लेखक परिचय

इक़बाल हिंदुस्तानी

इक़बाल हिंदुस्तानी

लेखक 13 वर्षों से हिंदी पाक्षिक पब्लिक ऑब्ज़र्वर का संपादन और प्रकाशन कर रहे हैं। दैनिक बिजनौर टाइम्स ग्रुप में तीन साल संपादन कर चुके हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अब तक 1000 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। आकाशवाणी नजीबाबाद पर एक दशक से अधिक अस्थायी कम्पेयर और एनाउंसर रह चुके हैं। रेडियो जर्मनी की हिंदी सेवा में इराक युद्ध पर भारत के युवा पत्रकार के रूप में 15 मिनट के विशेष कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं। प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ लेखक के रूप में जानेमाने हिंदी साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिंदी ग़ज़लकार के रूप में दुष्यंत त्यागी एवार्ड से सम्मानित किये जा चुके हैं। स्थानीय नगरपालिका और विधानसभा चुनाव में 1991 से मतगणना पूर्व चुनावी सर्वे और संभावित परिणाम सटीक साबित होते रहे हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव और एकता के लिये होली मिलन और ईद मिलन का 1992 से संयोजन और सफल संचालन कर रहे हैं। मोबाइल न. 09412117990

Posted On by &filed under लेख.


इक़बाल हिंदुस्तानी

टेलिफोन कम्पनियां खुलकर उड़ा रही हैं निजता की ध्ज्जियां!

सरकार सोशल नेटवर्किंग साइटों पर सेन्सरशिप लगाने की अपनी क़वायद से पीछे हटने का तैयार नहीं है। अब उसके दूरसंचार मंत्री खुलेआम इसके लिये कार्यवाही न कर गूगल को इसके लिये अपने कार्यालय में बुलाकर मजबूर कर रहे हैं। सरकार ने आर्कुट और यू ट्यूब से ऐसी 358 सामाग्री तत्काल हटाने को कहा है जिनमें से 255 में सरकार की आलोचना की गयी है। मज़ेदार बात यह है कि इनमें से मात्र 3 साइटें ऐसी हैं जिनसे अश्लीलता फैलने की आशंका खुद सरकार ने जताई है। साथ ही ऐसी एक भी साइट नहीं हटाने को कहा गया जिससे साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलता हो।

हो सकता है सरकार के इस झूठ को जताने के लिये ही दिल्ली में सभी धर्मों के मुखियाओं ने दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल से मुलाक़ात कर आस्था पर कीचड़ उछालने वाली सामाग्री इंटरनेट से हटाने की मांग तेज़ कर दी है। यह भी हो सकता है कि इसके पीछे खुद सरकारी कारिंदों का ही दिमाग़ एक चाल के तौर पर काम कर रहा हो, क्योंकि यह मामला अगर प्रायोजित हुआ तो इससे सरकार को अपनी मंशा पूरी करने में आसानी हो सकती है। यह एक तरह की पेशबंदी भी हो सकती है। फिलहाल तो इसका मतलब यह है कि सरकार ने केवल अपनी आलोचना और सोनिया गांधी व मनमोहन सिंह सहित अपने मंत्रियों के इंटरनेट पर आपत्तिजनक उल्लेख से तंग आकर यह क़दम उठाया है।

सरकार को यह पता लग चुका है कि एक तो इंटरनेट पर कोई भी सामाग्री पोस्ट होने से पहले एडवांस में वह उस पर रोक नहीं लगा सकती है। दूसरे ऐसा कोई भी नया नियम कानून बनाने पर उसके खिलाफ भ्रष्टाचार को लेकर पहले ही मुखर जनता उसके विरोध में सड़कों पर उतर आयेगी और उसे बैकफुट पर जाकर एक बार फिर मल्टीब्रांड एफडीआई की तरह मुंह की खानी पड़ेगी। सारे जहां का रिकॉर्ड उठाकर देख लो जिन सरकारों ने भी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक लगाने की जुर्रत की उनको तेज़ी से उसकी कीमत चुकानी पड़ी और नतीजा यह हुआ कि वे निर्धारित समय से पहले ही सत्ता से बाहर कर दी गयीं। जो काम सरकार को सख़्ती से करना चाहिये था वह टेलीग्राफी कानून पर कड़ाई से अमल और इनफोरमेशन टैक्नॉलोजी नेटवर्क की निगरानी वह करने में काहिल साबित होती रही है।

एमपी अमर सिंह के फोन टैपिंग मामले में यह सच सामने आया था कि सरकार का टेलिफोन कम्पनियों पर टैपिंग को लेकर कोई नियंत्रण नहीं है। वहां कुछ पैसे ख़र्च करके आप किसी का भी फोन टैप करा सकते हैं। हालत यह है कि ये कम्पनियां कुछ रूपये कमाने के चक्कर में अपने उपभोक्ताओं के निजी नम्बर मार्केटिंग कम्पनियों को बेच देती हैं जिनसे बेतहाशा कॉल और एसएमएस आने से फोन उपभोक्ता परेशान और लाचार हो जाता है। कानून के अनुसार किसी का फोन तभी टैप किया जा सकता है जबकि पुलिस के उपायुक्त रैंक के अधिकारी या गृहसचिव ने इसकी अनुमति दी हो। फोन टैपिंग के बारे में विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे ने चौंकाने वाले दावे किये हैं। असांजे का कहना है कि उसके पास इन दावों के ठोस सबूत भी मौजूद हैं। उनका कहना है कि हमारे देश का पूरा सूचना नेटवर्क यूरूप के देशों के आब्ज़र्वेशन पर है। बैंकों से लेकर क्रेडिट कॉर्ड तक के लेनदेन की अमेरिकी एजंसियों को हाथो हाथ ख़बर मिलती रहती है। हालत इतनी गंभीर है कि पिछले दिनों हमारी सेना के कुछ कम्प्यूटर भी हैक कर लिये गये थे। इतना ही नहीं चीन ने तो हमारी खुफिया एजंसी सीबीआई का पूरा का पूरा सूचना संदेश का नेटवर्क अपने कम्प्यूटरों पर बायडिफाल्ट डायवर्ट कर रखा है। यह बात हमारी समझ से बाहर है कि सरकार डाटा लीकेज न रोककर सोशल नेटवर्किंग के पीछे हाथ धोकर क्यों पड़ी है।

सवाल यह है कि जो सरकार सीबीआई, सेना और बैंकों की जानकारियों को लीक होने और हैक होने से नहीं रोक पा रही उसको यह हक़ किसने दिया कि वह लोगों की निजता में डाका डाले? पता नहीं सरकार को यह कब अहसास होगा कि इंटरनेट के ज़रिये दी जाने वाली प्रतिक्रिया पब्लिक का क्षणिक आवेश और विरोध प्रदर्शन होता है जिसके लिये न तो तथ्यात्मक बहस की जा सकती है और न ही साक्ष्य के तौर पर ऐसी सामाग्री का कोई प्रयोग किसी कानून के तहत स्वीकार्य और मान्यताप्राप्त होने का विवाद सामने है। घर में नहीं दाने अम्मा चली भुनाने वाला काम सरकार कर रही है कि जो उसको करना चाहिये वह उसके बस का नहीं और जो वह कर रही है उससे जगहंसाई हो रही है। सरकार को चाहिये कि अपने गिरेबान में झांककर देखे और अपने कर्म सुधारने का प्रयास करे न कि आइने पर गुस्सा उतारे।

पहले पत्ते , टहनियां फिर डालियां भी काट दीं,

इतना सब कुछ हो गया फिर भी शजर ख़ामोश है।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz