लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

कश्मीर घाटी में पिछले लम्बे अरसे से पाकिस्तान ने छद्म युद्ध छेड़ रखा है । ज़ाहिर है इस युद्ध के लिए परम्परागत तरीक़ों और हथियारों का तो इस्तेमाल नहीं हो सकता । इसे कुछ विशेषज्ञ हज़ार घाव देने वाला युद्ध भी कहते हैं । यानि शत्रु के शरीर पर एक एक कर हज़ार घाव कर दो ताकि वह निस्तेज हो जाए । पाकिस्तान भारत के शरीर पर हज़ार घाव करने के प्रयास में ही लगा हुआ है , क्योंकि आर पार की लड़ाई वह १९४७ से लेकर कारगिल युद्ध तक चार बार कर चुका है लेकिन उसमें सफल नहीं हुआ । हज़ार घाव करने की लड़ाई उसने कश्मीर घाटी के कुछ लोगों को भी शामिल कर लिया है । ये लोग क्षीण अल्पमत के लोग हैं लेकिन इन्होंने कश्मीर घाटी के बहुसंख्यक लोगों को एक प्रकार से बन्धक बना लिया है । बन्धक बने ये लोग कभी हुर्रियत कान्फ्रेंस के लोगों द्वारा जारी किए गए कैलण्डर का पीछा करते हैं , कभी किसी आतंकवादी गुट द्वारा जारी प्रैस विज्ञ्प्ति को पढ़ कर ही लाल चौक सुनसान हो जाता है । बहुत ही गहरी रणनीति से भूमिगत और उनके भूमि के ऊपर विचर रहे समर्थक भय और आतंक का वातावरण बना कर कश्मीर घाटी को बन्धक बनाए हुए हैं । इस प्रकार के वातावरण में समाजविरोधी तत्व धन सम्पत्ति जुटाने और उगाहने के अभियान में जुट जाते हैं । लेकिन यह सब कुछ तब तक ही संभव है यदि सरकार अपवित्र नैक्सस को तोड़ने में असफल रहती है । अब तक भारत सरकार का तरीक़ा किसी भी ढंग से इस अपवित्र आतंकी गठबन्धन से बातचीत करके कोई बीच का रास्ता निकालने का ही रहा है । उससे शान्ति की कुछ समय के लिए लीपापोती तो होती रहती है लेकिन अन्दर पनप रहे कीड़े नहीं मरते । आम जनता और भी ज़्यादा भयग्रस्त हो जाती है । उसको लगता है जब आतंकी गठबन्धन का सरकार कुछ नहीं बिगाड़ पाती तो हमारी क्या बिसात है । कश्मीर घाटी में पिछले तीस साल से यही हो रहा है । वहाँ के स्थानीय राजनीतिज्ञों को इस आतंकी वातावरण से असीम लाभ मिलता है । वे दिल्ली को डराते रहते हैं कि कश्मीर घाटी और दिल्ली के बीच वे ही इस नाज़ुक दौर में सेतु का काम कर सकते हैं । उनके बिना कश्मीर घाटी से संवाद समाप्त हो जायेगा । इस संवाद के लोभ में उनके भ्रष्ट आचरण की ओर कोई ध्यान नहीं देता । आज कश्मीर घाटी में शेख़ अब्दुल्ला का कुनबा भ्रष्टाचार को लेकर इतना बदनाम है कि उनके भ्रष्ट आचरण की सुगन्ध खाने के लिए वहाँ का बच्चा बच्चा तैयार है । लेकिन आप उनके इस भ्रष्टाचार की जाँच नहीं कर्णाटक सकते क्योंकि उनके अनुसार इससे घाटी की स्वायत्तता का हनन होता है । इसी स्वायत्तता की रक्षा करते करते दिल्ली ने घाटी में पाकिस्तान पोषित राक्षस को जेहलम किनारे पसरने दिया ।
लेकिन लगता है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार ने सत्ता में आने पर कश्मीर घाटी को समझने का मुहावरा बदल लिया है । पहली बार भारत सरकार ने कश्मीर घाटी में सचमुच का विधान सभा चुनाव करवा दिया ।पहला चुनाव जिसमें वहाँ के लोगों को लगा कि वे अपना प्रतिनिधि केवल रस्सी तौर पर नहीं बल्कि सही अर्थों में स्वयं चुन सके । यह आतंकवादियों और पाकिस्तान दोनों के लिए चौंक उठने का समय था । मोदी ने बातचीत का रास्ता तो पाकिस्तान से भी खुला रखा , लेकिन बातचीत की भाषा बदल गई । अब रिरियाने या सफ़ाई देने या माँगने की भाषा न रहकर मोटा मोटी खरी खरी सुनाने की भाषा हो गई । आतंकवादियों ने एक बार फिर बुरहान बानी के मरने के मौक़े का लाभ उठाकर कश्मीर बन्द और लाल चौक बन्द की पुरानी क़वायद शुरु कर दी । पत्थर फेंकने का पुराना सिलसिला । जगह जगह कुछ हज़ार लोगों के प्रदर्शन । सेना पर हमला । नियंत्रण रेखा पर फ़ायरिंग इत्यादि इत्यादि । लेकिन इस रणनीति का सबसे अहम हिस्सा था , पत्थर फेंकते रहो ताकि सरकार के पास कर्फ़्यू लगाने के अलावा कोई चारा न रहे । सरकार बन्दूक़ चलाए तो लाशों की गिनती बताओ और पैलेट गन चलाए तो शरीर पर लगे छर्रों का हिसाब किताब प्रसारित करते रहो । भारत सरकार कितने दिन यह दबाब झेल सकेगी ? गिलानी का पुराना अनुभव महीना दो महीना बताता था । उसके बाद सरकार फिर आकर किसी गिलानी- खुरासानी-करमानी-हमदानी के दरबाजे पर नाक रगड़ेगी । तब फिर वही पुराना सिलसिला शुरु हो जायेगा । लेकिन नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पाकिस्तान और कश्मीर घाटी में सक्रिय उसके आतंकी संगठनों को अलग अलग उत्तर उन्हीं की भाषा में दिया । पाकिस्तान को उन्होंने बलोचिस्तान की चिन्ता करने के लिए कहा । बताया कि मजलूम बलोचों पर पाकिस्तान की पंजाबी सेना अत्याचार कर रही है । यह भी कहा कि जम्मू कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के क़ब्ज़े में है वहाँ के लोग भारतीय नागरिक ही हैं । पाकिस्तान की पंजाबी सेना वहाँ भी बहुसंख्यक शिया समाज को मार रही है और पाकिस्तान से मुसलमानों को ला लाकर वहाँ बसा रही है । उसे बन्द कर देना चाहिए । गिलगित बल्तीस्तान में इससे एक बारगी तूफान आ गया । वहाँ के लोगों को लगा कि उनकी चिन्ता करने वाला भी कोई है । वहाँ भारत ज़िन्दाबाद के नीरे लगने लगे । बलोचिस्तान के लोग आभार जताने लगे कि किसी ने तो उनकी चिन्ता की ।
दूसरा उत्तर मोदी सरकार ने आतंकी संगठनों को दिया । सरकार किसी गिलानी के पास नहीं गई । यदि बात करनी होगी तो जनता के चुने हुए नुमांयदों के साथ की जायेगी । सीपीएम के कुछ लोग भाग कर गिलानी के दरवाज़े तक गए भी लेकिन झल्लाए गिलानी ने उनके लिए दरवाज़ा खोलने से भी इन्कार कर दिया । आतंकियों ने उड़ी में सेना के शिविर पर आक्रमण किया तो भारतीय सेना ने जम्मू कश्मीर के पाकिस्तान द्वारा क़ब्ज़ा किए गए इलाक़े के अन्दर घुस कर आतंकी शिविरों को नष्ट कर दिया । मोदी सरकार के इस क़दम से तो पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में भी भूचाल आ गया । आतंकी संगठनों को लगता था कि वे दबाब का वातावरण बना कर प्रदेश की मुख्यमंत्री को डरा लेंगे और वह डर कर सरकार से हाथ खींच लेगी तो दिल्ली और घाटी आमने सामने है , ऐसा माहौल बनाने में सहायता मिलेगी । आज तक प्रदेश में यही होता रहा है । वहाँ का मुख्यमंत्री या तो आतंकियों के आगे हथियार डाल देता था या फिर आतंकियों की भाषा में ही बोलना शुरु कर  देता था । फ़ारूक़ अब्दुल्ला तो अभी तक रट लगा रहे हैं कि सरकार और किसी से बात करे न करे , हुर्रियत कान्फ्रेंस से जरुर कर ले । दरअसल फ़ारूक़ अब्दुल्ला जैसे लोग ही हैं जो घाटी में हुर्रियत कान्फ्रेंस जैसी तंजीमों को ज़िन्दा रखते हैं । लेकिन महबूबा मुफ़्ती ने आतंकियों के राजनैतिक दबाब और आतंक के भय में आने से इन्कार कर दिया । उन्होंने स्पष्ट कहा कि आतंकी और उनके समर्थक अपने बच्चों को तो बाक़ी प्रदेशों में पढ़ने के लिए भेज रहे हैं और ग़रीब के बच्चों को आगे करके उनका दोहन कर रहे हैं । सैयद अहमद शाह गिलानी की पोती के हाथ में पोथी और लाल चौक में ज़मीन पर बैठ कर सब्ज़ी बेचने  वाले के बेटे के हाथ में पत्थर ।
अब पाकिस्तान की शह पर आतंकी संगठनों ने निराशा में आकर अपनी अंतिम चाल चली है । उन्होंने घाटी में स्कूलों को बन्द करवाना या जलाना शुरु कर दिया है । उन्होंने धमकियाँ देना शुरु कर दी हैं कि कोई बच्चा परीक्षा देने के लिए स्कूल में न जाए । जब तक पाकिस्तान के साथ मिल तर आतंकी कश्मीर घाटी को आज़ाद नहीं करवा लेते तब तक विद्यार्थियों को पढ़ने व परीक्षा देने जैसे ग़ैर इस्लामी काम छोड़ने होंगे । प्राथमिकता घाटी की आज़ादी है न कि स्कूल की परीक्षा ।  लेकिन ख़ास ख़ास मामलों में कुछ बच्चों को परीक्षा देने की छूट भी दे दी गई । जिस स्कूल में हुर्रियत कान्फ्रेंस के सदर सैयद अहमद शाह गिलानी की पोती पढ़ती है , उस स्कूल को छेड़ा नहीं गया । ताकि गिलानी की पोती परीक्षा दे ले । आख़िर बच्ची के भविष्य का सवाल है । लेकिन शेष बच्चों को स्कूल जाने से रोकना जरुरी है । उद्देष्य स्पष्ट है । ग़रीब का बच्चा पढ़ेगा तो सोचेगा । सोचेगा तो समझेगा भी जरुर । एक बार वह समझ गया तो गिलानियों, हमदानियों, खुरासानियों और करमानियों की दुकान बन्द नहीं हो जायेगी ? पाकिस्तान और पाकिस्तान की पंजाबी सेना का स्वार्थी चेहरा भी बेनक़ाब हो जायेगा । लेकिन लगता है यह पाकिस्तान और आतंकी संगठनों की घाटी में अंतिम लड़ाई है जो धीरे धीरे घाटी के आम आदमी तथा वलोचिस्तान और गिलगित बल्तीस्तान के शोर में डूब जायेगी ।

कश्मीर घाटी में अलगाववाद व आतंकवाद के कारणों को जानने के लिए घाटी की जनसांख्यिकी की संरचना को ध्यान में रखना होगा ।  दरअसल अरब-ईरान से आने वाले लोग इस कश्मीर की मिट्टी में अपनी जड़ें नहीं जमा सके । वे बीच बीच में अपना शासन स्थापित करने  में तो सफल हुए लेकिन उनका मानसिक अलगाव बना रहा । कश्मीरी चाहे वह हिन्दु था या मुसलमान उसकी वंश परम्परा इसी घाटी में थी । अरब-इरानियों के साथ ऐसा नहीं था । उनकी वंश परम्परा अरब की मिट्टी से निकलती थी । कश्मीर के सैयद तो अपनी इस वंश परम्परा का आम कश्मीरी के आगे गौरव गान करने का अपना अधिकार मानते थे/हैं । यह गौरव गान स्थानीय कश्मीरियों को नीचा दिखाने के लिए ही था । और अब इस बात की चर्चा की जाए की जम्मू कश्मीर में वर्तमान में क्या हो रहा है ? कश्मीर घाटी में , विशेषकर दक्षिणी कश्मीर के दोस्ताना जिलों में जो हो रहा है । उसको समझने में घाटी की जनसांख्यिकी की संरचना सहायता कर सकती है । इससे अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि कौन से लोग इसमें शामिल हो सकते हैं और उनकी संख्या कितनी कम है ।

कुछ समय पहले जम्मू कश्मीर के अलगाववादी संगठनों के आह्वान पर कश्मीर घाटी में लम्बी हड़ताल हुई थी । यह हड़ताल लगभग छह महीने चली थी । अलगाववादी संगठनों को आशा थी कि पूर्ववर्ती सरकारों की तरह ही इस बार भी सरकार झुक जाएगी । समझौते के नाम पर बातचीत होगी और अलगाववादी संगठन जनता को बता सकेंगे कि सरकार को झुका दिया है । यह एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक लड़ाई थी । अलगाववादी संगठनों को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए सरकार के मुक़ाबले ऐसी छोटी मोटी लड़ाइयाँ जीतना जरुरी होता है । यदि जीत न भी हो तो कम से कम जीत का आभास तो होना ही चाहिए । तभी आम जनता का अलगाववादी संगठनों पर भरोसा बना रहता है । कश्मीर घाटी में आज तक की सरकारें अलगाववादियों को या तो जीत का अवसर देती रही हैं या फिर जीत का आभास होने देती हैं । यह पहली बार हुआ कि सरकार ने हड़ताल करने वालों से बातचीत नहीं की । आम जनता में ही अलगाववादियों का विरोध करना शुरु कर दिया । तब अलगाववादियों को हड़ताल का आह्वान वापिस लेना पडा । पिछले तीन दशकों में यह अलगाववादियों की पहली पराजय थी ।
अब अलगाववादियों ने लड़ाई का दूसरा मोर्चा खोला । इस बार लड़ाई और गंभीर हो गई थी । पत्थर मारने वालों को विशेष रुप से तैयार किया गया । रणनीति भी बदली गई । सेना और सुरक्षा बलों पर सार्वजनिक स्थानों पर हमले शुरु हुए । पुलिस वालों के घरों में घुस कर उनके परिवारों पर हमले शुरु हुए । आजकल कश्मीर घाटी में जो हो रहा है यह उसी दूसरी रणनीति का हिस्सा है । पत्थर मारने वालों की लड़ाई कश्मीर घाटी के महाविद्यालयों तक पहुँचाई गई है । दक्षिणी कश्मीर के कुछ महाविद्यालयों में वहाँ के छात्रों ने सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसाए । एक दो जगह तो लड़कियों के कालिज में भी पत्थरबाज़ी की यह घटना हुई । कुछ बैंकों को लूटा गया । कुछ जगह घाटी के राजनैतिक दलों मसलन नैशनल कान्फ्रेंस, पीडीपी, भारतीय जनता पार्टी के नेताओं पर आक्रमण किया गया । इस आक्रमण में कुछ लोग मारे भी गए । यह कश्मीर घाटी के अन्दर की लड़ाई है । इस अन्दर की लड़ाई में भी जब कभी आतंकवादी सुरक्षाबलों के घेरे में आ जाते हैं तो मुठभेड़ शुरु होती है । लेकिन सुरक्षा बलों का ध्यान बँटाने के लिए पत्थरबाज़ों के गिरोह उसी मौक़े पर सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसाते हैं । सुरक्षा बलों का ध्यान बँटते देख आतंकवादी कई बार भागने में कामयाब हो जाते हैं ।  पहली लड़ाई हड़ताल की थी और उसके बाद अब उसी लड़ाई का नया मोर्चा, आक्रमण का है । आक्रमण की लड़ाई क्योंकि प्रत्यक्ष दिखाई पड़ रही है , इसलिए उसकी चर्चा भी सबसे ज़्यादा हो रही है । सुरक्षा बलों पर पत्थर पडते देख कर कर कश्मीर घाटी के विशेषज्ञ कभी कभी निराश भी होने लगते हैं । उनके अनुसार घाटी सरकार के हाथ से निकलती जा रही है । लोग सुरक्षा बलों से भिड़ने के लिए सड़कों पर निकल आए हैं । घाटी के लोगों ने भारत को रिजैक्ट कर दिया है । यह जल्दी निष्कर्ष निकाल लेना होगा । लेकिन सबसे ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि घाटी के प्रमुख राजनैतिक दल अपने क्षणिक लाभ के लिए , इस स्थिति का लाभ लेते हैं और उसे हवा भी देने लगते हैं । कश्मीर घाटी में जब अलगाववादी पहली लड़ाई हारने के बाद दूसरी लडाई लड़ रहे हैं , तो नैशनल कान्फ्रेंस के फारुक अब्दुल्ला भी इसी मोर्चे में शामिल हो गए और पत्थरबाज़ों का समर्थन करने लगे और अपने लाभ के लिए सोनिया कांग्रेस भी अन्ततः अब्दुल्ला परिवार के पक्ष में ही खड़ी हो गई । अब्दुल्ला परिवार अब पत्थर फेंकने वालों और अलगाववादियों को आज़ादी के लिए लड़ रहे बहादुर बताने लगा है । इसका उसे क्षणिक लाभ भी हुआ है । श्रीनगर की लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में फारुक अब्दुल्ला जीत गए हैं । इससे उत्साहित होकर वे सीधे सीधे मैदान में निकल आए हैं । उनका कहना है सुषमा में पच्चीस जवान शहीद हुए नक्सलवादियों से लड़ते शहीद हुए , उसकी बात कोई नहीं करता लेकिन कश्मीर घाटी में तीन सैनिक शहीद हो गए तो सारे देश में बबाल मचाया जा रहा है । वैसे अब्दुल्ला ने शहादत शब्द का प्रयोग नहीं किया , उन्होंने सैनिक मारे गए ही कहा । अब्दुल्ला का मानना है कि यह सब मुसलमानों को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है । लेकिन कश्मीर घाटी के अन्दर और बाहर जो हो रहा है उसमें आपस में पूरा तालमेल है । बाहर से सीमा पर सीमा का उल्लंघन पाकिस्तान की सेना निरंतर कर रही है । उससे घाटी के अन्दर पत्थरबाज़ी करने वालों का उत्साहवर्धन तो होता ही है साथ ही उनमें आशा का संचार होता है कि शायद घाटी में भारत लड़ाई हार जाएगा । दो भारतीय सैनिकों के शवों को विकृत करना इसी मानसिकता की उपज है ।
लेकिन अलगाववादियों की इस दूसरी लड़ाई में कश्मीर घाटी के कितने लोग शामिल हैं , यह प्रश्न सब से ज़्यादा महत्वपूर्ण है ।  सूबे की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती कहती हैं कि वे पाँच प्रतिशत से ज़्यादा नहीं हो सकते । मुझे लगता है कि वे ठीक ही कहती हैं । लेकिन जो पाँच प्रतिशत लोग इन कामों में शामिल हैं , वे मुखर हैं । उनका प्रदर्शन सड़कों पर दिखाई  देता है । उनकी गोलियों से और पत्थरों से सुरक्षा बल के जो लोग घायल होते हैं या मारे जाते हैं , उसकी ख़बर चौबीस घंटे चलती है । इन सभी बातों का मनोवैज्ञानिक असर होता है । दूर से देखने वाले को लगता है कि घाटी हाथ से निकल रही है । पाकिस्तान भी और घाटी के अन्दर काम करने वाले उसके साथी भी यह सारा खेल दूर के दर्शकों को ही दिखाना चाहते हैं । दूर से खेल देख रहे देश , समय पाकर कह सकते हैं कि इस विवाद को सुलझाने के लिए वे अपनी सेवाएँ देने के लिए तैयार हैं । सेवाएँ देने की ऐसी जल्दबाज़ी कुछ देशों ने दिखाई भी है । पीछे तुर्की के प्रधानमंत्री भी इस कार्य के लिए त्तत्पर नज़र आने लगे थे । हल्की भाषा में अमेरिका भी आगे आया था ।
घाटी के भीतर अब्दुल्ला परिवार किसी भी तरह फिर आतंकवादियों व अलगाववादियों का विश्वास जीतना चाहता है । उसकी रुचि भी घाटी में फैल रहे उपद्रवों में बढ़ती जा रही है । अब्दुल्ला परिवार की इच्छा है कि किसी भी तरह केन्द्र सरकार राज्य में राष्ट्रपति राज लागू कर दे । नैशनल कान्फ्रेंस की दुश्मन नम्बर एक पीडीपी है । उसके लिए वह राष्ट्रपति राज के लिए भी तैयार है । लेकिन जैसा महबूबा मुफ़्ती ने कहा है कि अलगाववादियों की हरकतें घाटी के दस जिलों में दक्षिणी कश्मीर के केवल दो तीन जिलों तक सीमित है ।

दरअसल घाटी के कश्मीरियों का विश्वास भारत में ख़त्म नहीं हुआ है बल्कि उनका विश्वास वर्तमान सिस्टम से उठ गया है । कश्मीर घाटी में भ्रष्टाचार इतना ज़्यादा है जितना देश में शायद और कहीं न हो । केन्द्र से जितना पैसा आता है , घाटी के कुछ अरब-ईरानी परिवार ही  ईमानदारी से आपस में मिलकर बाँट खा लेते हैं । जनता तक वह पैसा नहीं पहुँचता है । श्रीनगर से बाहर विकास के नाम पर कुछ नहीं है । इसलिए आम लोगों के मन में सिस्टम के प्रति पिछले छह सात दशकों से ग़ुस्सा बढ़ता गया है और अन्ततः वह निराशा में बदल गया है । उस निराशा के क्षणों में अलगाववादी उनके हाथ में पत्थर दे देते हैं । बहुत लोगों को ध्यान में होगा कि जिन दिनों जम्मू कश्मीर में जगदेव राज्यपाल थे तो उन्होंने कश्मीर घाटी में भी सुशासन की ओर काम करना शुरु कर दिया था । उससे आम जनता को विश्वास होने लगा था कि उनके लिए भी घाटी में कुछ करने  की आशा है । लेकिन इससे वहाँ के सभी राजनैतिक दलों को ख़तरा पैदा हो गया कि वे घाटी में अप्रासांगिक हो जाएँगे या फिर उन्हें भी स्वयं अपनी दिशा बदलनी होगी । अलगाववादियों के अस्तित्व के लिए ही ख़तरा पैदा हो गया था । जगमोहन का विरोध करने वाले भी यही दल थे और सड़कों पर जगमोहन मुर्दाबाद का नारा लगाने वाले भी वही लोग थे जिनके बच्चे आज पत्थर मार रहे हैं । उनकी संख्या और चेहरे लगभग वही हैं । आज भी वही स्थिति है । अलगाववादियों का समर्थन करने वाले आज भी उतने हैं । लेकिन वे चिल्लाते ज़ोर से हैं इसलिए सारे देश में सुनाई पड़ते हैं । वर्तमान सरकार यदि सुशासन ला पाती है तो यह चिल्लाहट स्वयं बन्द हो जाएगी । तब कश्मीर की आम जनता सरकार के साथ होगी । अलगाववादी और पत्थरबादी अपने आप अलग थलग पड़ जाएँगे ।

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