लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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असहमति को स्वीकारने का साहस हमारे सत्ताधारियों में कहां है

संजय द्विवेदी

अन्ना हजारे के साथ लेखक संजय द्विवेदी

असहमति को स्वीकारने की विधि हमारे सत्ताधारियों को छः दशकों के हमारे लोकतंत्र ने सिखाई कहां है? इसलिए अन्ना हजारे के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ जो अनपेक्षित हो। यह न होता जो आश्चर्य जरूर होता। लोकतंत्र इस देश में सबसे बड़ा झूठ है,जिसकी आड़ में हमारे सारे गलत काम चल रहे हैं। संसद और विधानसभाएं अगर बेमानी दिखने लगी हैं तो इसमें बैठने वाले इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। साढ़े छः दशक का लोकतंत्र भोग लेने के बाद लालकिले से प्रधानमंत्री उसी गरीबी और बेकारी को कोस रहे हैं। यह गरीबी, बेकारी, भुखमरी और तंगहाली अगर साढ़े छः दशक की यात्रा में खत्म नहीं हुयी तो क्या गारंटी है कि आने वाले छः दशकों में भी यह खत्म हो जाएगी। अमीर और गरीब की खाई इन बीस सालों में जितनी बढ़ी है उतनी पहले कभी नहीं थी। अन्ना एक शांतिपूर्ण अहसमहमति का नाम हैं, इसलिए वे जेल में हैं। नक्सलियों, आतंकवादियों और अपराधी जमातों के प्रति कार्रवाई करते हमारे हाथ क्यों कांप रहे हैं?अफजल और गुरू और कसाब से न निपट पाने वाली सरकारें अपने लोगों के प्रति कितनी निर्मम व असहिष्णु हो जाती हैं यह हम सबने देखा है। रामदेव और अन्ना के बहाने दिल्ली अपनी बेदिली की कहानी ही कहती है।

बदजबानी और दंभ के ऐसे किस्से अन्ना के बहाने हमारे सामने खुलकर आए हैं जो लोकतंत्र को अधिनायकतंत्र में बदलने का प्रमाण देते हैं। कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी जैसै दरबारियों की दहाड़ और हिम्मत देखिए कि वे अन्ना और ए. राजा का अंतर भूल जाते हैं। ऐसे कठिन समय में अन्ना हजारे हमें हमारे समय के सच का भान भी कराते हैं। वे न होते तो लोकतंत्र की सच्चाईयां इस तरह सामने न आतीं। एक सत्ता किस तरह मनमोहन सिंह जैसे व्यक्ति को एक रोबोट में रूपांतरित कर देती है, यह इसका भी उदाहरण है। वे लालकिले से क्या बोले, क्यों बोले ऐसे तमाम सवाल हमारे सामने हैं। आखिर क्या खाकर आप अन्ना की नीयत पर शक कर रहे हैं। आरएसएस और न जाने किससे-किससे उनकी नातेदारियां जोड़ी जा रही हैं। पर सच यह है कि पूरे राजनीतिक तंत्र में इतनी घबराहट पहले कभी नहीं देखी गयी। विपक्षी दल भी यहां कौरव दल ही साबित हो रहे हैं। वे मौके पर चौका लगाना चाहते हैं किंतु अन्ना के उठाए जा रहे सवालों पर उनकी भी नीयत साफ नहीं है। वरना क्या कारण था कि सर्वदलीय बैठक में अन्ना की टीम से संवाद करने पर ही सवाल उठाए गए। यह सही मायने में दुखी करने वाले प्रसंग हैं। राजनीति का इतना असहाय और बेचारा हो जाना बताता है कि हमारा लोकतंत्र कितना बेमानी हो चुका है। किस तरह उसकी चूलें हिल रही हैं। किस तरह वह हमारे लिए बोझ बन रहा है। भारत के शहीदों की शहादत को इस तरह व्यर्थ होता देखना क्या हमारी नीयत बन गयी है। सवाल लोकपाल का नहीं उससे भी बड़ा है। सवाल प्रजातांत्रिक मूल्यों का है। सवाल इसका भी है कि असहमति के लिए हमारे लोकतंत्रांत्रिक ढांचें में स्पेस कम क्यों हो रहा है।

सवाल यह भी है कि कश्मीर के गिलानी से लेकर माओवादियों का खुला समर्थन करने वाली अरूंधती राय तक दिल्ली में भारत की सरकार को गालियां देकर, भारत को भूखे-नंगों का देश कह कर चले जाएं किंतु दिल्ली की बहादुर पुलिस खामोश रहती है। उसी दिल्ली की सरकार में अफजल गुरू के मृत्युदंड से संबंधित फाइल 19 रिमांडर के बाद भी धूमती रहती है। किंतु बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के लिए कितनी त्वरा और कितनी गति है। यह गति काश आतंकियों, उनके पोषकों, माओवादियों के लिए होती तो देश रोजाना खून से न नहाता। किंतु हमारा गृहमंत्रालय भगवा आतंकवाद, बाबा रामदेव और अन्ना हजारे की कुंडलियां तलाशने में लगा है। मंदिर में सोने वाले एक गांधीवादी के पीछे लगे हाथ खोजे जा रहे हैं। आंदोलन को बदनाम करने के लिए अन्ना हजारे को भी अपनी भ्रष्ट मंडली का सदस्य बताने की कोशिश हो रही है। आखिर इससे हासिल क्या है। क्या अन्ना का आभा इससे कम हुयी है या कांग्रेस के दंभ से भरे नेता बेनकाब हो रहे हैं। सत्ता कुछ भी कर सकती है, इसमें दो राय नहीं किंतु वह कब तक कर सकती है-एक लोकतंत्र में इसकी भी सीमाएं हैं। चाहे अनचाहे कांग्रेस ने खुद को भ्रष्टाचार समर्थक के रूप में स्थापित कर लिया है। अन्य दल दूध के धुले हैं ऐसा नहीं हैं किंतु केंद्र की सत्ता में होने के कारण और इस दौर में अर्जित अपने दंभ के कारण कांग्रेस ने अपनी छवि मलिन ही की है। कांग्रेस का यह दंभ आखिर उसे किस मार्ग पर लेकर जाएगा कहना कठिन हैं किंतु देश के भीतर कांग्रेस के इस व्यवहार से एक तरह का अवसाद और निराशा घर कर गयी है। इसके चलते कांग्रेस के युवराज की एक आम आदमी के पक्ष के कांग्रेस का साफ-सुथरा चेहरा बनाने की कोशिशें भी प्रभावित हुयी हैं। आप लोंगों पर गोलियां चलाते हुए (पूणे), लाठियां भांजते हुए (रामदेव की सभा) और लोगों को जेलों में ठूंसते हुए (अन्ना प्रसंग) कितने भी लोकतंत्रवादी और आम आदमी के समर्थक होने का दम भरें, भरोसा तो टूटता ही है। अफसोस यह है कि आम आदमी की बात करने वाले विपक्षी दलों के नेताओं की भूमिका भी इस मामले में पूरी तरह संदिग्ध है। अवसर का लाभ लेने में लगे विपक्षी दल अगर सही मायने में बदलाव चाहते हैं तो उन्हें अन्ना के साथ लामबंद होना ही होगा। पूरी दुनिया में पारदर्शिता के लिए संघर्ष चल रहे हैं, भारत के लोगों को भी अब एक सार्थक बदलाव के लिए, लंबी लड़ाई के लिए तैयार हो जाना चाहिए।

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10 Comments on "हजारे के साथ कुछ गलत नहीं हुआ !"

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pROF. AVINASH LALL
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ANNA HAJARE TATHA UNKE HAJARO HAAJAR SAMRTHAKO SE……..

“PAHALE YAH TO TAY KAR KI WAFAADAAR KOUN HAI…
FIR WAKT TAY KAREGA KI GADDAAR KOUN HAI”.
PROF. AVINASH LALL

श्रीराम तिवारी
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अन्ना एंड कम्पनी अपनी सदिक्षाओं का कितना ही बखान करती फिरे ,जब तक वे भृष्टाचार की लड़ाई में ‘एकला चलो रे’करते रहेंगे तब तक जन-लोकपाल या किसी भी कारगर आन्दोलन का सफल होना संभव नहीं.ताज्ज्ब तो इस बात का है कि अच्छे और नामी वकीलों के सानिध्य में भी अन्ना हजारे सरकार से वो सब कुछ मांगते रहते हैं जो सरकार के बूते कि बात नहीं.संसदीय जनादेश या refrendam के कुछ कायदे क़ानून होते हैं,यदि दुनिया के विशालतम प्रजातांत्रिक राष्ट्र कि निर्वाचित सरकार को जनादेश मिलता कि संविधान में अमुक को लोकपाल के दायरे में लाना है,अमुक को बाहर रखना… Read more »
इंसान
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कुछ दिन हुए मेरा सात वर्ष का नवासा पीठ के बल लेटा बिस्तर के किनारे सिर लटकाए सामने और ऊपर छत की ओर देख रहा था| मेरे पूछने पर बोला, “नाना, सब कुछ उल्टा नज़र आ रहा है|” स्वभाविक है उस स्थिति में बच्चे की अनुभूति अवश्य प्रभावित हुई है| अचानक मीणा जी की टिप्पणी में मनुवाद की रट को देख यह आभास हो चला है कि कहीं…! उठ कर सीधे बैठने से संभवत: विचारों में कुछ संतुलन होने का लाभ हो सकता है| यह भी कैसा संतुलन? मीणा जी के धर्म के ठेकेदारों को समझ तो अवश्य आएगी लेकिन… Read more »
इंसान
Guest
अन्ना हजारे और किरण बेदी को दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लेने के समाचार ने क्षण भर के लिये मुझे निस्तब्ध कर दिया है| अन्ना हजारे गांधीवादी हैं और सुना है कि वे सन्यासी की भांति महाराष्ट्र में किसी मंदिर में वास करते हैं| व्यक्तिगत रूप में घर गृहस्थी में उलझे लाखों करोड़ों भारतीयों की तरह सत्ताधारी कांग्रेस से दूसरी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े इस सेनानी को कुछ खो जाने का कोई भय नहीं है| दूसरी ओर घर गृहस्थी से सम्बंधित और अपने दीर्घ एवं ख्यातिपूर्ण कार्यकाल में समाज में योगदान देती किरण बेदी हमारे आपके व देश के… Read more »
Dharmveer Vashistha
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Respecteds Anna Hazareji, Kiran Bediji, Swami Ramdevji & all supporters of India with Amitabh Bachchanji, Prakash jhaji & EFs, Vande Mataram. —– आ रक्षक करने आ रक्षण —– आ रण में Freedom in our Mind, Faith in our Words, Pride in our Souls, So We must salute our Nation. Be Proud We are Indian. We all always gives high regards to Indian Democracy for Transparency but steel oneself, for ……. being Brave Indians Few words for Indian ……… ……………….. कौन बनेगा करोड़पति ? ……. Beware from Corruption ……. होगा एक पुनरुत्थान …….. …….The Renaissance will be …… BE INDIAN MAKE… Read more »
sanjay
Guest

इतना पढ़ के मीणा जी को कुछ अक्ल आई हो तो …शायद

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