लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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assembly-election-मोदी को मिला ‘टानिक’ विरोधी हल्कान
संजय सक्सेना

भातरीय जनता पार्टी की किस्मत में घूप-छांव का सिललिसा बरकरार है। 2014 में मोदी को मिली शानदार जीत का जश्म मना रही बीजेपी को 2015 में दिल्ली और बिहार के नतीजों ने काफी दर्द दिया। पूरे साल दर्द का अहसास करते रहे बीजेपी नेताओं के लिये 2016 खूशियों भरा साल साबित हो रहा है। पांच राज्यों में चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। बीजेपी खेमा उत्साहित है। दिल्ली और बिहार में शिकस्त के बाद यह नतीजे बीजेपी के लिये टानिक और कांग्रेस के लिये निराशाजनक रहे। वहीं क्षेत्रीय क्षत्रपों का भी जबर्दस्त उभार देखने को मिला। अब इस वर्ष किसी राज्य में कोई चुनाव नहीं होना है। करीब एक वर्ष के बाद 2017 में ही पांच राज्यों में चुनावी चमक दिखाई-सुनाई देगी। अगले वर्ष जिन राज्यों में चुनाव होना है उसमें उत्तर प्रदेश सबसे प्रमुख राज्य है। यूपी की 403 विधान सभा सीटों के अलावा गोआ की 40, पंजाब की 117,उत्तराखंड की 70 और मणिपुर की 60 सीटो पर अगले साल विधान सभा चुनाव होने हैं। इसमें सबसे अधिक नजरें लोंगों की यूपी चुनावों पर लगी रहेंगी। जो यूपी जीतेगा वह दिल्ली में मजबूत होगा। खासकर बीजेपी के लिये यूपी विधान सभा चुनाव ‘मील का पत्थर’ साबित हो सकते हैं। यहां से जीत का मतलब राज्यसभा में मोदी सरकार की ताकत में इजाफा होना जहां बहुमत नहीं होने के कारण कई अहम बिल पास नहीं हो पा रहे हैं।
बीजेपी यूपी जीतना चाहेगी तो विरोधी उसे रोकने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगायेंगे। ऐसे में उत्तर प्रदेश का चुनावी परिदृश्य काफी रोमांचक हो सकता है। यूपी में बसपा-सपा और कांग्रेस तो स्वभाविक दुश्मन हैं ही इसके अलावा बिहार की जीत से उत्साहित बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी यूपी की सियासत में ताल ठोंक रहे हैं। वह अपने महागठबंधन के सहारे ‘संघ मुक्त भारत और शराब मुक्त समाज’ का नारा देकर यहां अपनी सियासी जड़े तलाश रहे हैं। नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा यहीं तक सीमित नहीं है। वह यह भी चाहते हैं कि उनकी इस मुहिम में पूरे देश के अन्य गैर भाजपाई दल और नेता भी कंधे से कंधा मिलाकर चलें ताकि पूरे देश से बीजेपी और मोदी को खदेड़ा जा सके। नीतीश की प्लानिंग ठीक थी,परंतु पांच राज्यों के चुनावी नतीजों से उनकी मुहिम को धक्का लग सकता है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की और तमिलनाडू मे जयललिता की शानदार वापसी के बाद हिन्दुस्तान की सियासत में बड़ा बदलाव होता दिखाई दे रहा है। अगर ममता बनर्जी और जयललिता दिल्ली की सियासम में कूद पड़ें(जिसकी संभावना से काफी प्रबल है) तो नीतीश का बीजेपी के खिलाफ देशभर में सर्वमान्य चेहरा बनना मुश्किल हो जायेगा। यहां यह बात भी याद रखना चाहिए कि मायावती और मुलायम सिंह पहले ही नीतीश के नेतृत्व को ठुकरा चुके हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी नीतीश के मुकाबले ममता बनर्जी के ज्यादा करीब हैं। बिहार चुनाव के समय से लेकर आजतक लालू भी नीतीश के साथ खुल कर कभी दिखाई नहीं पड़े हैं,भले ही बिहार में महागठबंधन की सरकार सत्तारूढ़ है।
नीतीश देश को संघ यानी भाजपा मुक्त बनाना चाहते हैं,परंत ममता बनर्जी हो या फिर जयललिता वह संघ नहीं कांग्रेस को अपने लिये बड़ा खतरा मानती हैं।जयललिता के लिये बीजेपी से बड़ा खतरा करूणानिधि की द्रमुक पार्टी है जिसने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था।इसी प्रकार ममता के लिये लेफ्ट बडा खतरा है जिसने कांग्रेस के साथ ममता के खिलाफ बंगाल में मोर्चा बनाया था। दोंनो की नेत्रियों की राजनैतिक महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। ममता बनर्जी तो दिल्ली की सियासत में कुछ ज्यादा ही रूचि लेती रही हैंं। वह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री भी रह चुकी हैं। सार्वजनिक मंचों पर ममता भले ही मोदी के खिलाफ मोर्चा खोले रखती हों,लेकिन उनकी नीतीश की तरह मोदी से कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं हैं। ऐसे में नीतीश के लिये बिहार से बाहर की राह आसान नहीं लग रही है। उन्हें कहीं भी किसी बड़े नेता से सहयोग मिलता नहीं दिख रहा है। पांच राज्यों के चुनावों के नतीजों से निश्चित ही नीतीश की मुहिम को तगड़ा झटका लगा है। अगर तमिलनाडु में करूणानिधि-कांग्रेस और बिहार में लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन की जीत हो जाती तो नीतीश की राष्ट्रीय सियासत के लिये काफी फायदे का सौदा रहता है,लेकिन कांग्रेस जिसके साथ नीतीश बिहार में सरकार चला रहे हैं,उसका पांचो जगह सफाया ही हो गया। वहीं मोदी को यह नतीजे 2017 के चुनावों तक एनर्जी देते रहेंगे। वैसे पांच राज्यों के साथ यूपी की दो सीटो ंपर हुए उप-चुनाव के नतीजे सत्तारूढ. सपा के पक्ष में गये हैं।

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