लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत की आजादी के बाद से लेकर आज तक ऐसा कोई दिन नहीं गया जिसे जम्मू-कश्मीर के सन्दर्भ में शाँति का दिन कहा जा सके। घाटी के किसी न किसी कोने में पडौसी देश पाकिस्तान और स्थानीय अलगाववादी तत्वों द्वारा हिंसा फैलाने का दुष्चक्र निरन्तर जारी है। पण्डित नेहरू ने सन् 1948 में कश्मीर समस्या का अंतर्राष्टन्ीयकरण करने की जो भूल की, उसका खामियाजा आज तक न केवल जम्मू-कश्मीर की जनता भुगत रही है, बल्कि सम्पूर्ण देश इससे जूझ रहा है। अभी तक हजारों की संख्या में हम अपने कर्मठ सैनिकों और सिपाहियों को कश्मीर समस्या से निपटने के नाम पर शहीद कर चुके हैं।

सेना जब-जब यहाँ अलगाववादी गुटों से सख्ती से निपटने का प्रयास करती है। तब कई मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले तथाकथित नेता सेना के विरोध में खडे होकर घाटी में जहर घोलने का कार्य करते हैं। हाल ही में कश्मीर में फैली हिंसा भी वहाँ के अलगाववादी और भारत विरोधी शक्तियों के षड्यंत्र का परिणाम है। किन्तु जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला का रवैया सेना के विरोध में जाकर बयान देना यही दर्शाता है कि स्वयं मुख्यमंत्री अब्दुला भी घाटी में इन दहशत गर्दों से भयाक्रांत हैं अथवा उनका इन अलगाववादी तत्वों को मौन समर्थन है, जबकि होना यह चाहिए था कि उमर अब्दुल्ला भारत सरकार और सेना को घाटी में दहशतगर्दी फैलाने वाले तत्वों से निपटने के लिए प्रत्येक स्तर पर सहयोग देते।

प्राकृतिक रूप से धरती के स्वर्ग कश्मीर में यदि दहशतगर्दी और आतंकवाद को समाप्त करने में सफलता मिल जाए तो वह दिन दूर नहीं जब भारत सहित वैश्विक पर्यटकों के लिए यह दुनिया के सबसे खूबसूरत राज्यों में से एक होगा, लेकिन लगता है इस ओर न जम्मू-कश्मीर सरकार का ध्यान है और न केन्द्र की संप्रग सरकार का ही। तभी तो घाटी में शाँति स्थापित करने वाली सेना के अधिकारों में कटौती करने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी सहमति जाहिर कर दी है।

तर्क यह दिया जा रहा है कि वहाँ स्थिति छुट-पुट घटनाओं को छोडकर लगभग सामान्य हो चुकी है। सेना आमजनता पर अत्याचार करती है, लेकिन हाल ही भडकी हिंसा में टेलीविजन पर सम्पूर्ण देश ने देखा कि आखिर घाटी की हवा कौन बिगाड रहा है? आज अलगाववादी तत्व कश्मीर की आम जनता में भारत के प्रति जहर भरने का कार्य कर रहे हैं। पाकिस्तान का झंडा और बेनर लेकर विरोध करने वालों को टीवी स्क्रीन पर देशभर में लोगों ने देखा है। अब सेना इनकी संदेहास्पद और आपराधिक गतिविधियों को रोकने का प्रयास करती है तो कौन सा गलत कार्य करती है? कोई पूछे इस बात को हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् और जम्मू कश्मीर के मुख्यंत्री उमर अब्दुल्ला से कि वह सेना की शक्तियों को यह जानते हुए भी कि इसकी दम पर वह बिगडे हालातों और खराब लाईन ऑर्डर की स्थिति को काबू में करने का प्रयास करती है उसे शक्ति प्रदान करने वाले आर्मड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट (एएफएसपीए) सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून में क्यों परिवर्तन कराना चाहते हैं ? उसे हल्का बनाकर या उसमें परिवर्तन कर सेना की शक्तियों को कमजोर करने के पीछे क्या सिर्फ यही कारण जिम्मेदार हैं जो बताये जा रहे हैं अथवा सेना के अधिकार छीनकर भारत को कमजोर व तोडने वाली शक्तियाँ अपने मनसूबों में कामयाब होना चाहती हैं।

सेना प्रमुख वी.के.सिंह ने बिल्कुल सही कहा कि संकीर्ण राजनीतिक लाभों के लिए यह माँग की जा रही है। वस्तुत: विषम परिस्थितियों में कुशलतापूर्वक अपना काम करने के लिए इस प्रकार की कानूनी सुरक्षा जरूरी है। इस कानून को हल्का बनाया गया या वापिस लिया गया तो सेना का संचालन गंभीर रूप से प्रभावित होगा ही भारतीय सैनिकों का मनोबल भी पूरी तरह टूट जाएगा। जो माँयें देश की सुरक्षा के लिए अपने सपूतों को सेना में खुशी-खुशी भेज देती हैं, वे अब सिर्फ मार खाने और मरने के लिए अपने लालों को ऐसी असुरक्षा देने वाले निर्णय के बाद नहीं भेजने वाली। अधिकारियों और रंगरूटों की कमी झेल रही भारतीय सेना को ओर कमजोर होने से कोई नहीं बचा पायेगा।

केन्द्र की संप्रग सरकार ने यदि सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून में परिवर्तन कर दिया। उसे हल्का बनाया तब फिर आतंकियों की मौज ही मौज है। अभी तो वह भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में ही दहशत और आतंक फैलाते हैं फिर तो वह देश के हर कोने में आतंकवादी गतिविधियाँ संचालित करेंगे और हमारी सेनाएँ मूक-बधिर बनकर हाथों में बंदूक होते हुए भी उन्हें हिंसा, अत्याचार के विरोध में इस्तमाल नहीं कर पायेंगी। जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में समान अधिकार और सम्मान का सपना देश के कर्णधारों ने देखा था वह कहीं दूर तिरोहित हो चुका होगा। वैसे वोट बैंक की घटिया राजनीति ने नेताओं के जमीर को इस हद तक मार दिया है कि वह अपने स्वार्थ के आगे कुछ सोच ही नहीं पा रहे हैं। राष्टन्ीय सरोकार और राष्टन्ीय अस्मिता से उन्हें कोई लेना-देना नहीं। तभी तो ऐसे गंभीर मुद्दे पर देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी सहमति दे देते हैं।

आतंकवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए देश में सन् 1985 में राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए आतंकवादी एवं विध्वंसक गतिविधि निरोध अधिनियम (टाडा) लागू किया गया था जो कि 1995 तक पूरी तरह सक्रीय रहा। सभी जानते हैं कि इस के लागू होने के बाद आतंकियों में भय व्याप्त हुआ था और दहशतगर्दी से संचालित गतिविधियों में कमी आई थी। उसके बाद दूसरा अवसर केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में सन् 2002 में उत्पन्न हुआ था जिसमें एनडीए की सरकार ने टाडा की समाप्ति के बाद देश में आतंकवाद निरोधक कानून (पोटा) लागू करने में विपक्षी दलों के भरसक विरोध के बावजूद सफलता प्राप्त कर ली, लेकिन केन्द्र में सत्ता पलटते ही आनन-फानन में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई केन्द्रीय मंत्रिमण्डल की बैठक 17सितम्बर, 2004 में निर्णय लिया गया कि पोटा को खत्म किया जाये। इसके बाद आज तक आतंकवादियों पर पूरी तरह अंकुश लगाने वाला कानून भारत में लागू नहीं किया गया है। उस पर अब सेना के अधिकारों में ओर कमी की जा रही है, जो यह बताने के लिये पर्याप्त है कि केन्द्र की संप्रग सरकार देश की सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं।

इस आर्मड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट में बदलाव करने के पीछे देश को तुकडों-तुकडों में बांटने की साजिश की बू आती है। यदि एक्ट में बदलाव होगा तो देश की सेनाएँ विवश हो जायेंगी वे देश के अशांत क्षेत्रों में दंगाईयों को न गिरफ्तार कर पायेंगी और न ही उन पर गोली चला सकेंगी। फौजियों को अलगाववादी मारेंगे, गौलियों से, बमों से और लात-घूसों से।

यह एक्स जो सेना को संकटग्रस्त क्षेत्र में विशेष शक्तियाँ प्रदान करता है के समाप्त होते ही भारत अपराधियों का चारागाह बन जाएगा, जो अपराध के विरूध्दा आवाज बुलंद करेगा या तो आतंकियों द्वारा मार दिया जायेगा अथवा उसे इतना विवश किया जायेगा कि वह विरोध करने की स्थिति में ही न रहे।

विश्व के सभी देशों ने अपनी सेनाओं को विशेषाधिकार दे रखे हैं। हमारे पडौसी मुल्कों पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका की सेनाओं के पास भी विशेषाधिकार हैं, जिन्हें वहाँ कि सरकारें कम करने की बजाए समय-समय पर ओर शक्ति प्रदान करती हैं, जबकि ठीक इसके विपरीत भारत में सेना की शक्तियों को कम किये जाने के बारे में विचार किया जा रहा है।

वस्तुत: यदि केन्द्र की संप्रग सरकार इस एक्ट में संशोधन कर इसे कमजोर करेगी तो वह दिन दूर नहीं जब पूर्वांचल और कश्मीर को अपने ही देश से कटने से रोका जा सके। देश का सम्मान किसी भी राजनीतिक सीमा से ऊपर है इससे कहीं समझौता नहीं किया जा सकता। आर्मड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट (एएफएसपीए) सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून हमारी सेनाओं का आवश्यक हथियार है, इसे किसी भी कीमत पर उनसे नहीं छीना जाना चाहिए। यही देश की एकता और सुरक्षा के लिए अच्छा होगा।

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2 Comments on "सेना के अधिकार छीनकर देश को कमजोर करने के प्रयास"

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Prof.Lakhan Kushre
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आपका लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा. जो लोग एएफसीपीए कानून को सेना से हटाने की बात करते हैं दरअसल उन्हें जम्मू कश्मीर एवं देश के पूर्वी राज्यों के मौजदा सुरक्षा हालत पर तथ्यात्मक विश्लेषण की आवश्यकता है .

sunil patel
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श्री मयंक जी की चिंता बहुत जायज है. सरकार की ढुलमुल और तुष्टिकरण की निति ने हजारो, लाखो लोगो के प्राण ले लिए है. सरकार चाहती ही नहीं कश्मीर समस्या का निधान. अगर इमानदारी से सरकार चाहे तो सालो, महीनो नहीं बल्कि हफ्तों बल्कि दिनी में समस्या ख़त्म हो जाएगी.

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