लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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अरविंद जयतिलक

अनुकूल परिस्थितियां तभी निर्मित होती है जब लक्ष्य का पता हो। लक्ष्य के विपरित दौड़ने वाला चूक जाता है। कांग्रेस लक्ष्य के विपरित छलांग लगा रही है। ऐसे में सूरजकुंड का संवाद बैठक और दिल्ली की रैली उसे आम आदमी से जोड़ने में फलदायी साबित होगी कहना कठिन है। एक दिन के संवाद बैठक से साढ़े तीन साल की गलतियां नहीं सुधरती। उससे सबक लिया जाता है। कांग्रेस उसके लिए तैयार नहीं है। वह तनिक भी चिंतित नहीं है कि उसकी नेतृत्ववाली यूपीए सरकार की नीतियां ही महंगार्इ और भ्रष्टाचार की मूल वजह है। अब जब सिर पर आम चुनाव की परछार्इ पड़ने लगी है तो उसे आम आदमी की चिंता सताने लगी है। यह चिंता मौके की राजनीति का प्रतिफल है। टूटपूंजिए विचार और निगूर्ण चिंतन से र्इमान का एंगल नहीं बदलता। घंटे- आधे घंटे का क्रांतिकारी इतिहास नहीं रचता। शास्त्रों में भी कहा गया है कि बुरार्इ का अंत जवानी में होना चाहिए। कांग्रेस अपने साढ़े तीन साल के शासन भरी जवानी में घपले-घोटाले में लिप्त रही। अब 17-18 महीने में संन्यासी बन बुरार्इयों को खत्म कर सियासी जमीन अनुकूल कर लेगी इसमें संशय है। लोगबाग अच्छी तरह समझ रहे हैं कि वह आम आदमी की चिंता में दुबली क्यों हुर्इ जा रही है। भगवान बुद्ध ने कहा है कि दुख के कारणों की समझ ही दुख का निदान है। कांग्रेस आम आदमी के दुख को समझने और उसके निदान को तैयार नहीं है। जुबानी जमा खर्ची से ही लोगों का संताप हरना चाहती है। अब आम चुनाव 2013 या 2014 में हो कांग्रेस और उसके नेतत्ववाली सरकार को अपनी करनी का कुपरिणाम भोगना होगा। देश में आमधारणा बन चुकी है कि आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक अराजकता के लिए सरकार की नीतियां और उसके भ्रष्ट मंत्री जिम्मेदार हैं। सरकार ऐसा कोर्इ कदम नहीं उठायी है जिससे आम आदमी राहत महसूस करे। विचित्र बात यह है कि सोनिया गांधी संवाद बैठक में यह कहती सुनी गयी कि मनमोहन सरकार ने पिछले आठ वर्शों में समाज की बेहतरी के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। अगर यह सच है तो फिर सरकार के मंत्रियों की टांगे भ्रष्टाचार से क्यों बंधी है? सरकार का अंकगणित और जनगणित क्यों बिगड़ गया है? हकीकत तो यह है कि सरकार जनता की बेहतरी के लिए कुछ भी नहीं किया है। सरकार के खाते में अगर मनरेगा जैसी एकाध उपलब्धियां हैं भी तो वह यूपीए एक की सरकार की देन है। लेकिन आश्चर्य है कि सोनिया गांधी से लेकर मनमोहन सिंह समेत सभी कांग्रेसी रणनीतिकार मनरेगा को ही हथियार बना अपना बचाव कर रहे हैं। इससे सरकार की साख और छवि सुधरने वाली नहीं है। आमचुनाव में यूपीए टू को अपनी वर्तमान उपलब्धियों और नाकामियों के बुते विपक्षी सेना से दो-दो हाथ करना होगा। 2009 में दुबारा सत्ता संभालने के बाद सरकार ने वादा किया था कि वह 100 दिन के अंदर महंगार्इ कम करेगी। लोगों को रोजगार देगी। उधोग-धंधों में तेजी लाएगी। सरकार इसमें विफल रही। साढ़े तीन साल के शासन में महंगार्इ और भ्रष्टाचार का ही विस्तार हुआ है। जनता छला महसूस कर रही है। सरकार अपनी गलत नीतियों से महंगार्इ के पांव में पहिए लगा दिए हैं। देश लहूलुहान है। बावजूद इसके सरकार हर रोज महंगार्इ कम होने का दावा कर रही है। कहीं दुनिया में ऐसे महंगार्इ कम होती है। लेकिन सत्ता का भोग लगा रही सरकार यही समझती है कि वह जो कर रही है वह दुनिया का सबसे बेहतरीन उपाय है। नतीजा सामने है। आर्थिक मोर्चे पर सरकार पस्त है। अब तो रिजर्व बैंक भी अपना हाथ खड़ा कर दिया है। पिछले दिनों कर्इ अंतेर्राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा भारत की रेटिंग घटायी गयी। अभी भी स्थिति माकूल नहीं है। निर्यात में गिरावट जारी है। चालू खाते का खाता सरकार के लिए सिरदर्द बना हुआ है। राजस्व संग्रह की रफ्तार ढीली है। शेयर बाजार की स्थिति नाजुक है। स्पेक्ट्रम नीलामी से अनुमानित 40000 करोड़ का लक्ष्य दूर की कौड़ी है। ऐसे में सरकार कितना फड़फड़ाएगी भगवान जानता है। ब्याज दरों को लेकर वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के बीच रार से सराकर की छवि और बिगड़ी है। इन नकारात्मक परिस्थितियों में सरकार आम आदमी की कसौटी पर खरा कैसे उतरेगी यह उसके लिए बड़ी चुनौती है। संवाद बैठक में सोनिया गांधी ने सरकार को चुनावी घोषणा पत्र पूरा करने का निर्देश दिया है। यह तभी संभव होगा जब सरकार के सहयोगी उसका साथ देंगे। ममता की विदार्इ के बाद सरकार ऐसे ताल ठोंक रही थी मानों उसकी सभी समस्याएं खत्म हो गयी है। जादू की छड़ी चलाकर सब कुछ ठीक कर लेगी। लेकिन उसकी दुष्वारियां पहले से भी बढ़ गयी है। एफडीआइ को हरी झंडी दिखाने और सबिसडी वाले गैस सिलेंडरों में कटौती से न तो अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटी है और न ही पेड़ पर पैसे उगे हैं। उल्टे सरकार को समर्थन दे रहे सहयोगी दल उसके खिलाफ हैं। अब सवाल यह गहराने लगा है कि शीतकालीन सत्र में सरकार अटके पड़े महत्वपूर्ण विधेयकों को कैसे पारित कराएगी? विपक्ष समेत सरकार को समर्थन दे रहे æमुक, सपा और बसपा भी एफडीआर्इ के विरोध में हैं। गैस सिलेंडरों में कटौती के सवाल पर भी वे भड़के हुए हैं। ऐसी स्थिति में सरकार का सहज रह पाना संभव नहीं होगा। दूसरी ओर सरकार पर लोकपाल बिल पारित कराने का भी दबाव है। अगर वह इस बार भी विफल रही तो जनता के बीच अच्छा संदेश नहीं जाएगा। भूमि अधिग्रहण को लेकर राहुल गांधी बेचैन हैं। उन्होंने किसानों से वादा कर रखा है। लेकिन सरकार उनकी बेचैनी दूर कर पाएगी इसमें संदेह है। वजह भूमि अधिग्रहण कानून अब संवेदशनशील मुददा बन चुका है। इस पर सियासत भी जारी है। ऐसे में इस पारित कराना आसान नहीं होगा। सोनिया गांधी की अगुवार्इ वाली राश्ट्रीय सलाहकार परिशद द्वारा तैयार खादय सुरक्षा बिल भी बर्फखाने में है। माना जा रहा है कि मनरेगा के तर्ज पर सरकार इसे चुनावी अस्त्र के रुप में आजमा सकती है। लेकिन उससे पहले उसे संसद से पारित कराना होगा। लेकिन इस कवायद मात्र से सरकार की छवि दुरुस्त होगी ऐसा संभव नहीं है। वह लोगों को समझाने में विफल रही है कि वह भ्रष्टाचारियों को संरक्षण नहीं देती है। इस बात की भी संभावना कम है कि शेष कार्यकाल में वह भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कठोर कदम उठाएगी। संवाद बैठक में सोनिया गांधी ने सरकार और पार्टी के बीच समन्वय की बात कही। लेकिन चिंता और चुनौती तो खुद उनके ही सिपाहसालार बने हुए हैं जो कुवचन से सरकार और कांग्रेस के बीच दरार पैदा कर रहे हैं। बटला हाउस कांड से लेकर नक्सली मसले पर दिगिवजय सिंह कर्इ बार सरकार के खिलाफ बोल चुके हैं। अभी भी वे संवैधानिक संस्था कैग पर जुबानी वार कर रहे हैं। विदेश मंत्री सलमान खुर्षीद कानून मंत्री के पद पर रहते हुए चुनाव आयोग की मानमर्यादा का ख्याल तक नहीं रखा। पिछले दिनों बेनी बाबू महंगार्इ को किसानों के लिए वरदान बताते सुने गए। महंगार्इ के सवाल पर पी चिदंबरम भी मध्यम वर्ग को निशाना बना चुके हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी नारायन सामी कैग को बहुसदस्यीय बनाने का सरकारी मंशा जाहिर कर चुके हैं। मजे की बात यह कि सरकार दावा करती है कि वह संवैधानिक संस्थाओं के प्रति संवेदनशील है। आखिर गर्दन उतारकर बाल की रक्षा किस तरह की संवेदनशीलता है। सरकार और कांग्रेस को रोशनी में कपड़ा बदलने से बचना चाहिए। देश की जनता सब देख रही है। दोनों को समझना होगा कि उसके चेहरे पर धूल है, आर्इना पोछने से दाग नहीं जाता। जनता से तादातम्य जोड़ने के लिए दोनों को कथनी और करनी का भेद मिटाना होगा।

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