लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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संदर्भः-दलित छात्र रोहित बेमुला की आत्महत्या-

 

प्रमोद भार्गव

केंद्रीय विश्व विद्यालय,हैदराबाद के दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या,एक संभावना की मौत इसलिए है,क्योंकि वह एक तो गरीब होने के बावजूद प्रतिभावान था,दूसरे उसका प्रवेश आरिक्षत कोटे की बजाय मोरिट के आधार पर हुआ था। विज्ञान और लेखन में उसकी रुची थी। एक हद तक परिवार का दायित्व भी उस पर था। ऐसे में निलंबन और छात्रवृत्ति पर रोक ने उसे एकाकी बना दिया और वह अवसाद से घिर गया। बावजूद उसकी महानता है कि उसने ख़ुदकुशी के पहले लिखे मार्मिक पत्र में अपनी मौत के लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया है। मृत्युपूर्व उसका स्वलिखित यह कथन किसी भी संवेदनशील इंसान को झकोरने वाला है। अलबत्ता इस निर्लिप्त एवं मासूम संवेदनशीलता को समझे बिना देश की राजनीति में जरूर उबाल आ गया है। प्रशासनिक विफलता से खिन्न रोहित की खुदकुशी को महज जातिगत भेदभाव और वैचारिक मत भिन्नता से जोड़कर परिभाषित किया जा रहा है,जबकि हम सब जानते हैं कि हरेक राजनीतिक दल अपने छात्र संगठनों का अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते हैं। गोया राजनीतिक दल एक-दूसरे को अनुशासन का पाठ पढ़ाने की बजाय बेहतर है, विवि और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों को बेवजह के सियासी हस्तक्षेप से छुटकारा दिलाने के नीतिगत उपाय करें।

फिलहाल इस मामले में केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय, कुलपति पी अप्पा राव, विधान परिषद के सदस्य रामचंद्र राव और छात्र सुशील कुमार एवं रामकृष्ण के विरूद्ध धारा 306 के तहत एफआईआर में दर्ज की जा चुकी है। यह धारा आत्महत्या के लिए किसी व्यक्ति को प्रेरित या मजबूर करने की भूमिका रचने पर लगाई जाती है। आरोप है कि दलित छात्रों के साथ दत्तात्रेय के कहने पर भेदभाव बरता गया। नतीजतन रोहित आत्मघाती कदम उठाने को विवश हुआ। इस घटनाक्रम के बाद पूरे मामले ने राजनीतिक मोड़ ले लिया। दरअसल 17 अगस्त 2015 को सिकंदराबाद से सांसद दत्तात्रेय ने मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि ‘विवि जातिवादी,अतिवादी और राष्ट्रविरोधी राजनीति का अखाड़ा बन गया है।‘

पत्र लिखने की स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई थी,क्योंकि रोहित और उनका ‘अंबेडकर छात्र संगठन‘ विवि परिसर में नकुलसिंह साहनी की फिल्म ‘मुजफ्फरनगर बाकी है‘ को दिखाए जाने के पक्ष में थे। जबकि विद्यार्थी परिषद का नेतृत्व कर रहे सुशील कुमार फिल्म दिखाने का विरोध कर रहे थे। 1993 के मुंबई विस्फोटों के दोषी याकूब मेनन को फांसी दिए जाने का भी रोहित ने विरोध किया था। इस कारण इन दोनों विपरीत विचारधाराओं के संगठनों में विरोध किसी सार्थक बहस में बदलने की बजाय,हिंसा,मारपीट और सबक सिखाने के अवसरों में परिवार्तित हो गया। जाहिर है,सबक सिखाना उस पक्ष के लिए आसान होता है,जिसका संबंध सत्तारूढ़ दल से हो ?

हमारे शिक्षा संस्थानों का माहौल लगातार इसलिए बिगड़ रहा है,क्योंकि उनमें सत्तारूढ़ दलों का नियुक्तियों से लेकर कार्य संस्कृति तक में हस्तक्षेप जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है। संस्था प्रमुख भी बिना किसी नैतिकता की परवाह किए अपने आकाओं का सही-गलत जो भी हो फरमान मानने और उनकी चिरौरी में घुटने टेकने को तैयार हो जाते हैं। चापलूसी और पदलोलुपता की यह स्थिति तब और आसानी से निर्मित हो जाती है,जब विश्व विद्यालयों में अपात्र एवं वरिष्ठता को नजरअंदाज करके निम्नतर व अयोग्य लोगों को प्रशासन संभालने की ज्म्मिेदारी दे दी जाती है। ऐसे लोग विवादित व विरोधाभासी हालातों में दोनों पक्षों को संतुष्ट करके बीच का रास्ता निकालने में अकसर नाकाम रहते हैं। हैदराबाद की यह घटना भी ऐसी ही नासमझी का जानलेवा परिणाम है। यही वजह है कि कठघरे में कंद्रीय राजनीतिक नेतृत्व और विवि प्रशासन दोनों हैं।

यदि इस मामले की पृष्ठभूमि में जाएं तो पता चलता है कि इस प्रकरण का वास्ता दलितों के उत्पीड़न से जुड़ा नहीं है। छात्र राजनीति करें,अच्छा है,लेकिन मुजफ्फरनगर और याकूब मेमन जैसे विवादित मुद्दों से बचने की जरूरत है। मुजफ्फरनगर तो फिर भी ठीक है,लेकिन मेमन की फांसी का विरोध विवि परिसर में कतई तार्किक नहीं कहा जा सकता ? क्योंकि उसने मुंबई हमले की पृष्ठभूमि तैयार करने में अहम् भूमिका निभाई थी। इस हादसे में हजारों लोग प्रभावित हुए थे और करोड़ो की संपत्ति नष्ट हुई थी। मेमन को फांसी भी कानूनी प्रक्रिया को हरेक स्तर पर पूर्ण करने के बाद दी गई। उसका कृत्य राष्ट्रविरोधी गतिविधि की श्रेणी में था। इसलिए निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय और फिर राष्ट्रपति तक ने सजा की यथास्थिति बनाए रखी।

बावजूद दत्तात्रेय ने अपने पत्र में छात्रों को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्पता का जो पत्र स्मृति ईरानी को लिखा था,उसे कतई उचित नहीं कहा सकता है ? क्योंकि मेमन की फांसी का विरोध तो वकीलों के एक समूह से लेकर कई स्वयंसेवी संगठनों ने भी किया था। तब क्या उन्हें राष्ट्र विरोधी कानून के दायरे में लाकर कठघरे में खड़ा किया गया ? नहीं। तब जो छात्र राजनीति का सबक अपनी मूल शिक्षा ग्रहण करते-करते सीख रहे थे,उन्हें राष्ट्र विरोधी जैसे शब्द की संज्ञा देना,किसी स्तर पर भी तर्क सम्मत नहीं है ? साफ है,दोनों केंद्रीय मंत्रियों ने अपने विवेक और शिक्षा के समावेषी स्वरूप को ध्यान में रखकर प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया। बल्कि जल्दबाजी में अपने दल के अनुशांगिक संगठन के नेताओं की हरेक मांग का आंख मूंद कर समर्थन किया। यह स्थिति राजनीति के स्वरूप की लोकतांत्रिक सरंचना का हिस्सा कतई नहीं थी ? समर्थन का यही अंधापन देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में वैचारिक खुलेपन में दूरी और असहमति को तनावपूर्ण बना रहा है। जबकि शिक्षा परिसरों का दायित्व है कि वे इन्हीं विविध मूल्यों और विलक्षणताओं को सहेजें व प्रोत्साहित करें। गौरतलब यह भी है कि जब हम कश्मीर के अलगाववादियों और इस्लामिक आतंकवाद के बहकावे में आ रहे युवाओं को भी देश की मुख्यधारा में शामिल होने को प्रेरित करते हैं तो फिर इन छात्रों ने ऐसा क्या गंभीर गुनाह कर दिया था कि उन्हें कथित रूप से देशद्रोही कह दिया जाए ?

इस घटना के बाद जरूरत तो यह थी कि राजनीतिक दल इस समस्या का बातचीत से हल ढूंढते ? जिससे रोहित को आत्महत्या जैसी असामान्य स्थिति का शिकार होने की जरूरत नहीं पड़ती ? क्योंकि यह घटनाक्रम लंबा चला है। रोहित और उसके साथी महीनों से अपने निलंबन की बहाली और छात्रवृत्ति पाने के लिए संघर्षरत थे। किंतु अब मौत के बाद गर्म तवे पर राजनीतिक रोटियां सेंकने आंध्रप्रदेश में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति भी लग गई है। जबकि राज्य सरकार की ऐन नाक नीचे पिछले छह माह से एबीपी और एएसए के बीच रस्साकशी चल रही थी।  टीआरएस चाहती तो इस विवाद में समय रहते दखल देकर हल निकाल सकती थी ? किंतु वह अनदेखी करती रही। अब जरूर मुद्दे को भाजपा के खिलाफ एक औजार के रूप में इस्तेमाल करने को तत्पर दिखाई दे रही है। क्योंकि राज्य सरकार के शीर्ष नेतृत्व के इशारे के बिना केंद्रीय मंत्री और कुलपति के विरूद्ध एकाएक प्राथमिकी दर्ज होना संभव नहीं थी ? जबकि दत्तात्रेय खुद भी दलित समाज से हैं। कायमी इसलिए भी की गई,क्योंकि फरवरी माह में आंध्र प्रदेश में नगरीय निकायों के चुनाव होने हैं। टीआरएस इस मुद्दे को उछाल कर भाजपा की हवा निकलना चाहती है। साफ है रोहित की आत्महत्या अपना-अपना राजनीतिक जनाधार बढ़ाने के सियासी समीकरणों में बदलती जा रही है। टीआरएस के सांसद व तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की बेटी कल्वकुंतला कविता के नेतृत्व में ‘तेलंगाना जागृति युवा मोर्चा‘ ने बंडारू दत्तात्रेय के घर पर प्रदर्शन किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसे सीधे हत्या ठहराया है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी अब कह रहे हैं कि रोहित कृत्रिम परिस्थितयों का शिकार हुआ है। प्रसिद्ध कवि अषोक वाजपेयी ने इसी विवि से दी गई डी लिट् की मानद् उपाधि लौटाने की घोशणा की है। सवाल उठता है कि घटना के बाद शुरू हुई इन प्रतिक्रियाओं से क्या विवि परिसर का माहौल समरस हो जाएगा या ये प्रतिक्रियाएं असहिष्णुता को और गाढ़ा करेंगी ?

यह अपनी जगह सही है कि यह घटना शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव की कड़वी सच्चाई को रेखांकरित करती है। क्योंकि इस विवि में दलित छात्रों द्वारा एक दशक में खुदकुशी करने की यह नौंवी घटना है। अन्य विश्व विद्यालयों में भी केवल चार साल के भीतर 18 दलित छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। ऐसे में किसी नाजुक मुद्दे से खेलने की बजाय गरिमापुर्ण ढंग से समाधान निकालने की जरूरत है,जिससे दलित छात्रों को रोहित जैसे विपरीत हालातों का सामना न करना पड़े। यह इसलिए भी जरूरी है,क्योंकि रोहित ने भी मौत को गले लगाने के बावजूद पत्र में बेहद संयत एवं गरिमामयी लहजे में अपनी पीड़ा को अभिव्यक्ति दी है। लिहाजा राजनीतिकों और बुद्धिजीवियों को इस अभिव्यक्ति से भी सबक लेने की जरूरत है।

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