लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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~यदि मेरे पास एकमुखी शक्ति होती, तो आज ही, छात्रों की परदेशी माध्यम द्वारा शिक्षा, रोक देता ।

~~कोई देश नकलचियों को पैदा कर राष्ट्र नहीं बन सकता।

~~हिन्दुस्थान की आम भाषा अंग्रेजी नहीं, हिन्दी है।

~~हिन्दुस्थान को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजी जानने वाले भारतीय लोग ही हैं।……”

~~अंग्रेजी भाषा और संस्कृति के, सभी विषयों की दृष्टि दैहिक और भोगवादी है।

~~दुख की बात: हम स्वराज्य की बात भी परायी भाषा में करते हैं।

~~अंग्रेज खुद अपनी सभ्यता से परेशान हैं यह समझने के लिए अंग्रेजी का उपयोग किया जाये।

~~करोड़ों को अंग्रेजी शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालना है।

~~अंग्रेजी शिक्षा पाकर , उस से छुटकारा पाओ, उससे पैसे कमाने का उद्देश्य न हो।

~~अंग्रेज़ी पढनेवाले अनैतिक होने की संभावना गांधी जी ने परखी थी।

~~

(१)

हिन्दुस्थान की आम भाषा अंग्रेजी नहीं पर हिन्दी है।

प्रश्न: क्या गांधी जी ने, अंग्रेजों को भी हिंदी सीखने के लिए कहा था ?

उत्तर: जी हाँ। गांधी जी ने शासक अंग्रेजो को, कहा था. कि …..”हिन्दुस्थान की आम भाषा अंग्रेजी नहीं बल्कि हिंन्दी है। वह आप को (अंग्रेज शासकों को) सीखनी होगी और हम तो, आप के साथ अपनी भाषा में ही व्यवहार करेंगे।……”

(२)

हिन्दुस्थान को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजी जानने वाले भारतीय लोग ही हैं।

प्रश्न: गांधी जी, ”हिंद स्वराज” में अंग्रेज़ी के लिए क्या लिखते हैं?

उत्तर: …..गांधी जी ने ‘हिन्द स्वराज’ (पृष्ठ ९१) में लिखा, कि, क्या यह कम अत्याचार है, कि, मुझे मेरे देश में न्याय पाना हो, तो अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करना पडता है? बैरिस्टर होने पर भी, मैं स्वभाषा में बोल नहीं सकता। दूसरे किसी व्यक्ति को मेरे लिए तरजुमा (अनुवाद) कर देना पडता है? यह क्या, कम दंभ है? यह गुलामी की हद नहीं, तो और क्या है? इस में मैं अंग्रेजों का दोष निकालूं या अपना ? हिन्दुस्थान को गुलाम बनाने वाले तो हम अंग्रेजी जानने वाले भारतीय लोग ही हैं।……” (क्या स्वतंत्रता के ६५ वर्ष बाद भी यह चल नहीं रहा?)

(३) शासक अंग्रेज़ और काले अंग्रेज़

प्रश्न: शासक अंग्रेज़ और काले अंग्रेज़ों ( सुडो या छद्म भारतीयों ) के लिए गांधी जी क्या कहते हैं?

उत्तर: आप हिन्दुस्थान में ( शासन के लिए )आनेवाले अंग्रेज जो हैं, वे अंग्रेजी प्रजा के सच्चे नमूने नहीं हैं, और हम जो ”आधे अंग्रेज” बने बैठे हैं वे भी सच्ची ”हिन्दुस्थानी प्रजा” के नमूने नहीं कहे जा सकते।

{लेखक: तो आज कल कौन से नमूने दिल्ली में बैठ शासन कर रहें हैं?}

(४) अंग्रेज़ी की दैहिक और भोगवादी दृष्टि

अंग्रेजी भाषा और संस्कृति में विज्ञान, इतिहास और अन्य सभी विषयों की दृष्टि दैहिक और भोगवादी है। यहां अंग्रेजी शिक्षा के साथ अंग्रेजी सभ्यता (?) भी आई थी। गांधी जी ने लिखा, कि, आप को समझना चाहिए कि अंग्रेजी शिक्षा स्वीकार कर, हम ने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, विलासिता, अत्त्याचार वगैरा बढ़े हैं। अंग्रेजी शिक्षा पाये हुए लोगों ने प्रजा को ठगने में, उसे पीडित करने में कुछ भी उठा नहीं रखा है।

(५) अंग्रेज़ी शिक्षा गुलामी की जड

(वही पृ0 91) गांधी जी ने लिखा, कि, करोड़ों (मिलियन्स) लोगों को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकॉले ने शिक्षा की जो बुनियाद (नींव) डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी। उसने इसी उद्देश्य से अपनी योजना बनायी थी, ऐसा मैं नहीं सुझाना चाहता। लेकिन उस के काम का नतीजा यही निकला है। यह कितने दुख की बात है कि हम स्वराज्य की बात भी परायी भाषा में करते हैं? (वही पृ0 90)

(६)भारत पश्चिमी सभ्यता के मोहपाश में

(वही पृष्ठ 87) भारत पश्चिमी सभ्यता के मोहपाश में है। उन्होंने लिखा, हम सभ्यता के रोग में ऐसे फंस गये हैं कि अंग्रेजी शिक्षा लिये बिना अपना काम चला नहीं सकते। अब, जिसने वह शिक्षा पायी है, वह उसका अच्छा उपयोग करे, अंग्रेजों के साथ के व्यवहार में। और ऐसे हिन्दुस्थानियों के साथ, जो व्यवहार में निज भाषा को समझ न सकते हों, और अंग्रेज खुद अपनी सभ्यता से कैसे परेशान हो गये हैं यह समझने के लिए अंग्रेजी का उपयोग किया जाये।

(७)अंग्रेज़ी पढनेवाले अनैतिक होने की संभावना गांधी जी ने परखी थी।

इसी लिए वे कहते थे, कि, जो लोग अंग्रेजी पढ़े हुए हैं उनकी संतानों को पहले तो नैतिक शिक्षा देनी चाहिए, मातृभाषा सिखानी चाहिए, और हिन्दुस्थान की एक दूसरी (प्रादेशिक) भाषा सिखानी चाहिए। बालक जब आयु में, बडा हो जायें तब भले चाहे तो, अंग्रेजी शिक्षा पायें, और वह भी उस से छुटकारा पाने के उद्देश्य से, न कि उस के द्वारा पैसे कमाने के उद्देश्य से। (वही पृष्ठ 91)

(८)

भारत के अग्रणी नेता ,विद्वान, सुधारक, चिंतक, दृष्टा, मनीषी, इत्यादि, मिलकर, अंग्रेज़ी की विकलांग विवशता ना होती तो –तो भारत आगे बढ चुका होता।

राम मोहन राय और भी और अच्छे सुधारक हो सकते थे, एवं लोकमान्य तिलक और भी बडे विद्वान प्रमाणित होते, यदि दोनों को (उन्हें) विकलांगता पूर्ण अंग्रेज़ी में विचार करने की, और फिर उन विचारों को व्यक्त करने की विवशता ना होती। स्वभाषा में विकास तीव्र गति से होता है।

(९)अंग्रेज़ी शिक्षा अंग्रेज़ी पढे-लिखे भारतीय को खस्सी (नपुंसक) कर गयी है।

गहरे चिंतन के बाद कहता हूँ, कि जिस प्रकार से अंग्रेज़ी शिक्षा दी जा रही है, वह, अंग्रेज़ी पढे-लिखे भारतीय को खस्सी कर गयी है, और उस की भाव-तन्त्रिकाओं पर भारी बोझ डालकर हमें नकलची बना दिया है।

(१० ) कोई देश नकलचियों का वंश पैदा कर के राष्ट्र नहीं बन सकता।

आप कुछ लोगों की उन्नति अंग्रेज़ी द्वारा कर लेंगे।

अंग्रेज़ी एक पराई भाषा देशको निगल रही है।

अंग्रेज़ी से आप व्यक्तिगत उन्नति कर सकते हैं, क्या समग्र भारत की उन्नति आप अंग्रेज़ी से करेंगे?

(११)हर भारतीय भाषा की शत्रु अंग्रेज़ी है।

अंग्रेज़ी एक पराई भाषा देशको निगल रही है। परतंत्र की भाषा होने के कारण, हमारी स्वतन्त्रता में भी एक लांछन है। नहीं, जब तक अंग्रेज़ी रहेगी तब तक हम पूर्ण रूपसे स्वतंत्र नहीं।

भारत का युवा अपने आपको गौरवहीन अनुभव करता है। हीन ग्रन्थि से पीडित अनुभव करता है। इसी लिए वह टूटी-फूटी अंग्रेज़ी बोलता है। इस परतंत्रता के भाव को समझकर ही लगता है, गांधी जी ने कहा था कि

(१२) गांधी जी भी तानाशाह ?

”यदि मैं मेरे पास शासन की एकमुखी शक्ति होती, तो आज के आज, अपने छात्र छात्राओं की परदेशी माध्यम द्वारा होती शिक्षा, रुकवा देता। और सेवा-मुक्त करने का भय दिखाकर सारे प्राध्यापकों एवम् शिक्षकों से, तत्काल बदलाव लाने की माँग करता। पाठ्य पुस्तकें तैय्यार होने तक भी राह ना देखता। वे तो बदलाव के बाद बन ही जाती। यह परदेशी माध्यम ऐसा पाप है, जिसका अविलम्ब उपचार आवश्यक है।” कोई भी भाषा पहले होती है, पाठ्य पुस्तके बाद में आती हैं। कोई उदाहरण है, जहां पुस्तके पहले थी, और बाद में भाषा पैदा हुयी?

महात्मा गांधी —–महात्मा जी का निश्चय स्पष्ट है। विचार कीजिए।

(१३ )

अहिंसा में निष्ठा रखने वाले गांधी, अनेक बार भाईचारे के पक्ष में, समझौता करने वाले गांधी, जब ऐसा तानाशाही निर्णय दृढता पूर्वक व्यक्त करते हैं, तो उसके पीछे उन्होंने गहरा चिन्तन किया होगा ही।

पाठ्य पुस्तकों के लिए भी वे रुकना नहीं चाहते।

एकाध वर्ष में पुस्तकें भी बन जाएगी। खरिददार मिलने पर सारे लेखक दौड कर पुस्तक लिखना प्रारंभ कर सकते हैं। एक बार निर्णय लिया जाए, बाकी सब कुछ एक एक वर्ष जैसे नया छात्र कक्षा पास होते होते आगे बढेगा, वैसे वैसे बनती चलेगी।

—मैं ने कुछ बिंदु विचार स्पष्ट करने के लिए डाले हैं। आप ”हिंद स्वराज” के आलेख, प्रवक्ता पर ही स्पष्टता के लिए देख सकते हैं।

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15 Comments on "गांधी जी के भाषा विषयक विचार–डॉ. मधुसूदन"

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डॉ. मधुसूदन
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संस्कृत जैसी गहराई और विस्तार क्षमता मैं ने किसी भाषा में नहीं देखी. संस्कृत का शब्द रचना शास्त्र जो जानते हैं, उनकी ओर से टिपण्णी अपेक्षित हैं. शब्द रचना शास्त्र जाने बिना आपको संस्कृत की महिमा पता नहीं चलेगी. प्रवास पर हूँ १४ नवम्बर तक. पश्चात लेख डालूँगा. ऐसे विद्वान् जो संस्कृत का शब्द रचना शास्त्र जानते नहीं, पर अज्ञानी होते हुए भी निंदा करते रहते हैं, उन्हें सुझाव देता हूँ. सुझाव: कभी लघु सिद्धांत कौमुदी के तद्धित, कृदंत, प्रत्यय पढ़ें. उपसर्ग रचित शब्द पढ़ें. समास पढ़ें. —-और कुछ व्याकरण पढ़ें. आप संस्कृत की अनंत शक्ति मान जाएंगे. जब मैक्समुलर… Read more »
santanu arya
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पिछले दिनों आस्ट्रेलिया की प्रधान मंत्री ने हमारे आत्मसम्मान को ललकारते हुए कहा, ‘भारत अंग्रेज शासित देश है।’ ऐसा तब हुआ जब एक समिति ने आस्ट्रेलिया – भारत संबंधों को और बेहतर बनाने के लिए सभी राजनयिकों को हिन्दी सीखने का सुझाव दिया। इस सुझाव को वहाँ की प्रधानमंत्री ने अस्वीकार करते हुए उक्त टिप्पणी की। सच ही तो है, जो राष्ट्र स्वयं अपनी राष्ट्रभाषा से नजरें चुराता हैं उसे अपने स्वाभिमान को आहत कर देने वाली ऐसी टिप्पणियों के लिए तैयार रहना चाहिए। यह दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्ष बाद भी हम… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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आर्य जी सुन्दर सर्वोचित सविस्तार अभिव्यक्ति.
आपका यह आलेख स्वतंत्र रूपसे छपने पर अधिक पाठक पढ़ पाएंगे, विचार करें.
किन शब्दों में कृतज्ञता व्यक्त करूँ?
असमर्थ हूँ.
साथ देते रहें.
सप्रेम, सादर, नमन.

डॉ. राजेश कपूर
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इसका अर्थ तो फिर स्पष्ट है कि भारत सरकार किसी प्रकार से भी भारतीय नहीं है. इसका अर्थ यह भी हुआ ही भारत अभीतक आज़ाद नहीं हुआ है, आज़ादी के लिए अभी और संघर्ष करना पडेगा.

डॉ. मधुसूदन
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शांतनु आर्य जी की प्रदीर्घ टिपण्णी निश्चित पढ़ें.
स्वतंत्रता में अभी भी क्षतियां हैं.

१४ भारतीय शोधक बैठे अंग्रेजी में आपस में वार्तालाप कर रहे थे.
निकट से जाने वाले परदेशी ने पूछा क्या आपकी अपनी राष्ट्र (?) भाषा नहीं ?
कोई उत्तर दे न पाए.
नमस्कार-और बहुत बहुत धन्यवाद.

के जी
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किसी भी भाषा का विकास विचारों की पवित्रता से होता है। आज संस्कृत इसलिए पढ़ी जा रही है, कि भागवत, वेद, गीता की भाषा संस्कृत है। यही वह मार्ग है जिस से हम, उन ज्ञान के श्रोत तक पहुंचेगे। हिन्दी भाषा में, कबीर, तुलसी, प्रेमचंद के विचार हैं, और इसलिए उन विचारों की गंगा में नहाने का अद्भुत सुख तभी मिलेगा जब हमें हिन्दी का ज्ञान या उस से प्रेम हो। अँग्रेजी भी उसी तरह ही भाषा है किन्तु शासक वर्ग ने इसे कानून और व्यवस्था के सीमित कर उसके प्रति दुर्भावना भर दी। लेकिन अँग्रेजी भी हिन्दी या संस्कृत… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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शांतनु आर्य जी की दीर्घ टिपण्णी अवश्य पढ़ें.
सादर धन्यवाद.

Vishwa Mohan Tiwari
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पहली‌बात तो यह कि मधुसूदन जी ने हम सबका बहुत उपकार किया है जो उऩ्होंने दूध में से मक्खन निकालकर हमें परोस दिया है।

क्या यह आश्चर्य नहीं कि जिस गाँधी को देश के पिता तथा महात्मा की संज्ञा दी गई थी और जिसके एक शब्द पर लाखों लोग निकल पड़ते थे, उसी के इतने सुविचारित तथा दृढ़ कथनों को किसी ने भी नहीं सुना !! या सुनकर अनसुना कर दिया !!

क्या अब बहुत देर हो गई है ?
देश भक्तों के लिये तो जब भी बात समझ में आ जाए वही समय आन्दोलन करने के लिये सही‌है।
मधुसूदन जी का धन्यवाद

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