लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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shivaदेवभूमि में बादल फटे,

यात्री बाढ़ में फंसे,

प्रलय सा मच गया,

देखो, हाहाकार।

भागीरथी और अलखनन्दा में,

भीषण जल प्रवाह,

बस और कारें ऐसे बहीं,

जैसे कग़ज़ की नाव,

बाढ़  प्रकोप से उजड़ गये,

उत्तरकाशी व देवप्रयाग,

बद्री नाथ तो बच गये,

उजड़े केदार नाथ,

सारी बस्ती बह गई,

रह गये भोलेनाथ।

गंगा तट पर ऋषिकेश में,

शिव की मूर्ति विशाल,

जटाओ मे न रोक सके,

गंगा को इस बार,

मूर्ति जलमग्न हुई,

गंगा मे इस बार।

प्रलय सा मच गया,

देखो, हाहाकार।

भूखे प्यासे लोग बिताये,

पहाड़ पर ऐसे में दिन रात,

कब कोई हैलीकौप्टर,

आके बचाये जान।

अपनों से बिछड़े कई,

ढूँढे चारों ओर ,

प्रलय सा मच गया,

देखो, हाहाकार।

गये साठ थे गाँव से,

लौटे केवल आठ,

कैसा हुआ विनाश,

रोती आंखे अपनों की,

टिकीं द्वार पर आज।

राजनीति ने त्रासदी में ,

अपने पसारे पाँव,

कोई हवाई दौरा करें,

कोई सूरत दिखायकर,

वापिस लौट जायें,

कोई थोडा सा करें,

कई गुना जतलायें।

ऐसी अंधेरी रात मे,

चोर लूट मचाये,

पैसे बनाने के लिये,

मुनाफा़खोर आँख लगायें,

खाने की चीज़ों के दाम,

पाँच गुना बढ़ाये।

सभी नही ऐसे मगर,

कई आधी रोटी,

बाँट के खांये।

प्रकृति की इस त्रासदी में,

सेना के जवान,

बचाव कार्य में ऐसे लगे,

कुछ ने गंवाई जान।

उनको शत् शत् प्रणाम।

 

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