लेखक परिचय

अनिल गुप्ता

अनिल गुप्ता

मैं मूल रूप से देहरादून का रहने वाला हूँ! और पिछले सैंतीस वर्षों से मेरठ मै रहता हूँ! उत्तर प्रदेश मै बिक्री कर अधिकारी के रूप मै १९७४ मै सेवा प्रारम्भ की थी और २०११ मै उत्तराखंड से अपर आयुक्त के पड से सेवा मुक्त हुआ हूँ! वर्तमान मे मेरठ मे रा.स्व.सं. के संपर्क विभाग का दायित्व हैऔर संघ की ही एक वेबसाइट www.samvaadbhartipost.com का सञ्चालन कर रहा हूँ!

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अनिल गुप्ता

rahul-gandhi
जैसे जैसे २०१४ के चुनावों का समय नजदीक आ रहा है परस्पर दोषारोपण अधिक तीखे होते जा रहे हैं.अज (अक्तूबर ०९,२०१३) को कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी ने मुस्लिम राजनीती के प्रमुख केंद्र अलीगढ में रैली करके अपना भाषण दिया.टीवी पर जो उद्धरण प्रसारित किये जा रहे हैं उनके अनुसार राहुल गाँधी ने कहा ”मुजफ्फरनगर दंगों के पीछे राजनीती जिम्मेदार है”,”राजनेता हिन्दुओं और मुस्लिमों को वोटों के लिए लड़ाते हैं”,”राजनीतिक फायदे के लिए यु.पी. को बांटा जा रहा है.”
इसके जवाब में समाजवादी पार्टी के मुस्लिम चेहरे और उत्तर प्रदेश के डी फेक्टो मुख्य मंत्री आज़म खान ने पलटवार करते हुए कहा की ”पचास सालों से कांग्रेस ही दंगे करा रही है”,”दंगे करना राहुल के पूर्वजों का काम रहा है”, और ”कांग्रेस मुस्लिमों को डराकर वोट लेती रही है”.
अब तक ये सारे सेकुलर दल साम्प्रदायिकता के लिए केवल आर एस एस और जनसंघ/भाजपा को ही कोसते रहे हैं लेकिन राहुल और आज़म खान की इस जुबानी बहस में सच्चाई सामने आ ही गयी है.बेहतर होगा अगर ये नेता अपने इस बयां पर कायम रहें और लोगों को सच जानने का मौका मिले.
अभी दो दिन पूर्व जमात-ऐ-उलेमा-ऐ-हिन्द के राष्ट्रिय अध्यक्ष मौलाना सुएब कासमी ने बिजनोर में प्रेस वार्ता में कहा की कांग्रेस और उसके सहयोगी दल आज़ादी से लेकर अब तक मुस्लिमों को वोट बेंक के रूप में इस्तेमाल करते चले आ रहे हैं.हमेशा मुस्लिमों को धोखा दिया गया.दंगे भड़काकर मुस्लिमों का ध्यान विकास से हटाया जाता रहा है.कांग्रेस व उसके सहयोगी दल बाँटने व दंगों की राजनीती करते हैं.मौलाना कासमी ने मुजफ्फरनगर दंगों के लिए भाजपा विधायकों की गिरफ़्तारी को सपा सर्कार का सियासी अजेंडा भी बताया.उन्होंने कहा की भाजपा देश की उन्नति,एकता,अखंडता व विकास की बात करती है.गुजरात में नरेन्द्र भाई मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सर्कार में ग्यारह सालों से कोई दंगा नहीं हुआ है.वहां पर विकास हो रहा है.मुस्लिम इस बात को अब समझने लगे हैं.
मौलाना ने ये भी कहा की भाजपा विधायक संगीत सोम, सुरेश राणा की गिरफ़्तारी सपा सर्कार का सियासी अजेंडा है.राजस्थान,छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश,गोवा,बिहार में मुस्लिम भाजपा से जुड़ रहे हैं.यु.पी. का मुस्लिम भी अब वोट बेंक बनकर नहीं रहेगा,बल्कि विकास की राजनीती करने वाली भाजपा से जुड़ेगा.
जमात-ऐ-उलेमा-ऐ-हिन्द के अध्यक्ष का ये बयान मुस्लिम मानस में आ रहे सकारात्मक बदलाव का संकेत है.
वास्तव में हिंदुस्तान प्रायद्वीप की पिछले डेढ़ सौ वर्षों की राजनीती का इतिहास इस क्षेत्र(भारत,पाकिस्तान,बांग्लादेश) के हिन्दू-मुस्लिम संबंधों के इतिहास से जुड़ा है.इसकी शुरुआत तो १७०७ से ही हो गयी थी.भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा भारत की अस्मिता से टकराव जब शुरू हुआ तो यहाँ की सहिष्णु हिन्दू जनता उसके विरोध में खड़ी होने लगी.छत्रपति शिवाजी द्वारा मुग़ल सल्तनत को निर्णायक चुनौती दी गई थी जिसके कारण मुग़ल बादशाह औरंगजेब को दक्खन में ही रहकर युद्ध करना पड़ा और वहीँ १७०७ में उसकी मौत हो गयी.उसकी मौत के साथ ही मुग़ल सल्तनत बिखरने लगी और अगले डेढ़ सौ वर्षों में दिल्ली का तखत केवल नाम मात्र का बादशाह रह गया. कहावत बन गयी की ”नाम है शाहे आलम और हुकूमत है लालकिले से पालम”.इस दौरान मुस्लिम बद्शहॉत और मुग़ल सल्तनत के दौर में जिन मुस्लिमों (अधिकांश हिन्दुओं से बलपूर्वक या लालच से धर्मान्तरित)को जागीरें और ज़मिन्दारियां बख्शी गयी थी वो छिनने लगी थीं.१८५७ के प्रथम स्वातंत्रय संग्राम में दिल्ली के मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फर को सांकेतिक रूप से नेता बनाकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया था.लेकिन इससे लगभग एक शताब्दी पूर्व, १७३९ में नादिरशाह के हमले और दिल्ली की लूट के बाद,जाटों और मैराथन द्वारा दिल्ली के आस पास हिन्दू राज्य स्थापित कर लिए थे.मुग़ल सल्तनत की कमजोर होती स्थिति को देखकर सबसे पहले शाह वलीउल्लाह ने ’इस्लाम खतरे में’ नारा दिया और इसके लिए मुस्लिमों द्वारा ” हिन्दुओं की सांगत में रहने के कारण उनकी जीवन शेली अपनाये जाने” और शरियत के अनुसार न रहने को जिम्मेदार मन.तथा बादशाह और सामान्य मुसलमानों को कडाई से शरियत के अनुसार जिंदगी जीने का आग्रह किया.इसके लिए उसने हिन्दू रीती रिवाजों के खिलाफ मजबूत आन्दोलन छेड़ने का सन्देश दिया उसने ये भी कहा की ’ये जरूरी है की मुस्लमान अपने आप को सामान्य बहर्तीय समाज का हिस्सा न समझें.बल्कि उन्हें हमेशा ये याद रखना चाहिए की वो वृहद मुस्लिम संसार का हिस्सा हैं’.उसने अहमद शाह अब्दाली को भी भारत में आमंत्रित किया.१७६१ में अब्दाली आया, लड़ा,कामयाब हुआ, लूटा और चला गया. अगले साल वलीउल्लाह मर गया.१७८२ में मैराथन ने दिल्ली को जीत लिया.इसी दौरान अरब में वहाबी आन्दोलन उभर रहा था जिसने मुस्लिम फंडामेंटलइज्म को बढ़ावा दिया.भारत में ब्रिटिश शाशन की स्थापना से इन रूढ़िवादियों में खतरे की घंटी बजने लगी थी.
१७९३ में बंगाल में अंग्रेजों द्वारा स्थायी बंदोबस्त ने मुस्लिम अभिजात्यवर्ग को तगड़ा झटका दिया.इसके साथ ही मानचेस्टर की मीलों से बना कपडा आयत होने से बंगाली बुनकर तबाह हो गए.अंग्रेजी कानूनों और अदालतों ने उलेमाओं के प्रभाव को काफी कम कर दिया.इन सब के बीच वलीउल्लाह के बेटे शाह अब्दुल अज़ीज़ ने दिल्ली में फतवा जरी करके हिंदुस्तान को ’दारुल हरब’ घोषित कर दिया.उसने मुसलमानों को अंग्रेजों के अधीन फ़ौज में भारती होने की सलाह भी दी.इसके साथ ही अपने धर्मयुद्ध को चलाने के लिए अपने दूर के रिश्तेदार सैय्यद अहमद बरेलवी को सिखों के विरुद्ध जिहाद चलाने का जिम्मा सोंपा.सिखों के विरुद्ध जिहाद के लिए सैय्यद अहमद और शाह इस्माइल ने रोहिलखंड,दोआब,अवध,बिहार और बंगाल में जिहादियों की भर्ती और धन एकत्र करने का अभियान शुरू किया.१८२१ में इन दोनों ने मक्का जाने के लिए कलकत्ता से प्रस्थान किया.मक्का में इन्होने तुर्कियों की सहायता लेने का प्रयास किया तथा वो वहाबीयों के संपर्क में भी आये.१८२६ में वो दोनों भारत लौट आये.कलकत्ता से दिल्ली आते हुए उन्होंने भर्ती शुरू करदी.तथा हिन्दू परम्पराओं को छोड़ने के लिए भी सघन प्रचार किया.तथा मुसलमानों को हिन्दू त्योहारों में भाग न लेने के लिए आह्वान किया.अंग्रेज इन सब घटनाओं से अवगत थे लेकिन चूँकि ये इस्लामी पुनरुत्थानवादी सिखों के विरुद्ध धर्मयुद्ध में लगे थे अतः अंग्रेजों द्वारा उन्हें अनदेखा किया गया बल्कि उन्हें प्रोत्साहित किया.यहाँ तक की नील की खेती करने वाले बिहार और अन्य स्थानों के ब्रिटिश मालिकों द्वारा जिहाद में हिस्सा लेने वाले मुस्लिम कर्मचारियों को अवकाश भी स्वीकार कर दिया गया.लेकिन बालकोत के युद्ध में ये मुजाहिदीन फौज हार गयी और सैय्यद अहमद और शाह इस्माइल दोनों युद्ध में मारे गए.
उधर दिल्ली में अब्दुल अज़ीज़ की मौत के बाद उसके पोते मोहम्मद इशाक ने वलिउल्लहि आन्दोलन को पुनर्गठित किया और १८४१ में तुर्की से सीधे संपर्क जोड़ने के लिए मक्का की और प्रस्थान किया.लेकिन वो १८४६ में मक्का में ही मृत्यु को पाप्त हुआ.बंगाल में भी दारुल हरब के सिद्धांतों का जोरशोर से प्रचार चल रहा था.
1857 के असफल स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने मुस्लिमों को नौकरियां देनी काफी कम कर दीं.ऐसे में सैय्यद अहमद खान (सर सैय्यद) ने एक थ्योरी दी की हिंदुस्तान में हिन्दू और मुस्लमान कभी एक हो ही नहीं सकते हैं क्योंकि ये दोनों दो अलग कौमें हैं.और इनमे एक होने के लिए कोई भी समानता नहीं है.बंगाल में नवाब अब्दुल लतीफ़ ने १८६३ में मुहम्मदन लिटरेरी सोसाईटी की स्थापना की जिसने मुसलमानों को अंग्रेजी भाषा का ज्ञान प्राप्त करने और विज्ञानं की शिक्षा ग्रहण करने को प्रेरित किया.ताकि वो ब्रिटिश राज के प्रति सकारात्मक सोच बना सकें और उन्हें हुकूमत में प्रशाशनिक नौकरियां मिल सकें.सैय्यद अहमद और अन्य बंगाली मुस्लिम ब्रिटिश भक्तों के प्रयास अंग्रेजों की नगाह से बच नहीं सके.और सैय्यद अहमद को १८६९ में इंग्लेंड आमंत्रित किया गया.वहां के जीवन को देखकर उसने लिखा की अंग्रेजों की तुलना में भारत के लोग गंदे जानवर जैसे हैं.१८७० में ब्रिटिश अफसर हंटर ने ”द इन्डियन मुस्लमान” नामक पुस्तक लिखी जिसमे वहाबी मुसलमानों को ब्रिटिश हुकूमत का सबसे बड़ा खतरा बताया गया.इसके बाद सर सैय्यद अहमद ने अनेकों लेख लिख कर ये बताने की कोशिश की वहाबी अंग्रेजों के खिलाफ नहीं थे बल्कि सिखों के विरुद्ध थे.इसके साथ ही सर सैय्यद अहमद ने मुहम्मदन एंग्लो-ओरियंटल कोलेज की स्थापना के लिए फंड इकठ्ठा करना शुरू किया जिसमे उसे काफी सफलता मिली और अलीगढ में एंग्लो-ओरियंटल कोलेज १८७५ में स्थापित हो गया.जिसमे एक अंग्रेज प्रिंसिपल की नियुक्ति की गयी.और इस अंग्रेज प्रिंसिपल बेक ने सर सैय्यद को हिन्दू विरोधी बनाने में अपनी ताकत लगादी.बाद के अंग्रेज प्रधानाचार्यों ने भी इस परंपरा को आगे बढाया.
१९०५ में कर्ज़न ने बंगाल के विभाजन की घोषणा करदी.१९०६ में सर आगा खान के नेतृत्व में लार्ड मिनटों को ज्ञापन देकर अलग चुनाव क्षेत्रों की मांग की गयी तथा देश के विभाजन के बीज बो दिए गए.
कांग्रेस जो लोकमान्य तिलक और अन्य राष्ट्रवादीयों के नेतृत्व में देश की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रही थी उसमे १९१६ के लखनऊ समझौते के बाद मुस्लिम परस्ती की होड़ लग गयी.१९२१ में खिलाफत आन्दोलन मुसलमानों के आगे घुटने टेकना जैसा ही था.इस आन्दोलन का देश की आज़ादी से कोई सरोकार नहीं था. और ये तुर्की के सत्ताच्युत किये गए सुल्तान को पूरी दुनिया के मुसलमानों का खलीफा बनाने के लिए था.सावरकरजी और तिलक ने इसका विरोध किया था.रा.स्व.स. के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने, जो उस समय विदर्भ कांग्रेस के बड़े नेता थे,ने भी खिलाफत का विरोध किया था.लेकिन इस आन्दोलन ने मुस्लिम कट्टरपंथ के सांप को दूध पिलाने का काम किया.और आन्दोलन की असफलता के बाद मुसलमानों ने पूरे देश में हिन्दुओं के विरुद्ध दंगे करके असंख्य हिन्दुओं की हत्या कर डाली.केरल के मालाबार क्षेत्र में मुस्लिम मोपलाओं नें वहां के हिन्दुओं पर बर्बर अत्याचार किये.इसकी पृष्ठभूमि पर वीर सावरकर ने ’मोपला’ उपन्यास लिखा.लेकिन निर्दोष हिन्दुओं की बर्बरता पूर्ण धंदग से हत्याओं के बाद भी गांधीजी मोपलाओं को शांति का दूत बताते रहे.बाद में पंडित मदन मोहन मालवीय की मांग पर इन दंगों की जांच किये जाने पर कालीकट जिला कांग्रेस के सचिव श्री माधवन नायर ने लिखा की मोपलाओं ने अल्लाहो अकबर के नारों के साथ तेज धारवाले हथियारों से हमला करके हजारों बच्चे,वृद्ध और महिलाओं सहित क्रूरता से हत्याएं की.लेकिन गांधीजी इसे मोपलाओं का धर्मयुद्ध बताते रहे.बाद में कम्युनिस्ट शाशन में उन्हें स्वाधीनता सेनानी बताकर पेंशन भी दे दी गयी.
डॉ आंबेडकर ने मुस्लिम मानसिकता को समझकर इस विषय में लम्बे लेख लिखे.श्रीमती एनी बेसेंट ने मुस्लिम तुष्टिकरण के घटक परिणामों के बारे में कांग्रेस को कई बार चेतावनी दी थी.

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