लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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tarun vijayसंदर्भ-ः उत्तराखण्ड में दलितों के मंदिर में प्रवेश पर सांसद तरुण विजय पर हमला

प्रमोद भार्गव

उत्तराखण्ड के एक मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर की जा रही परिवर्तन यात्रा के वाहक सांसद तरुण विजय पर जानलेवा हमला बेहद चिंताजनक व शर्मनाक है। यह घटना उस उत्तराखण्ड में हुई जिसे देवताओं की भूमि माना जाता है और देश के प्रसिद्ध चारतीर्थ इसी उत्तराखण्ड में हैं। इन चारों तीर्थों के दर्शन के लिए करोड़ों लोग हर साल देश के कोने-कोने से आते है, जिनमें सभी जातियों के लोग होते हैं। इन मंदिरों में दलितों को प्रवेश से न तो कोई रोकता है और न ही कोई व्यक्ति की जाति पूछता है। ऐसे में यदि चक्रराता के पोखरी में शीलगुर देवता मंदिर में प्रवेश को लेकर दलितों को रोका जाता है तो यह हैरानी में डालने वाली बात होगी। आजादी के 70 साल बाद देश में ऐसी घटनाएं देखने में आ रही है तो हिंदु धर्म के शंकराचार्यों और धर्माचार्यों का कर्तव्य बनता है कि वे ऐसे मंदिरों में दलित जातियों के प्रवेश के लिए आगे आएं और समारोहपूर्वक दलितों का मंदिर में प्रवेश कराएं, जैसा कि महाराष्ट्र के मंदिरों में हुआ है।

सनातनी हिंदुओं द्वारा अपने ही समाज के एक बड़े हिस्से को भिन्न व अस्पृदृश्य वर्ग बना देना हिंदु धर्म के माथे पर सदियों से चला आ रहा एक ऐसा कंलक था, जो धोए नहीं धुल रहा है। हालांकि पंढरपुर और तिरूपति मंदिर के द्वार पर दलितों का स्वागत हिंदू समाज में कमावेश परंपरा बन चुकी रूढ़िवादिता ,छूआछूत और जातिवाद को समाप्त कर देने की दिशा में ऐतिहासिक पहलें हो चुकी हैं। ये कोशिशें दलितों के हित साध्य के हेतुओं में राजनीतिक स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा सामाजिक समानता और समरसता का महत्व रखती हैं। क्योंकि ये व्यक्ति की गरिमा बढ़ाती हैं और जतिगत हीनता बोध को समाप्त करती हैं। फलस्वरूप उनका आत्मबल भी प्रबल होता है। गोया, ऐसे सम्मान दलितों को हिंदुओं की मुख्यधारा में जोड़ने का काम करते हैं। इस तरह की कोशिशें ही धर्मांतरण पर अंकुश लगाने का काम कर सकती हैं। इस लिहाज सक तरुण विजय वर्जना को तोड़ने का महत्वपूर्ण काम कर रहे थे। इस दृष्टि से भाजपा अध्ययक्ष अमित शाह ने दलित साधु-संतों को लेकर सिंहस्थ में शिप्रा में डुबकी लगाकर समरसता का संदेश दिया है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दलित युवाओं को पूजा-पाठ का प्रशिक्षण देकर मंदिरों में पुजारी बनाने का संकल्प लिया है।

गांधी ने अपने एक भाषण में कहा था ‘अछूतों को एक जुदा वर्ग बना देना हिंदू धर्म के माथे पर कलंक है। यह अस्पृष्यता रूपी राक्षसी तो रावण से भी ज्यादा भयंकर है और जब हम इस राक्षसी की पूजा करते हैं, तब तो हमारे पाप की गुरूता और बढ़ जाती है। यदि इसे धर्म कहें तो ऐसे धर्म से तो मुझे घृणा होती है। यह हिंदू धर्म हो ही नहीं सकता। मैंने तो हिंदू धर्म द्वारा ईसाई और इस्लाम धर्म का आदर करना सीखा है,फिर यह पाप हिंदू धर्म का अंग कैसे हो सकता है ? इस पाखंड और अज्ञान के खिलाफ यदि जरूरत पड़े तो मैं अकेला लड़ुंगा, अकेला तपष्चर्या करूगां और उसका नाम जपते हुए मरूंगा।’ गांधी ने धर्म के पाखंड से जुड़ी कुरीतियों पर जितना मुखर हमला बोलकर सामाजिक समरसता के प्रयास किए थे उतने प्रयास स्वंतत्रता प्राप्ती के बाद किसी अन्य नेता ने नहीं किए। गांधी ने अपने अस्पृदष्यता विरोधी अभियान को केवल वैचारिक स्तर तक ही सीमित न रखते हुए इसे व्यावहारिक भी बनाया। यही नहीं 1920 में जब गांधी ने अंग्रेजी- राज के विरुद्ध असहयोग आंदोलन की शुरूआत की तो इसके सामांतर ही अस्पृदष्यता उन्मूलन मुहिम को देशव्यापी जागरूकता अभियान के रूप में भी गतिशीलता प्रदान की।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत की नामचीन सवर्ण जातियों ने धार्मिक कर्मकाण्ड और पाखंड की कपोल कल्पित पृष्ठभूमि के आधार पर जन्म की प्राकृतिक देन के साथ भेदभाव और छूआछूत की संकीर्णता का बीजारोपण किया हुआ है। जिसके कारण कृषि,लघु व हस्त शिल्प उद्योगों में उत्पादन से जुड़ी एक बड़ी आबादी को दलित व अछूत का दर्जा देकर सदियों से बहिष्कृत किया हुआ है। इन शर्मनाक व निंदनीय हालातों को बदलने की शुरूआत आजादी के समय से ही की जा रही थी। इसलिए इन जातियों के सामाजिक,राजनीतिक और प्रशासनिक उत्थान को दृष्टिगत रखते हुए इन्हें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में आरक्षण के समुचित संवैधानिक प्रावधान रखे गए थे। मंडल आयोग के मार्फत उच्च प्रशासनिक पदों में भी उत्पीड़ितों को आरक्षण के अधिकार मिले। आरक्षण का लाभ उठाकर लाखों लोग धर्म और जाति की बिना पर बहिष्कृत प्रतिष्ठापूर्ण राजनीतिक व प्रशासनिक पदों की शोभा बने,लेकिन इनमें से ज्यादतार प्रगतिशील रास्ता अपनाने की बजाय उस ब्राह्मणवाद के अनुयायी हो गए जिस ब्राह्मणवाद के पाखंड के चलते यह बहुसंख्यक समाज उपेक्षित था। दलित सरोकरों की बात तो दूर की कौड़ी रही, जो लोग आरक्षण के बूते अधिकार और आर्थिक समृद्धि के सोपान चढ़े थे, उनमें से अधिसंख्य अपने समाज से भी कटते चले गए। विडबंना तो इस हद तक थी कि जब क्रीमीलेयर के बहाने आरक्षण प्राप्त कर चुके लोगों के बच्चों को आरक्षण से मुक्त रखने की बात उठने लगी तो यह तबका आरक्षण के लाभ को छोड़ने तैयार नहीं हुआ। इससे यह तय हुआ कि अपने ही जातीय समूहों के कल्याण हेतु व्यक्तिगत लाभ और आरक्षण के अवसर की कोई आहुति देना नहीं चाहता। लिहाजा जो कमजोर तबका सवर्ण जातियों की उलाहना झेलता चला आ रहा था, वह अपने ही समाज की उपेक्षा झेलने को भी विवश हो गया है। यही नहीं आरक्षण के अवसर का लाभ पाए इन वंचित समुदायों ने उच्च और निम्न जातियों के बीच कमोवेश ठीक वैसी ही विभाजक रेखा खींच दी  है, जो जन्म के आधार पर सदियों से सवर्ण और अवर्ण के बीच खिंची चली आ रही थी।

ऐसे विशम हालातों में कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से पंढरपुर के भगवान विट्ठल मंदिर में  अवर्णों के लिए दरवाजे खोलना हिंदूत्व को बड़े स्तर पर पुनर्जीवीत करना था। इससे मंदिर में पूजा और पुरोहिताई की सदियों से चली आ रही हिंदू धर्म की वह मान्यता भी खत्म हुई है, जो सामाजिक रूढ़िवादिता, समाज में असमानता और छुआछूत को बढ़ावा देती चली आ रही थी। इस फैसले के बाद इस मंदिर में धार्मिक अनुष्ठानों व कर्मकाण्डों में दलित, पिछड़े व आदिवासियों को वैदिक विधि- विधान से पूजा अर्चना करने का अधिकार मिल गया है। यह पहल हिंदू समाज में भिन्न धर्म, उपधर्म और जाति उपजातियों के कारण जो भेदभाव पनपा हुआ था, उसे कम करने की मिसाल बनना चाहिए थी, लेकिन शीलगुर के मंदिर में तरुण विजय व दलितों पर हुए हमले ने जता दिया है कि अभी हिंदु समाज में संपूर्ण चेतना आई नहीं है। जबकि समाज में ऐसे उपाय एकता स्थापित करने वाले और राष्ट्रीय अखण्डता को मजबूत करने वाले होते हैं। वैसे भी हमारा संविधान अनेक नागरिक अधिकारों के साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता की भी गांरटी देता है। धार्मिक स्वंतत्रता का अधिकार बाधित होने के कारण ही खासकर दलित हिंदूओं में धर्म परिवर्तन की भावना का उत्स यदा-कदा फूट पड़ता है।

हालांकि कुछ जातीय समूहों को दलित, आदिवासी और पिछड़ी बना दिए जाने के कारण ऐतिहासिक भी रहे हैं। लेकिन हिंदू हित चिंतको ने अवैज्ञानिक व अविवष्सनीय इन मिथकों को तोड़ने की कोशिश कभी नहीं की, क्योंकि यही अंधविश्वास उनकी प्रतिष्ठा का आधार था। कर्मकाण्ड का अंधविश्वासी यही अनुष्ठान उनकी जीवीकोपार्जन का साध्य भी बना हुआ है। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद देश में गृहयुद्ध के जो हालात उपजे और विदेशी आक्राताओं के सिलसिलेवार जो हमले हुए उस उथल-पुथल में धर्म के निष्ठावान अनुयायी श्रीहीन हुए। फलस्वरूप धर्म के वाहक ऐसे लोग बन बैठे, जिन्होंने आक्रांताओं के समक्ष घुटने टेक दिए। नतीजतन यथास्थितिवाद के शिकार पंडे-पाखंडियों ने वैदिक कालीन वर्ण-व्यवस्था के सामाजिक विचार को जन्म के अलौकिक चमत्कार और विधि के विधान से जोड़कर रूढ़िवादी दुर्बल पराजय में ढाल दिया। अलौकिक चमत्कार की अवधारणओं ने देश को परतंत्र बना देने में भी अहम भूमिका निभाई थी। जब महमूद गजनबी यवन आक्रमणियों के साथ सोमनाथ के प्रसिद्ध शिव मंदिर पर चढ़ाई कर रहा था तो मंदिर के पंडे-पुजारियों ने प्रतिकार के लिए तैयार खड़े लोगों को भरोसा जताया कि भोले शंकर तीसरा नेत्र खोलेंगे और देखते-देखते यवन सेना भस्म हो जाएगी। लेकिन चमत्कारवादी अलौकिक अवधारणाओं के क्या फलित निकले यह इतिहास के पन्नों पर शर्मनाक दास्तावेजों के रूप में दर्ज है। दैवीय शक्तियों के भ्रामक विचार ने दुर्बल मानसिकता को जन्म दिया और राजे-रजवाड़े व स्वतंत्र जनपदों में बंटे देश के सत्ताधारी घुटने टेकते चले गए। इस उथल-पुथल में जिन योद्धा समूहों ने पराजय नहीं मानी और अपने धर्म व अस्तित्व को बचाए रखने के लिए भटकते रहे, इनमें से भी कई जातीय समूह षैक्षिक व आर्थिक बदहाली के चलते दरिद्र जातियों के समूहों में तब्दील होते चले गए।

स्वतंत्र भारत में हैरानी की बात यह भी रही कि राजनीतिक स्तर पर भी वैज्ञानिक तरीके से जातीय अवधारणा की पड़ताल नहीं की गई। हां,जातीयता और सांप्रदायिकता को वोट की राजनीति के चलते भुनाया जरूर जाता रहा। सामाजिक न्याय के पैरोकारों ने तो मंडल के बहाने जातिवाद को घृणा की हद तक पहुंचाने का काम ब्राह्मणवाद की तरह किया। बावजूद इसके ऐसा नहीं है कि जातिवाद के विरूद्ध दृष्टि व्यापाक न हुई हो, छूआछूत का भेद और दालित का अपमान आज दंडनीय अपराध के दायरे में है। बहरहाल अब समय आ गया है कि अवसर का लाभ उठाते हुए हिंदु हित चिंतक दरिद्रनारायण कहे जाने वाले सभी हिंदुओं के लिए शेष रहे मंदिरों के द्वार खोल दें और आदर के साथ उन्हें प्रवेश, पूजा, पूजारी एवं पुरोहिताई का अवसर दें। क्योंकि सवर्ण हिंदुओं के व्यापक हित दरिद्र को नरायण बना देने के व्यापक हितों में ही अंतर्निहित व सुरक्षित हैं।

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