। ऐसा भी हो सकता है, उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। वे कहने लगे कि यह एक प्रचार है। किन्तु जब प्रदर्शनी के आयोजकों ने वस्तुस्थिति को प्रत्यक्ष देखने के लिए पांच रूसी मज़दूरों के प्रतिनिधि मण्डल को अपने खर्चे से अमेरिका भेजने की पेशकश की और यह कहा की प्रदर्शनी में वर्णित तथ्यों में यदि तनिक भी अतिरंजना पाई गई तो वे कम्युनिज्म स्वीकार कर लेंगे। प्रदर्शनी देखने के बाद स्थानीय मज़दूरों में असंतोष विकराल रूप लेने लगा। सरकार ने डरकर प्रदर्शनी ही बंद करा दी।

कम्युनिस्ट देशों में तथाकथित वर्गहीन समाज में नए वर्गों ने जन्म लेना आरंभ कर दिया। मार्क्स ने कहा था कि जब सभी वर्ग नष्ट हो जाएंगे, तब वर्गविहीन समाज का निर्माण होगा, लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। एक ओर सरकारी स्तर से पुराने वर्गों को ध्वस्त करने की प्रक्रिया चलती रही, तो दूसरी ओर नए वर्ग बनते और बद्धमूल होते गए। युगोस्लाविया के भूतपूर्व उपप्रधान मंत्री ने अपनी पुस्तक ‘द न्यू क्लास’ में लिखा है – हमने पुराने वर्ग नष्ट किए, किन्तु नए वर्गों का निर्माण हुआ। ख्रुश्चेव ने स्वयं एक लेख में लिखा था – ‘मुझे पता नहीं चलता की क्या किया जाय? छोटे बच्चों में भी अलग-अलग वर्ग की भावना का निर्माण हो रहा है। शासक, उच्चाधिकारियों, इंजीनयरों, डाक्टरों के बच्चे स्कूल के मध्यावकाश में अलग ग्रूप बनाकर बैठते हैं और मज़दूर-किसानों के बच्चे अलग ग्रूप में। बचपन में ही वर्ग भावना निर्मित हो रही है। इसे कैसे दूर किया जाय?’

रूस द्वारा अन्तरिक्ष में पहला उपकरण भेजने पर ख्रुश्चेव ने गर्व से कहा था कि यह उपग्रह विश्व में कम्युनिज्म की विजय का परिणाम है। इसपर प्रख्यात दार्शनिक बर्ट्रेन्ड रसेल ने कहा था कि यह कम्युनिज्म की विजय का नहीं, पराजय का प्रमाण है। यदि वैज्ञानिकों को कम्यून में रखने के बदले विशेष सुविधा और अधिकार नहीं दिए गए होते, तो उन्हें स्पूतनिक विज्ञान और अनुसंधान की प्रेरणा ही नहीं मिली होती। किसी वर्ग को विशेष सुविधा और अधिकार देना कम्युनिज्म या मार्क्सवाद के घोषित सिद्धान्तों के प्रतिकूल है। बात विशेषाधिकार प्राप्त एक या दो वर्गों की नहीं, आज विश्व के एकमात्र घोषित कम्युनिस्ट देश चीन में लघुत्तम और महत्तम आमदनी में १ और ९० का अनुपात है। आय में तो अन्तर है ही, भयंकर सामाजिक विषमता भी है।

कम्युनिस्ट देशों में समानता और वर्गहीनता की बात एक छलावा सिद्ध हुई। मार्क्स ने कहा था कि सर्वहारा (Proletariate), जिसके पास भगवान के द्वारा प्रदत्त दो हाथों के सिवा कुछ भी महीं है, वे ही क्रान्ति का नेतृत्व करेंगे। लेकिन लेनिन को इससे समस्याओं का सामना करना पड़ा। मार्क्स ने सिर्फ सिद्धान्त-सरणि दी थी, लेकिन लेनिन को प्रत्यक्ष क्रान्ति का काम करना था। उन्होंने अनुभव किया कि सर्वहारा क्रान्ति के लिए मर तो सकता है, क्योंकि उसके लिए मार्क्स ने कहा था कि तुम्हारा कुछ भी नुकसान नहीं, क्रान्ति में सिर्फ तुम्हारे बंधन टूटेंगे (You have nothing to lose but your chains), लेकिन नेतृत्व नहीं कर सकता। नेतृत्व के लिए बुद्धि, संगठन क्षमता और प्रशासनिक दक्षता की आवश्यकता होती है। लेनिन ने मार्क्स के सिद्धान्त में परिवर्तन करते हुए कहा कि सर्वहारा नेतृत्व नहीं करेगा। वह सिपाही का काम करेगा, नेतृत्व तो कम्युनिस्ट पार्टी के अनुभवी क्रान्तिकारी (Professional Revolutionaries) ही करेंगे। और इस तरह एक विशिष्ट वर्ग का निर्माण हुआ। रूस में एक परंपरा-सी बन गई थी कि शासन के विभिन्न संगठनों के प्रमुख जैसे न्यायाधीश, प्रबंधक, प्राचार्य, कुलपति, सचिव, निदेशक, सेनापति आदि सभी पार्टी के नेतृत्व वर्ग से ही चुने जाएंगे, भले ही उनमें अपेक्षित योग्यता हो या न हो। किसी विज्ञान-संस्था का प्रमुख एक गैर विज्ञानी भी हो सकता था। इससे चापलूसी को प्रश्रय मिला और अयोग्य लोग भी उच्च पदों पर पहुंचने लगे। इस वर्ग को विशेष सुविधाएं, जैसे फार्म हाउस, समस्त सुविधाओं से युक्त आलीशान बंगला, फर्नीचर, कारें, प्रसिद्ध शिक्षा संस्थानों में बच्चों के प्रवेश की सुविधा, आयातित वस्तुओं की प्राप्ति की सुविधा, सर्वोत्त्कृष्ट चिकित्सा सेवा की सुविधा आसानी से प्राप्त होने लगी। यहां तक कि मास्को के प्रसिद्ध नाट्यगृह के टिकट भी पहले उन्हें ही प्राप्त होते थे।

मार्क्स को मानव-मन की अत्यन्त अल्प जानकारी थी। मनुष्य के मन के विकास के लिए उनके साहित्य में कुछ भी नहीं है। उन्होंने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया कि किसी भी कार्यक्रम के सुचारु क्रियान्यवन के लिए चरित्रवान मनुष्य की आवश्यकता प्रथम शर्त है। या तो उन्होंने इस विषय का अध्ययन नहीं किया था या किया भी होगा तो अत्यन्त अल्प अध्ययन किया होगा। वे मनुष्य को एक यंत्र मानते थे जिसके कारण उनके समस्त सिद्धान्त व्यवहार के धरातल पर असफल हो गए। अनिर्बाध और अनियंत्रित सत्ता प्राप्त होने पर कट्टर कम्युनिस्ट भी मार्क्स को भूल गए। रूमानिया के कम्युनिस्ट राष्ट्राध्यक्ष चाउसेस्कू ने उस देश पर लगातार २४ वर्षों तक तानाशाही के बल पर शासन किया था। यह भी कैसा संयोग है कि जिस अधिनायकवाद का विरोध मार्क्स ने अपनी हर पुस्तक और लेख में किया था, कम्युनिस्ट देशों में वही सबसे पहले आया। प्रत्येक कम्युनिस्ट देश का प्रमुख तानाशाह ही होता है। रूस का स्टालिन, युगोस्लाविया का मार्शल टीटो, क्यूबा का फिडेल कास्त्रो, चीन का माओ और रूमानिया का चाउसेस्कू इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। रूमानिया में अपनी २४ साल की तानाशाही के दौरान, चाउसेस्कू के भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की चर्चा के बिना यह लेख अधूरा ही रहेगा। चाउसेस्कू की पत्नी एलीना, प्रथम उप प्रधानमंत्री, जो चाउसेस्कू के बाद सर्वाधिक शक्तिशाली पद था पर आसीन थी। चाउसेस्कू का भाई रक्षा मंत्री, दूसरा योजना आयोग का अध्यक्ष, तीसरा राजदूत, चौथा कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्य पत्र का संपादक, एक साला कृषि सचिव, दूसरा ट्रेड उनियन का प्रमुख तथा सबसे छोटा लड़का ट्रान्ससिल्वानिया में पार्टी के सचिव पद पर काबिज़ था। वैभव-विलास का जीवन बिताने में उसने रोम के सम्राटों को भी पीछे छोड़ दिया था। तीन-तीन आलिशान बंगले – पहाड़ पर एक, काले सागर पर एक तथा राजधानी बुखारेस्ट के बाहर तालाब के किनारे संगमरमरी फ़र्श का वैभवपूर्ण महल! चालीस कमरों के इस महल में एक परिवार का निवास, सर्वत्र सोने-चांदी की वस्तुएं तथा दुर्लभ कलाकृतियों की राजसी सजावट। चाउसेस्कू महोदय सोने के बर्त्तनों में ही भोजन करते थे।

तानाशाह चाउसेस्कू का पतन भी बड़े भयानक ढंग से हुआ। जनता ने उसके निकट संबंधियों के साथ बुखारेस्ट के एक चौराहे पर खड़ा कर सार्वजनिक रूप से गोली मारकर उसकी हत्या कर दी। यह सामान्य जनता की मार्क्सवाद या कम्युनिज्म के प्रति दीर्घ असंतोष का प्रकटीकरण था। उसकी मृत्यु के बाद पत्रकारों ने उसके महल में जब प्रवेश किया, तो आश्चर्य से उनकी आंखें फटी रह गईं। जूतों की अनेक कतारें, जिनमें कुछ की एड़ियों में हीरे जड़े हुए, इतालवी फ़र्श वाले स्नानगारों में सोने के नलों से गरम पानी आने की व्यवस्था। चाउसेस्कू की पत्नी एलीना रोयेंदार जानवरों के चमड़ों के वस्त्रों तथा महंगे आभूषणों पर बेशुमार धन खर्च करती थी। रूमानिया की सामान्य जनता के प्रति उसके मन में अपार घृणा थी। वह कहा करती थी – ‘इन कीड़े मकोड़ों को चाहे जितना खाने को दो, ये कभी संतुष्ट नहीं हो सकते।’ चाउसेस्कू दंपत्ति ने उस समय ४० करोड़ डालर का सोना स्विस बैंकों में जमा कर रखा था। चीन के माउत्से तुंग भी इस विकृति से बच नहीं सके। उन्होंने चीन की एक खूबसूरत अभिनेत्री जियान किंग से शादी की थी, जिसे कालान्तर में उन्होंने पोलिट ब्यूरो का सदस्य बना दिया। जियान किंग माओ के बुढ़ापे के दिनों में इतनी शक्तिशाली और प्रभावशाली हो गईं कि अपने तीन और वफ़ादारों के साथ माओ को किनारे करते हुए वर्षों तक चीन पर राज किया। इन चारों को गैंग आफ़ फ़ोर कहा गया, जिनके कारनामे माओ की मृत्यु के बाद स्वयं चीनी शासकों ने उजागर किए और वर्षों तक विश्व समाचार की सूर्खियां बटोरते रहे। ये चारों अत्यन्त क्रूर, भ्रष्ट, विलासी और तानाशाही प्रवृत्ति के थे। माओ की पत्नी जियान किंग, चाउसेस्कू की पत्नी एलीना से इंच भर भी कम नहीं थीं। माओ के बाद जब डेन शियाओ पिंग ने सत्ता संभाली, तो इस गैंग आफ़ फ़ोर को उनके अपराधों के लिए मृत्यु दंड दिया गया। रूस में ब्रेज़नेव के प्रधानमंत्रीत्व काल में उनके दामाद प्रशासन में बहुत ताकतवर हो गए थे। उसी समय रूसी सेना ने अफ़गानिस्तान पर कब्जा किया था। वहां की भौगोलिक दशा और स्थानीय लड़ाकों के खूनी आक्रमण के डर के कारण कोई रूसी सैनिक वहां जाना नहीं चाहता था। वहां जाने का अर्थ था – फिर कभी लौट के नहीं आना। इसका फायदा उठाते हुए ब्रेज़नेव के दामाद ने अफ़गानिस्तान में सैनिकों की पोस्टिंग रोकने के लिए अकूत धन कमाया। भारत में स्व. ज्योति बसु के पुत्र चन्दन बसु ने सत्ता का दुरुपयोग कर पश्चिम बंगाल में कई उद्योग लगाए। वे आज बंगाल के अग्रणी पूंजीपति हैं। स्व. ज्योतिर्मय बसु की कलकत्ता की छः मंजिली इमारत चाउसेस्कू के महल के आगे झोंपड़ी ही मानी जाएगी। सोमनाथ चटर्जी ने मार्क्सवाद को त्याग दिया लेकिन लोकसभा के अध्यक्ष की कुर्सी नहीं त्यागी। अनगिनत किस्से हैं व्यवहारिक धरातल पर मार्क्सवाद के असफल होने की।

सोवियत रूस के पूर्व शासक गोर्बाचोव ने, जो एक कट्टर कम्युनिस्ट थे, समय रहते यह पहचान लिया कि कम्युनिज्म अव्यवहारिक है और सिर्फ मार्क्सवाद के खोखले नारे से जनता की समस्याओं का समाधान तथा देश का उत्थान नहीं किया जा सकता। उन्होंने ‘पेरेस्त्रोइका (पुनर्रचना) और ग्लासनोस्त (खुलापन) के नाम से स्वतंत्र चिन्तन और आलोचना को स्थान दिया। उन्होंने रूस में परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। जून १९९० की कम्युनिस्ट पार्टी की २८वीं कांग्रेस में जो प्रस्ताव स्वीकार किया गया उसमें मार्क्सवाद और लेनिनवाद का दूर-दूर तक कोई नाम नहीं था। उसमें प्रमुख बातें थीं –

१. सोवियत रूस के संविधान की धारा ६ को निरस्त कर दिया गया जो कम्युनिस्ट पार्टी को एकमात्र अधिकृत पार्टी मानती थी। इससे अन्य दलों के चुनाव लड़ने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

२. जेनेरल सेक्रेटरी के अधिकार राष्ट्राध्यक्ष को सौंपकर पार्टी और प्रशासन को अलग करने की दिशा में कदम उठाया गया।

३. व्यक्तिगत संपत्ति न रखने के मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मौलिक सिद्धान्त को तिलांजलि देते हुए कहा गया कि – पार्टी व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार को मानती है और उत्पादन के साधनों पर व्यक्ति के स्वामित्व को स्वीकार करती है।

कम्युनिस्ट व्यवस्था में जिनका निहित स्वार्थ था, ऐसे लोगों की टोली ने एक आखिरी प्रयास किया। गोर्बाचोव को गिरफ़्तार कर कालचक्र को विपरीत दिशा में घुमाने की कोशिश की। किन्तु ग्लासनोस्त के कारण स्वतंत्रता का स्वाद चखे जनगण ने उनके प्रयत्नों को पूर्ण विफल कर दिया और तीन दिन बाद ही गोर्बाचोव पुनः राष्ट्रपति के पद पर आसीन किए गए। षडयंत्रकारियों को गिरफ़्तार कर लिया गया और गोर्बाचोव ने हमेशा के लिए कम्युनिस्ट पार्टी से त्यागपत्र दे दिया। कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यालय और संपत्ति जब्त कर कर ली गई। रूसी गणराज्य की जनता ने रूस के हसिया-हथौड़े वाले झंडे को त्यागकर उसके स्थान पर १९१७ के पूर्व का झंडा अपना लिया। स्थान-स्थान पर औंधे मुंह पड़े लेनिन के पुतले कम्युनिज्म की विफलता और दर्दनाक अन्त पर सिसकियां भर रहे थे। सोवियत संघ की दासता से उज़्बेकिस्तान, कज़किस्तान, उक्रेन आदि अनेक देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त की। फिर तो यह सिलसिला चल पड़ा। हंगरी, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, युगोस्लोवाकिया, रूमानिया, पूर्वी जर्मनी, चीन, वियतनाम इत्यादि देशों ने भी जबर्दस्ती थोपे गए मार्क्सवाद का जूआ उतार फेंका। कई नए देश अस्तित्व में आए। किसी को भी विश्वास नहीं था कि पूंजीवाद की Thesis में क्रान्ति का Antithesis लगाकर, मार्क्सवाद के नाम पर निर्मित Thesis – कम्युनिज्म – इतनी जल्दी स्वयं Thesis बनकर दूसरे Synthesis का मार्ग प्रशस्त करेगा और स्वयं अज़ायबघर (Museum) की एक वस्तु बन जाएगा।

समाप्त

Leave a Reply

3 Comments on "कम्युनिज्म का अन्तर्द्वन्द्व, विरोधाभास और असफलता-३"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
ULLU
Guest

अपने पुरे जीवन में मैने आजतक मार्क्सवाद कि इससे घटिया वीवेचना नही पढी…….लेखक को मार्क्स वाद तो दूर कि बात…समान्य ग्यान भी नही ही…….

मार्क्सवाद कि ऐसी मुर्ख्तापूर्ण वीवेचना आपके अलावा शायद rss ओर संघ के लोग हि कर सकते ही ………भूल कर भी ये लेख किसी ऐसे इन्सान को न पढा दिजीयेगा जिसने 80 के दशक में कभी रुस कि यात्रा करी हो ….रुस के विखंदन के समय भी शायद समाजवादी सिस्टम कि वो हालत नही थी…जैसा कि लेखक ने लिखी ही……..बहुत हि हंसी आई ऐसा लेख पडकर ..हा हा हा

श्रीराम तिवारी
Guest
चूँकि कम्युनिस्म एक वैज्ञानिक और यथार्थ दर्शन है मानवीय मूल्यों और सर्व -जन-हितेषी इस विचारधारा ने दुनिया को आमानवीय शोषण -गुलामी,अत्याचार और पाखंडपूर्ण भाववादी शोषण से मुक्त कराया है. अतेव इस विचारधारा को तो निरंतर उत्तरोत्तर अभिवृद्ध ,परिष्कृत होते हुए परवान ही चढ़ना है. जब तक दुनिया में शक्तिशाली व्यक्ति द्वारा निर्वल का शोषण होता रहेगा, जब तक साम्राजी मुल्कों द्वारा निर्धन राष्ट्रों का शोषण -दमन जरी रहेगा तब तलक दोनों वर्गों के बीच संघर्ष जारी रहेगा. कोरी आस्थाओं,छुद्र स्वार्थ प्रेरित संवेदनाओं और फेंकू किस्म की वितान्दावादी पूंजीवादी मानसिकता प्रेरित आख्यायिकाओं से इस ‘सर्वश्रेष्ठ’ मानवीय धरोहर अर्थात ‘साम्यवादी विचारधारा’ का… Read more »
Avaneesh kumar singh
Guest

भारत में तो ये आज भी जिन्दा है और सशक्त भी है| हर तरफ पकड़ भी है| इस बारे में कुछ कहना चाहेंगे?

wpDiscuz