लेखक परिचय

राजीव गुप्ता

राजीव गुप्ता

बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय एवं एम. बी. ए. की डिग्रियां हासिल की। राजीव जी की इच्छा है विकसित भारत देखने की, ना केवल देखने की अपितु खुद के सहयोग से उसका हिस्सा बनने की। गलत उनसे बर्दाश्‍त नहीं होता। वो जब भी कुछ गलत देखते हैं तो बिना कुछ परवाह किए बगैर विरोध के स्‍वर मुखरित करते हैं।

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समानो मन्त्रः समिति समानो

समानं मनः सह चित्तमेषाम !

समानं मंत्राभिः मन्त्रये वः

समानेन वो हविषा जुहोनि !!

लोगों का लक्ष्य और मन समान हो , तथा वे समान मन्त्र से, समान यज्ञों के पदार्थों से ईश्वर का मनन करें ! ऋग्वेद और अथर्ववेद के इन सूक्तियों में कुछ हद तक हम लोकतंत्र ( समानता की बात की गयी है ) की पृष्ठभूमि देख सकते हैं ! एक पुस्तक में मैंने पढ़ा कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहमलिंकन की परिभाषा के अनुसार – लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन – प्रामाणिक मानी जाती है। लोकतंत्र में जनता ही सत्ताधारी होती है, उसकी अनुमति से शासन होता है, उसकी प्रगति ही शासन का एकमात्र लक्ष्य माना जाता है। परंतु लोकतंत्र केवल एक विशिष्ट प्रकार की शासन प्रणाली ही नहीं है वरन् एक विशेष प्रकार के राजनीतिक संगठन, सामाजिक संगठन, आर्थिक व्यवस्था तथा एक नैतिक एवं मानसिक भावना का नाम भी है। लोकतंत्र जीवन का समग्र दर्शन है जिसकी व्यापक परिधि में मानव के सभी पहलू आ जाते हैं। लोकतंत्र की आत्मा जनता की संप्रभुता है जिसकी परिभाषा युगों के साथ बदलती रही है। इसे आधुनिक रूप के आविर्भाव के पीछे शताब्दियों लंबा इतिहास है। यद्यपि रोमन साम्राज्यवाद ने लोकतंत्र के विकास में कोई राजनीतिक योगदान नहीं किया, परंतु फिर भी रोमीय सभ्यता के समय में ही स्ताइक विचारकों ने आध्यात्मिक आधार पर मानव समानता का समर्थन किया जो लोकतंत्रीय व्यवस्था का महान् गुण है। सिसरो, सिनेका तथा उनके पूर्ववर्ती दार्शनिक जेनों एक प्रकार से भावी लोकतंत्र की नैतिक आधारशिला निर्मित कर रहे थे। मध्ययुग में बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी से ही राजतंत्र विरोधी आंदोलन और जन संप्रभुता के बीज देखे जा सकते हैं। यूरोप में पुनर्जागरण एवं धर्मसुधार आंदोलन ने लोकतंत्रात्मक सिद्धांतों के विकास में महत्वपूर्ण योग दिया है। इस आंदोलन ने व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता पर जोर दिया तथा राजा की शक्ति को सीमित करने के प्रयत्न किए। लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप को स्थिर करने में चार क्रांतियों, 1688 की इंगलैंड की रक्तहीन क्रांति, 1776 की अमरीकी क्रांति, 1789 की फ्रांसीसी क्रांति और 19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति का बड़ा योगदान है। इंगलैंड की गौरवपूर्ण क्रांति ने यह निश्चय कर दिया कि प्रशासकीय नीति एवम् राज्य विधियों की पृष्ठभूमि में संसद् की स्वीकृति होनी चाहिए। अमरीकी क्रांति ने भी लोकप्रभुत्व के सिद्धांत का पोषण किया। फ्रांसीसी क्रांति ने स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धांत को शक्ति दी। औद्योगिक क्रांति ने लोकतंत्र के सिद्धांत को आर्थिक क्षेत्र में प्रयुक्त करने की प्रेरणा दी। आजकल सामान्यतया दो प्रकार के परंपरागत लोकतंत्रीय संगठनों द्वारा जनस्वीकृति प्राप्त की जाती है – संसदात्मक तथा अध्यक्षात्मक। संसदात्मक व्यवस्था का तथ्य है कि जनता एक निश्चित अवधि के लिए संसद् सदस्यों का निर्वाचन करती है, जिस व्यवस्था को भारत ने अपनाया हुआ है ! संसद् द्वारा मंत्रिमंडल का निर्माण होता है। मंत्रिमंडल संसद् के प्रति उत्तरदायी है और सदस्य जनता के प्रति उत्तरदायी होते है। अध्यक्षात्मक व्यवस्था में जनता व्यवस्थापिका और कार्यकारिणी के प्रधान राष्ट्रपति का निर्वाचन करती है। ये दोनों एक दूसरे के प्रति नहीं बल्कि सीधे और अलग अलग जनता के प्रति विधिनिर्माण तथा प्रशासन के लिए क्रमश: उत्तरदायी हैं। इस शासन व्यवस्था के अंतर्गत राष्ट्र का प्रधान (राष्ट्रपति) ही वास्तविक प्रमुख होता है। इस प्रकार लोकतंत्र में समस्त शासनव्यवस्था का स्वरूप जन सहमति पर आधारित मर्यादित सत्ता के आदर्श पर व्यवस्थित होता है। लोकतंत्र केवल शासन के रूप तक ही सीमित नहीं है, वह समाज का एक संगठन भी है। सामाजिक आदर्श के रूप में लोकतंत्र वह समाज है जिसमें कोई विशेषाधिकारयुक्त वर्ग नहीं होता और न जाति, धर्म, वर्ण, वंश, धन, लिंग आदि के आधार पर व्यक्ति व्यक्ति के बीच भेदभाव किया जाता है। वास्तव में इस प्रकार का लोकतंत्रीय समाज ही लोकतंत्रीय राज्य का आधार हो सकता है।

राजनीतिक लोकतंत्र की सफलता के लिए उसका आर्थिक लोकतंत्र से गठबंधन आवश्यक है। आर्थिक लोकंतत्र का अर्थ है कि समाज के प्रत्येक सदस्य को अपने विकास की समान भौतिक सुविधाएँ मिलें। लोगों के बीच आर्थिक विषमता अधिक न हो और एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का शोषण न कर सके। एक ओर घोर निर्धनता तथा दूसरी ओर विपुल संपन्नता के वातावरण में लोकतंत्रात्मक राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं है।

नैतिक आदर्श एवं मानसिक दृष्टिकोण के रूप में लोकतंत्र का अर्थ मानव के रूप में मानव व्यक्तित्व में आस्था है। क्षमता, सहिष्णुता, विरोधी के दृष्टिकोण के प्रति आदर की भावना, व्यक्ति की गरिमा का सिद्धांत ही वास्तव में लोकतंत्र का सार है।

हम भारतवासियों का सौभाग्य रहा है कि स्वतंत्रता की प्रभात – वेला में हमें ऐसे देश भक्त नेता मिले जो देश के लिए समर्पित के साथ साथ उच्च कोटि के भी थे ! समय ने करवट बदला ! भारत ऐसा देश है जिसके पास दुनिया का लिखित संविधान है ! परन्तु अब भारत जिसने हर संकट की घड़ी में बिना धैर्य खोये हर मुसीबत का सामना किया, अनेकों बुराइयों से जकड गया मसलन आतंकवाद, भ्रष्टाचार, आर्थिक विषमता, जातिवाद, सत्ता लोलुपता के लिए सस्ती राजनीति करना जो कि कभी कभी सामाजिक वैमनष्य के साथ साथ देश की एकता को ही संकट में डाल देता है , राजनीति में वंशवाद व भाई-भतीजावाद, न्यायिक प्रक्रिया में विलम्ब आदि-आदि ! एक पुस्तक ‘भारतीय राजनीति सिद्धांत समस्याएं और सुधार” में मैंने पढ़ा भी है कि राष्ट्रीय संविधान कार्यकरण समीक्षा आयोग ने सिविल और न्यायिक प्रशासन के बारे में कहा है कि प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार, उदासीनता और अक्षमता ने गैर-कानूनी प्रणालियों, सामानांतर अर्थ-व्यवस्थाओं और सामानांतर सरकारों तक को जन्म दिया है ! नौकरशाही के भ्रष्टाचार और चालबाजियों ने लोगों के दैनिक जीवन में निराशा घोल दी है ! वें कानून की सीमाओं को लाघने लगे है ! कुशासन ने न्याय-तंत्र की निष्पक्षता में लोगों की आस्था हिला दी है ! इस कारण लोगो का अब लोकतंत्र की संस्थाओं में अविश्वास और मोहभंग हो गया है ! लोगों की जबाबदेही की प्रकृति घटती जा रही है ! भ्रष्टाचार का चारों ओर बोल-बाला है ! सार्वजानिक हित को चोट पहुची है ! अनुच्छेद 311 ने सेवाओं संविधानिक सुरक्षा प्रदान की है ! बेईमान आधिकारियों ने अपने गलत कामों के परिणामों से बचने के लिए इस अनुच्छेद की आड़ ली है ! न्याय-व्यवस्था ने समाज की साधारण आशाओं तक को पूरा नहीं किया है ! लोगों को न्याय पाने में. अत्यधिक देरी लग जाती है और उनका खर्च भी अंधाधुंध हो जाता है ! न्याय – प्रक्रिया धीमी है और उसमे अनेक दांव – पेच है ! यह कहा जा सकता है कि संविधान द्वारा स्थापित लोकतंत्रात्मक राज्य-व्यवस्था पर भारी दबाव है ! संविधान निर्माताओं का स्वप्न भंग हो चुका है ! संविधान में निर्दिष्ट आधारभूत मूल्य और आकांक्षाएं पूरी नहीं हुई है ! राजनीतिक व्यवस्था में अनेक विकृतियों का समावेश हुआ है ! राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण , बाहुबल, धनबल, और माफिया शक्ति के बढ़ते हुए महत्त्व, राजनीतिक जीवन में जातिवाद, साम्प्रदायिकता तथा भ्रष्टाचार के प्रभाव ने राजनीतिक परिदृश्य को विषाक्त कर दिया है ! भारत में आजादी के इतने वर्ष बाद अभी भी गरीब और अशिक्षित है जो कि एक कलंक के समान है ! खंडित समाज में राष्ट्र की एकता, राष्ट्रीय अखंडता या भारतीय अस्मिता राजनीतिक मंचो से बोले जाने वाले नारे-मात्र सिद्ध हुए है ! राजनीति अब एक व्यवसाय बन गयी है ! सभी जीवन मूल्य बिखर गए है ! धन तथा व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए सत्ता का अर्जन सर्वोच्च लक्ष्य बन गया है ! अब राजनीतिक पार्टियों को स्पष्ट बहुमत मिलना लगभग बंद सा हो गया है ! जिसके कारण गठबंधन सरकारे अस्तित्व में आ गयी ! परिणामतः इच्छा शक्ति में कमी के साथ साथ नेतृत्व क्षमता भी प्रभावित हो रही है और दुहाई गठबंधन की मजबूरी की दी जाती है ! राजनीतिक नेता सत्ता हथियाने के लिए आपस में संघर्ष करने लगे है ! समाज में विघटनकारी तत्वों की बन आई है ! प;रतिस्पर्धाओं और भ्रष्टाचारों का वर्चस्व स्थापित हो गया है ! जो पहले सांस्कृतिक, धार्मिक, या भाषाई समूह थे, वे अब राजनीतिक अल्पसंख्यक वर्ग, अथवा, जातीय-राष्ट्रीय समूह बन गए ! धर्म, जाति, उपजाति, भाषा, प्रदेश ये सब राजनीतिज्ञों के सत्ता पाने की लालसा की कठपुतलियाँ बन गयी है ! कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि देश के लिए गर्व का ये मुहावरा “विविधता में एकता” जो भारत के लिए प्रयोग किया जाता है कही राजनीतिज्ञों को दु-राजीनति करने का हथियार तो नहीं है ? सभी राजनीतिक दलों और व्यावसायिक राजनीतिज्ञों ने अनुभव किया कि सत्त्मूलक राजनीति के खेल और निर्वाचकीय लड़ाईयों में सफलता पाने के लिए जातीय-सांप्रदायिक, कबाइली और भाषाई भेदभावों को बढ़ावा देना है ! राजनीतिक व्यवस्था में सत्ता के व्यापारियों के लिए मूल्यवान वस्तु है वोटों का गणित जिसके लिए वो धर्म,जाति,भाषा,प्रदेश आदि के नाम पर फूट डालकर एकता को खंडित करने से भी नहीं चूकते ! राजनीति के खिलाड़ी सत्ता की दौड़ में इतने व्यस्त हो गए है कि उनके लिए विकास,जनसेवा अथवा राष्ट्र-निर्माण की बात करना बेईमानी है ! संसदीय शासन-प्रणाली के अंतर्गत सत्ता के दलालों और वोट के व्यापारियों की बन आई ! अभी हाल में ही संसद के अन्दर हुए “वोट के बदले नोट” काण्ड इसका प्रत्यक्ष उदहारण है ! रोम साम्राज्य के इतिहासकार एडबर्ड गिबन से कहा गया था कि वे अपनी रचनाओं को एक वाक्य में प्रस्तुत करे ! गिब्बा थोड़ी देर में चुप रहे और बोले कि रोम के लोग और उनके नेता रोम के सेवा में अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए तैयार थे तब रोम ने अपूर्व उन्नति की, और जब रोम के लोग और उनके नेता ने रोम से ज्यादा से ज्यादा लेने के लिए तैयार हो गए तब, रोम का पतन हो गया ! तभी तो चिंतन करने के पश्चात “देश हमें देता है सबकुछ हम भी तो कुछ देना सीखें” किसी ने कहा होगा ! कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में यहाँ तक कह दिया है कि “जिस तरह पानी में तैरती हुई मछली के बारे ये नहीं कहा जा सकता कि वो पानी पी रही है कि नहीं ठीक उसी तरह सरकारी काम में लगे हुए कर्मचारियों के बारे में भी यह नहीं पता लगाया जा सकता कि वो भ्रष्ट है या नहीं !” कौटिल्य ने भ्रष्ट कर्मचारियों द्वारा बेईमानी से अर्जित किये हुए धन को जब्त कर उन्हें स्थानांतरित कर उन्हें दूसरे काम में लगाया जाने की बात भी कही है ! परन्तु भारतवर्ष में किसी कि क्या मजाल जो भ्रष्टाचार के खिलाफ तथा व्यवस्था परिवर्तन की बात करे ! अभी हाल ही में अन्ना हजारे जी व बाबा रामदेव के नेतृत्व में हुए आन्दोलन इसका प्रत्यक्ष उदहारण है ! हालाँकि संविधान के कार्यकारण की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग ने जिसमे 31 मार्च ,2002 को अपनी रिपोर्ट पेश की, उसमे यह शिफारिश की गयी कि सरकारी कर्मचारियों के द्वारा अर्जित संपत्ति को जब्त कर लिया जाय, परन्तु अब वह रिपोर्ट संभवतः ठन्डे बसते में चली गयी होगी ! डा. राधाकृषण ने 14 -15 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि को बोलते हुए कहा था कि ” जब तक हम ऊंचे स्थानों में भ्रष्टाचार को नष्ट नहीं करेंगे, पक्षपात, सत्ता-लोलुपता,मुनाफाखोरी और कालाबाजारी को जिसने पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश की कीर्ति को कलंकित कर रखा है, जडमूल से नहीं मिटायेंगे, तब तक हम प्रशासन, उत्पादन, और जीवन की आवश्यक वस्तुओं के वितरण में कुशलता नहीं ला सकेंगे !” ये शब्द वर्तमान समय में और भी ज्यादा महत्व रखते है ! पूर्व राष्ट्रपति के.आर.नारायणन ने सार्वजानिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार की चर्चा करते हुए कहा था कि पहले सार्वजानिक पड़ एक पवित्र-स्थान समझा जाता था ! लेकिन अब वह “अधिक से अधिक पदाधिकारियों तक के लिए पैसा कमाने और सत्ता हथियाने का साधन बन गया है !” यह कटु सत्य है कि हमारा समाज स्वयं भ्रष्ट हो गया है ! भ्रष्टाचार उसकी शायद नितांत आवश्यकता बन गया है ! लोगों के मन में भ्रष्टाचार एक जीवन पद्धति के रूप में अंकित हो गया है और उसे विकास का प्रेरक माना जाने लगा है ! उदहारण के लिए आजकल रिश्ते के लिए जब लड़के वालों से उसकी जीविका के बारे में पूछा जाता है तो बड़े सहज रूप से बखान करते हुए कहते है कि साहब तनख्वाह 10,000 हजार रुपये है और ऊपर की कमाही भी लगभग इतनी ही है ! आजकल स्कूल में नर्सरी में दाखिले से लेकर एम्स जैसी संस्थान में एम्.डी. की पढाई तक घूसखोरी का बोलबाला है और तो और परीक्ष से पहले ही परीक्षा पत्र लीक हो जाते है जिसका खुलासा अभी हाल में ही मीडिया ने कई बार किया है ! यह कहना कोई हास्यापद नहीं होगा कि अब भारतीय लोकतंत्र का अर्थ है भ्रष्ट लोगों का, भ्रष्ट लोगो द्वारा, भ्रष्ट लोगों के लिए शासन मात्र राह गया है ! भारतीय चिंतन वसुधैव कुटुम्बकम का अर्थ अब ये हो गया है कि पूरा संसार एक मंडी अथवा बाजार से ज्यादा कुछ नहीं है जहा सब कुछ खरीदा व बेचा जाता है ! अब तो राजनेताओं के लिए घोटाले करना उनकी शान की बात बन गयी है !

अदालतों में मुक़दमे निपटने में देरी गंभीर चिंता का विषय बन गया है ! लम्बी छुट्टियों की वजह से तो न्याय में देरी होती है, व्यर्थ की मुकुदमेबाजी और वकीलों की आये दिन की हड़तालें भी अदालतों के काम को प्रभावित करती है ! कभी कभी तो अनेक आरोपी पुलिस हिरासत में ही दम तोड़ देते है अथवा सजा से ज्यादा समय वो कैद में ही बिता देते है ! प्रभावशाली व्यक्तियों को भ्रष्टाचार या हत्या, बलात्कार, अपहरण, तस्करी जसी संगीन अपराधों के लिए भी दंड नहीं मिलता ! इनके मुकुदमें ज्यादा से ज्यादा दिनों तक चले बस यही कोशिश रहती है, और बाद में साक्ष्य के आभाव में या किसी और के आभाव में ये बेदाग छोट जाते है ! आदालतों में पैसा पानी की तरह बहता है जो कि आम आदमी के बूते की बात नहीं है ! वकील भारी फीस लेते है और वह भी नगद !

यदि हर स्तर पर सामूहिक कोशिश की जाय तो अनेक समस्याओं से और इन चुनौतियों से निजात पाया जा सकता है ! भारत में सबसे अधिक जनसँख्या युवाओं की है ! वो ही देश का भविष्य है ऐसा प्रायः कहा जाता है ! अब उन्हें ही कुछ क्रांतिकारी कदम उठाना होगा ! लेकिन उससे पहले उन्हें इन समस्याओं तथा चुनौतियों के मूल तक जाना होगा और समझ कर उसका निदान ढूढना होगा ! मसलन राजनीति में भ्रष्टाचार का मुख्य कारण निर्वाचन-प्रक्रिया और राजनेता की नियत है ! क्योंकि निर्वाचन में इतना ज्यादा खर्च होता है जिसका ठीक ठीक हिसाब भी नहीं लगाया जा सकता ! इसी के कारण अनैतिक और अवैध प्रथाओं का विकास हुआ है ! सुधारों का एक विकल्प गांधी जी का माडल है जिसके अंतर्गत राजनीति को जनता की सेवा का साधन समझा जाता है ! गांधीवादी व्यवस्था में सत्ता का निम्न स्तर तक विकेंद्रीकरण होता है ! साधारण व्यक्ति अपने को स्वतंत्र समझता है, वह शासन-कार्यों में भाग लेता है ! शासन की इकाई गाँव होता है ! सत्ता का रूख ऊपर से नीचे न होकर नीचे से ऊपर की ओर होता है ! समूचा शासन पारदर्शी होता है ! गांधी जी भी निर्वाचन पर कम से कम खर्च चाहते थे ! कुछ चिंतको और विद्वानों का भी मानना है कि निर्वाचन में मतदान आवश्यक कर देना चाहिए ऐसा कई देशों में भी है जिसका समर्थन पूर्व राष्ट्रपति श्री आर. वेंकटरामण ने भी किया था ! निर्वाचनो में निर्दलीय सदस्यों की बढ़ती हुई संख्या ने निर्वाचन-प्रक्रिया को विकृत कर दिया है ! इससे निर्वाचन का खर्च भी बढ़ा है ! एक लेखक ने निर्वाचन में खर्च होने वाले धन के सात स्रोत बताये है ! इसका पहला स्रोत है राज्य, दूसरा स्रोत है उम्मीदवारों का स्वयं का पैसा , तीसरा स्रोत है उनके राजनैतिक दाल, चौथा स्रोत है उनके व्यापारिक सम्बन्ध, पांचवा स्रोत है अपनी इच्छा से देने वाले दान दाता , छठा स्रोत है विदेशी पैसा जैसा हवाला जैसे माध्यम और सातवां स्रोत है समान हितों वाले निकायों के सिंडिकेट ! अब इनसे बचना है टी पहला कदम यह होना चाहिए कि सभवतः राज्य विधान सभा का और संसद का चुनाव एक साथ होना चाहिए, निर्वाचन अभियान की समय सीमा घटा देनी चाहिए, किसी भी उम्मेदवार को एक से अधिक जगह से चुनाव लड़ने की छूट नहीं होनी चाहिए, आचरण-सहित को एक विधि के रूप दे देना चाहिए, खर्चे की अधिकतम सीमा तय होनी चाहिए और साथ ही रसीदों के आधार पर लेखा-परीक्षा आवश्यक कर देनी चाहिए !

देश के सामने चरित्र का संकट है ! यह चारित्रिक संकट व्यक्तिगत भी है और सामूहिक भी ! हमारे जीवन में पाए जाने वाले अधिकांश भ्रष्टाचार का कारण बाजार-केन्द्रित व्यापर और धन-केन्द्रित पश्चिमी उपभोक्ता मूल्य है ! जब तक जीवन का अंतिम लक्ष्य धन होगा तब तक भ्रष्टाचार का अंत नहीं होगा ! यह घोर चिंता का विषय है कि हम अपने स्वर्णिम के अतीत को भूलते जा रहे है ! हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अपने मूल और अपने आदर्शों को भूलने वाले राष्ट्र नष्ट हो जाया करते है ! जो समाज अपने बच्चों को अपनी परंपरा का, सदियों की संचित विवेक-सम्पदा का और जीवन मूल्यों का ज्ञान नहीं देते वें महाकाल की धूल में लीन हो जाया करते है ! समाज पुरस्कार और दंड के सिद्धांत पर चलता है ! यदि लोगों को भ्रष्टाचार का लाभ नहीं मिलेगा और भ्रष्टाचार में संलिप्त व्यक्तियों को तुरंत दंड का प्रावधान हो जाय तो भ्रष्टाचार में कमी आ जायेगी ! फिर प्रधानमंत्री को किसी गठबंधन की मजबूरी नहीं होगी और केन्द्रीय मंत्री को सेना भेजकर काला धन वापस मंगवाने जरूरत नहीं होगी ! हर देशभक्त विशेषकर युवाओं को भ्रष्टाचार के खिलाफ आगे आकर अपना विरोध जाताना चाहिए ! हम सभी युवाओं को अब स्वामी विवेकानंद जैसे चिंतको के द्वारा दिखाए गए गए मार्ग पर चलने का समय आ गया है ! उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा है कि –

“उत्तिष्ठत जाग्रत ,

प्राप्यवरान्निबोधत !

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्या

दुर्ग पथस्तत कवर्योवदन्ति !!”

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1 Comment on "लोकतंत्र : चुनौतियाँ और समाधान"

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आर. सिंह
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मेरे विचार से यह लेख विवेचनापूर्ण होते हुए भी वस्तुतः एक युवक के दिल से निकला हुआ उदगार और इस भयावह समस्या के समाधान हेतु अग्रसर होने के लिए आवाहन है,पर मैं उद्दीयमान लेखक को कुछ बातों को याद दिलाना चाहूंगा .उन्होंने जब लिखा की “कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में यहाँ तक कह दिया है कि “जिस तरह पानी में तैरती हुई मछली के बारे ये नहीं कहा जा सकता कि वो पानी पी रही है कि नहीं ठीक उसी तरह सरकारी काम में लगे हुए कर्मचारियों के बारे में भी यह नहीं पता लगाया जा सकता कि वो भ्रष्ट… Read more »
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