लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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drugsअभिषेक तिवारी
रचना: बहुत समय से कोई लेख नहीं लिखा था। अब फिर से शुरूआत कर रहा हूं। कुछ अलग तरीका है इस बार लिखने का। वो इसलिए क्योंकि इस बार जो विषय है वो करोड़ों जिंदगियों से जुड़ा हुआ पहलू है। बावजूद इसके कोई इस विषय पर ज्ञान लेना नहीं चाहता। तो सवाल उठता है कि फिर इसे लिखने में समय और मेहनत क्यों बर्बाद करना। तो ऐसा है कि मुझे लगता है कि अगर एक आदमी भी इससे प्रभावित हो जाए तो मेरा लेखन सार्थक हो जाएगा। अब प्रायिकता के इस खेल में इतनी गुंजाइश तो रहती ही है। इसी उम्मीद के साथ पेश है आपके सामने – “उड़ता ज्ञान (नशे का)”

कल एक सज्जन मिले। उनसे नशे के दुष्प्रभाव के बारे में चर्चा की तो पता चला कि वे तो इसे कुछ खास बुरा नहीं मानते। ऊपर से शराबी फिल्म के गाने का बोल भी चिपका डाला कि “नशा शराब में होती तो नाचती बोतल”।
अब समझे आप कि कितना कठिन है इसपर किसी से चर्चा करना। नशा कैसा भी हो, इसे करने वाला चाहे अनपढ़ ही क्यों न हो, वो इसके पक्ष में दर्द का इलाज, गम भुलाने की दवा, सच्चा साथी जैसे न जाने कितने ही अनगिनत बहाने निकाल ही लेगा। खैर ये सब बातें इस लिए हो रही हैं क्योंकि आज है- अंतरराष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस
आज से करीब 29 साल पहले यानी 1987 को ‘संयुक्त राष्ट्र महासभा’ ने नशीली वस्तुओं और पदार्थों के निवारण के लिए हर साल ’26 जून’ को ‘अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस’ मनाने का निर्णय लिया था। यह दिवस एक तरफ़ लोगों में चेतना फैलाता है, वहीं दूसरी ओर नशे के लती लोगों के उपचार की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण कार्य करता है। इसमें नशे के कुछ अजीबो-गरीब मामले देखे गए हैं। जैसे- कुछ बच्चे फेविकोल, तरल इरेज़र, पेट्रोल कि गंध और स्वाद से आकर्षित होते हैं। कई बार कम उम्र के बच्चे आयोडेक्स, वोलिनी जैसी दवाओं को सूंघकर इसका आनंद उठाते हैं। कुछ मामलों में इन्हें ब्रेड पर लगाकर खाने के भी उदहारण देखे गए हैं। 2001 के एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण में भारतीय पुरुषों में अफीम सेवन की उच्च दर 12 से 60 साल की उम्र तक के लोगों में 0.7 प्रतिशत प्रति माह देखी गई।
इस आयोजन का उद्देश्य समाज में बढ़ती हुई मद्यपान, तम्बाकू, गुटखा, सिगरेट की लत एवं नशीले मादक द्रव्यों, पदार्थों के दुष्परिणामों से समाज को अवगत कराना था, ताकि मादक द्रव्य एवं मादक पदार्थों के सेवन की रोकथाम के लिए उचित वातावरण एवं चेतना का निर्माण हो सके। इस अवसर पर मादक पदार्थों से मुक़ाबले के लिए विभिन्न देशों द्वारा उठाये गये क़दमों तथा इस मार्ग में उत्पन्न चुनौतियों और उनके निवारण का उल्लेख किया जाता है। ’26 जून’ का दिन मादक पदार्थों से मुक़ाबले का प्रतीक बन गया है। इस अवसर पर मादक पदार्थों के उत्पादन, तस्करी एवं सेवन के दुष्परिणामों से लोगों को अवगत कराया जाता है।

भारत में नशे की स्थिति

संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में भारत भी हेरोइन का बड़ा उपभोक्ता देश बनता जा रहा है। गौरतलब है कि अफीम से ही हेरोइन बनती है। भारत के कुछ भागों में धड़ल्ले से अफीम की खेती की जाती है और पारंपरिक तौर पर इसके बीज ‘पोस्तो’ से सब्जी भी बनाई जाती है। अपराध मामलों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (यूएनओडीसी) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में जिस अफीम को हेरोइन में तब्दील नहीं किया जाता, उसका दो तिहाई हिस्सा पांच देशों में इस्तेमाल होता है। ईरान 42 प्रतिशत, अफ़ग़ानिस्तान 7 प्रतिशत, पाकिस्तान 7 प्रतिशत, भारत छह प्रतिशत और रूस में इसका पांच प्रतिशत इस्तेमाल होता है। रिपोर्ट के अनुसार भारत ने 2008 में 17 मीट्रिक टन हेरोइन की खपत की और वर्तमान में उसकी अफीम की खपत अनुमानत: 65 से 70 मीट्रिक टन प्रति वर्ष है। कुल वैश्विक उपभोग का छह प्रतिशत भारत में होने का मतलब कि भारत में 1500 से 2000 हेक्टेयर में अफीम की अवैध खेती होती है। यह तथ्य वास्तव में ख़तरनाक है।

नशे का शिकार होता युवा वर्ग

मादक पदार्थों के नशे की लत आज के युवाओं में तेजी से फ़ैल रही है। कई बार फैशन की खातिर दोस्तों के उकसावे पर लिए गए ये मादक पदार्थ अक्सर जानलेवा होते हैं। मजाक-मजाक और जिज्ञासावश किये गए ये प्रयोग कब कोरेक्स, कोदेन, ऐल्प्राजोलम, अल्प्राक्स, कैनेबिस जैसे दवाओं को भी घेरे में ले लेते हैं, पता ही नहीं चलता। फिर स्कूल-कॉलेजों या पास-पड़ोस में गलत संगति के दोस्तों के साथ ही गुटखा, सिगरेट, शराब, गांजा, भांग, अफीम और धूम्रपान सहित चरस, स्मैक, कोकिन, ब्राउन शुगर जैसे घातक मादक दवाओं के सेवन की ओर अपने आप कदम बढ़ जाते हैं। पहले उन्हें मादक पदार्थ फ्री में उपलब्ध कराकर इसका लती बनाया जाता है और फिर लती बनने पर वे इसके लिए चोरी से लेकर अपराध तक करने को तैयार हो जाते है।

कई बार तो बच्चे घर के ही सदस्यों से नशे की आदत सीखते हैं। उन्हें लगता है कि जो बड़े कर रहे हैं, वह ठीक है और फिर वे भी घर में ही चोरी आरंभ कर देते हैं। चिकित्सकीय आधार पर देखें तो अफीम, हेरोइन, चरस, कोकीन, तथा स्मैक जैसे मादक पदार्थों से व्यक्ति वास्तव में अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है एवं पागल हो जाता है। ये ऐसे उत्तेजना लाने वाले पदार्थ हैं, जिनकी लत के प्रभाव में व्यक्ति अपराध तक कर बैठता है। मामला सिर्फ स्वास्थ्य से नहीं अपितु अपराध से भी जुड़ा हुआ है।

महिलाओं में नशे की प्रवृत्ति

आज देश में शराब का सेवन करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है, साथ ही बढ़ रही है मद्यपान के कारण मौत से जूझने वालों की संख्या। 15 से 20 प्रतिशत भारतीय आज शराब पी रहे हैं। 20 साल पहले जहाँ 300 लोगों में से एक व्यक्ति शराब का सेवन करता था, वहीं आज 20 में से एक व्यक्ति शराबखोर है। परंतु महिलाओं में इस प्रवृत्ति का आना समस्या की गंभीरता दर्शाता है। पिछले दो दशकों में मद्यपान करने वाली महिलाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। विशेष कर उच्च तथा उच्च मध्यम वर्ग की महिलाओं में यह एक फैशन के रूप में आरंभ होता है और फिर धीरे-धीरे आदत में शुमार होता चला जाता है। कुछ महिलाएँ खुलेआम तथा कुछ छिप-छिप कर शराब का सेवन करती हैं। महानगरों और बड़े शहरों की कामकाजी महिलाओं के छात्रावासों में यह बहुत ही आम होता जा रहा है। महानगरों में स्थित शराब मुक्ति केंद्रों के ऑंकड़ों से ज्ञात होता है कि नशे की गिरफ्त से छुटकारा पाने हेतु आने वाले 10 व्यक्तियों में से 4 महिलाएं होती हैं।

कारण

कुछ हद तक आधुनिक रहन-सहन, पश्चिम का अंधानुकरण, मद्यपन को सामाजिक मान्यता, आसानी से शराब की उपलब्धता, तनाव, अवसाद व पुरुषों से बराबरी की होड़ को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है। घर बाहर की दोहरी जिम्मेदारियों को निभाती आज की नारी अधिक तनाव एवं मानसिक दबाव तले जी रही है। सफलता के मार्ग पर चलने के साथ ही उन पर कार्य का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। रोजमर्रा की अनेक समस्याओं से घिरी कई महिलाएँ इसका हल शराब के नशे के रूप में पाती हैं।
गर्भपात का खतरा

अमेरिका में किए गए अनुसंधानों से पता चला है कि गर्भपात का खतरा शराब का सेवन करने वाली महिलाओं में अधिक रहता है। गर्भवती महिलाओं में शुरू के दिनों में 12 प्रतिशत अधिक खतरा होता है। शिशु के मस्तिष्क में विकृति की सम्भावना औरों के मुकाबले मद्यपान करने वाली महिलाओं के शिशुओं में 35 प्रतिशत तक अधिक होती है। शराब किसी समस्या का हल कभी नहीं बन सकती, भले ही यह कुछ समय के लिए उस समस्या को भुलाने में सहायक बन जाती हो।

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