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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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डॉ. परशुराम तिवारी

सुना है गाँधीजी ने भारत की आजादी की तुलना में देश में देश में स्वच्छता को अधिक महत्त्वपूर्ण माना था. इसके बावजूद देश को स्वच्छता से पहले आजादी ही मिली. गाँधी जी ने देश के सही रूप में विकास के लिए, पहले गाँव के विकास पर जोर दिया था. इसके बाबजूद, अतीत की सरकारों ने गाँधी जी की इस तरह की अनेक नेक इच्छाओं की अनदेखी की. यही वजह है कि देश को स्वच्छ बनाने की दिशा में 67 साल तक कोई ठोस नीति या योजना नहीं बनी. विगत लगभग दो दशक में सम्पूर्ण स्वच्छता कार्यक्रम और निर्मल भारत अभियान के तहत कुछ प्रयास हुए थे जो नाकाफी रहे. कारण ? इनमें राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छा शक्ति एवं जनभागीदारी की महत्त्वपूर्ण कमियां थी.

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त, 2014 को लाल किले की प्राचीर से दिए गए अपने पहले भाषण में स्वच्छता को देश के एक व्यापक अजेंडा के रूप में देश के सामने रखा. उन्होंने स्वच्छता के महत्त्व कुछ इस तरह बयां किया था- “पहले शौचालय, फिर देवालय.” इस भावना को अमली जामा पहनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत मिशन ( एसबीएम) की शुरुआत की गई. इस मिशन ने मानो ठहरे हुए पानी में कंकड़ मार दिए हैं. जन जन में साथ-साफ़ सफाई की आदत को बढ़ावा देने और खुले में शौच जाने की प्रथा को समाप्त करने का सन्देश देने के लिए प्रधानमन्त्री के साथ लाखों लोगों ने अपने हाथ में झाड़ू थामी. कई जगह लड़कियों ने ससुराल में जाने से पहले शौचालय बनाने की मांग रखना शुरू कर दिया. कई जगह लोगों ने प्रोत्साहन राशि न मिलने पर भी स्वेच्छा से अपने घर में शौचालय बनवा लिए. वातावरण की साफ़-सफाई के अन्य प्रयास भी देश में शुरू हुए हैं.

मप्र के हरदा में चलाये गए माल युद्ध अभियान द्वारा की जा रही पहल का स्वयं प्रधानमन्त्री ने रेडियो पर प्रसारित अपने मन की बात कार्यक्रम में उल्लेख किया है. देश दुनिया में चर्चा हो रही है कि स्वच्छता कार्यक्रम ने सही मायने में अभियान का रूप ले लिया है. इसके पीछे यह मन जगा रहा है कि स्वच्छता मिशन के साथ अब व्यापक राजनीतिक इच्छा शक्ति, प्रशासनिक सक्रियता और जन भागीदारी दिखने लगी है. केंद्र सरकार ने 2019 तक भारत को खुले में शौच मुक्त बनाने के लिए योजना भी बना ली है. म.प. सरकार ने भी 2019 तक प्रदेश में लक्षित 900,3900 हजार शौचालय बनाने की कार्ययोजना बना ली है.

यहाँ तक तो ठीक है. पर यक्ष प्रश्न ये है कि क्या सिर्फ प्रधानमंत्री की इच्छा और कार्य योजना बना लेने मात्र से देश में खुले में शौच मुक्त और स्वच्छता का लक्ष्य प्राप्त हो सकता है? आगामी पांच साल में इस लक्ष्य को हासिल करना यानि पहाड़ तोड़ने जैसा कठिन और चुनौतीपूर्ण है. यह चिंता इसलिए है क्योंकि मिशन में “दसरथ माझियों” का तो अता-पता ही नहीं है. इस तथ्य को समझने के लिए मप्र. के स्वच्छता से जुड़े कुछ जरुरी आंकड़ों, राज्य में एक साल में प्राप्त उपलब्धियों और चल रही प्रक्रियाओं पर रोशनी डालना जरुरी है. विगत एक साल में भाबरा, (अलीराजपुर), बडवानी, सरदारपुर (धार) और पेटलावद (झाबुआ) जिलों की 62 पंचायतों के 125 से अधिक गांवों में स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर हुए प्रयासों को करीब से देखने के बाद जमीनी हकीकत कुछ और ही दिखी. विश्व हाथ धुलाई दिवस के अंतर्गत प्रदेश में एमपीवाश (डीएफआईडी/वाटर ऐड) के सहयोग से शासन द्वारा गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने के लिए गठित राज्य टीम का अंग होने के नाते भी 30 से अधिक जिलों में मिशन के काम को करीब से देखने का अवसर मिला. उसी आधार पर ये मीमांसा संभव हुई-

ये है जमीनी सच्चाई-

बहुत जतन करने पर अक्टूबर 2014 से सितम्बर 2015 के बीच सरकार ने लगभग 5.69 लाख शौचालय बनवाए हैं. जबकि 5 साल की कार्य योजना के अनुसार कुल लक्ष्य 9003900 में से प्रदेश में से इस साल 180780 शौचालय बनना चाहिए थे. जबकि मप्र सरकार की उपलब्धि लगभग 31.7 ही रही. यानि सरकार फ़ैल हो गई. यदि इसी गति से प्रदेश सरकार ने स्वच्छता मिशन को लागू करने का काम किया तो 2019 तक लगभग 2845000 शौचालय ही बन सकेंगे. इसका मतलब ये होगा कि निर्धारित लक्ष्य के बाकी 6158900 शौचालय बनाने के लिए 2019 के बाद 11 साल और लगेंगे. यानि लक्ष्य 2030 तक या इसके बाद ही हासिल हो सकेगा. इसमें भी गुणवत्ता और समुदाय/लोगों द्वारा उनके उपयोग की गारंटी शामिल नहीं है.
सीहोर जिले का बुधनी, मुख्मंत्री का गृह विकास खंड है. वर्ष 2013-2014 से यहाँ गाँव को खुले में शौच मुक्त करने के प्रयास चल रहे हैं. दो साल में यहाँ बहुत धन राशी खर्च की गई है. कुछ काम भी हुए हैं, पर कामयाबी कोसों दूर है. 2015 तक बुधनी विकास खंड में लगभग 16000 शौचालय बनाये गए थे. इनमे से अनेक तो फर्जी या लापता हैं. लगभग 1965 शौचालय जर्जर और अनुपयोगी पाए गए हैं. इसी तरह राज्य के प्रायः सभी जिलों में  2012 के पहले रिपोर्ट किये गए 15 लाख में से अधिकतर शौचालय फर्जी और जर्जर पाए गए हैं. इस तरह के जर्जर शौचालयों को सुधारने के लिए सरकार के पास न तो धन राशि की व्यवस्था है और न ही मरम्मत की अलग से कोई रणनीति.
शौचालय निर्माण में प्रशिक्षित राज मिस्त्रियों और स्वच्छ्ता दूतों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. लेकिन मिशन में ना तो राज मिस्त्रियों का गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण नहीं होता है और ना ही उनको निर्माण कार्य में निरंतर लगाये रखने की जिलों/विकासखंड के पास कोई ठोस योजना है. इसी तरह स्वच्छ्ता दूतों को भी प्रशिक्षण के बाद प्रायः काम ही नहीं दिया जाता. अगर काम दिया भी गया, तो बाद में किसी ने ही पूछा नहीं कि उन्होंने मिशन के लिए क्या काम किया? अगर किसी दूत ने कोई काम किया भी है तो उनके मानदेय के भुगतान की कोई चिंता नहीं करता. इससे इन दूतों का योगदान नगण्य होकर रह गया है.
बहुत से गाँव/फलियों/पहाड़ी/दुर्गम इलाकों तक शौचालय निर्माण सामग्री के परिवहन की लागत विकय स्थल से अधिक बैठती है. जबकि मिशन के तहत सभी तरह के इलाकों के लिए शौचालय निर्माण लिए केवल 12000/- रूपये ही निर्धारित हैं. इस तरह मिशन में दूरी के मान से राशि का आवंटन व्यावहारिक नहीं है. इस कारण भी समय पर और गुणवत्तापूर्ण काम नहीं होता. केंद्र/राज्य को इस मुद्दे पर भी जल्द और ठोस पहल करना चाहिए है.
विकास खंड और जिला स्तर पर जो समन्वयक पदस्थ हैं वो प्रशासन के प्रोफेसोनल बनने के बजाय या तो बाबू बना दिए गए हैं या फिर अफसर बन गए हैं. उन्हें सामाजिक परिवर्तन के वाहक बनाने की जरुरत है.
बहुत से हितग्राहियों को मिशन की प्रोत्साहन राशि का भुगतान भ्रष्टाचार रहित नहीं है. दुखद पहलू तो ये है कि कहीं-कहीं तो स्वयं सेवी संस्थाओं की मौजूदगी में ही यह खेल जारी है.
शौच के बाद और खाने से पहले सही तरीके से हाथ धोने की आदत को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 15 अक्टूबर, 2014 को गिनीज बुक का विश्व कीर्तिमान बनाने की पहल मप्र शासन ने की थी. इस कीर्तिमान का शासन को गिनीज से प्रमाणीकरण मिला भी गया है. पर इस श्रम साध्य काम को अंजाम तक पहुंचाने वाले शिक्षकों, प्रशिक्षकों, एसबीएम स्टाफ/सहयोगियों और कार्यकर्ताओं को शासन ने सम्मान का एक शब्द भी नहीं दिया. इससे मिशन के लिए मेहनत करने वाले हतोत्त्साहित हुए हैं.
विश्व हाथ धुलाई दिवस के आयोजन के लिए स्कूलों को दी गई सामग्री-बाल्टी, मग, वाश स्टेंड, पानी की व्यवस्था के साधन आदि बाद के दिनों में या तो गायब पाए गए या फिर स्कूल प्रबंधन ने ताले में बंद करके रख दिए. यानि प्रदेश में हाथ धुलाई कार्यक्रम एक टिकाऊ परंपरा बनने के बजाय महज रस्म अदायगी बन कर रह गया. सरकार को चाहिए की वह महज तात्कालिक वाहवाही लेने के लिए अन्तराष्ट्रीय या राष्ट्रीय पुरष्कार लेने की बदनामी से बचे.
अनेक स्कूलों में अब भी लड़के-लड़कियों के लिए शौचालय नहीं. जहाँ हैं, उनमें से कुछ के खिड़की दरवाजे टूटे हैं, कुछ में ताले पड़े हैं, कुछ का उपयोग शराबी- नशेडी व्यसन स्थल के रूप में कर रहे हैं. कई स्कुलो के शौचालय इसलिए उपयोग नहीं होते क्योंकि सफाई के लिए उनके पास स्टाफ और राशि उपलब्ध नहीं.

यह आश्चर्यजनक ही है कि स्वच्छता मिशन की सफलता के लिए सरकार, नीति निर्माण से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी और उनके सलाहकार, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन या राष्ट्रीय आजीविका मिशन जैसी प्रक्रियाओं और कोई प्रेरणा नहीं ले रहे जी अपेछाकृत इससे बेहतर परिणाम दे रहे हैं.

गुणवत्तापूर्ण परिणाम के लिए जरुरी हैं ये पहल –
स्वच्छता का मतलब केवल शौचालय बन जाना ही नहीं है. इस हेतु शौचालयों का नगर/गाँव के हर परिवार के सदश्यों द्वारा उपयोग, पानी की व्यवस्था, ठोस और गीले कचरे के लिए अलग-अलग कूड़ेदान की व्यवस्था, कचरे का प्रबंधन, नालियों का बनना एवं की हर गली की नियमित साफ़-सफाई होना भी जरुरी है. जहाँ ये व्यवस्थाएं मुकम्मल ना हों, वहां के स्थानीय निकाय के अमले और समुदाय के लिए दण्ड का प्रावधान हो. इस हेतु पंचायत राज और नगरीय निकाय अधिनियमों में जरुरी बदलाव करना होंगे.
सभी स्तर के प्रशासनिक अमले में स्वच्छ भारत मिशन के प्रति प्रतिबद्धता की बेहद कमी है. सरकारी अधिकारी अब भी स्वच्छता के काम को एक रुटिन योजना के काम  की तरह ही करते है. अत: कार्य प्रदर्शन के आधार पर इस तरह के अमले को हटाने, या बनाये रखने अथवा प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.
एसबीएम के दिशानिर्देश जारी हुए एक साल हो गया है पर मप्र में राज्य, जिला और विकास खंड स्तर पर अब तक अनुकूल और आवश्यक तंत्र विकसित नहीं किया गया. इसमें राज्य, जिला पंचायत और जनपद पंचायत स्तर पर मानव संसाधन सहित मिशन कार्यालयों की स्थापना करना आदि शामिल हैं.
व्यवहार परिवर्तन हेतु, खासकर महिलाओं में स्वच्छता के महत्त्व पर आधारित सघन और प्रभावी संचार रणनीति बनाकर लागू की जाये. पंचायत/गाँव स्तर पर जागरूकता हेतु “पैन इन वैन” जैसे नवीन तरीके के शिविर/गतिविधिbharat abhiyanयाँ आयोजित किया जा सकता है.
विकास खंड और जिला समन्वयकों की दक्षता बढ़ने के लिए समय-समय पर सामुदायिक प्रक्रियाओं को बढावा देने वाले स्थानों/माडल का भ्रमण/ एक्सपोज़र कराया जाये. इससे गुणवत्तापूर्ण परिणाम की परिस्थिति बनती है.
क्षमता वृद्धि/प्रशिक्षण और अनुश्रवन के लिए राज्य स्तर पर संसाधन समूह अथवा संस्था का गठन हो.
बेहतर कार्य प्रदर्शन के लिए सीएम कार्यालय, राज्य मिशन कार्यालय, जिला और जनपद स्तर की जल एवं स्वच्छता समितियों द्वारा नियमित निगरानी एवं समीक्षा हो. कलेक्टर द्वारा मिशन के काम की निगरानी के लिए माह में कम से कम एक बार जिले में मिशन के काम की समीक्षा अनिवार्य की जाये.
पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के साथ पीएचई, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला एवं बाल विकास विभागों से जुडी परियोजनाओं में अनिवार्य समन्वय सुनिश्चित किया जाये.
मिशन के काम में थर्ड पार्टी की भूमिका सुनिश्चित हो, इससे गुणवत्तापूर्ण परिणाम हासिल करने में मदद मिलेगी.
सभी जर्जर और अनुपयोगी शौचालययों को सुधारने में उद्द्योग जगत और समुदाय को भी आगे आना चाहिए.
दूरस्थ इलाकों तक शौचालय निर्माण सामग्री की पहुँच और आकस्मिक काम के लिए पंचायत को अनाबद्ध राशि देने का प्रावधान होना चाहिए.
हितग्राही को प्रोत्साहन राशि के भुगतान की हर स्तर पर समय सीमा तय हो. समय पर भुगतान ना होने पर जिम्मेदार के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही हो.
मिशन का काम अच्छा करने वालों को राज्य, जिला, जनपद और पंचायत स्तर पुरष्कृत और प्रोत्साहित किया जाये.
यदि 2019 तक मप्र को स्वच्छता मिशन के तहत आधी सफलता भी हासिल करना है तो स्वच्छ भारत मिशन के एक साल पहले जारी दिशा निर्देशों को मध्यप्रदेश की विशेष परिस्थितियों में तत्काल लागू करना होगा. मगर ये तब ही संभव होगा, जब मुख्यमंत्री चाहेंगे.

 

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2 Comments on "कैसे होगा 2019 तक स्वच्छ मध्यप्रदेश ?"

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Ramkrishan yadav
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अति सुन्दर

डॉ परशुराम तिवारी
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डॉ परशुराम तिवारी

मेरा समसामयिक लेख प्रकाशन के लिए बहुत शुक्रिया.

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