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-डॉ. मनोज जैन

“पट्टाभि सीतारमैया की हार मेरी हार है” यह कह कर महात्मा गांधी ने एक व्यक्ति को कांग्रेस संगठन और देश पर भारी साबित करने का जो सिलसिला प्रारंभ किया था वह आज कांग्रेस पार्टी ने फिर से स्थापित करने का प्रयास किया है कि सोनिया गांधी इस देश में सभी सवालों से उपर हैं। इसी मूल अवधारणा के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निवर्तमान सरसंघचालक कुप्पहल्ली सीतारामैया सुदर्शन के पुतलों को जला कर संघ विरोधी प्रदर्शन किया जा रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र की अगुआ राजनैतिक पार्टी कांग्रेस अक्सर यह भूल जाती है कि असहमति ही लोकतंत्र का आधार होती है। हमारे संबिधान ने देश की जनता को अपने नेताओं के चरित्र के बारे में चितंन करने का और निर्णय लेने का पूरा अधिकार दिया है।

यूं तो कांग्रेस पार्टी में असहमति के स्वरों को दबा देने का सिलसिला तब ही शुरु हो गया था जब सुभाष बाबू के कांग्रेस अध्यक्ष बनने पर महात्मा गांधी ने कहा था कि “पट्टाभि सीतारमैया की हार मेरी हार है” पर वास्तव में कांग्रेस के खून से लोकतंत्र का डी एन ए तब तो बिल्कुल ही लुप्त हो गया जब कांग्रेसियों ने तमाम बडे नेताओं को खूंटी पर टांग कर “इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा” का नारा बुलंद किया था। आपातकाल के नाम पर जनता की जुबान काटने का काम भी कांग्रेस पार्टी ने ही किया है। तो मीडिया का गला घोंटने की कोशिश करने वाला काला कानून मानहानि विधेयक के नाम पर लाने का कलंक भी इसी कांग्रेस पार्टी के माथे पर लगा हुआ है।

लोकतंत्र के नाम पर एक परिवार के साम्राज्यवाद को पोसने बाली कांग्रेस पाटींर इस देश में भगवान राम का अस्तित्व नकार देने के लिये स्वतंत्र है। भारत माता के सरओम होने वाले अपमान को नजरअदांज करने के लिये स्वतंत्र है। सरकार की नाक के नीचे ही दिल्ली में अरुंधति राय को देश तोडने वाले बयानों पर राख डालने के लिये स्वतंत्र है। बागंलादेश को कई बीघा जमीन बिना कारण देने के लिये स्वतंत्र है। लाल चौक पर तिरगें को जलते देख कर भी आखें मूंदने के लिये स्वतंत्र है। लाखों सिखों की हत्या के लिये जिम्मेदार लोगों को महत्वपूर्ण पदों से नबाजने के लिये स्वतंत्र है। लाखों कश्मीरी पण्डितों को घाटी से बेदखल किये जाने के बाद उनकों भिखमगों से बदतर जिन्दगी जीने देने पर बेशर्मीर से आखें मूदनें के लिये स्वतंत्र है। मकबूल फिदा हुसैन को भारत माता, सरस्वती माता, दुर्गा माता के नगें चित्रों से अपमान को अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता का दर्जा देने के लिये स्वतंत्र है। अपने मंत्रियों के द्वारा अंदमान जेल में स्वातंत्रय वीर सावरकर के अपमान करने देने के लिये स्वतंत्र है। एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को मौत का सौदागर जैसे नितान्त घटिया संबोधनों से अपमानित करने के लिये स्वतंत्र है। देशभक्तों को आतंकबादी कहने और आतंकबादी संगठनों से तुलना करने देने के लिये अपने महासचिवों और युवराज को पूरी स्वतंत्रता देने के लिये स्वतंत्र है। और जब कोई व्यक्ति इस पार्टी से सवाल पूछे तो चौराहों पर गुंडागर्दी का नंगा नाच करने के लिये भी स्वतंत्र है।

आखिर सुर्दशन जी ने देश की सबसे प्रमुख राजनीतिक पार्टी की प्रमुख के बारे में ऐसा नया क्या कह दिया है जिसकी फुसफुसाहट देश के राजनैतिक गलियारों में पहले से ही नहीं गूजं रही है। यह बात और है कि सुदर्शन जैसे बडे व्यक्तित्व ने पहली बार सार्वजनिक मंच से इस प्रकार का वक्तव्य दिया है। लेखक व स्तंभकार ए. सूर्यप्रकाश द्वारा संपादित पुस्तक सोनिया का सच’ में इन प्रश्नों को पहले ही मथा जा चुका है तथा पूर्व केन्द्रीय विधि मंत्री डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने जनता पार्टी की अधिकृत बेबसाइट पर इन प्रश्नों को बहुत पहले ही पूछा है। और जिनके हाथों में देश की 118 करोड़ जनता की किस्मत सौपनें की तयौरी की जा रही है क्या उनका फर्ज नहीं है कि वह अपने माता-पिता, दादी-दादा, नानी-नाना के बारे में देश को बतायें। वह अपना फर्ज समझें न समझें पर देश की जनता को यह सारे सवाल जानने का हक है।

सूर्यप्रकाश ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि सन 1977 में एक भारतीय पत्रकार जावेद लैक ने सोनिया गांधी के पिता के ड्राइगं रुम में मुसोलिनी की पुस्तकों के सग्रंह के बारे में पूछा तो श्री मायनो ने कहा कि नवफासिस्टों को छोड़कर लोकतांत्रिक इटली में किसी अन्य राजनीतिक दल के लिए उनके मन में कोई सम्मान नहीं है बाकी के सारे दल देशद्रोही’ हैं। इस प्रकार के राजनीतिक वातावरण में पली सोनिया गांधी से क्या देश को यह जानने का अधिकार नहीं है कि उनके मन में देश के अन्य दलों के लिये लोकतांत्रिक मर्यादा का क्या स्थान है ?

क्या देश को अपनी नेता से यह जानने का हक नहीं है कि यदि उनके मन में भारत के प्रति इतना ही प्रेम था और वह भारत की आदर्श बहू रहीं है तो राजीव गांधी से विवाह के पन्द्रह सालों के बाद 7 अप्रेल 1983 को उन्होंनें भारतीय नागरिकता के लिये आवेदन क्यों किया था? इतने वर्षों तक उनके मन में भारतीय नागरिकता को लेकर क्या संशय था? पन्द्रह वर्षों तक एक विदेशी के रुप में भारत के प्रधानमंत्री के आवास में रहने पर उन्होंने किसी किस्म का संकोच क्यों नहीं अनुभव किया था?

बिना भारत की नागरिकता के जनवरी, 1980 में नई दिल्ली की मतदाता सूची में उनका नाम किस प्रकार शामिल हो गया। जब इस आशय की धोखाधड़ी की शिकायत मुख्यनिवार्चन अधिकारी के पास पहुंची तब 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटाया गया।

क्या देश को यह जानने का हक नहीं है कि भारत की प्रधानमंत्री अपने ही घर में हत्यारों की गोलियों का शिकार होती रहीं और उनके साथ एक चूहा भी नहीं मारा गया। कांग्रेस पार्टी के सर्वोच्च नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अपनी ही पार्टी की चुनावी रैली में भीषण मानव बम से छत विक्षत हो जाते हैं। उनके साथ कांग्रेस पार्टी का जिला अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष को खरोंच भी नहीं आती है। यह कैसे संभव है? जब भी कोई बड़ा नेता क्षेत्र में जाता है तो स्थानीय नेता उसका कुर्ता नहीं छोडतें हैं ऐसे हालातों में क्या देश को यह जानने का हक नहीं है कि शक की सुई कहां-कहां घूमनी चाहिये। जिस लिट्टे ने राजीव गांधी की हत्या की जिम्मेदारी ली उस लिट्टे के समर्थक रहे एमडीएमके, पीएमके और डीएमके की गलबहियां काग्रेंस के साथ देखकर जनता को कारण जानने का हक है या नहीं?

देश यह जानना चाहता है कि 1977 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी और श्रीमती इन्दिरा गांधी की पराजय के बाद श्रीमती सोनिया गांधी ने अपने बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ इटली दूतावास में शरण क्यों ली थी ? यह चुनावों में पराजय थी कोई तख्ता पलट की घटना नहीं थी। क्या उनके मन पर उनके पिता का फासिस्टवादी दर्शन का उपजा भय काम कर रहा था। यदि उनको भारतीय लोकतंत्र और समाज में आस्था होती तो क्या वह इस प्रकार का कदम उठातीं?

देश के कानून के अनुसार जब कोई व्यक्ति किसी पद पर चयनित हो जाता है और उसके प्रमाण पत्रों में किसी भी प्रकार की हेराफेरी पकड़ी जाती है तो संबधित को न केवल नौकरी से हाथ धोना पड़ता है बल्कि गलत जानकारी देने तथा कागजातों की कूट रचना के लिये धोखाधड़ी की कायमी भी की जाती है। सोनिया गांधी ने लोकसभा में जो अपना जीवनवृत प्रस्तुत किया है उसमें उनकी कैम्ब्रिज विश्वविधालय की डिग्री को लेकर स्व. राजीव गांधी के मित्र डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने कैम्ब्रिज विश्वविधालय से हुये पत्राचार के उपरान्त बताया है कि सोनिया गांधी की डिग्री के सम्बन्ध में कैम्ब्रिज विश्वविधालय ने झुठला दिया है। क्या देश को यह जानने का हक है या नहीं कि स्वामी, सोनिया और कैम्ब्रिज किसकी बातों में सच्चाई है। ऐसे एक नहीं अनेकों प्रश्न है जिनका जबाब देश चाहता है पर आपातकाल के नाम पर सरकारी आंतक बरपाने बाली पार्टी से इन सवालों के जबाब की अपेक्षा करना ही बेमानी है।

(लेखक मध्य प्रदेश के भिंड स्थित जैन महाविद्यालय में प्राध्यापक हैं)

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4 Comments on "कांग्रेस को पसंद नहीं है असहमति का स्वर"

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बी एन गोयल
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लेख के ऊपर श्री राम तिवारी जी की टिपण्णी भी ठीक हैं | मेरी एक मुश्किल है की किस दल से देश के कल्याण की अपेक्षा करें | हमाम में सभी नंगे हैं | कृपया किसी एक दल का नाम बताएं जिसे देश की चिंता हो | जिस के लिए देश का हित सर्वोपरी हो | सभी अपनी अपनी रोटियां सेंक रहे हैं | कितने शर्म की बात है की हर नया दिन एक नए स्केंडल का खुलासा लेकर आता है और पहले दिन के स्केंडल को पीछे धकेल देता है | ताज़ा तरीन स्कंदेल में एक लाख सत्तर हज़ार… Read more »
Anil Sehgal
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कांग्रेस को पसंद नहीं है असहमति का स्वर – by – डॉ. मनोज जैन

किसी भी प्रकार का तंत्र हो, संगठन हो, कोई भी अपने विचारों से सम्पूर्ण सहमति चाहेगा. इसमें क्या . बुराई है ?

असली बात यह है कि असहमति के होने पर उससे कैसे निपटा जाये.

प्रजातंत्र में इसका एक ढंग है, उसी का ही पालन करना चाहिए. हल्ला बोल, पुतले जलाओ, जनता को उकसाओ – यह नहीं होना चाहिए.

ऐसी हरकतों से आप असहमति को दबा नहीं सकते.

– अनिल सहगल –

श्रीराम तिवारी
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यह सही विश्लेषण होता यदि कांग्रेस के साथ साथ भाजपा की भी जन्म पत्री बांची होती …
फुर्सत मिले तो पता लगाना …खोज बीन करना ….की कैसे गोविन्दाचार्य को बाहर का रास्ता दिखाया …दीं दयाल उपाध्य के साथ क्या किया ?तपन सिकदर .शंकरसिंह बाघेला ….उमा भारती …मदन लाल खुराना , तो अभी जिन्दा हैं उन्ही से पूछो की भाजपा में कितना लोकतंत्र है ….कितनी सहनशीलता है ……गडकरी तक के ये हाल हैं की येदुरप्पा आँख दिखा रहे हैं ….असल में भाजपा का कोई स्वतंत्र वजूद नहीं है ….वह तो संघ का अनुसंगी सेवक मात्र है

Nsingh
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कांग्रेश राजनीती के साथ साथ सत्ता मैं एक लम्बे समय तक रहने के कारन विश्व समुदाय के साथ भी व्यापारिक तोरे पर जूरी है

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